रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
About this granth
Rasaratnasamuchchaya (रसरत्नसमुच्चय) is a major text of rasashastra, the branch of Ayurveda that purifies mercury, sulphur, mica, metals and gems and turns them into medicines. It is ascribed to Vagbhatacharya, usually called Rasa-Vagbhata to distinguish him from the author of the Ashtanga Hridaya.
The opening part describes the pharmacy, apparatus, crucibles, heating methods and technical terms, followed by the purification and incineration of the major and minor minerals, metals and gems. Later chapters give mineral formulations for treating particular diseases.
This edition was published in 1939 by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Benares, as No. 91 of the Haridas Sanskrit Series. It carries the Suratnojjvala Hindi commentary of Pandit Ambikadatta Shastri, Ayurvedacharya of Banaras Hindu University, with notes, introduction, indices and appendices. Each verse is followed by a plain Hindi explanation, and the book long served students and practising vaidyas. The opening leaves of this copy also carry a few remedies handwritten in Nepali by an earlier owner.
[ १७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| वातज्वरलक्षणम् | ३३७ | चातुर्थिकगजाङ्कुशरसः | ३६८ |
| पित्तज्वरलक्षणम् | ३३८ | मृत्युञ्जयरसः | ३६९ |
| कफज्वरलक्षणम् | ,, | पञ्चवक्त्ररसः | ,, |
| द्विदोषजत्रिदोषजज्वरकथनम् | ३३९ | उन्मत्तरसः | ३७० |
| त्रैलोक्यसुन्दररसः | ३४० | सन्निपाताञ्जनरसः | ,, |
| त्रैलोक्यडम्बररसः | ३४१ | नस्यम् | ३७१ |
| मेघनादरसः | ३४३ | प्रतापलङ्केश्वररसः | ,, |
| ज्वरगजहरिरसः | ,, | प्राणेश्वररसः | ३७३ |
| दीपिकारसः | ३४४ | मृतसञ्जीवनरसः | ३७४ |
| शीतभञ्जीरसः | ३४५ | द्वितीयमृतसञ्जीवनरसः | ३७५ |
| प्रकारान्तरेण शीतभञ्जीरसः | ३४६ | सन्निपातकुठाररसः | ३७६ |
| मृतजीवनरसः | ३४७ | नवज्वरारिरसः | ३७७ |
| वृद्धज्वराङ्कुशरसः | ३४९ | जलमञ्जरीरसः | ३७८ |
| महाज्वराङ्कुशरसः | ,, | कान्तरसः | ३७९ |
| मृत्युञ्जयरसः | ३५१ | चन्द्रोदयरसः | ,, |
| सर्व्वज्वरादिरसः | ,, | जीर्णज्वरारिरसः | ३८० |
| चन्द्रसूर्यरसः | ३५२ | नवज्वरमुरारिरसः | ३८१ |
| विषप्रयोगायोग्यनिर्देशः | ३५३ | त्रयोदशोऽध्यायः। | |
| उमाप्रसादनोरसः | ३५४ | रक्तपित्तम् | ३८४ |
| ज्वराङ्कुशरसः | ३५५ | रक्तपित्ताङ्कुशरसः | ३८५ |
| सर्वाङ्गसुन्दरचिन्तामणिरसः | ३५६ | चन्द्रकलारसः | ३८६ |
| लोकनाथगुटिका | ३५७ | पटोलादियोगः | ३८८ |
| सूचिकाभरणरसः | ३५९ | रसेन्द्रयोगः | ३८९ |
| शार्ङ्गष्टादिवर्गः | ३६४ | अन्यश्च | ,, |
| सूचीमुखरसः | ३६५ | नवनीतादियोगः | ,, |
| सन्निपातगजाङ्कुशरसः | ३६६ | शिरोलेपः | ,, |
| चातुर्थिकहरो रसः | ३६७ | द्राक्षादिक्वाथः | ३९० |
३ र० स०
[ १८ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| योगद्वयम् | ३९० | कज्जलयोगः | ४०७ |
| सितामृता | ,, | शिलापूतरसः | ,, |
| कासः | ,, | मन्थानभैरवरसः | ४०९ |
| कासनाशनरसः | ३९१ | विश्वादिवटिका | ४१० |
| कासहररसः | ,, | सामान्योपचाराः | ४११ |
| रक्तकाण्डरसः | ३९२ | तत्र रास्नादिक्षीरम् | ,, |
| भूताङ्कुशरसः | ३९३ | हिक्काघ्नधूमः | ,, |
| बोलबद्धरसः | ३९४ | गन्धपाषाणयोगः कफेभेषजविशेषनिर्देशश्च | ४१२ |
| अग्निरसः | ३९५ | स्वरभङ्गः | ,, |
| स्वयमग्निरसः | ,, | पर्पटीरसः | ४१३ |
| सामान्योपायाः | ३९६ | कफरोगे क्रियासूत्रम् | ४१७ |
| भृङ्गराजयोगः | ,, | चतुर्दशोऽध्यायः । | |
| अर्कादियोगः | ,, | राजयक्ष्मा | ,, |
| कासघ्नधूमद्वयम् | ,, | कनकसुन्दररसः | ४१८ |
| क्षयकासान्तकयोगः | ३९८ | राजमृगाङ्करसः | ४२१ |
| श्वासः | ,, | शङ्खेश्वररसः | ,, |
| ऊर्ध्वश्वासादिः | ३९९ | मृगाङ्कपोट्टलीरसः | ४२२ |
| सूर्यावर्तरसः | ,, | मृगाङ्कपोट्टलीरसः | ४२३ |
| श्वासान्तकरसः | ४०० | यक्ष्मणि औषधविशेषसेवनोपदेशः | ,, |
| श्वासारिवटकः | ४०१ | पञ्चामृतरसः | ४२४ |
| सप्तामृतावटी | ,, | जयन्तीप्रयोगः | ,, |
| नीलकण्ठरसः | ४०२ | क्षयशामकरसः | ,, |
| श्वासकासकरिकेसरी रसः | ४०३ | लोकनाथरसः | ४२५ |
| सूर्यरसः | ४०४ | वैद्यनाथरसः | ४२८ |
| सामान्योपचाराः | ,, | लोकनाथरसः | ४२९ |
| हिक्का | ४०५ | ||
| हिक्कानाशनरसः | ४०७ |
[ १९ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| प्राणनाथरसः | ४३० | वातार्शोलक्षणम् | ४५२ |
