रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
About this granth
Rasikapriya (रसिकप्रिया) is Keshavdas's Braj Bhasha treatise on the erotic sentiment (shringara rasa), written in the late sixteenth century under the patronage of Prince Indrajit Singh of Orchha. It became the model for describing types of heroes and heroines in Hindi Riti poetry, later poets followed its scheme, and its scenes were painted widely in Rajasthani and Pahari miniatures.
Its sixteen prabhavas treat the nature of rasa and the kinds of shringara, the types of hero, the companion and the messenger, the types of heroine and their gestures, the eight situations of the heroine such as one whose lover is devoted, one betrayed and one who waits adorned, the lover's pique and its appeasement, and love in union and separation. For each definition Keshav gives his own verses on Radha and Krishna.
This edition carries the Priyaprasad commentary of Acharya Vishwanath Prasad Mishra, the noted critic and editor of Riti poetry, and runs to 286 pages.
२४२ रसिकप्रिया
सागर बना दिया । तुम्हारा यौवन ही नदी का भीषण प्रवाह है, जिसमें
पूर्वराग से युक्त होना ही जल है । इस नदी को पार करने के लिए मनोरथ
का ही जहाज है, आतुरता ही आवर्त्त है । इसी प्रकार उसमें अनेक भय
( के कारण ) भरे हुए हैं । तर्क की ऊँची लहरें उठ रही हैं बड़े बड़े कष्ट ही
दीर्घकाय जलजंतु हैं ( तेरे यौवन की इस नदी के जा मिलने से नायक अब
शोक के समुद्र ही हो गए हैं ) ।
सूचना—श्रीकृष्ण को शोक-समुद्र ( करुणा-वरुणालय ) कहने से करुणा-
विरह और बहिरंग सखी की उक्ति होने से प्रकाश है ।
अलंकार—सांग रूपक ।
अथ प्रवासविरह-लक्षण—( दोहा )
(३६६) केसव कौनहु काज तें, पिय परदेसहिं जाइ ।
तासों कहत प्रवास सब, कबि कोबिंद समुझाइ ।७।
सूचना—इसके बाद हस्तलिखित प्रति और लीथोवाली प्रति में यह
सवैया दिया गया है, जो मुद्रित प्रतियों में नहीं है—
जानै कहा मेरी दीरघ साँस लै नैन नवाइ दुकाइ बिथाहू ।
माथौ न दुखिहै सूघे निहारौ पखारौ नहीं मुख जौ न अन्हाहू ।
ऐसें ही केसव क्यों रहै प्रान सु आपनी पीर सुनावहु काहू ।
काहे तें भोर को भोजनौ छोड़यो तौ पानो न पीवौ जौ पान न खाहू ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४००) तूँ करिहै कहि धौं कब गौनहि नंदकुमार तौ गौन कियोई ।
मोहि महा डर तो डर को न रहै लटि लै जिनि को धौं लियोई ।
ऐसी न बूझियै केसव तोहि बिचारै जु बीच बिचार बियोई ।
तेरे ही जीय जियै जिनको जिय रे जिय ता बिन तूँ ब जियोई।८।
शब्दार्थ—गौनहि = गमन । लटि = क्षीण होकर । बियो = दूसरा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति प्राण से ) हे प्राण, नंदकुमार तो गए,
अब तू कब गमन करेगा ? मुझे तो बड़ा डर तेरे हृदय का है । कहीं वह
दुर्बलता-क्षीणता का बहाना लेकर रह न जाय, प्रत्युत उसने यह बहाना ले ही
लिया । तुझे वैसा नहीं करना चाहिए जैसा तू इस समय दूसरे प्रकार का
विचार करके करने लगा है ( गमन न करके रहना चाहता है ) । तेरे ही जी
८—कहि-कब । कब-कहि । मोहि-मोहि तो मोह । रहै-रह्यो । लै जिनि
कौ धौं-लाभ । ऐसी-ऐसो । बिचारै-बिचारयो ।
एकादश प्रभाव २१३
से जिनका जी जीता है (जो तुझे प्राणों की भाँति प्यार करते हैं) ऐसे
श्रीकृष्ण के बिना भी तू अब भी जी रहा है ? (यह कार्य ठीक नहीं) ।
सूचना—'नंदकुमार तौ गौन कियोई' से प्रवासविरह । प्राणों के प्रति
उक्ति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रवासविरह-वर्णन, यथा—(कवित्त)
(४०१) कौन कें न प्रीति, को न प्रीतमहिं बिछुरत,
याही कें अनोखो पतिव्रत गाइयत है ।
केसौदास जतन कियैं ही भलें आवै हाथ,
और कहा पच्छिनि के पाछें धाइयत है ।
उठि चलि जौ न मानै काहू की बलाइ जानै,
मानसै जु पहिचानै ताकें आइयत है ।
याकें तौ है आजु ही मिलौं कि मरि जाउँ ऐसें,
आगि लागें मेरी माई मेह पाइयत है ।६।
शब्दार्थ—कौन कें०= किसके (हृदय में) प्रेम नहीं होता। को न
प्रीतमहिं बिछुरत = किसे प्रियवियोग नहीं होता। जतन······धाइयतु है =
(पिंजड़े से निकलकर उड़ जानेवाला) पक्षी यत्न करने से ही हाथ आता
है, नहीं तो क्या कोई पक्षी के पीछे पीछे दौड़ता फिरता है (अर्थात् नहीं) ।
बलाइ=बला। उठि चलि० = यदि नहीं मानती है तो चल उठ चलूं, किसी
की बला जाने (मुझे क्या)। मानसै= मनुष्य को। मानसै जु० = जो
मनुष्य को पहचाने उसी के यहाँ आया जाता है (यह तो जैसे आदमी ही नहीं
पहचानती) । मरि जाउँ = मर जाऊँ (मरकर जा मिलूँ) । माई = संबोधन
में । मेह = (मेघ) जल । आगि लागें० = भला कहीं आग लगने पर (मनाने
से) पानी बरसता है ।
उक्ति—सखी की उक्ति सखी से ।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सूचना—सखियों की परस्पर बातचीत है, अतः बात बाहर तक पहुँच
चुकी है इसी से प्रकाश है ।
श्रीराधिकाजू को विरह-भयविभ्रम, यथा—(सवैया)
(४०२) कोकिल केकी कुलाहल हूल उठी उर में मति की गति लूली।
केसव सीत सुगंध समीर गयो उड़ि धीरज ज्यों तन तूली।
६—याही कें-तेरे ही । कियैं ही-करें ही। चलि-चलौ। मानसै-मान
