रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
About this granth
Raghuvamsha (रघुवंशम्) is Kalidasa's mahakavya in nineteen cantos on the kings of the Solar dynasty, from Dilipa to the dissolute Agnivarna. It is counted among his most mature poems and has been a core text of Sanskrit education for centuries.
Its well-loved episodes include Dilipa's service of the cow Nandini, Raghu's conquest of the quarters and his gift to the student Kautsa, the svayamvara of Indumati and Aja's lament at her death, the story of Dasharatha and then of Rama, Kusha's resettling of Ayodhya and the decline of the line under Agnivarna.
This is No. 40 of the Chaukhamba Surbharati Granthamala, in its fifth edition of 1994. It prints the verses with Mallinatha's classic Sanskrit commentary Sanjivani and the Chandrakala Hindi commentary of Dr. Shrikrishnamani Tripathi, former head of the department of Purana-Itihasa, culture and geography at Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. With text, Mallinatha's analysis and plain Hindi together, the 735-page volume serves both students and lovers of poetry.
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हुए। अनन्तर रामचन्द्र जी, भरत एवं लक्ष्मण के साथ शोभित पताकायुक्त इच्छानुगामी पुष्पक विमान पर वैसे ही आरूढ़ हुए जैसे बुध एवं वृहस्पति के संगति से दर्शनीय तारापति चन्द्रमा रात में चञ्चल बिजली वाले मेघ पर आरूढ़ होते हैं। विमान पर ही भरत जी ने प्रलयकाल में आदि वराह द्वारा उद्धृत पृथ्वी के समान श्रीराम द्वारा रावण के सङ्कट से उद्धृत सीता जी की पादवन्दना की। रावण की प्रणय प्रार्थना को ठुकराने से परम पवित्र एवं वन्दनीय पतिव्रता सीता जी का चरणयुगल तथा भ्राता राम के अनुसरण से जटायुक्तभरत जी का मस्तक ये दोनों मिलकर एक दूसरे को परम पवित्र करनेवाले हुए। बाद श्रीराम की शोभायात्रा आरम्भ हुई।
श्रीराम ने जिसके आगे-आगे अयोध्या के प्रजाजन चल रहे थे, ऐसे मन्दगति वाले पुष्पक विमान से आधा कोस जाकर शत्रुघ्न द्वारा सजाये गये तम्बू आदि से युक्त अयोध्या के सुन्दर उपवनों में सपरिवार निवास किया।
चतुर्दश सर्ग
अयोध्या के उपवन में विश्राम करने के बाद राम और लक्ष्मण ने आश्रय वृक्ष के भग्न हो जाने पर मुरझायी हुई दो लताओं के समान अपने पति राजा दशरथ के स्वर्गवास से शोचनीय अवस्था को प्राप्त दोनों माताओं-कौशल्या तथा सुमित्रा को एक ही साथ देखा। क्रम के अनुसार प्रणाम करनेवाले उन दोनों पुत्रों को दोनों माताओं ने आंसुओं से भरी आंखों से साफ-साफ नहीं देख पाया, किन्तु केवल पुत्रस्पर्श के सुख के अनुभव से जान लिया। दोनों माताओं ने आनन्दजन्य शीतल आंसू एवं शोकजन्य गर्म आंसू को पोंछकर दूर कर दिया। बाद उन्होंने राम एवं लक्ष्मण की देह को राक्षसों के प्रहार से हुए पुराने घावों को नये के समान दया से स्पर्श करती हुई क्षत्रियाणियों को अभीष्ट वीरमाता कहलाना अच्छा नहीं समझा। बाद में सीताजी ने पतिदेव को कष्ट देनेवाली, शुभ लक्षणों से रहित 'मैं सीता हूँ' इस प्रकार कहकर उन दोनों के चरणों पर गिरकर समान रूप से अभिवादन किया। इसपर उन्होंने कहा—कल्याणी ! उठो, लक्ष्मण के साथ तुम्हारे पति राम ने तुम्हारे पवित्र चरित्र से ही इस कठोर कष्ट को पार किया।
इसके बाद बड़े समारोह के साथ वृद्ध मन्त्रियों ने गङ्गा आदि पवित्र तीर्थों से लाये गये जलों से श्रीराम का राज्याभिषेक किया जिससे उनकी और शोभा
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बढ़ गयी। अनन्तर श्रीराम ने बाजा-गाजा के साथ नागरिकों को आनन्दित करते हुए राजधानी अयोध्या में प्रवेश किया और सुग्रीव आदि मित्रों को विविध सामग्रियों से सम्पन्न भवनों को देकर चित्रमात्र से अवशिष्ट पिता-राजा दशरथ के पूजागृह में आँखों से अश्रु बहाते हुए प्रवेश करके कैकेयी को प्रणाम करके मीठे वचनों से उनकी लज्जा को दूर किया। अनन्तर अभिनन्दन करने के लिए आये हुए अगस्त्य आदि मुनियों का सत्कार कर राम ने उनसे रावण के जन्म का वृत्तान्त श्रवण किया। एक पक्ष के बाद श्रीराम ने सीताजी के द्वारा सत्कार कराकर सुग्रीव, विभीषण आदि को विदा कर पुष्पक विमान को कुबेर के पास भेज दिया और भाइयों के साथ धर्मपूर्वक न्यायपूर्ण शासन करते हुए प्रजाओं को सुख पहुँचाया। कुछ दिनों के बाद सीताजी को