| वज्ररसः | ४३१ | अर्शःकुठाररसः | ४५३ |
| महावीररसः | ४३३ | पित्तार्शोहररसः | ४५४ |
| अरुचिस्तस्या निदानम् | ४३५ | सर्व्वलोकाश्रयरसः | ४५५ |
| अरुचेः सलक्षणभेदाः | ,, | अर्शोघ्नवटकम् | ४५६ |
| अरुचि-चिकित्सा | ,, | अर्शोघ्नी वटिका | ४५७ |
| यवानीखाण्डवचूर्णम् | ,, | मूलकुठाररसः | ४५८ |
| छर्द्दिरोगः | ४३६ | महोदयप्रत्ययसाररसः | ४६१ |
| वान्तिचिकित्सायां मातुलुङ्गादि योगः- | ४३७ | कनकसुन्दररसः | ४६२ |
| रजन्यादियोगः | ,, | भर्कैशः | ४६४ |
| सुगन्धालककयोगौ | ४३८ | तीक्ष्णमुखरसः | ४६६ |
| हृदयरोगः | ४३८ | अर्शःकुठाररसः | ४६७ |
| हृदयरोग-चिकित्सा | ,, | त्रैलोक्यतिलकरसः | ४६८ |
| दशमूलादिक्वाथः | ,, | सामान्योपचाराः | ४७२ |
| ककुभाद्यं चूर्णम् | ,, | वचादिमोदकः | ,, |
| हृदयार्णवोरसः | ४४० | लौहादिचूर्णम् | ,, |
| नागार्जुनाभ्रम् | ,, | श्लेष्मार्शसि औषधविशेषनिर्देशः | ४७३ |
| पञ्चाननरसः | ४४१ | अर्शोहरयोगः | ,, |
| तृष्णारोगः | ,, | देवदाल्दादिलेपः | ,, |
| तृष्णाहररसः | ४४२ | अर्शःकुठारलेपः | ४७४ |
| मदात्ययरोगः | ,, | अर्शोघ्नशौचः | ,, |
| राजावर्त्तरसः | ४४४ | दुर्नामहरलेपः | ,, |
| द्वितीयराजावर्त्तरसः | ,, | अर्शोघ्नीवर्तिः | ,, |
| भैरवनाथी पञ्चामृतपर्पटी | ४४५ | अर्कक्षीरादिलेपः | ४७५ |
| पञ्चदशोऽध्यायः। | ४५० | शिग्रुमूलादिलेपः | ,, |
| अर्शः | ,, | षोडशोऽध्यायः। | ४७६ |
| पित्तार्शोलक्षणम् | ४५१ | उदावर्त्तः | ,, |
[ २० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| उदावर्त्तहरघृतम् | ४७७ | सामान्योपायाः | ५०४ |
| अतिसारः | ४७९ | वह्यादिचूर्णम् | ,, |
| दर्दुररसः | ४८० | दग्धशम्बूकादियोगः | ,, |
| द्वितीयदर्दुररसः | ४८१ | अन्योपायः | ५०५ |
| आनन्दभैरवरसः | ,, | अजीर्णम् | ,, |
| सुधासाररसः | ४८२ | अजीर्णकण्टकरसः | ५०६ |
| रसोत्तमः | ४८४ | विध्वंसरसः | ,, |
| स्वेदनीयन्त्रलक्षणम् | ४८५ | विसूचीविजयरसः | ५०७ |
| लोकेश्वररसः | ,, | अग्निकुमाररसः | ,, |
| लोकनाथरसः | ४८६ | वडवाग्निरसः | ५०८ |
| नागसुन्दररसः | ,, | वैश्वानरपोटलीरसः | ५०९ |
| षणिष्कतैलम् | ४८८ | चराचरवटी लक्षणम् | ५१० |
| सङ्ग्रहणी | ४८६ | श्रेष्ठमध्यमाधमवराटिकायालक्षणम् | ५११ |
| वज्रकपाटरसः | ,, | पुंवराटलक्षणं तस्य दोषाश्च | ,, |
| अग्निकुमाररसः | ४९० | वडवामुखी गुटी | ,, |
| कनकसुन्दररसः | ४९१ | क्रव्यादरसः | ५१२ |
| ग्रहणीहररसः | ४९२ | राजशेखरवटी | ५१४ |
| चण्डसङ्ग्रहगदैककपाटरसः | ,, | अग्निकुमाररसः | ५१५ |
| लघुसिद्धाभ्रकरसः | ४९३ | अमृतवटी | ५१६ |
| सर्वरोगरसः | ४९४ | राक्षसनामारसः | ५१७ |
| ग्रहणीगजकेसरीरसः | ४९७ | जीवननामारसः | ५१८ |
| शीघ्रप्रभावरसः | ४९९ | वडवानलरसः | ५१९ |
| पोट्टलीरसः | ५०० | अग्निजननीवटी | ५२० |
| वह्निज्वालावटोरसः | ५०१ | सर्वरोगान्तका वटी | ,, |
| वज्रधररसः | ५०२ | सामान्योपायः | ५२१ |
| ग्रहणीकपाटरसः | ,, | सप्तदशोऽध्यायः । | |
| सौवर्चलादिचूर्णम् | ५०३ | मूत्रकृच्छ्राश्मर्यादिचिकित्सनम् | ५२३ |
| मुस्तादिचूर्णम् | ५०४ |
[ २१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पाषाणभेदीरसः | ५२६ | सञ्जीवन रसः | ५५१ |
| द्वितीयपाषाणभेदीरसः | ५२७ | मेहमर्दनरसः | ५५२ |
| गोक्षुरादिचूर्णम् | ५२८ | रामबाणरसः | ५५३ |
| त्रिविक्रमरसः | ,, | राजमृगाङ्करसः | ५५५ |
| आनन्दभैरवी वटी | ५२९ | मेहहररसः | ५५७ |
| अश्मरीहरयोगः | , | उदयभास्कररसः | ५५८ |
| यवक्षारप्रयोगः | ५३० | हिमांशुरसः | ५६० |
| हरिद्राप्रयोगः | ,, | वसन्तकुसुमाकररसः | ५६१ |
| शिवोक्तयोगः | ,, | सर्वमेहान्तकरसः | ५६३ |
| लघुलोकेश्वररसः | , | मेहारिरसः | ,, |
| सामान्योपायः | ५३१ | मेहबद्धरसः | ५६६ |
| गोक्षुरप्रयोगः | ,, | हरिशङ्कररसः | ,, |
| पाण्डूरादियोगः | ,, | वङ्गेश्वरो रसः | ५६७ |
| शुक्लपिण्याकादियोगः | ५३२ | गुडमार्कण्डी | ,, |
| मूत्रकृच्छ्रान्तको रसः | ,, | ताम्रयोगः | ५६८ |
| विदार्यादिकषायः | ,, | रक्तमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| क्षारप्रयोगः | ५३३ | शुक्रमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| प्रमेहः | ,, | मधुमेहे वङ्गप्रयोगः | ,, |
| चन्द्रप्रभावटी | ५३९ | शाल्मलिप्रयोगः | ५६९ |
| प्रमेहगजसिंहरसः | ५४० | रक्तमेहे बोलबद्धरसोपदेशः | ,, |
| महाविद्यागुटी | ५४१ | श्लेष्मातकक्वाथः | ,, |
| मेहध्वान्तविवस्वान् रसः | ५४२ | कुष्माण्डस्वरसप्रयोगः | ,, |
| उमाशम्भुरसः | ५४४ | स्त्रीणांरक्तस्रावे तौवरयोगः | ५७० |
| रसेन्द्रनागरसः | ५४६ | मेहकुठारो रसः | ,, |