सों। तौ है०-तो है नोखो व्रत । ऐसें-माई, × । माई-आली ।
२१४ रसिकप्रिया
जै मुनि जै मुनि कै बची जोन्ह की जामिनी, पै न अजौं सुधि भूली ।
क्यों जियै कैसो करौं बहुरचौ बिष सी बिसनी बिसवासिनी फूली ।१०।
शब्दार्थ-केकी=मयूर । कुलाहल = (कोलाहल) शोर । हूल = पीड़ा ।
लूली=पंगुल । तूली = रूई (वाला) । मुनि = अगस्त्य मुनि । बिष सी=विष
की भाँति कष्टदायिनी । बिसनी = कमलिनी । बिसवासिनी = ( ब्रजभाषा का
विशिष्ट प्रयोग ) विश्वासघातिनी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, कोयल और मोरों
का कोलाहल सुनकर उस विरहिणी नायिका के हृदय में पीड़ा होने लगी और
उसकी बुद्धि पंगु हो गई (वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई) । शीतल एवम् सुगंधित
वायु के चलने से शरीर से धैर्य रूई की भाँति उड़ गया । ( उस दिन तो समुद्र
का शोषण करनेवाले ) अगस्त्य मुनि का बार-बार जयकार करके वह उस
चाँदनी रात्रि में बची (क्योंकि चंद्रमा समुद्र का पुत्र है, अपने पिता के शोषक
के नाम से डर जाएगा) पर उस दिन उसे जो कष्ट उस चाँदनी रात्रि से मिला
उसके कारण वह उसे आज तक भूल नहीं सकी । अब ( प्रभात के समय )
वह कैसे जी सकेगी और क्या करेगी, क्योंकि विष की भाँति मार डालनेवाली
विश्वासघातिनी कमलिनी भी फूलने लगी है ।
सूचना -विरहावस्था में संयोग की सुखदायिनी वस्तुएँ दुःखद हो जाती हैं ।
इसी का वर्णन केसवदासजी ने 'विरह-भयविभ्रम' नाम से अलग कर दिया है ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४०३) जिनि बोलि सुबोल अमोल, सबै अँग केलिकलोलनि मोल लिये ।
जिनको चित लालची लोचन रूप अनूप पियूष सु पोय जिये ।
जिनके पद केसव पानि छियैं सुख मानि सबै दुख दूरि किये ।
तिनको सँग छूटत ही फिटु रे फटि कोटिक टूक भयो न हिये ।११।
शब्दार्थ—छियैं = छूने पर । छूटत = छूटने से । फिटु = धिक्कार ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति आत्मगत ) जिन्होंने सुंदर अमूल्य वाणी
बोलकर और क्रीड़ा के कल्लोल ( मुद्राओं ) से मेरे सभी अंग मोल ले लिए
( जिनकी वाणी और मुद्रा पर मेरा शरीर निछावर था ), जिनके अनेक रूप
( सौंदर्य ) के अमृत का नेत्रों द्वारा पान करके मेरा लालची चित्त जीता रहा,
जिनके चरणों को हाथ से छूकर सब दुःख दूर करके मैंने सुख माना उनका
१०—जैमुनि०-जामनि जामनि । जियै-जियो । करौ करे । बिसनी-
बिनसी । ११—बिनके पद-जिनको पद । छियैं-छवै, हिये । छूटत-फूटत ।
फिटु-फिटि ।
साथ छूटने पर भी ऐ हृदय तू फटकर करोड़ों टुकड़े नहीं हो गया, तुझे
धिक्कार है ।
सूचना- मन के प्रति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रवासविरह, यथा- ( सवैया )
(४०४) केसव क्योंहूँ चलैं चलि कोरि संदेस कहैं फिरि पैंडक दू पर ।
आगें धरैं अपनौ सो कै साहस पाछेहीं पेलि परै पग भू पर ।
होत जहाँ तहीं ठाढ़े ठगे से चलौ न कह्यो परै कान्ह हितू पर ।
लोक की लाज फिरयो न परै पै मिलान करैं अधकोसक ऊपर ।१२।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ । पैंड़क दू पर = दो डग चलने पर । पेलि =
बरबस । कान्ह हितू पर = प्रिय कृष्ण से । फिरयौ न परै = लौटा नहीं जाता ।
मिलान करैं = पड़ाव डालते हैं । अधकोसक ० = आधे कोस पर ।
भावार्थ- (सखी-वचन सखी से) किसी प्रकार श्रीकृष्ण चलते हैं और
दो पग चलने पर ही लौटकर करोड़ों ( अनेक ) संदेश कह डालते हैं । अपने
साहस से आगे को पैर रखते हैं, पर बलपूर्वक वह पृथ्वी पर पीछे ही पड़ता
है जहाँ जहाँ वे ठगे से खड़े हो जाते हैं और उनसे ( साथवाली सखी या
प्रेमिका से ) 'चलो' ( लौट जाओ ) कहते नहीं बनता । लोक लज्जावश
उनसे भी लौटते नहीं बनता इसलिए वे आधे आधे कोस पर पड़ाव डालते हुए
जा रहे हैं ।
सूचना-( १ ) सखियों तक बात पहुँच गई है ( सब जानते हैं ),
अतः प्रकाश है । ( २ ) हस्तलिखित प्रति में इसके बाद यह दोहा है-
खान पान परिधान पुनि, जान जान दुति अंग ।
सुभ संजोग बियोग बिन जानौ सुख तिय संग ॥
श्रीकृष्णजू को विरह-भयविभ्रम, यथा- ( सवैया )
(४०५) प्रेत की नारि ज्यों तारे अनेक चढ़ाइ चलै चितवै चिहुँघातो ।
कोढ़िनि सी ककुरे कर कंजनि केसव सेत सबै तन तातो ।
भेटतहीं बरहीं अबहीं तौ बरषाइ गई ही सुखै सुख सातो ।
कैसी करौं कहि कैसें बचौं बहुरयौ निसि आई कियें मुँह रातो ।१३।
१२-फिरि-पुनि । पेंडक०-पेंडक ऊपर, पेंडकहू पर । सो कै-कै सु ।
कान्ह०-कान्हहि तूपुर । अध-दस । १३ -- चलै-चली । तो-तें । ककुरे-सकुरे ।
अबही-तबही । ही सुखै०-संग ही सुख, ही सुखै सुध । बचौं = जियों ।
२१६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—तारे = नक्षत्र, नेत्र की पुतली । चितवै चहुँघातो = चारो तरफ
देखती है । ककुरे = सिकोड़े हुए । तातो = तप्त । भेटतहीं = भेंट करते ही, छूते
ही । बरहीं = बलपूर्वक । बरचाइ गई = कठिनता से गई थी, मुश्किल से हटी
थी । सुखै = सुखाकर, नष्ट करके । बहुरचौ = फिर, पुन: । सुख सातो = सात
प्रकार के सुख (खान-पान परिधान पुनि ज्ञान गान द्युति अंग । सुभ संयोग
वियोग बिन, सातो सुख तिय संग )। हस्तलिखित प्रति में यह दोहा मूल में
है । रातो = रक्त, लाल ।
भावार्थ—( नायक-वचन सखी प्रति ) प्रेतिनी की भाँति अनेक (नेत्र
के) तारों को चढ़ाए हुए (नक्षत्रों से युक्त) चारो ओर देखती चल रही है ।
