रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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सागर बना दिया । तुम्हारा यौवन ही नदी का भीषण प्रवाह है, जिसमें
पूर्वराग से युक्त होना ही जल है । इस नदी को पार करने के लिए मनोरथ
का ही जहाज है, आतुरता ही आवर्त्त है । इसी प्रकार उसमें अनेक भय
( के कारण ) भरे हुए हैं । तर्क की ऊँची लहरें उठ रही हैं बड़े बड़े कष्ट ही
दीर्घकाय जलजंतु हैं ( तेरे यौवन की इस नदी के जा मिलने से नायक अब
शोक के समुद्र ही हो गए हैं ) ।
सूचना—श्रीकृष्ण को शोक-समुद्र ( करुणा-वरुणालय ) कहने से करुणा-
विरह और बहिरंग सखी की उक्ति होने से प्रकाश है ।
अलंकार—सांग रूपक ।
अथ प्रवासविरह-लक्षण—( दोहा )
(३६६) केसव कौनहु काज तें, पिय परदेसहिं जाइ ।
तासों कहत प्रवास सब, कबि कोबिंद समुझाइ ।७।
सूचना—इसके बाद हस्तलिखित प्रति और लीथोवाली प्रति में यह
सवैया दिया गया है, जो मुद्रित प्रतियों में नहीं है—
जानै कहा मेरी दीरघ साँस लै नैन नवाइ दुकाइ बिथाहू ।
माथौ न दुखिहै सूघे निहारौ पखारौ नहीं मुख जौ न अन्हाहू ।
ऐसें ही केसव क्यों रहै प्रान सु आपनी पीर सुनावहु काहू ।
काहे तें भोर को भोजनौ छोड़यो तौ पानो न पीवौ जौ पान न खाहू ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४००) तूँ करिहै कहि धौं कब गौनहि नंदकुमार तौ गौन कियोई ।
मोहि महा डर तो डर को न रहै लटि लै जिनि को धौं लियोई ।
ऐसी न बूझियै केसव तोहि बिचारै जु बीच बिचार बियोई ।
तेरे ही जीय जियै जिनको जिय रे जिय ता बिन तूँ ब जियोई।८।
शब्दार्थ—गौनहि = गमन । लटि = क्षीण होकर । बियो = दूसरा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति प्राण से ) हे प्राण, नंदकुमार तो गए,
अब तू कब गमन करेगा ? मुझे तो बड़ा डर तेरे हृदय का है । कहीं वह
दुर्बलता-क्षीणता का बहाना लेकर रह न जाय, प्रत्युत उसने यह बहाना ले ही
लिया । तुझे वैसा नहीं करना चाहिए जैसा तू इस समय दूसरे प्रकार का
विचार करके करने लगा है ( गमन न करके रहना चाहता है ) । तेरे ही जी
८—कहि-कब । कब-कहि । मोहि-मोहि तो मोह । रहै-रह्यो । लै जिनि
कौ धौं-लाभ । ऐसी-ऐसो । बिचारै-बिचारयो ।