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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished750 pages

४२-वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान

Page 463Permalink

४२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


तुम ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके योग्य हो तो मुझ परमेश्वर-की आत्माको और अपनी आत्माको एकरसकर अखण्ड परिपूर्णात्माका तत्काल आश्रय ले लो। 'यह मैं हूँ' और 'यह भी मैं हूँ' इत्यादि जो कुछ मैं कहता हूँ, वह सब इस आत्मतत्त्वका ही उपदेश मैं तुम्हें देता हूँ। मैं समझता हूँ कि मेरे उपदेशसे तुम भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके हो, ब्रह्मपदमें विश्रान्ति पा चुके हो और सर्व-संकल्पोंसे भी मुक्त हो चुके हो। अब तुम सत्य एवं अद्वितीय आत्मस्वरूप होकर स्थित रहो एवं सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त और सबको समभावसे देखनेवाले तुम आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखो—अर्थात् एक परमात्माके सिवा और कुछ नहीं है, ऐसा समझो। क्योंकि जो पुरुष 'सब कुछ ब्रह्म ही है' 'मैं भी ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार एकीभावका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित परमात्माको भजता है, वह सब प्रकारसे व्यवहार करता हुआ भी पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। 'सर्व' शब्दका अर्थ है—एकत्व और वह एकत्व परमात्माका वाचक है। वह परमात्मा प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेके कारण सत् भी नहीं कहा जा सकता और ध्रुव सत्य भावरूप होनेके कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता; अतः वह सत्-असत्‌से विलक्षण है। वह जिसके अनुभवमें आ जाता है, उसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। जो तीनों लोकोंके अन्तःकरणके भीतर स्थित हुआ प्रकाश देता है और जो ज्ञानियोंके अनुभवमें प्रत्यक्ष है, निश्चय ही वही मैं परमात्मा हूँ।

सम्पूर्ण शरीरोंके भीतर जो दृश्य संसारसे रहित और सूक्ष्मरूपसे व्यापक अनुभवस्वरूप है, वही यह सर्वव्यापी परमात्मा है। बाहर-भीतर प्रकाश करनेवाला तेजस्वरूप मैं देहोंके भीतर प्रत्यक्ष विद्यमान रहता हुआ भी प्रतीत नहीं होता। जिस तरह हजारों घड़ोंके बाहर और भीतर आकाश समभावसे व्यापक है, उसी तरह भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्‌में स्थित शरीरोंके भी बाहर और भीतर मैं व्यापक हूँ; किंतु लाखों देहोंके भीतर सम-भावसे व्यापक हुआ भी यह परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत नहीं होता। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितना भी पदार्थ-समूह है, उसमें जो समभावसे नित्य स्थित है, विद्वान्‌लोग उसे ही नित्य चिन्मय परमात्मा जानते हैं। विनाशशील पदार्थोंमें साक्षीकी भाँति समभावसे स्थित अविनाशी परमात्माको जो देखता है, वही यथार्थ देखता है। पाण्डुनन्दन ! 'समस्त शरीरोंमें चेतन ही मैं हूँ, शरीर मैं नहीं हूँ' इस प्रकार जो मैं कहता हूँ, वह अद्वितीय परमात्मा मैं सबका आत्मा हूँ। तुम मुझे इस प्रकार तत्त्वतः जानो। जिस प्रकार पर्वतोंका वास्तविक स्वरूप पाषाण ही है, वृक्षोंका स्वरूप काष्ठ ही है और तरङ्गोंका स्वरूप जल ही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप परमात्मा ही है। जो पुरुष परमात्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको परमात्मामें कल्पित देखता है एवं आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है। अर्जुन ! नाना प्रकारके आकार-विकारों-वाले तरङ्गोंमें जैसे जल व्यापक है या कडे-कुण्डल आदिमें सुवर्ण व्यापक है, वैसे ही विविध प्रकारके समस्त प्राणियोंमें परमात्मा समभावसे व्यापक है। तथा जिस प्रकार जलमें नाना प्रकारके चञ्चल तरङ्ग-समूह हैं या सुवर्णमें कडे-कुण्डल आदि हैं, उसी प्रकार परमात्मामें ये समस्त भूत-प्राणी भी हैं। इसलिये भारत ! सम्पूर्ण पदार्थ और भूत-प्राणी एवं परम ब्रह्म—इन सबको एकरूप ही जानो, इनमें लेशमात्र भी पृथक्त्व नहीं है। इस प्रकारके उपदेशोंको सुनकर और निश्चयपूर्वक भीतर अभय ब्रह्मकी भलीभाँति भावना करके समबुद्धि महात्मालोग जीवन्मुक्त होकर इस संसारमें विचरा करते हैं। जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है, जिनकी