कोढ़िन (स्त्री) की भाँति कर रूपी कमलों को सिकोड़े हुए है (रात में
कमल संकुचित हो जाते हैं) । इसका सारा शरीर (कुष्ठ के कारण) श्वेत
है (चाँदनी फैली है) । शरीर तप्त है (विरह के कारण चाँदनी तप्त जान
पड़ती है) । अभी बरबस मुझे छूते ही सातो सुख नष्ट कर, बड़ी कठिनाई से
गई थी । मैं क्या करूँ, कैसे अपने को बचाऊँ वह रात्रि (पिशाचिनी) फिर
लाल मुँह किए (ललाईयुक्त, उदित होते हुए चंद्रमा से युक्त) आ गई ।
सूचना—विरह में सात सुख दुःखद माने जाते हैं—
नींद, सेज, सुमनो, समा, संगति, सालि, सुगंध ।
सात बियोगिन कों करत, महा बिरह तें अंध ।। (-सरदार की टीका
श्रीराधिकाजू की निद्रा, यथा—(सवैया)
(४०६) आएँ तें आवैंगी आँखिन आगेंही डोलिहै मानहु मोल लई है ।
सोवै न सोबन देइ न यों तब सोवन में उन साथ दई है ।
मेरियै भूलि कहा कहौं केसव सौति कहूँ तें सहेली भई है ।
स्वारथ ही हितु है सबकें, परदेस गएँ हरि नींदौ गई है ।१४।
शब्दार्थ—आएँ तें = प्रियतम के आने पर । मानहु मोल लई है = मानो
मोल ले ली गई है अर्थात् क्रीतदासी की भाँति है । सोवै = ( यह ) सोती थी,
सोना चाहती थी ( प्रिय के पास ) । तब = जाते समय । सोवन में = सोने के
समय । उन = प्रिय ने ।
भावार्थ—( नायिका-वचन सखी से ) हे सखी, प्रिय के आने पर वह
नींद आएगी और क्रीतदासी की भाँति आँखों के आगे नाचा करेगी, पर इस
१४—डोलिहै-डोलैगी । सोवै-सोऊँ । देइ-देउँ । न यों-न ज्यों, सखी ।
मेरियै-मेरी सों ।
एकादश प्रभाव २१७
समय नहीं आती । (उस समय वह पति के पास सोने की बहुत इच्छा रखती
थी) उनके पास सो जाती थी, पर मैं उसे सोने नहीं देती थी । इसलिए
विदेश जाते समय (चित्त में कोई खटका न हो) इसलिए वे उसे मेरे साथ
सोने के लिए दे गए हैं । पर इसमें भी मेरी ही भूल है, भला कहीं सौत सखी
हुई है । सबको स्वार्थ ही प्रिय होता है, प्रिय के परदेश चले जाने पर वह
नींद भी उड़ गई है । (वह भी मेरा साथ नहीं देती) ।
श्रीकृष्णजू की निद्रा, यथा-( सवैया )
(४०७) केसव कैसहूँ कोरि उपाइन जानि सु तौ उर लागति है ।
चकचौंधत सी चितवै चित में चित सोवतहूँ महँ जागत्ति है ।
परदेश प्रिया पल मोहिं पत्याति न जानै को याकी कहा गति है ।
तजि नैननि नींद नवोढ़बधू लहुँ अधिक राति तें भागति है ।१५।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ों । आनि = आकर । सु तौ = वह तो (नींद)।
परदेस प्रिया = प्रिया के परदेश में होने से (विरह के कारण), यह प्रिया
(नवोढ़ा वधू निद्रा) परदेश में है (पिता के घर से पति के घर आई है) ।
लहुँ = लौं, समान ।
भावार्थ-(नायक-वचन स्वगत या मित्र से) किसी प्रकार करोड़ों
उपाय करने पर तो यह छाती से आकर लगती है। (छाती से लगने पर) चित्त
में चकपकाती हुई सी देखा करती है (सोती नहीं, पूरी नींद आती नहीं) सोने
पर भी चित्त से जागती रहती है, सावधान रहती है (बारबार उचट जाती
है) । प्रिया के परदेश में होने से यह मुझ पर क्षण भर के लिए भी विश्वास
नहीं करती । न जाने इसकी कैसी चालढाल है । नेत्रों को त्याग कर नवोढ़ा
वधू की भाँति निद्रा आधी रात से ही चुपचाप शीघ्रता से भाग जाती है ।
अलंकार - रूपक ।
श्रीराधिकाजू की सखी की पत्री, यथा-(सवैया)
(४०८) केसव कुँवर बृषभानु की कुँवरि आजु,
देवता ज्यों बन उपबन बिहरति है ।
कमल ज्यों थिर न रहति कहूँ एक छिन,
कमलाग्रजा ज्यों कमलनि तें डरति है ।
काली ज्यों न केतकी के फूल रुचैं, सीता जू ज्यों
निसिचर-मुख तिन देखे ही जरति है ।
१५-अधिक ०- आवत ही निसि ।
२१८ रसिकप्रिया
बदन उघारतहीं 'मदन-सुयोधनहों,
द्रौपदी ज्यों नाम मुख तेरो ही ररति है ।१६।
भावार्थ—कुँवर = श्रीकृष्ण। वृषभानु की कुँवरि = राधिका । देवता =
देवी । बिहरति है=बिहार करती है । कमला = लक्ष्मी । कमलाग्रजा = लक्ष्मी
की बड़ी बहन, दरिद्रा । काली = काली देवी ( इन्हें केतकी का फूल नहीं
चढ़ता, यह पौराणिक मत है) । निसिचर=राक्षस, रात्रि में चलनेवाला (चंद्रमा
का विशेषण ) । बदन = शरीर । उघारतहीं = खोलने का प्रयत्न करते ही ।
मदन = काम रूपी । सुयोधनहीं = दुर्योधन के द्वारा । ररति = रटती है ।
अलंकार—भिन्नधर्मा मालोपमा ।
सूचना—( १ ) दरिद्रा को 'कमलाग्रजा' कहते हैं । पर कई प्रतियों में
'कमलानुजा' पाठ ही मिलता है । वह केवल प्रमाद जान पड़ता है ।
( २ ) कमलों से वह इसलिए डरती है कि उसे शोभा नहीं भाती ।
पुनर्यथा—(कबित्त)
(४०६) भौरिनी ज्यों भँवत रहति बन बीथिकानि,
हंसिनी ज्यों मृदुल मृनालिका बहति है।
पीउ पीउ रटति रहति चित चातकी ज्यों,
चंद चितै चकई ज्यों चुप ह्वै रहति है।
हरिणी ज्यों हेरति न केसरि के काननहि,
केका सुनि ब्याली ज्यों बिलानहीं चहति है।
केसव कुँवर कान्ह बिरह तिहारे ऐसी
सूरति न राधिका की मूरति गहति है ।१७।
शब्दार्थ—भँवत रहति = घूमती ही रहती है । वीथिकानि = गलियों में ।
मृनालिका = कमलनाल । बहति है=धारण करती है (जैसे हंसिनी मृणाल
लेकर उसे खेलते खेलते तोड़ डालती है वैसे यह भी उसे लेकर तोड़ डालती
है) । हेरति न=नहीं देखती । केसरि के काननहि=सिंह के वन को (हरिणी
के पक्ष में) ; केसरवाले वन को ( नायिका के पक्ष में) । केका = मोर की
वाणी । ब्याली = सर्पिणी । बिलानहीं चहति है = बिलों को ही देखने लगती है
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१६—सखी की पत्री-श्रीराधिकाजू की प्रकाश पत्री, प्रिया को विरहनिवेदन ।
