रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
द्वितीयोऽध्यायः। ७३
द्वितीयोऽध्यायः। ७३
पाण्डुरोग, अर्श, श्वास, कास, दुषित ग्रहणी, उरःक्षत तथा मुख के रोग नष्ट होते हैं तथा शरीर भी वलयुक्त होता है ॥ ७० ॥
अथ प्रयोगान्तरम्—
सूतभस्मार्धसंयुक्तं नीलवैक्रान्तभस्मकम्
मृताभ्रसत्त्वमुभयोस्तुलितं परिमर्दितम् ॥ ७१ ॥
क्षौद्राज्यसंयुक्तं प्रातर्गुञ्जामात्रं निषेवितम् ।
निहन्ति सकलान् रोगान् दुर्जयानन्यभेषजैः ।
त्रिःसप्तदिवसैर्नॄणां गङ्गांभ इव पातकम् ॥ ७२ ॥
इति वैक्रान्ताधिकारः ।
पारद भस्म ( रससिन्दूर ) आधा भाग, एक भाग नील वर्ण के वैक्रान्त की भस्म तथा दोनों के तुल्य मृत अभ्रक का सत्व मिला कर घोट कर शहद तथा घृत मिला कर प्रातःएक रत्ती भर ( १ गुञ्जा ) २१ दिन तक सेवन करने से अन्य औषधियों से असाध्य भी मनुष्यों के सकल रोग नष्ट हो जाते हैं जिस तरह गङ्गा जल पापों को नष्ट कर देता है ॥ ७१-७२ ॥
अथ माक्षिकम्—
माक्षिकोत्पत्तिवर्णनम्
सुवर्णशैलप्रभवो विष्णुना काञ्चनो रसः ।
ताप्यां किरातचीनेषु यवनेषु च निर्मितः ॥
ताप्यः सूर्य्यांशुसन्तप्तो माधवे मासि दृश्यते ॥ ७३ ॥
विष्णु भगवान की कृपा से सुमेरु पर्वत से उत्पन्न हुआ तथा सुवर्ण के समान चमकने वाला माक्षिक धातु तापी नदी और किरात, चीन इत्यादि यवन देशों में निर्मित हुआ है और यह तापी नदी से उत्पन्न माक्षिक वैशाखमास में सूर्य की प्रखर किरणों से तप्त होने पर दिखाई देता है ॥ ७३ ॥
अथ माक्षिकस्य गुणाः—
मधुरः काञ्चनाभासः साम्लो रजतसन्निभः ।
किञ्चित् कषायमधुरः शीतः पाके कटुर्लघुः ।
तत्सेवनाज्जरायाधिविषैर्न परिभूयते ॥ ७४ ॥
सुवर्ण के समान चमकदार माक्षिक मधुररसवाला होता है और रजतवर्ण
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रसरत्नसमुच्चये—
माक्षिक अम्ल तथा कुछ कसैला और मधुर, पाक में शीतवीर्य कटु और लघु होता है। इन दोनों प्रकार के माक्षिक का सेवन करने से मनुष्य जरा व्याधि और विष से आक्रान्त नहीं होता है ॥ ७४ ॥
अथ माक्षिकभेदाः—
माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः ।
तत्राऽऽद्यं माक्षिकं कान्यकुब्जोत्थं स्वर्णसन्निभम् ॥ ७५ ॥
तपतीतीरसम्भूतं पञ्चवर्णसुवर्णवत् ।
पाषाणबहुलः प्रोक्तस्ताराख्योऽल्पगुणात्मकः ॥ ७६ ॥
माक्षिक धातु सुवर्ण और रजत का भाग मिलने से दो तरह का होता है। इनमें प्रथम सुवर्ण माक्षिक जो कि कान्यकुब्ज ( कन्नोज या कानपुर ) देश की खानों से निकलता है सुवर्ण के समान होता है। किन्तु तापी नदी के तट के पास की खानों से निकाला हुआ सोनामाखी धातु पांच रङ्ग वाला तथा सुवर्ण सदृश होता है, रौप्यमाक्षिक में पत्थर का भाग ज्यादा होता है तथा वह अल्प गुणदायक है ॥७५-७६॥
**विमर्शः—**भारतवर्ष में माक्षिक कोयलों की खानों में मिलता है। आचार्यों ने इसके तीन भेद बताये हैं किन्तु इस पन्थ में इसके दो ही भेद हैं। तथा आगे विमल ( रौप्यमाक्षिक ) के तीन भेद किए हैं किन्तु यह अन्य रसग्रन्थों से विरुद्ध है।
"माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः” ( इति० र० र० स० )
१ स्वर्णमाक्षिक—कापरं पेराइटिज़् ( Copperpyritis Cu,fes 2 )
२ रोप्यमाक्षिक ( विमल )—आयर्न पेराइटिज़् ( Iron pyritis )
३ कांस्यमाक्षिक ( आर्सेनो पेराइटिज़् Arsano pyritis )
ये तीनों खनिज ताम्र, लौह, और संखिये के गन्धित हैं। इनमें से गन्धक निकाल देने से उक्त तीनों पदार्थों की प्राप्ति होती है। यद्यपि इनमें अन्य खनिज भी रहते हैं किन्तु प्रधान रूप में उपर्युक्त ही होते हैं। इस लिये इनकी भस्म बनाने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यद्यपि बजार में आने वाले स्वर्ण तथा रौप्य माक्षिक में दोनों ( स्वर्णरजत ) की मात्रा नहीं होती है। किन्तु विदेशों से कुछ इनके अधिक मूल्य खनिज आते हैं उनमें दोनों धातुओं का कुछ अंश रहता है इसलिये रस शास्त्रों में जहां २ स्वर्ण और चांदी के भस्म के अभाव में इन दोनों का ग्रहण करना हो तब उक्त अधिक मूल्यवान माक्षिक खनिजों की भस्म बनाकर प्रयोग करना चाहिये।