| अष्टादशोऽध्यायः । | |||
| मेहशत्रुरसः | ५४७ | विद्रधिः | ५७१ |
| कासीसबद्धरसः | ५४८ | सर्वेश्वरपोटलीरसः | ५७२ |
| भोमपराक्रमरसः | ५५० |
[ २२ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सर्वामयहरो रसः | ५७५ | देवदार्वादिचूर्णम् | ५९३ |
| वरुणकषायः | ५७७ | देवदालीपञ्चाङ्गचूर्णम् | ,, |
| शोभाञ्जनादिक्वाथः | ,, | तक्रासवः | ,, |
| वृद्धिचिकित्सा | ५७८ | एरण्डक्षारम् | ५९४ |
| वातारिरसः | ,, | शरपुङ्खादियोगः | ५९५ |
| सामान्योपायः | ५७९ | वज्रक्षारप्रयोगः | ,, |
| दार्वीप्रयोगः | ,, | काञ्चनीप्रयोगः | ,, |
| वातारिरसस्य प्रयोगोपदेशः | ,, | प्लीहिरक्तमोक्षणोपदेशः | ,, |
| तैलाईर्द्रकप्रयोगः | ५८० | शूलचिकित्सा | ५९६ |
| आन्त्रवृद्धौ पानीयतैलम् | ,, | अग्निमुखरसः | ,, |
| आन्त्रवृद्धौ पानीयतैलान्तरघृतञ्च | ,, | त्रिनेत्ररसः | ५९८ |
| अन्त्रवृद्धौ मांसरसः | ५८१ | सौभाग्ययोगः | ५९९ |
| अन्त्रवृद्धौ द्वितीयमांसरसः | ,, | चिन्तामणिरसः | ,, |
| गुल्मः | ५८२ | शूलकेसरीरसः | ६०० |
| गन्धकादिपोट्टलीरसः | ,, | मृतोत्थापनरसः | ६०१ |
| गन्धकादिपोट्टल्याः प्रयोगान्तरम् | ५८३ | क्षारताम्ररसः | ६०३ |
| वज्रेश्वररसः | ५८४ | शूलान्तकरः | ६०४ |
| शिखिवाडवरसः | ५८५ | द्वितीयोऽग्निमुखरसः | ६०५ |
| दीप्तामररसः | ५८६ | द्वितीयत्रिनेत्ररसः | ६०६ |
| विद्याधररसः | ,, | उदयभास्कररसः | ६०७ |
| रक्तोदरकुठाररसः | ५८७ | शूलगजकेसरीरसः | ६०८ |
| वैश्वानररसः | ५८८ | द्वितीयक्षारताम्रम् | ६०९ |
| अग्निकुमाररसः | ५८९ | ताम्राष्टकम् | ६१० |
| सर्वाङ्गसुन्दररसः | ,, | वडवानलगुटिका | ,, |
| गुल्मनाशनरसः | ५९२ | अग्निकुमाररसः | ६११ |
| सामान्योपायः | ५९३ | शूलहरक्षारः | ६१३ |
| तिलकक्वाथः | ,, | क्षारवटी | ६१४ |
$$[ \text{ २३ } ]$$
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सामान्योपायः | ६१४ | वातोदरलक्षणम् | ६३२ |
| शम्बूकादिलौहम् | ,, | उदरघ्नरसः | ६३३ |
| अथेन्द्रवारुणिकादिचूर्णम् | ६१५ | विनोदविद्याधररसः | ,, |
| भूदार्वादियोगः | ,, | सुरेचनकररसः | ६३४ |
| सद्यःशूलहरोयोगः | ,, | मृत्युञ्जयरसः | ,, |
| सद्यःशूलहरयोगद्वयम् | ६१६ | उदरे विरेचनविधिः | ६३६ |
| कार्श्य-चिकित्सा | ,, | त्रैलोक्यसुन्दररसः | ,, |
| अमृतार्णवरसः | ,, | महावह्निरसः | ६३७ |
| पूर्णचन्द्ररसः | ६१७ | गुडनागरप्रयोगः | ६३८ |
| स्थौल्यचिकित्सा | ६१८ | वैश्वानररसः | ,, |
| वडवाग्निमुखरसः | ,, | उदयमार्त्तण्डरसः | ६३९ |
| स्थौल्ये पूर्वकृत्यनिर्देशः | ,, | सूर्यप्रभागुटिका | ६४० |
| मध्वार्द्रकप्रयोगः | ,, | वज्रक्षारम् | ,, |
| अग्निकुमाररसः | ,, | सामान्योपायाः | ६४२ |
| अम्लपित्त-चिकित्सा | ६२३ | खदिरादियोगः | ,, |
| तत्रादौ अम्लपित्तलक्षणम् | ,, | पिप्पलीप्रयोगः | ,, |
| लीलाविलासरसः | ,, | पाण्डुरोगः | ६४३ |
| ताम्रद्रुतिरसः | ६२५ | हंसमण्डूरः | ,, |
| कुष्माण्डखण्डलेहः | ६२७ | कालविध्वंसनरसः | ६४४ |
| सामान्योपायः | ६२८ | पञ्चाननरसः | ६४६ |
| वमनयोगः | ,, | आरोग्यसागररसः | ६४८ |
| विरेचनयोगः | ६२९ | पाण्डुपङ्कशोषणरसः | ६५० |
| पित्तरोग-चिकित्सा | ,, | पित्तपाण्ड्वरिरसः | ,, |
| पित्तान्तरसः | ,, | त्रैलोक्यसुन्दररसः | ६५१ |
| दशसारचूर्णम् | ६३० | त्रिनेत्राख्यरसप्रयोगः | ,, |
| एकोनविंशोऽध्यायः । | जयपालरसः | ,, | |
| उदरादिचिकित्सा | ६३१ | देवदालीचूर्णम् | ६५२ |
| जलोदरलक्षणम् | ,, |
[ २४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पाण्डुहारीहरीतकी | ६५० | कुष्ठजिद्रसः | ६६९ |
| विजयावटिका | ६५३ | तालेश्वररसः | ,, |
| टङ्कणादियोगः | ६५४ | महातालेश्वररसः | ६७१ |
| कामला | ,, | ककनसुन्दररसः | ६७२ |
| कामलाप्रणुद्रसः | ,, | हरिबोलाङ्कुशरसः | ६७३ |
| त्रयोनिरसः | ६५५ | त्रिपुरान्तकरसः | ,, |
| कामेश्वररसः | ६५६ | विश्वहितरसः | ६७४ |
| सिन्दूरभूषणरसः | ६५७ | व्योषादिगुटिका | ६७५ |
| सुधापञ्चकरसः | ६५८ | कुष्ठकुठाररसः | ६७६ |
| मुस्तादिचूर्णम् | ,, | वज्रशेखररसः | ६७७ |
| सामान्योपायः | ६५९ | दद्रुकुष्ठविद्रावणरसः | ६७९ |
| विंशोऽध्यायः । | माणिक्यतिलकरसः | ,, | |
| विसर्पजिद्रसः | ६६० | परहितरसः | ६८० |
| विसर्पनाशनतैलम् | ६६१ | तालकेश्वररसः | ६८२ |
| विसर्पहरतैलम् | ,, | खगेश्वररसः | ६८४ |
| कुष्ठरोगः | ६६२ | कुष्ठनाशनरसः | ६८५ |
| गलत्कुष्ठलक्षणम् | ,, | आरोग्यवर्धिनी गुटिका | ,, |
| श्वित्रकुष्ठलक्षणं भेदाश्च | ,, | नारायणरसः | ६८७ |
| वातकुष्ठहररसः | ६६३ | मेदिनीसाररसः | ६८८ |
| पित्तकुष्ठहररसः | ,, | जन्तुघ्नीगुटिका | ६९० |