आजु-बन । कहूँ-कान्ह । दिन-ठौर । डरति-जरति, दुरति । रुचै-सुँघै । मुख
तिन-मुखचंद, चंदमुख । जरति-रति । १७—भौरिनी०-भौँरि ज्यों भंवति
है भवन । बहति-चहति । काननहि-कानन को । चहति-कहति ।
एकादश प्रभाव २१६
(छिप जाने के लिए) या छिपना चाहती है; नष्ट हो जाना चाहती है
(नायिका के पक्ष) । ऐसी = वह ऐसी हो गई है कि । सूरति = सुधि, चेतना ।
भावार्थ-(सखी का पत्र नायक को) हे कुँवर कान्ह, आपके विरह में
उसकी ऐसी दशा हो गई है कि वह भौंरी की भाँति वन-वीथिकाओं में घूमा करती
है । हंसिनी की भाँति मृणाल धारण करती है (तोड़ती रहती है) । चातकी
की भाँति 'पी पी' (शब्द और प्रिय का नाम) चित्त में रटा करती है । चंद्रमा
को देखकर चकई की भाँति चुप हो जाती है । हरिणी की भाँति केसरि-कानन
को (सिंह जिस वन में रहता है, जिस वन में केसर होती है उसे) देखती
नहीं । मोर की केका सुनकर सर्पिणी की भाँति 'बिलान ही' चाहती (बिलों
की ओर देखती है; नष्ट हो जाना चाहती है) । राधिका की मूर्ति चेतनाहीन
होती जा रही है होश-हवास ठिकाने नहीं हैं।
अलंकार-भिन्नधर्मा मालोपमा ।
श्रीकृष्णजू की सखी की पत्री, यथा- (कबित्त)
(४१०) दीरघ दरीनि बसैं केसवदास केसरी ज्यों,
केसरी कों देखि बनकरी ज्यों कपत हैं।
बासर की संपदा उलूक ज्यों न चितवत,
चकवा ज्यों चंद चितै चौगुनो चपत है।
केका सुनि ब्याल ज्यों बिलात जात घनस्याम,
घननि की घोरनि जवासे ज्यों तपत हैं।
भौंर ज्यों भँवत बन जोगी ज्यों जगत निसि,
साकत ज्यों स्याम नाम तेरोई जपत हैं।१८।
शब्दार्थ-दीरघ = (दीर्घ) बड़ी, गंभीर । दरीन = गुफाएँ । केसरी =
सिंह; केसर । करी = हाथी । बासर = दिन । संपदा = शोभा । चपत हैं =
दुखी होता है । बिलात जात=छिपता जाता है; गलते या नष्ट होते जाते हैं ।
घोर = गर्जन से । तपत = जलता है । साकत = शक्ति के उपासक, शक्ति ।
भावार्थ-(कृष्ण की सखी की पत्रिका राधिका को) सिंह की भाँति
बड़ी बड़ी कंदराओं में (एकांत में) रहते हैं। केसरी (सिंह) को देखकर
जैसे जंगली हाथी काँपता है वैसे ही केसर को देखकर ये काँपते हैं। उल्लू
जैसे दिन की शोभा नहीं देखता वैसे ही ये भी दिन में आँखें मूंदे पड़े रहते हैं।
१८-सखी की पत्री-प्रिय को विरहनिवेदन, श्रीकृष्ण की पत्री, श्रीकृष्ण
की सखी की पत्री राधिका सों। केसोदास-केसोराइ । संपदा-संपति ।
उलूक-चकोर । चितै-ही तें । निसि-रैनि । साकत-चातक ।
२२० रसिकप्रिया
चक्रवाक की भांति चंद्रमा को देखकर अत्यंत दुखी होते हैं। मोर की वाणी
सुन जैसे सर्प बिलों में छिप जाता है वैसे ये भी गलते जाते हैं। बादलों की
ध्वनि से जवासे की भांति जल उठते हैं। भौंरे की भांति वन में घूमते हैं,
योगी की तरह रात में जागते हैं और शक्ति की भाँति तेरा ही नाम जपा
करते हैं।
अलंकार—भिन्नधर्मा मालोपमा ।
सूचना—'रामचंद्र-चंद्रिका में 'स्याम के स्थान' पर 'राम' रखकर इसे
राम के विरह-निवेदन का छंद बना दिया गया है।
( दोहा )
(४११) केसवदास प्रवास को, कह्यो जथामति साज ।
राधा-हरि बाधाहरन, बरनौ सखी-समाज ॥१६॥
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां संभोगशृंगार-
प्रवासवर्णनं नामैकादशः प्रभावः ॥११॥
द्वादश प्रभाव
अथ सखी-वर्णन-( दोहा )
(४१२) धाइ, जनी, नाइन, नटी, प्रगट परोसिनि नारि ।
मालिनि, बरइनि, सिल्पिनी, चुरिहेरनी, सुनारि ॥१॥
(४१३) रामजनी, संन्यासिनी, पटु पटुवा की बाल ।
केसव नायक नायिका, सखी करहिं सब काज ॥२॥
शब्दार्थ—धाइ = धात्री । जनी = दासी, खवासिन । सिल्पिनी =
चितेरिन, चित्र बनानेवाली । चुरिहेरनी = चुड़िहारिन । रामजनी = जिसके
जनक का पता न चलता हो । पटु = चतुर । पटुवा की बाल = पटहारे की स्त्री
पटहारिन ।
धाइ को बचन राधिका सों, यथा-( सवैया )
(४१४) मोहन-साथ कहा निसि-द्योस रहै सतरंजहि के मिस बैठी ।
केसव क्योंहूँ सुनै महतारी तौ राखहि री घर ही महँ पैठी ।
२—पटु-बटु । पटुवा-पटवा । करहि-करौ ।
द्वादश प्रभाव २२१
हौं सिखऊँ सुखदै सिख तोहि तें भौंह चढ़ाइ कै डीठि अनैठी।
को न लड़ैती सरूप न काहितुहीं कछु जाति अकासहि ऐंठी।३।
शब्दार्थ—मिस=बहाने से। घर ही=घर में डाल रखेगी, बाहर न
निकलने देगी। सुखदै=हितकारी। अनैठी=अनिष्ट की, तनेनी की। लड़ैती=
दुलारी। सरूप=सुंदर।
भावार्थ=(धात्री की उक्ति नायिका प्रति) तू शतरंज खेलने का बहाना
करके रातदिन मोहन के साथ बैठी रहती है। यदि कहीं तेरी माता सुन लेगी
तो फिर घर में डाल रखेगी (बाहर फटकने भी न देगी)। मैं तो तुझे हितकर
शिक्षा देती हूँ और तू उलटे भौंहें चढ़ाकर मेरे ही ऊपर आँखें तनेनी कर रही
है। कौन लाड़-प्यार से पली दुलारी लड़की नहीं है, कौन रूपवती नहीं है,
पर तू ही कुछ ऐंठकर आकाश में चढ़ी जा रही है (सभी लाड़िली और सुंदर
होती हैं, पर ऐसे ऐंठते तो किसी को न देखा)।
सूचना—'लड़ैती' कहने से यह धाय की उक्ति मानी जायगी।
धाइ कों वचन कृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४१५) थोरी सी सुदेस बैस दीरघ नयन केस,
गौराजू सी गोरी भोरी भवजू की सारी सी।
साँचे की सी ढारी अति सूक्ष्म सुढार कटि,
केसौदास अंग अंग भाँइकै उतारी सी।
सोंधे कैसी सोंधी, देह सुधा सों सुधारी पाइ
धारी देवलोक तें कि सिंधु तें उधारी सी।
आजु यासों हँसि खेलि बोलि चालि लेहु लाल,
