रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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Read in contextएकादश प्रभाव २१३
से जिनका जी जीता है (जो तुझे प्राणों की भाँति प्यार करते हैं) ऐसे
श्रीकृष्ण के बिना भी तू अब भी जी रहा है ? (यह कार्य ठीक नहीं) ।
सूचना—'नंदकुमार तौ गौन कियोई' से प्रवासविरह । प्राणों के प्रति
उक्ति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रवासविरह-वर्णन, यथा—(कवित्त)
(४०१) कौन कें न प्रीति, को न प्रीतमहिं बिछुरत,
याही कें अनोखो पतिव्रत गाइयत है ।
केसौदास जतन कियैं ही भलें आवै हाथ,
और कहा पच्छिनि के पाछें धाइयत है ।
उठि चलि जौ न मानै काहू की बलाइ जानै,
मानसै जु पहिचानै ताकें आइयत है ।
याकें तौ है आजु ही मिलौं कि मरि जाउँ ऐसें,
आगि लागें मेरी माई मेह पाइयत है ।६।
शब्दार्थ—कौन कें०= किसके (हृदय में) प्रेम नहीं होता। को न
प्रीतमहिं बिछुरत = किसे प्रियवियोग नहीं होता। जतन······धाइयतु है =
(पिंजड़े से निकलकर उड़ जानेवाला) पक्षी यत्न करने से ही हाथ आता
है, नहीं तो क्या कोई पक्षी के पीछे पीछे दौड़ता फिरता है (अर्थात् नहीं) ।
बलाइ=बला। उठि चलि० = यदि नहीं मानती है तो चल उठ चलूं, किसी
की बला जाने (मुझे क्या)। मानसै= मनुष्य को। मानसै जु० = जो
मनुष्य को पहचाने उसी के यहाँ आया जाता है (यह तो जैसे आदमी ही नहीं
पहचानती) । मरि जाउँ = मर जाऊँ (मरकर जा मिलूँ) । माई = संबोधन
में । मेह = (मेघ) जल । आगि लागें० = भला कहीं आग लगने पर (मनाने
से) पानी बरसता है ।
उक्ति—सखी की उक्ति सखी से ।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सूचना—सखियों की परस्पर बातचीत है, अतः बात बाहर तक पहुँच
चुकी है इसी से प्रकाश है ।
श्रीराधिकाजू को विरह-भयविभ्रम, यथा—(सवैया)
(४०२) कोकिल केकी कुलाहल हूल उठी उर में मति की गति लूली।
केसव सीत सुगंध समीर गयो उड़ि धीरज ज्यों तन तूली।
६—याही कें-तेरे ही । कियैं ही-करें ही। चलि-चलौ। मानसै-मान
सों। तौ है०-तो है नोखो व्रत । ऐसें-माई, × । माई-आली ।