| कफकुष्ठहररसः | ६६४ | धन्वन्तरिरसः | ६९१ |
| सन्निपातकुष्ठहररसः | ,, | वज्रधाररसः | ६९२ |
| विजयरसः | ६६५ | महातालेश्वररसः | ,, |
| सर्वेश्वररसः | ६६६ | कुष्ठकुठाररसः | ६९४ |
| सप्तकुष्ठारिरसः | ६६७ | स्वर्णक्षीररसः | ६९५ |
| प्रतापलङ्केश्वरः | ६६८ | त्रैलोक्यविजयतैलम् | ६९६ |
| कुष्ठनाशनरसः | ,, | कुष्ठान्तपर्पटीरसः | ,, |
[ २५ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| कासीसबद्धरसः | ६९७ | श्वेतकुष्ठहरचूर्णम् | ७१४ |
| सर्वेश्वररसः | ६९८ | सामान्योपायः | ७१५ |
| योगराजगुग्गुलुप्रयोगोपदेशः | ६९९ | सिध्मेगन्धपाषाणलेपः | ” |
| श्वित्रारिरसः | ” | सिध्मे वराटिकालेपः | ” |
| चन्द्रप्रभावटिका | ७०० | दद्रुकुष्ठे मयूरक्षारादिलेपः | ७१६ |
| किलासनाशनरसः | ७०१ | चर्मकुष्ठे पर्पटरसप्रयोगविधिः | ” |
| उदयादित्यरसः | ” | मेघनादाद्युद्वर्त्तनम् | ” |
| अल्पश्वित्रे शिलादिलेपः | ७०३ | निर्गुण्ड्यादिप्रलेपः | ७१७ |
| अङ्कोलतैलादिलेपद्वयम् | ” | गुञ्जाद्युद्वर्त्तनम् | ” |
| श्वित्रान्तकरसः | ७०४ | काञ्चन्यादिप्रयोगः | ७१८ |
| श्वेतारियोगः | ७०५ | कुमार्यादिलेपः | ” |
| कृष्णीकरणयोगः | ” | महामुण्डीलेपः | ” |
| श्वित्रकुष्ठारिरसः | ७०६ | कण्डूव्रणादिहरः शिलादिप्रलेपः | ” |
| स्नुह्यादितैलम् | ” | गन्धकादिप्रयोगः | ७१९ |
| आरग्वधादितैलम् | ” | कुष्ठविध्वंसनो लेपः | ” |
| गन्धपिष्टीतैलम् | ७०७ | कृमिचिकित्सा | ७२० |
| सर्वकुष्ठान्तकृत्तैलम् | ७०८ | कृमिलक्षणम् | ” |
| कुष्ठविद्रावणतैलम् | ” | अग्नितुण्डरसः | ” |
| वज्रतैलम् | ७०९ | कृमिज्वरे आखुपर्णीप्रयोगः | ७२१ |
| महाभल्लाततैलम् | ७१० | क्रिमौ पर्पटीप्रयोगोपदेशः | ” |
| महामार्त्तण्डतैलम् | ” | कीटमर्दनरसः | ” |
| श्वित्रारितैलम् | ७१२ | कृमिघ्नरसः | ७२२ |
| कुष्ठारितैलम् | ” | क्रिमिहररसः | ” |
| कुष्ठामयघ्नगणः | ७१३ | कृमिशूलहरो रसः | ७२३ |
| महानिम्बादिचूर्णम् | ” | सूतभस्मप्रयोगः | ” |
| सर्वकुष्ठाङ्कुशचूर्णम् | ७१४ | एकविंशोऽध्यायः। | |
| श्वित्रनाशनचूर्णम् | ” | अष्टो महारोगाः | ७२४ |
[ २६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शीतवातलक्षणम् | ७२४ | रक्तवातेऽपथ्यम् | ७३६ |
| वातारिरसः | ७२५ | आमवातः | ” |
| विजयागुटिकाप्रयोगोपदेशः | ” | आमवातेवातारिरसप्रयोगोपदेशः | ” |
| शीतारिरसः | ७२६ | अनिलारियोगः | ७३७ |
| स्पर्शवातः | ” | आमवातेऽरण्डतैलप्रशंसा | ” |
| सर्वेश्वररसः | ७२७ | अपस्मारः | ” |
| अर्केश्वररसः | ७२८ | पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ७३८ |
| स्पर्शवातघ्नरसः | ” | ब्राह्म्यादिनस्यम् | ” |
| गन्धाश्मगर्भरसः | ७२९ | गवाक्ष्यादिनस्यम् | ” |
| द्वितीयगन्धाश्मगर्भरसः | ७३० | श्वेतापराजितादिनस्यम् | ७३९ |
| स्पर्शवातारिरसः | ७३१ | अपस्मारहरनस्यम् | ” |
| स्पर्शवातान्तकृद्वटी | ” | अपस्मारहरो योगः | ” |
| स्पर्शवातारितैलम् | ७३२ | उन्मादः | ७४० |
| स्पर्शवाते राजवृक्षप्रयोगः | ७३३ | माहेश्वरधूपः | ” |
| स्पर्शवाते चक्रमर्दादिः | ” | उन्मादे पर्पटीरसप्रयोगोपदेशः | ७४१ |
| अस्पर्शवाते त्रिगन्धप्रयोगः | ७३४ | उन्मादे उपचारविशेषाः | ” |
| अस्पर्शवाते हियावलीप्रयोगः | ” | एकाङ्गवातः | ७४२ |
| यवानीघृतम् | ” | वडवानलरसः | ” |
| स्पर्शान्तकरोऽर्कदुग्धप्रयोगः | ” | मार्त्तण्डेश्वररसः | ७४३ |
| स्पर्शान्तको हल्यादियोगः | ७३५ | चतुःसुधारसः | ७४५ |
| स्पर्शवाते रसेन्द्रलेपः | ” | सर्ववातारिरसः | ७४७ |
| रक्तवात-चिकित्सा | ” | वातविध्वंसनरसः | ७४९ |
| रक्तवातलक्षणम् | ” | वृकोदरगुटिका | ७५१ |
| सामान्योपायाः | ” | प्रभावती वटी | ७५२ |
| त्रियोनिरसप्रयोगः | ” | स्वच्छन्दभैरवरसः | ७५३ |
| कोकिलाक्षादिकषायः | ७३६ | स्वच्छन्दभैरवरसः | ७५४ |
| संशोधनोपदेशः | ” | वडवानलरसः | ” |
[ २७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| त्र्यम्बकेश्वररसः | ७५५ | अमृतप्राशचूर्णम | ७६८ |
| गगनगर्भा वटी | ७५६ | ऐलेयकतैलम् | ७७० |
| वातगजाङ्कुशरसः | ” | ऐलेयसर्पिः | ७७१ |
| शतावरी गुग्गुलुः | ७५७ | ऐलेयकप्रयोगः | ७७२ |
| योगराज गुग्गुलुः | ७५८ | द्वाविंशोऽध्यायः । | |
| द्वितीयो योगराजगुग्गुलुः | ७६० | वन्ध्यादिचिकित्सा | ७७३ |
| षडङ्गगुग्गुलुः | ७६१ | वन्ध्यादोषभेदादिकथनम् | ” |
| विजयभैरवतैलम् | ७६२ | जयसुन्दररसः | ७७५ |
| द्वितीयविजयभैरवतैलम् | ” | रत्नभागोत्तररसः | ७७७ |
| सूततैलम् | ७६३ | चक्रिकावन्चरसः | ७७८ |
| एरण्डतैलत्रिफलादिसिद्धघृतवानन्द-भैरवोपदेशश्च | ७६४<br>” | वर्धमानरसः | ७८० |