कालि ऐसी ग्वारि लाऊँ काम की कुमारी सी।४।
शब्दार्थ—थोरी=छोटी। सुदेस = बढ़िया। बैस = (वयस्) उम्र।
दीरघ = (दीर्घ) विशाल, लंबे। गौरा=पार्वती। भोरी=भोली-भाली।
भव = महादेव। सारी=पत्नी की छोटी वहन, पार्वती की छोटी बहन। सुढार
=उत्तम, चढ़ाव-उतारवाली। भाँइकै=खराद पर चढ़ाकर खरादी हुई
सुडौल। सोधें० = सुगंध से सुवासित। पाइ धारी=आई, अवतीर्ण हुई।
उधारी = उद्धृत की हुई, निकाली हुई। ऐसी=ऐसी ही। ग्वारि ग्वालिनी।
३—महतारी०–जननी तेरी राखिहै। सिखऊं–सिखवों। सुखदै०–सिख
दै सखि। भौंह०-दीठि। दीठि-भौंह। अनैठी–अमंठी, उमैठी। काहि-का पै।
४—बैस-वेष। गौराजू–गौरीजू, गोरजा। सुढार०–सुधारि कढ़ी। पाइ-
पांड। उधारी–उबारी। ग्वारि–बाल।
२२२ रसिकप्रिया
भावार्थ—(धाय की उक्ति कृष्ण प्रति) आज मैं जो नायिका ले आई हूँ,
उसकी छोटी और मनमोहनी वय है, बड़े नेत्र और लंबे केश हैं, पार्वती की
भांति गोरी है, शंकर की साली की भांति भोली है, साँचे में ढली हुई, पतली
और सुडौल कमर है। प्रत्येक अंग खराद पर चढ़ाकर खरादा हुआ (सुडौल)
है, यह सुगंध से सुवासित है, शरीर अमृत से सिक्त है। यह देवलोक से अव-
तीर्णा (अप्सरा सी) या समुद्र से निकाली हुई (लक्ष्मी) सी सुंदर है आज
इसीसे हँसे खेलें और बोलें चालें मैं कल काम की कुमारी सी दूसरी नायिका
ले आऊँगी।
सूचना—(१) यह छंद 'कविप्रिया' में विक्रियोपमा के उदाहरण में
दिया गया है, पर वहाँ पूर्वार्द्ध इस प्रकार है—
केसौदास कुंदन के कोस तें प्रकासमान,
चिंतामनि ओपनी सों ओपिकै उतारी सी।
इंदु के उदोत तें उकीरि ऐसो काढी, सब
सारस सरस सोभा सार तें निकारी सी।
(२) 'कुमारी' शब्द कहने से 'धाय' की उक्ति मानी जायगी।
जनी को बचन राधिका सों, यथा—(कबित्त)
(४१६) सोभा को सघन बन मेरो घनस्याम नित,
नई नई रुचि तन हेरत हिराइयै।
केसौदास सकल सुबास को निवास, करि
बिबिध बिलास हास, त्रास बिसराइयै।
ऊँख-रस केतक महूख-रस मीठो है,
पियूखहू की पैली धाँ है जाकों नियराइयै।
चोरी चोरौ नैननि चुराएँ सुख कौन जौ लौं,
पिय-मन माहि मन मेलि न चराइयै।५।
शब्दार्थ—रुचि = शोभा। हिराइ = खो जाता है, मन मुग्ध हो जाता
है। केतक = कितना (मीठा) है। महूख = (मधु) शहद। पैली = परली,
उस पार, पराकाष्ठा। धाँ ओर।
भावार्थ—(दासी का वचन नायिका प्रति) मेरे घनश्याम तो शोभा के
घने वन हैं, नित्य ही उनके शरीर की नई नई शोभा देखकर मन मुग्ध हो जाता
है। उनका शरीर सब प्रकार की सुगंध का घर है। उनके द्वारा अनेक प्रकार
के हासों का विलास होने से त्रास (विषाद) भूल जाया जाता है। ऊख का
रस कितना मीठा है, मधु में भी कितना मीठापन है। उनके निकट जाने से तो
५—जनी के०-प्रिया प्रति जनी को बचन। बन-घन। महूख-मयूख।
धाँ है-घातो।
द्वादश प्रभाव २२३
अमृत की पराकाष्ठा की प्राप्ति होती है । लुकाछिपी के द्वारा उनसे नेत्रों को
मिलाने और प्रायः चुराए रखने में क्या सुख ? ( लुक-छिपकर थोड़ा नेत्र
मिला लेने से कितना सुख मिलेगा ) जब तक प्रिय के मन में अपने मन को
डालकर ( स्वच्छंदतापूर्वक ) विचरण करने के लिए न छोड़ दिया जाय ( मन
से मन भली भाँति मिल न जाय, खुलकर न मिल जाय ) ।
सूचना—बिहारी ने भी 'महुख' शब्द का प्रयोग किया है—
छिनक छबीले लाल वह जौ लगि नहिं बतराइ ।
ऊख महुख पीयूख की तौ लगि भूख न जाइ ॥—बिहारी-सतसैया
'देव' ने भी इसका बहुत प्रयोग किया है । यह 'मयूख' भी लिखा मिलता है ।
जनी को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४१७) ऐसी बातें ऐसें ही धौं कैसें कै कही परति,
जाकी गति मति लाज-पट सों लपेटी हैं।
मेरें ही न आवै, मेरी बीर एती बेर वे तौ,
जानति हौं धाइ ही के साथ लौटि लेटी हैं।
ऐसी तौ हैं चेरिन की चेरी बाकी केसवदास,
जैसी तुम हाहा करि पाइ परि भेंटी हैं।
जानति हौं नंदजू के ढोटा हौ जू, जानौ बोल,
उतहिं वेऊ तौ बृषभानजू की बेटी हैं ।६।
शब्दार्थ-ऐसें ही धौं = जिस प्रकार तुम कह रहे हो । जाकी० = जिसकी
चालढाल लज्जा रूपी वस्त्र में लिपटी है, जो अत्यंत लज्जाशील है । मेरे ही =
मेरे यहाँ तो कभी आती ही नहीं । हाहा करि = विनय करके । ढोटा = पुत्र ।
भावार्थ—( जनी की उक्ति नायक से ) आप जैसे कह रहे हैं वैसे भला
मुझसे और उस पर भी ऐसी बातें, उससे कैसे कही जा सकती हैं ? यही नहीं
उससे जिसकी चालढाल अत्यंत लज्जाशील है ( प्रेम की ये प्रगल्भ बातें ) ।
अरी मैया, मेरे यहाँ तो वह आती नहीं और फिर इस समय ( रात में ) मेरा
अनुमान है कि वह ( घूम-फिरकर ) धाय के साथ साथ लौटी है और आराम
कर रही है ( इस बीच जाकर कैसे ये बातें कहूँ ? ) । जैसी नायिका से विनय
करके और पैरों पड़कर आज आपने आलिंगन किया है, वैसी तो उसकी दासी
की दासी हैं । जानती हूँ कि आप नंद जी के लाड़ले हैं, आपके बोल मैंने पह-
चाने । उधर वे भी वृषभानु की लाड़िली पुत्री हैं ( मेरी तो हिम्मत नहीं कि
उनसे जाकर ऐसी बातें कह सकूँ ) ।
६—श्रीकृष्ण सों-प्रिय प्रति । ही धौं-हिये । कैसें०-कैसे कही परति धौं,
कैसे कही परत न । पट-पाट । बेर-बार । जानति०-जात धाइ ही के घर साथ ।
केसौदास-केसौराइ । ढोटा-बेटा । बोल-जाहू । उतहिं०-वेऊ तौ उतहिं ।
right after it: "देती" has 'द', 'े', 'त', 'ी'. Look at the 'ी' matra on "ती": it goes up from the right vertical line and curves left over the 'त'.
