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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 318 में से

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पृष्ठ 93

⑨
अथ कर्णवेध-संस्कारविधिं
वक्ष्यामः
अत्र प्रमाणम्—
कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा॥
यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥
बालक के कर्ण वा नासिका के वेध का समय जन्म से
तीसरे वा पाँचवें वर्ष का उचित है।
जो दिन कर्ण वा नासिका के वेध का ठहराया हो, उसी
दिन बालक को प्रातःकाल शुद्ध जल से स्नान और वस्त्रालङ्कार
धारण कराके बालक की माता यज्ञशाला में लावे। पृष्ठ ९-
३७ तक लिखा हुआँ सब विधि करे और उस बालक के आगे
कुछ खाने का पदार्थ वा खिलौना धरके—
ओं भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः।
स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाग्ँ स॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑महि दे॒वहि॑तं॒ यदायु॑ः॥
इस मन्त्र को पढ़के चरक-सुश्रुत वैद्यक ग्रन्थों के जाननेवाले
सद्वैद्य के हाथ से कर्ण वा नासिका वेध करावें कि जो नाड़ी
आदि को बचाके वेध कर सके। पूर्वोक्त मन्त्र से दक्षिण कान,
और—
ओं व॒क्ष्यन्ती॒वेदा ग॑नीगन्ति॒ कर्णं॑ प्रि॒यग्ँ सखा॑यं परि षस्वजा॒ना।
योषे॑व शि॒ङ्क्ते वित॒ताधि॒ धन्व॒ञ्ज्या इ॒यग्ँ सम॑ने पा॒रय॑न्ती॥
इस मन्त्र को पढ़के दूसरे वामकर्ण का वेध करे।
तत्पश्चात् वही वैद्य उन छिद्रों में शलाका रक्खे कि जिससे
छिद्र पूर न जावें और ऐसी ओषधि इसपर लगावे जिससे कान
पकें नहीं और शीघ्र अच्छे हो जावें॥
॥ इति कर्णवेधसंस्कारविधिः समाप्तः ॥