| सामान्योपायाः | ” | द्रुतिसाररसः | ७८३ |
| पर्पटरसप्रयोगविधिः | ” | सामान्योपायाः | ७८५ |
| सर्जतैलम् | ७६५ | देवदालीप्रयोगः | ” |
| एकाङ्गवाते पर्पटीरसप्रयोगविध्यन्तरम् | ”<br>” | शरपुङ्खाप्रयोगः | ७८६ |
| धूमसारादिषडङ्गप्रयोगः | ” | रुद्राक्षादिप्रयोगः | ” |
| निर्गुण्डीप्रयोगः | ७६६ | श्वेतकण्टकारीप्रयोगः | ” |
| रक्तैरण्डप्रयोगः | ” | विष्णुक्रान्ताप्रयोगः | ७८७ |
| इन्द्रवारुणीप्रयोगः | ” | अश्वगन्धाप्रयोगः | ७८८ |
| सर्वाङ्गैकाङ्गवातारिरसः | ” | शिवोक्ततान्त्रिकप्रयोगः | ” |
| वातरक्तः | ७६७ | मृतवत्सालक्षणम् | ” |
| अधिकारान्तरोक्तौषधप्रयोगोपदेशः | ” | शङ्खरोक्तदेवव्यपाश्रयचिकित्सा | ” |
| वातरक्तादिसर्वरोगे सर्वेश्वरी पर्पटी | ” | युक्तिव्यपाश्रये वन्ध्याकर्कटकीप्रयोगः | ७९१ |
| पित्तरोग-चिकित्सा | ” | गर्भिणीरोगः | ” |
| चन्द्रावलेहः | ” | गर्भिणीरोगापनयन-गर्भपोषण-सामान्योपायाः | ” |
[ २८ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| प्रथममासे पद्माकादिकल्कः | ७९१ | गर्भिण्या वातरोगे बालबिल्वादिसाधितक्षीरप्रयोगः | ७९७ |
| द्वितीयमासे नीलोत्पलादिकल्कः | ,, | गर्भिण्या मूत्ररोगे श्वदंष्ट्रादिकषायः | ,, |
| तृतीयमासे श्रीखण्डादिकल्कः | ७९२ | गर्भिण्या मासानुमासिकयोगः | ,, |
| तृतीयमासे नीलोत्पलादिकल्कान्तरम् | ,, | मूढगर्भचिकित्सा | ८०० |
| गर्भिणीज्वरहरः पाठादिकषायः | ,, | अन्तर्मृतापत्याया लक्षणम् | ,, |
| गर्भिणीज्वरहरश्छिन्नादिकषायः | ७९३ | मूढगर्भाया असाध्यलक्षणम् | ,, |
| गर्भिणीज्वरहरः पयस्यादिकषायः | ,, | गर्भप्रसवसामान्योपायाः | ८०१ |
| गर्भिणीज्वरहानिः | ७९४ | तत्र करञ्जबीजादिप्रलेप अहिन्निर्मोकस्नुहीक्षीरौ च | ,, |
| गर्भिण्यतीसारहरो वृक्षकत्वगादिकषायः | ,, | हलिनीप्रयोगः | ,, |
| गर्भिण्यतिसारहरौ श्रीपर्ण्यादिबलादिक्वाथौ | ,, | यष्टिकादिकल्कः | ,, |
| गर्भिण्युदावर्त्तादिहरः पुनर्नवादिकषायः | ,, | लाङ्गल्यादिलेपः | ८०२ |
| गर्भिण्याः शोथहरोऽपायः | ७९५ | मातुलुङ्गीरम्भाप्रयोगौ | ,, |
| गर्भिणीशोथहरः पुनर्नवादिलेपः | ,, | सिद्धार्थादिवस्तिः | ,, |
| गर्भिण्युदावर्त्तादिहरोवर्षाभूक्वाथः | ,, | सिद्धार्थकानुवासनम् | ,, |
| गर्भिण्याः पित्तार्त्तिहरोयष्टिकादिक्वाथः | ,, | सूतिका-चिकित्सा | ८०३ |
| गर्भिण्याः श्वासकासहरस्तिक्तकादिकषायः | ७९६ | पर्पटीरसः | ,, |
| गर्भिणीकासे मरिचप्रयोगः | ,, | सूतिकारोगनाशनरसः | ,, |
| गर्भिण्या वान्तौ लाजादिकषायः | ,, | सौभाग्यशुण्ठी | ,, |
| गर्भिण्या हिक्कायां बालबिल्वादिक्वाथः | ,, | सामान्योपायाः | ८०५ |
| गर्भिण्या अग्निमान्द्ये अजमोदादिचूर्णम् | ,, | तत्रादौ कौरण्टकादिक्वाथः | ,, |
| पञ्चमूलक्वाथः | ,, | ||
| भूनिम्बादितैलम् | ,, | ||
| योनिव्यापच्चिकित्सा | ८०६ | ||
| योनिशूलहरोनिर्गुण्ड्यादिप्रयोगः | ,, | ||
| प्रधंसिन्यां कारलीकन्दप्रयोगः | ,, |
[ २९ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शिथिलयोनौ इन्द्रगोपप्रयोगः | ८०६ | गुदपाकचिकित्सा | ८१४ |
| विवृतायां माकन्दमूलादिलेपः | ” | मुखपाकचिकित्सा | ८१५ |
| श्रीपर्णीतैलम् | ८०७ | नाभिपाकचिकित्सा | ” |
| बालरोगः | ” | कुण्डलचिकित्सा | ” |
| माहेश्वरधूपः | ” | बालपञ्चामृतम् | ८१६ |
| विजयधूपः | ८०८ | तिक्ताद्यं घृतम् | ” |
| ग्रहनाशिनीगुटिका | ” | राजीकुष्ठादि लेपः | ” |
| सामान्योपायाः | ८०९ | छिन्नातैलम् | ८१७ |
| कणास्वर्णप्रयोगः | ” | स्फूर्जकादितैलम् | ” |
| सद्योजातबालस्य संज्ञाजननोपायः | ” | निम्बादिघृतं क्षीरञ्च | ” |
| सद्योजातबालस्य ज्वरादिनिवारणोपायः | ” | त्रयोविंशोऽध्यायः ।<br>उन्मादरोगः | ८१८ |
| पित्तज्वरे रोहिणीक्षीरम् | ” | उन्मादस्य निदानसम्प्राप्ती | ” |
| पित्तज्वरे अश्वत्थक्षीरम् | ८१० | उन्मादलक्षणम् | ८१९ |
| गन्धोत्पलजटादिकल्कः | ” | उन्मादचिकित्सा | ” |
| सहदेव्यादिचूर्णम् | ” | ग्रहघ्नधूपः | ” |
| न्यग्रोधादिक्वाथः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| रक्तातिसारहरचूर्णम् | ८११ | अर्कमूर्तिरसस्यप्रयोगविधिः | ” |
| सक्षीरबोलप्रयोगः | ” | निर्गुण्डिकादितैलम् | ८२० |
| मूत्रविङ्ग्रहहरं मधुकादि | ” | अपस्मारः | ” |
| यष्ट्यादिघृतम् | ” | अपस्मारसम्प्राप्तिलक्षणे | ” |
| शङ्खनाभ्यादिवर्तिः | ८१२ | अपस्मारचिकित्सा | ८२१ |
| अश्वगन्धाघृतम् | ” | अपस्मारनाशनरसः | ” |
| तालुकण्टलक्षणम् | ” | नवाङ्गवटिका | ८२२ |
| तालुकण्टकचिकित्सा | ८१३ | सूतकप्रत्ययः | ” |
| गुदकीटस्य निदानलक्षणे | ” | सर्वेश्वररसः | ८२३ |