Now look at "देखत..." in L33: does the letter after 'ह' curve over the 'ह'?
NO! It has a vertical line and TWO SLANTS going up! It is "देखत हौ"!
Wait, wait! Let me look really closely at L33:
"देखत हौ-देखे बिना मुख।" or "देखत ही-देखे बिना सुख।"
Wait, look at "देखे बिना मुख": is it "मुख" or "सुख"? The letter is 'म' with 'ु', then 'ख': wait, 'स' with 'ु' has a loop on the left like in 'सु तो'. Here it's 'स' or 'म'? In "सुख" (L19: "बड़ो सुख दीने"), look at 'सुख' in L19: 'स' with 'ु' + 'ख'. Look at L33: it's identical to 'सुख' in L19! Wait, is it "सुख"?
Wait, look at the footnote again: "देखे बिना मुख" or "देखे बिना सुख"? In L6: "मुख स्याम सभागैं". A variant for "मुख" might be "सुख" ("देखे बिना सुख स्याम सभागै
पर पैर रखने"
Wait! Is it "पलँग" or "पलंग"?
In line 25: "पलँग" (with an anusvara over ल, but is it लँ or लं?)
Wait, look at line 25: "पलँग को स्पर्श किया था ( पैर रखा था ) । ( और पलँग पर पैर रखने"
Look at "पलँग": it has an anusvara above 'ल'. It's "पलँग" or "पलंग"? Just a dot (anusvara). "पलंग".
Line 26:
"पर भी ) रति ( प्रीति, घुंघची ) को हटाकर तुमने उनकी प्रीति तोलनी"
Notice spacing around parentheses: "पर भी )", "( प्रीति, घुंघची )".
Line 27:
"आरंभ की । कसमें खाने पर अपने मुँह को उनके सामने किया । ऐसा"
Line 28:
"क्यों ? तुममें अब तक तो ऐसी चालढाल नहीं थी, भला रात में पान खिलाते"
Line 29:
"समय ( उनसे ) चिढ़ क्यों रही थीं ?"
Line 30:
"सूचना—सरदार कवि ने यह माना है कि पड़ोसिन ने स्वयम् आहट"
Line 31:
"नहीं पाई है । नायक ही उससे कह गया है । धाय, सखी आदि की अपेक्षा"
Line 32:
"पड़ोसिन से कहना नायिका को उलाहना देने के लिए अधिक संभव
द्वादश प्रभाव २२७
परोसिन को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४२३) हाँसी में बातक वासों कही हँसि वेहूँ कही सु हितै करि लेख्यो ।
आँखें मिली न मिली सखियाँ मिलबोई सु केसव क्यों अवरेख्यो ।
चिच्याइ मरै चुप साधै कि चातक स्वाति समै ही स्रवै सु बिसेख्यो ।
आजुहीं क्यों वह आवै यहाँ जिनि आगि लगैं हूँ न आँगन देख्यो ।१२।
शब्दार्थ—हाँसी में = हँसी में, झूठमूठ । बातक = एक बात (मेरे
यहाँ क्यों आने लगीं आदि) । वासों = उससे (नायिका से) । सु = वह
बातचीत । हितै करि लेख्यो = आपने अपने अनुकूल समझ लिया । आँखें
मिली न = आँखें चार नहीं हुईं । अवरेख्यो = निश्चित कर लिया । चिच्याइ
मरै = चिल्लाकर मरता रहे । चुप साधै कि = अथवा चुप होकर रहे । स्रवै=
पानी बरसाता है । सु = वह (बादल) । बिसेख्यो = विशेष रूप से, अत्यधिक ।
भावार्थ—(पड़ोसिन और नायिका को किसी दिन बातचीत करते हुए
नायक ने देखा । पड़ोसिन से नायिका को न आने का उलाहना दिया और
नायिका ने भी नायक की ओर देखते हुए हँसी में ही उलाहने का उत्तर देते
हुए आने की बात कही । नायक नायिका से मिलने के लिए उसी दिन पड़ो-
सिन के यहाँ आया है इस पर पड़ोसिन कह रही है) वाह आप भी अच्छे
निकले । उससे हँसी में मैंने एक बात कही और उसने भी हँसी में मुझे कुछ
उत्तर दे दिया, इधर आपने उसे ही अपनी घात की बात जान लिया । जब
आपसे न आँख मिली और न सखियाँ ही मिलने के लिए गईं तब आपने
मेरे यहाँ उससे भेंट होने का निश्चय कैसे कर लिया ? भला वह भलीमानस
आज मेरे यहाँ क्यों आने लगी, वह तो ऐसी है कि जब घर में आग लगी
थी तब भी आँगन झाँकने नहीं गई । (आप चातक की ठान क्यों नहीं
ठानते, क्योंकि ) चातक या तो चिचियाता हुआ मरता रहता है या चुप्पी ही
साध लेता है । बादल तो स्वातीं नक्षत्र में ही उसके ऊपर ध्यान देकर विशेष
जल गिराता है (ढारस रखिए, कभी न कभी आप पर भी उसकी कृपादृष्टि
हो ही जायगी) ।
मालिन को वचन राधिका सों, यथा—(कवित्त)
(४२४) दुरिहै क्यों भूषन बसन दुति जोबन की,
देह ही की ज्योति होति द्योस ऐसी राति है ।
नाह को सुबास लागेँ द्वै है कैसी केसव,
सुभाव हो की बास भौर-भीर फारे खाति है ।
१२—बातक-बात वै । वेहूँ-वाहू । हितै-हित्वै । क्यों-कै । मरै-मरो ।
साधै-साधो । स्रवै-सवै । आवै०-आवति हपाँ । जिनि-जिहि ।
२२८ रसिकप्रिया
देखि तेरी सूरति की मूरति बिसूरति हौं,
लालन को दृग देखिबे कों ललचाति है।
चलिहै क्यों चंदमुखी कुचनि के भार भएँ,
कचनि के भार तौ लचकि लंक जाति है ॥१३॥
शब्दार्थ—दुरिहै = छिपेगी । जोति = ज्योति, दीप्ति । नाह = नाथ,
नायक । सुभाव ही की = स्वाभाविक । भौंर-भीर फारे खाति है = भौरों की
भीड़ फाड़े खाती है, भौंरे घेरे रहते हैं । सूरति की = सौंदर्यवाली । बिसूरति
हौं = मैं सोच रही हूँ । कुच = स्तन । भार = बोझ । लंक = कमर, कटि ।
भावार्थ—देह की स्वाभाविक दीप्ति से जब रात दिन की भाँति प्रकाश-
युक्त हो जाती है तब फिर यौवन की द्युति उत्पन्न होने पर और भूषण एवम्
वस्त्रों से सुसज्जित हो जाने पर तेरी दीप्ति कैसे छिपाए छिपेगी ? जब शरीर
की स्वाभाविक सुगंध ही से भौंरों की भीड़ तुझे घेरे रहती है तब नायक की
सुगंध लगने से न जाने क्या दशा होगी ? मैं तो तेरी सुंदर मूर्ति देखकर
(उसके ऊपर पड़नेवाले झंझटों का ध्यान करके ) सोच कर रही हूँ और तू
निश्चिन्त होकर नायक को अपनी आँखों से देखने के लिए लालायित हो रही
है (नायक को देखने पर तेरी जो दशा होगी उसकी कल्पना से ही मैं दुखी
हो रही हूँ और तू उसी के लिए प्रयत्नशील है ) । अभी केशों के बोझ से तो
तेरी कमर लचक जाती है, जब कुचों का भार होगा तब न जाने तू कैसे
चल सकेगी ?
