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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 213 of 286

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Page 213

एकादश प्रभाव २१७
समय नहीं आती । (उस समय वह पति के पास सोने की बहुत इच्छा रखती
थी) उनके पास सो जाती थी, पर मैं उसे सोने नहीं देती थी । इसलिए
विदेश जाते समय (चित्त में कोई खटका न हो) इसलिए वे उसे मेरे साथ
सोने के लिए दे गए हैं । पर इसमें भी मेरी ही भूल है, भला कहीं सौत सखी
हुई है । सबको स्वार्थ ही प्रिय होता है, प्रिय के परदेश चले जाने पर वह
नींद भी उड़ गई है । (वह भी मेरा साथ नहीं देती) ।
श्रीकृष्णजू की निद्रा, यथा-( सवैया )
(४०७) केसव कैसहूँ कोरि उपाइन जानि सु तौ उर लागति है ।
चकचौंधत सी चितवै चित में चित सोवतहूँ महँ जागत्ति है ।
परदेश प्रिया पल मोहिं पत्याति न जानै को याकी कहा गति है ।
तजि नैननि नींद नवोढ़बधू लहुँ अधिक राति तें भागति है ।१५।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ों । आनि = आकर । सु तौ = वह तो (नींद)।
परदेस प्रिया = प्रिया के परदेश में होने से (विरह के कारण), यह प्रिया
(नवोढ़ा वधू निद्रा) परदेश में है (पिता के घर से पति के घर आई है) ।
लहुँ = लौं, समान ।
भावार्थ-(नायक-वचन स्वगत या मित्र से) किसी प्रकार करोड़ों
उपाय करने पर तो यह छाती से आकर लगती है। (छाती से लगने पर) चित्त
में चकपकाती हुई सी देखा करती है (सोती नहीं, पूरी नींद आती नहीं) सोने
पर भी चित्त से जागती रहती है, सावधान रहती है (बारबार उचट जाती
है) । प्रिया के परदेश में होने से यह मुझ पर क्षण भर के लिए भी विश्वास
नहीं करती । न जाने इसकी कैसी चालढाल है । नेत्रों को त्याग कर नवोढ़ा
वधू की भाँति निद्रा आधी रात से ही चुपचाप शीघ्रता से भाग जाती है ।
अलंकार - रूपक ।
श्रीराधिकाजू की सखी की पत्री, यथा-(सवैया)
(४०८) केसव कुँवर बृषभानु की कुँवरि आजु,
देवता ज्यों बन उपबन बिहरति है ।
कमल ज्यों थिर न रहति कहूँ एक छिन,
कमलाग्रजा ज्यों कमलनि तें डरति है ।
काली ज्यों न केतकी के फूल रुचैं, सीता जू ज्यों
निसिचर-मुख तिन देखे ही जरति है ।
१५-अधिक ०- आवत ही निसि ।