| गुदकीटचिकित्सा | ८१४ | धूस्तूरपञ्चाङ्गघृतम् | ८२४ |
[ ३० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| चूर्णाञ्जनम् | ८२४ | पित्ताभिष्यन्दे तीक्ष्णादिवर्तिः | ८३७ |
| मसीयोगः | ” | पित्ताभिष्यन्दे नागादिवर्तिः | ” |
| तिलजदीपाञ्जनम् | ८२५ | ताम्रादिवर्तिः | ” |
| चण्डभैरवरसः | ” | पारदादिवर्तिः | ८३८ |
| पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८२६ | एकत्रिशाङ्गवर्तिः | ” |
| पर्पटीरसस्य प्रकारान्तरेण सेवनोपदेशः | ” | षडङ्गवर्तिः | ८३९ |
| नेत्ररोगाणां संख्या | ” | द्वादशाङ्गवर्तिः | ” |
| नेत्ररोग-चिकित्सा | ८२७ | पटलहरेन्द्ररसः | ८४० |
| ताम्रवर्तिः | ” | खर्णादिवर्तिः | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | विशायाञ्जनम् | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | पुष्पहराञ्जनम् | ८४१ |
| ताम्रद्रुतिः | ८२९ | शिग्रुमूलाद्याश्च्योतनम् | ” |
| गन्धकद्रुतिः | ८३० | नेत्रशूलघ्नमाश्च्योतनम् | ” |
| गरुडाञ्जनम् | ८३१ | पौनर्नवाञ्जनम् | ” |
| तिमिरहराञ्जनम् | ८३२ | नेत्रजलस्रावहरोयोगः | ” |
| पटलहराञ्जनम् | ” | वक्ररोमहराञ्जनञ्च | ” |
| रक्ताञ्जनम् | ८३३ | नृकपालाञ्जनम् | ८४२ |
| शम्बूकादिवर्तिः | ” | काचान्धह्राञ्जनम् | ” |
| नक्तान्ध्ये पञ्चाङ्गगुटिका | ” | राज्यन्धहराञ्जनम् | ” |
| नवनेत्रदात्रीवर्तिः | ८३४ | अभिष्यन्दहरो योगः | ८४३ |
| नयनरोगहरा वर्तिः | ” | राज्यन्धे व्योषाञ्जनम् | ” |
| शिग्रुतैलम् | ८३५ | राज्यन्धे मरिचाञ्जनम् | ” |
| नागादिवर्तिः | ” | तिमिरहराञ्जनम् | ” |
| वाताभिष्यन्दे इन्द्रादिवर्तिः | ” | चतुर्विंशोऽध्यायः । | ८४५ |
| श्लेष्माभिष्यन्दे शुल्वादिवर्तिः | ८३६ | कर्णरोगः | ” |
| त्रिदोषाभिष्यन्दे रसेन्द्रवर्तिः | ” | कर्णरोगनामानि | ” |
| कर्णरोगचिकित्सा | ८४६ |
[ ३१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कर्णरोगहरी वज्रादिवटिका | ८४६ | धातुबद्दरसगुटिका | ८५३ |
| कर्शामयघ्नतैलम् | ” | महासरस्वतीचूर्णम् | ८५५ |
| क्रिमिकर्णारितैलम् | ८४७ | मुखरोगादिगलगण्डमालारोगाणां सामान्योपायाः | ” |
| सामान्योपायाः | ” | गलकीलके आमलकप्रयोगः | ” |
| कर्णशूले लवणाद्रकप्रयोगः | ” | विषतिन्दुकादि वटी च | ” |
| कर्णशूले तिलपर्णीप्रयोगः | ” | गलकीलके सैन्धवप्रयोगः | ८५६ |
| अर्कपत्रप्रयोगः | ” | गलकीलके भल्लातकप्रयोगः | ” |
| लशुनरसप्रयोगः | ” | दन्तदार्ढ्यंकरोजिह्वापूतिगन्धहरश्च जयाप्रयोगः | ” |
| पूयहरो मेघनाद स्वरसः | ८४८ | मुखपाके पर्पटीरसः | ” |
| बाधिर्यहरं रुषल्यादिचूर्णम् | ” | मुखशोषे महाराष्ट्री गुटिका | ८५७ |
| कर्णमूलस्फोटहरः केतकादिलेपः | ” | सामान्योपायाः | ” |
| कर्णगलादिस्फोटहरः पुत्रजीवलेपः | ” | मुखवैवर्ण्ये पुनर्नवायुद्वर्तनम् | ” |
| गोमक्षिकानिःसारणार्थं तगरचर्वणादिकम् | ” | नीलिकायां रजन्यादिलेपः | ” |
| कर्णपालीवर्धको मुषलीप्रयोगः | ८४९ | मुखवैवर्ण्ये वङ्गभस्मप्रयोगः | ८५८ |
| कर्णवर्धकचर्मचेटप्रयोगः | ” | मुखवैवर्ण्यदौ मातुलुङ्गादिप्रलेपः | ” |
| कर्णवृद्धिकरोवराहतैलप्रलेपः | ” | मञ्जिष्ठादिप्रलेपः | ” |
| नासारोगाः | ८५० | मुखदौर्गन्ध्यनाशिनी कुष्ठादिवटी | ” |
| मणिपर्पटीरसः | ” | मुखदौर्गन्ध्ये गृहधूमक्वाथः | ८५९ |
| पूयास्रलक्षणम् | ८५१ | मुखदौर्गन्ध्ये पथ्यादि वटिका | ” |
| सामान्योपायः | ” | मुखवैरस्ये लाजादिचूर्णम् | ” |
| कुङ्कुमादिनस्यम् | ८५२ | उपजिह्वायां निर्गुण्ड्यादियोगः | ” |
| कामलाहराञ्जनम् | ” | कृमिदन्ते अभयादिगुटिका | ८६० |
| कामलाहरमञ्जनान्तरम् | ” | कृमिदन्ते वासीसादिगुटिका | ” |
| मुखरोगः | ” | कृमिदन्ते विशालाधूमः | ” |
| मुखरोग-चिकित्सा | ८५३ | चलदन्ते जात्यादिदन्तधावनम् | ” |
| ताप्यादिवटी | ” |
[ ३२ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्कः | विषयाः | पृष्ठाङ्कः |
|---|---|---|---|
| चलदन्ते मूलकबीजप्रयोगः | ८६१ | इन्द्रलुप्ते भल्लातादिलेपः | ८६७ |
| मुखवैरस्ये आरनालगण्डूषः | ” | इन्द्रलुप्ते गुञ्जाप्रयोगः | ८६८ |
| सुखदो गण्डूषः | ” | सूर्यावर्तादौ अभ्रादिवटिका | ” |
| कण्ठशालूकादौ पारदादिप्रलेपः | ” | पलितादौ कटुतैलनस्यम् | ८६९ |
| गलकीले सैन्धवप्रयोगः | ८६२ | खालित्ये स्नुह्यादितैलं विषतैलञ्च | ” |
| गलरोगे मण्डूरलेपः | ” | व्रणस्यभेदनिर्देशः | ८७० |
| अपचीगण्डमालाचिकित्सा | ” | जात्यादिघृतम् | ” |
| गण्डमालायां ब्रह्मदण्डीमूलप्रयोगः | ८६३ | सामान्योपायाः | ८७१ |
| गण्डमालायां गन्धकादिप्रयोगः | ” | व्रणशोधनरोपणार्थंशुल्बादिप्रयोगः | ” |