सूचना—(१) केशवदास ने इसे 'कविप्रिया' में अभूतोपमा के उदाहरण
में दिया है । (२) 'सुबास', 'भौंर' आदि की बात लाने से 'मालिन' जान
पड़ती है।
मालिन को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४१५) घेरौ जिनि मोहि घर जान देहु घनस्याम,
घरिक में लागी डर देखिबो क्यों द्वामिनी ।
होइ कोऊ ऐसी वैसी आवै इत उत ह्वैकै,
वह बृषभानजू की बेटी गजगामिनी ।
आदित को आयो अंत आवौ बलि बलि जाउँ,
आवती हैं वेऊ बनी, आई बनि जामिनी ।
१३—सुभाव-सुदेहु, सुबास । लंक-कांट ।
द्वादश प्रभाव २२६
काम के डरनि तुम कुंज गह्यो केसोदास ।
भौरन के भय भौन गह्यो उनि भामिनी ।१४।
शब्दार्थ--घेरौ जनि = रोकों मत । घनस्याम = श्रीकृष्ण; बादल ।
-घरिक में = एक घड़ी में । देखिबी = देखोगे । दामिनी=बिजली । लागी उर०=
बिजली की भाँति उसे हृदय से लगी देखोगे । ऐसी वैसी = साधारण । इत
उत ह्वैकै = इधर उधर से । आदित = ( आदित्य ) सूर्य । बनि=सजकर ।
बनी = श्रृंगार किए हुए । जामिनी = रात्रि । काम = कामोद्दीपन । भामिनी=
मन को भाने वाली, प्यारी नायिका ।
भावार्थ-हे कृष्ण, आपने काम के भय से ( कारण ) कुंज में प्रवेश
किया और भौरों के भय से वे घर में बैठी हैं। अब सूर्यास्त का समय हो रहा
है (वैराग्य-वेश त्यागिए ) शीघ्र सजकर प्रस्तुत हो जाइए, मैं बलिहारी जाती
हूँ । रात्रि आ ही गई, वे भी शृंगार किए हुए आ रही हैं ( वे पद्मिनी और
कमलबदनी हैं, उन्हें सुगंध-लोलुप भौंरे दिन में घेरे रहते हैं ) । यदि कोई
साधारण घराने की लड़की होती तो इधर उधर से ( किसी प्रकार ) आ ही
जाती, पर एक तो वे वृषभानु की पुत्री हैं ( बड़े घराने की हैं ) दूसरे गज-
गामिनी हैं ( धीरे धीरे चलती हैं ) । हे घनश्याम, मुझे मत रोकिए (नायिका
के घर जाने दीजिए ) घड़ी भर में उन्हें आप दामिनी की भाँति अपने हृदय
से लगी देखेंगे ।
सूचना-( १ ) नायक दुखी होकर जंगल में चला गया है ।
( २ ) सुवास की चर्चा करने से मालिन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा-( कबित्त )
(४२६) मैन ऐसो मन मृदु मृदुल मृनालिका के
सूत ऐसी सुरधुनि मनहि हरति हैं।
दारथो कैसे बीज दाँत, पान से करुन ओठ,
केसोदास देखे दृग आनंद भरति हैं।
एरी मेरी तेरी मोहिं भावति भलाई तातें,
बूझति हौं तोहि और बूझत डरति हैं।
१४-देखिबी ज्यों-लागि लीजो, देखि लीजो। ह्वैकै-होइ, ह्वै सो । वह-
वेऊ, वे तौ । बलि बलि-अघनन, बन बलि । आई०-ओर आई, आई अरु ।
काम कें०-जैसे तुम काम के डरनि कुंजभौन गह्यो केसोराइ । के भय०-भयनि
भवन गह्यो, उन भौन गह्यो । उनि-उहि ।
२३० रसिकप्रिया
माखन सी जीभ, मुख कंज सो कोवँर, कहु
काठ सी कठेठी बातें कैसैं निकरति हैं ।१५।
शब्दार्थ—मैन = ( मदन ) मोम । मृदु = कोमल । मृनालिका = कमल-
नाल । सूत = कमलनाल तोड़ने से जो पतले सूत दिखाई पड़ते हैं । सुर-
धुनि = स्वर की ध्वनि (मधुर राग) । मननि मनों को । दारधो = (दाड़िम)
अनार । पान = ( पर्ण ) पल्लव । देखे० = आँखों से देख लेने पर हृदय में
आनंद भर देती है । एरी = एरी सखी । बूझति हौं = पूछती हूँ । और० =
और हम पूछते हुए हृदय से डरती हैं। कंज = कमल । कोवँर = कोमल ।
कठेठी = कठोर । निकरति ० = निकलती है ।
अलंकार—विभावना ।
सूचना—'पान' कहने से बरइन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कवित्त )
(४२७) नैननि नवावौ नेक अति ही अनीति करें,
जानति न तुम जैसें ब्रज जानियत हैं।
चंचल चरित्र चित्त, चेटक चटकि लावौ,
चेरे कै चितनि अभिसार सौंपियत हैं।
एकनि के पैठे उर, उररि उरोजन में,
डर डोलैं केसौदास कैसैं वै जियत हैं।
ऐसी कहूँ होति है जो बालनि के चोरि चोरि
मन मनमथ ही के हाथ बेचियत हैं ।१६।
शब्दार्थ—नवावौ नेक = थोड़ा दबाओ, रोको । अनीति = अन्याय ।
चेटक = जादू । चटकि = शीघ्रता से । अभिसार० = अभिसार को सौंप देता
है, चक्कर में डाल देता है या अभिसार के लिए प्रेरित करता है । पैठे =
घुसे । उररि = उलझकर । बालनि = नायिकाओं ( ब्रजांगनाओं ) ।
भावार्थ—हे प्यारे, भला ऐसा भी कहीं किया जाता है ? तुम ब्रजांग-
नाओं के मन चुरा चुराकर उन्हें काम के हाथ बेच देते हो । इन नेत्रों को
१५—मृदु–तब । के–से । ऐसी–कैसे । मनहि–मन को, मननि । पान
से०–पान सो उदरु, बिंब से अरुन । केसौदास०--देखि देखि केसौदास । मेरी-
बोर । और–उर । कोवँर–कुंवरि, कुँवर, कोमल । १६—नवावौ--नवेंबो ।
अति ही--निपट । न--हौ । ब्रज--जग । चेटक०--चेटको चटका गाथो । चेरे
कै–चोरि कै । उररि--उरझि । डर०--उरझे तें । केसौदास--केसौराइ । वै--ति ।
के चोरि०--की चोरीचोरी, के चोराचोरी । मन०--चित मति मनमथ हाथ, मन
मनमथ चाक ।
नवम से षोडश प्रभाव: मान-मोचन, दर्शन-मिलन एवं सम्पूर्ण संयोग-वियोग रस