| गण्डमालायां जैपालप्रयोगः | ” | व्रणरोपणार्थं पटोलादिलेप | ” |
| चलदन्ते हेमतारादिगुटिका | ८६४ | व्रणरोपणार्थं निम्बपत्रादिप्रयोगः | ” |
| चलदन्ते धातुवद्धरसगुटिकोपदेशः | ” | व्रणरोपणे अपामार्गप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगाणां नामानि | ” | व्रणरोपणे गुडटङ्कणवर्तिः | ८७२ |
| शिरोरोगचिकित्सा | ८६५ | दुषितव्रणलेखनार्थं पारदादिप्रयोगः | ” |
| शिरोरोगारिरसः | ” | भग्नस्य भेदनिर्देशः | ” |
| मस्तकरोगाणां सामान्योपायाः | ” | भग्नेपर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८७३ |
| अर्द्धावभेदके गिरिकर्णीप्रयोगः | ” | भग्ने वज्रीलेपः कान्तपाषाणलेपश्च | ” |
| गुडादिनस्यम् | ” | भगन्दरलक्षणम् | ” |
| मरिचप्रयोगः | ” | भगन्दरस्य निरुक्तिः | ” |
| शिरः शूले कुङ्कुमादिनस्यम् | ८६६ | रविताण्डवरसः | ८७४ |
| अर्धशूले मरिचप्रयोगः | ” | सामान्योपायाः | ८७५ |
| यूकालिक्षायां पारदप्रयोगः | ” | कर्तव्यनिर्देशः | ” |
| दारुणतैलम् | ” | लाङ्गल्यादिप्रलेपः | ” |
| केशपाते हरिद्रादिलेपः | ८६७ | कालाग्निरसः | ” |
| दृढकेशकरो जातिपुष्पादिप्रलेपः | ” | चक्रिकाबद्धरसप्रयोगोपदेशः | ” |
| केशपाते भृङ्गचादितैलम् | ” | स्फोटने चतुरङ्गलेपः | ८७६ |
| स्फोटने हरिद्रादिप्रलेपः | ” |
[ ३३ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| शोषणे नरास्थितैलप्रयोगः | ८७६ | पञ्चविंशोऽध्यायः । | |
| शोधनरोपणे ताम्रभस्मप्रयोगः | ८७७ | क्षुद्ररोगाणां नामानि | ८८५ |
| रोपणे मार्जारस्थिप्रलेपः | ,, | क्षुद्ररोगे पर्पटोप्रयोगविधिः | ८९५ |
| भगन्दरव्रणक्षालने त्रिफलाकषायः | ८७७ | व्यङ्गे शशरुधिरप्रयोगः-जातिफलप्रयोगश्च | ,, |
| भूतलोत्थचूर्णप्रयोगः | ,, | व्यङ्गे इङ्गुदीमज्जप्रयोगः | ,, |
| कुक्कुरास्थिलेपः | ,, | कुनखे स्नुहीक्षीरादिप्रलेपः | ,, |
| ग्रन्थिलक्षणं व्युत्पत्तिश्च | ८७८ | कुनखे अभयाप्रयोगः | ८९६ |
| मेदोग्रन्थौ अरिमेदादिभस्मलेपः | ,, | कुनखे कुष्ठादिप्रलेपप्रयोगः | ,, |
| मेदोवृद्धौ गुडूच्यादिः | ,, | कुनखे पुत्रजीवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायामुदयभास्करः | ,, | कक्षाग्रन्थौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| कालस्फोटादौ पुत्रजीवप्रलेपः | ८७९ | कक्षाग्रन्थौ विषादिलेपः | ,, |
| सन्धिग्रन्थौ रक्तस्रावविधिः | ,, | स्तनविद्रधौ क्रियाक्रमः | ,, |
| कक्षग्रन्थ्यादौ पुत्रजीवप्रयोगः | ८८० | स्तनविद्रधिस्फोटने एकवीरप्रयोगः | ८९७ |
| कालस्फोटै गुञ्जापत्रादिचूर्णम् | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे यष्ट्यादिचूर्णम् | ,, |
| कालस्फोटे विष्णुक्रान्तादिप्रलेपः | ,, | स्तनविद्रधिरोपणे दारुवर्त्तिः | ,, |
| ग्रन्थ्यादौ पुनर्नवादिप्रलेपः | ,, | लिङ्गरोग-चिकित्सा | ८९८ |
| अर्बुदभेदः | ८८१ | बोलप्रयोगः | ,, |
| अर्बुदहररसः | ,, | लिङ्गपाके उडुम्बरादिक्षालनम् | ,, |
| सामान्योपायाः | ,, | लिङ्गपाके जीरकप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालापचीलक्षणम् | ८८२ | लिङ्गपाके महाशङ्खप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सुरवारुण्यादियोगः | ८८३ | लिङ्गपाके घोण्टादिलेपः | ,, |
| गण्डमालायामर्कक्षीरादिलेपः | ,, | लिङ्गपाके गन्धप्रयोगः | ८९९ |
| अपच्यां गिरिकर्णिकाप्रयोगः | ८८४ | लिङ्गपाके निम्बादिचूर्णम् | ,, |
| गण्डमालायां छुछून्दरी तैलम् | ,, | लिङ्गव्रणरोपणे सैन्धवप्रयोगः | ,, |
| गण्डमालायां सहदेवीप्रयोगः | ,, | लिङ्गवगादौ शिग्रुप्रयोगः | ,, |
| अपच्यादौ गुञ्जादिलेपः | ,, |
४
[ ३४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| लिङ्गादिग्रन्थौ कुष्ठादिलेपः | ८९९ | भस्मकलक्षणम् | ९०७ |
| गुह्यादिगतपीटिकायामश्वत्थादिप्रलेपः | ९०० | श्लीपदस्य सम्प्राप्तिलक्षणे | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां वाकुचीचित्रकप्रयोगः | ,, | श्लीपदहररसः | ,, |
| लिङ्गादिपिटिकायां सर्पाक्षीप्रयोगः | ,, | श्लीपदहरलेपः | ९०८ |
| उपदंशहरो धूपः | ,, | वल्मीकेपित्तलभस्मप्रयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ काञ्चनीप्रयोगः | ९०१ | स्थौल्ये विडङ्गादिचूर्णम् | ९१० |
| पामायां शाखोटकक्वाथः | ९०२ | स्थौल्ये त्रिफलादिपत्रादिकषायौ | ,, |
| पादकण्डूहरो योगः | ,, | विपरीतरतिजन्यव्याधिलक्षणम् | ,, |
| पाददाहे तिलादिचूर्णम् | ,, | विपरीतरतिजन्याधिप्रतीकारः | ९११ |
| पादकण्डूहरं प्रयोगान्तरम् | ,, | उपदंशादिप्रतीकारः | ,, |
| पादस्फुटने पथ्यामर्दनम् | ,, | सर्वरक्तविकारे उपायः | ९१२ |
| कदरे यवचिञ्चादिकषायः | ९०३ | अस्थिभग्ने लाक्षादिप्रलेपः | ,, |
| विपादिकायां गुड़ादिप्रलेपः | ,, | स्नायुके अस्पर्शारिप्रयोगोपदेशः | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापन्निदानम् | ,, |
| विपादिकायां मदनादिप्रलेपः | ,, | योनिव्यापत्सु पिष्टीयोगः | ,, |
| कण्ड्वादौ रसादिप्रलेपः | ,, | योनिशूले निम्बादिगोलकम् | ९१३ |
| स्वरभङ्गे धात्रीफलस्वरसप्रयोगः | ९०४ | योनिरोगे सोमराज्यादिप्रलेपः | ,, |
| स्वरभङ्गे देवदार्वादिचूर्णम् | ,, | योनिकृमिशूले रसोनादिप्रलेपः | ,, |
| गलदाहे सैन्धवादि चूर्णम् | ९०५ | मञ्जिष्ठादिघृतम् | ,, |
| गलदाहे करञ्जमज्जापथ्याप्रयोगः | ,, | रजोनाशे त्रियोनिरसप्रयोगविधिः | ९१४ |
| स्तनवर्द्धने स्नेहनस्यम् | ,, | पुष्परोधहरयोगत्रयम् | ,, |
| स्तनव्रणे कुरूबकतैलम् | ९०६ | पुष्परोधरक्तगुल्महरयोगद्वयम् | ९१५ |
| स्तनविद्रधौ शुल्वप्रयोग | ,, | पुष्परोधे चणकप्रयोगः | ,, |
| स्नायुके कुम्भीप्रयोगः | ९०७ | पुष्परोधे गुढव्योषादिचूर्णम | ,, |
| गर्भाजनने धुस्तूरप्रयोगः | ९१६ | ||
| गर्भाजनने सैन्धवप्रयोगः | ,, | ||
| गर्भस्रावणे चूर्णप्रयोगः | ,, |
[ ३५ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| गर्भस्रावे एरण्डप्रयोगः | ९१६ | तार्क्ष्यसूतः | ९२४ |
| गर्भस्रावे चित्रकप्रयोगः | ,, | विषहररसः | ,, |
| अतिरक्तस्रावेशरपुङ्खाप्रयोगः | ,, | षड्विंशोऽध्यायः । | |
| अतिरक्तस्रावे अर्कमूर्त्तिरसप्रयोगविधिः | ,, | जरारोग-चिकित्सा | ९२५ |
| योनिशूलहरयोगद्वयम् | ९१८ | रसायनगुणाः | ,, |
| रजोदोषे व्योषादितैलम् | ,, | जरायानिदानम् | ,, |
| पुष्यानुगं चूर्णम् | ,, | वार्धक्यहररसायनम् | ,, |
| विविधविषनिर्देशः | ९१९ | उदयादित्यरसः | ९२६ |
| विष-चिकित्सा | ,, | सर्वरोगहररसायनम् | ९२७ |
| मेघनादप्रयोगः | ,, | मासिकरसायनम् | ,, |
| सूतशतावरीयोगः | ,, | षाण्मासिकरसायनम् | ९२८ |
| सूतसोमराजीयोगः | ९२० | पाक्षिकरसायनम् | ९२९ |
| अभ्रकादिप्रलेपः | ,, | हेमादिरसायनम् | ,, |
| लूताविषेसूतभस्मप्रयोगः | ,, | पिप्पल्यादिरसायनम् | ,, |
| महासर्पविषे नागदमनप्रयोगः | ९२१ | अष्टमासिकरसायनम् | ९३० |
| पञ्चाङ्गशिरीषप्रयोगः | ,, | त्रिवार्षिकरसायनम् | ९३१ |
| अश्वगन्धावन्ध्याप्रयोगौ | ,, | षष्ठ्यधिकत्रिशतवर्षायुष्कर-रसायनम् | ९३२ |
| वृश्चिकविषेव्योषादितैलम् | ,, | सहस्रवर्षायुष्कररसायनम् | ,, |
| मृतसञ्जीवनम् | ,, | त्रिफलारसायनम् | ९३३ |
| आखुविषेशिरीषप्रयोगः | ९२२ | द्वितीयत्रिफलारसायनम् | ,, |
| सर्पविषे देवदार्यादियोगः | ,, | तृतीयत्रिफलारसायनम् | ९३४ |
| सर्पविषे टङ्कणप्रयोगः | ,, | षडङ्गरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे मनोहादिगुलिका | ९२३ | वार्षिकरसायनम् | ,, |
| वृश्चिकविषे पलाशबीजगुलिका | ,, | कुष्ठादिहररसायनम् | ९३५ |
| गरविषे कनकादिवटी | ,, | ज्योतिष्मतीतैलरसायनम् | ,, |
| सविषान्ने वृक्षामादियोगः | ,, | सर्वरोगान्तकरसायनम् | ९३६ |
[ ३६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| कान्तरसायनम् | ९३६ | उमापतिरसः | ९५९ |
| अन्यत् त्रिफलारसायनम् | ९३७ | महाकनकसुन्दररसः | ९६० |
| द्वितीयकान्तरसायनम् | ९३८ | अमृतार्णवरसः | ९६१ |
| तृतीयकान्तरसायनम् | ” | मदनसञ्जीवनरसः | ९६४ |
| कान्ताभ्रकरसायनम् | ९३९ | पुष्पधन्वारसः | ९६५ |
| पाठादिघृतम् | ९४० | रसेन्द्रचूडामणिः | ९६६ |
| ताप्यादिवटकः | ” | पूर्णचन्द्ररसः | ९६८ |
| कमलाविलासरसः | ९४१ | महाकल्कः | ” |
| लक्ष्मीविलासरसः | ९४२ | मदनमोदकः | ९७२ |
| सौश्रुतनारिकेलप्रयोगः | ९४३ | कामेश्वरमोदकः | ९७३ |
| सप्तविंशोऽध्यायः । | वाजीकरणे सामान्योपायाः | ९७४ | |
| वाजीकरणम् | ९४५ | मधुकप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणगुणाः | ” | शृङ्गीप्रयोगः | ९७५ |
| वाजीकरणस्य निरुक्तिः | ” | स्वयङ्गुप्तादिचूर्णंम् | ” |
| शुक्रक्षयस्य निदानम् | ” | तिलप्रयोगः | ” |
| वाजीकरणयोगादेशे प्रतिज्ञा | ” | सिन्दूररसः | ” |
| वाजीकरणप्रयोगे पूर्वकृत्यम् | ९४६ | कार्य्यहरयोगः | ९७६ |
| कामकलाख्यरसः | ” | कार्य्यहरयोगत्रयम् | ” |
| कामदेवरसः | ९४७ | लिङ्गलेपाः, द्रावणश्च | ९७७ |
| मदनसुन्दररसः | ९४८ | द्रावणे सूतप्रयोगः | ” |
| पूर्णचन्द्ररसः | ९४९ | सिन्दूरमधुलेपः | ” |
| मदनसुन्दररसः | ” | स्तम्भने कुकवाकुप्रयोगः | ” |
| कुसुमायुधः | ९५१ | कर्पूरादिप्रलेपः | ९७८ |
| सूतेन्द्ररसः | ९५३ | पुण्डरीकप्रयोगः | ” |
| मदनकामदेवरसः | ९५४ | मदनजीवनः | ” |
| कामधेनुरसः | ९५६ | अष्टविंशोऽध्यायः । | |
| महाभ्रसत्त्वम् | ९५८ | लोहकल्पः | ” |