द्वादश प्रभाव २३१
दबाओ, ये बहुत ही अनौति कर रहे हैं। तुम इन्हें उतना नहीं जानते जितना
इन्हें ब्रज जानता है। ये अत्यंत चंचल स्वभाव और चित्तवाले हैं, ये शीघ्र
ही जादू डाल देते हैं यही नहीं, चित्तों पर जादू डालकर उन्हें चक्कर में भी
डाल देते हैं। ये किसी के स्तनों से उलझकर हृदय में घुस जाते हैं।
(चित्त) डरे डरे घूमते हैं। इनके डर से इधर उधर भागते फिरते हैं, न
जाने कैसे जीते हैं।
शिल्पिनी को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४२८) अबहीं पुनि बोलि री बोलि लगी जक पौरिहूँ लौं उठि जान न दीने।
मेरे ही जान भई उलटी तुम्हहीं बस केसव वे कहँ कीने।
जौ तौ इतौ दुख पावति हौ तलफैं दृग मीन मनो जल झीने।
तौ कत छाड़ति हौ छिन एक रहौ किनि चित्र ज्यों हाथहिं लीने ।१७।
शब्दार्थ—बोलि री बोलि = बुला री बुला । जक = धुन, रट । पौरिहूँ
लौं = दरवाजे तक भी न जाने दिया । उलटी बस = उलटी तू ही उनके
वशीभूत हो गई है । इतौ = इतना ( अधिक ) । तलफैं = तड़पते हैं । झीने =
कम, थोड़े ।
भावार्थ—हे सखी, अभी उन्हें यहाँ से उठकर तूने द्वार तक जाने भी न
दिया कि 'बुला ले बुला ले' की रट फिर लगा दी । मेरी समझ से तो तू ही
उनके वश में हो गई है । उन्हें तो तूने केवल कहने के लिए वश कर रखा है।
यदि तू ( वियोग से ) इतना दुख पाती है और तेरे नेत्र थोड़े पानी में की
मछली की तरह तड़पते हैं तो उन्हें पल भर के लिए भी तू क्यों छोड़ती है ?
हाथ में चित्र की भाँति लिए ही क्यों नहीं रहती ?
अलंकार—उत्प्रेक्षा ।
सूचना—यहाँ 'चित्र' शब्द से 'शिल्पिनी' सूचित है ।
शिल्पिनी को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४२६) खोट तुरी जिमि खूँट रहौ गहि ठौर कुठौरनि जानिहू जाहू ।
लाज न आवति मारे समाजन लागें अलोक के ताजन ताहू ।
कोटि बिचार बिचारहु केसव देखहु बूझि हितू सब काहू ।
नेह ही के फिरि लागिहौ संग न नैननि के सँग ओर निबाहू ।१८।
१७—उलटी--फिरि तू । तुम्हहीं ०--बस केसव हैं कहिबे कहँ । तौ--पै ।
पावति--देखति । झीने--हीने, जीने । कत--कहा, कित । १८—खोट--खेट, खोटु,
खाटु । जानिहू--जानि न । लाज न--लालन । समाजन--सभाजन । बूझि--बोलि ।
नेह ही--नेह हू ।
२३२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोट = खोटा, शरारती ! तुरी = घोड़ा । खूँट = ओर, दिशा ।
अलोक = बदनामी । ताजन = चाबुक, कोड़ा । ओर निबाहू = अंत तक निर्वाह
भावार्थ—खोटे शरारती घोड़े की भाँति आप जिधर जाते हैं, सीधे चले
जाते हैं । ठौर कुठौर को जानकर भी उधर ही जाते हैं । समाज द्वारा मारे
गए बदनामी के कोड़े के लगने पर भी लज्जा नहीं आती ( आप शोख होते
जाते हैं ) । अनेक प्रकार के विचारों द्वारा विचार लीजिए तथा जो आपके
हितुआ हों उनसे भी पूछ लीजिए, प्रेम के ही साथ लगने से काम बनेगा, नेत्रों
का साथ देने से अंत तक निर्वाह नहीं हो सकता ( आप नायिका से प्रेम
करके भी जो अपने नेत्रों को बेलगाम छोड़े रहते हैं सो ठीक नहीं ) ।
चुरिहेरिन को वचन राधिका सों, यथा—( कबित्त )
(४३०) मन मन मिलें कहा मिलिहै मिले को सुख,
मिलिहू धौं देखहु बोलाइ काहू बाल सों ।
भूलि परे भौंहनि हीं बाँधिहौ कितेक दिन,
बाँधौ बलि जाउँ बनमाली बनमाल सों ।
मुँह मोरें मारें न मरति रिस केसोदास,
मारहु धौं मेरे कहें कमल सनाल सों ।
नैननिहीं बिहँसि बिहँसि कौ नौ बोलिहौ जू,
कबहूँ तौ बोलियै बिहँसि मुख लाल सों ।१६।
शब्दार्थ—मन मन मिले = केवल मन से मन मिलाने से । कहा =
क्या । भूलि = चूक । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाल सों = वनमाला से
अर्थात् स्वागत करके, आलिंगन करके । कमल सनाल = मृणालयुक्त कमल
( हथेली सहित भुजा ) ।
भावार्थ— केवल मन को मन से मिलाने से मिलाने का क्या सुख मिलेगा ?
यदि आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो आप किसी प्रेम करनेवाली स्त्री
को बुलाकर और उससे पूछकर ही समझ लीजिए । यदि नायक से भूल हो
जाय तो आप भौंहों से कितने दिनों तक बाँधेंगी ? ( भौंहें टेढ़ी करने से वे
कब तक चूक न करेंगे ? ) । मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ उन वनमाली को
वनमाला से बाँधो (उनका स्वागत करो, आलिंगन करो, रूठो मत) । क्या कहीं
मुँह मोड़ लेने से प्रेम का रोष मारने के मान का होता है ? (नहीं, मुँह फेरने
से क्रोध नहीं दबेगा ) । यदि आप उन्हें किसी अपराध का दंड देना चाहती
हैं तो मेरे कहने से उन्हें मृणालयुक्त कमल से मारिए ( अपनी भुजाओं से
१६—हीं-धौं । न मरति-मान रति, नाम मन । मरति०—मारै रिस
केसोदास, रति रिस प्यारेलाल । कबहूँ-बबहू । तौ-धौं ।