गर्भ रह गया। श्रीराम ने गर्भिणी-मनोरथ के लिए उनसे जब पूछा, तब उन्होंने गङ्गातटवर्ती तपोवनों को देखने की इच्छा प्रकट की। उसी समय गुप्तचरों के द्वारा सीता के विषय में लोकापवाद सुनकर श्रीराम ने उस लोकापवाद को दूर करने के विचार से लक्ष्मण के द्वारा वाल्मीकि मुनि के आश्रम के पास सीताजी को छोड़ आने की आज्ञा दे दी। तदनुसार लक्ष्मण ने सीताजी को रथ पर बैठाकर तपोवन देखने के बहाने गङ्गा के तट पर ले जाकर उतार दिया और बड़े दुःख से श्रीराम का आदेश सुना दिया, जिसे सुनते ही सीताजी मूच्छित हो गयीं। लक्ष्मण के प्रयास से होश में आने पर सीताजी ने बिना अपराध के परित्याग करने-वाले श्रीराम को दोष नहीं दिया, किन्तु वे अपने भाग्य को ही कोसने लगीं। बाद लक्ष्मण ने दुःख से उनके चरणों पर गिरकर कहा—आर्ये ! मुझे क्षमा कीजिए, मैं पराधीन हूँ। सीताजी ने उनको उठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा—लक्ष्मण ! उठो, तुम्हारा कल्याण हो, मेरी सासुओं से मेरा प्रणाम कहना और उनके पुत्र के द्वारा निहित मेरे गर्भ का शुभ चिन्तन करने को कह देना। और
बड़े भाई से मेरा यह वचन भी कहना—राजन्, साधारण प्रजा के समान मेरा भी पालन करना आपका धर्म है। लङ्का में सबके सामने प्रत्यक्ष अग्नि में विशुद्ध होने पर भी आपने मुझे मिथ्या लोकापवाद के भय से जो छोड़ दिया है, क्या यह आपके पावन कुल के योग्य है ? मालूम पड़ता है कि राजलक्ष्मी का परित्याग कर आप मेरे साथ वन को चले गये थे, उसी से नाराज होकर उसने राजभवन में मेरा रहना सहन नहीं किया है। अब मैं सूर्य में दृष्टि लगाकर तप करूँगी कि अगले जन्म में भी आप ही मेरे पतिदेव हों। सीताजी के वचन को
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स्वीकार कर लक्ष्मण के चले जाने पर दुःख के कारण सीताजी कुररी पक्षी के समान विलाप करने लगीं, जिससे समस्त वन करुणामय हो गया—मोरों ने नाचना, पेड़ों ने पुष्प तथा हरिणों ने चबाते हुए कुशों को छोड़ दिया। कुश और समिधा को लेने के लिए आश्रम से बाहर निकले हुए वाल्मीकि मुनि रोने के शब्द का अनुसरण करते हुए सीता के सम्मुख आकर बोले—वत्से ! मैं समाधिदृष्टि से जानता हूँ कि राम ने मिथ्यावाद से क्षुब्ध होकर तुम्हारा त्याग किया है। तुम दूसरे देश में स्थित पिता के ही घर में आ गयी हो, तुम्हारे श्वसुर दशरथ मेरे मित्र थे तथा तुम्हारे पिता जनक सबको ज्ञान देने वाले हैं और तुम पतिव्रताओं में अग्रगण्य हो । तपस्वियों से शान्त इस तपोवन में रहो, तुम्हारी सन्तति का संस्कार कर्म विधिवत् हो जायेगा । शोक को दूर करने वाली तमसा में स्नान कर देवपूजन करती हुई मुनि-कुमारियों के साथ रहो । इस प्रकार आश्वासन देकर अपने आश्रम पर सीता को ले जाकर तपस्विनियों के साथ एक पर्णकुटी में रख दिया । वहाँ वे मुनि-कुमारियों के साथ रहकर नियम से समय बिताने लगीं ।
इधर लक्ष्मण ने श्रीराम के पास आकर सारा समाचार कह सुनाया, जिसे सुनकर श्रीराम के नेत्रों से आँसू गिरने लगे, क्योंकि उन्होंने तो सीता को घर से निकाला था, हृदय से नहीं ।
अनन्तर वे शोक को हटाकर प्रजाओं का पालन करने लगे । उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि अश्वमेध यज्ञ में स्वर्णमयी सीता की मूर्ति बनाकर उसे सम्पन्न किया । यह सुनकर सीताजी ने परित्याग-दुःख को किसी प्रकार सहन किया ।
पञ्चदश सर्ग
सीताजी का परित्याग कर देने के बाद रामचन्द्रजी ने किसी दूसरी स्त्री से विवाह नहीं किया । एक दिन यमुना तटवर्ती कुछ तपस्वियों ने श्रीराम के पास आकर प्रार्थना की कि लवणासुर के उपद्रव के कारण हमारी यज्ञक्रियाएँ बन्द हो गयी हैं। राम ने उनके विघ्न दूर करने की प्रतिज्ञा की, क्यों कि धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया था। राम ने उन मुनियों की रक्षा का भार शत्रुघ्न को सौंपा । जब शत्रुघ्न रथ पर सवार होकर चले तब राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे वनों की छटा देखते हुए चल पड़े ।
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शत्रुघ्न के साथ कुछ सेना भी गयी जो वैसे ही व्यर्थ थी जैसे 'अध्ययन' शब्द में इङ् धातु से लगा हुआ अधि उपसर्ग व्यर्थ है। मार्ग में जाते हुए शत्रुघ्न ने पहली रात महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पर निवास कर बितायी। वाल्मीकिजी ने अपने तप के प्रभाव से शत्रुघ्न का बड़ा सत्कार किया। उसी रात को वन-वास के समय से निवास करती हुई उनकी भाभीजी को दो पुत्र उत्पन्न हुए। यह सुनकर शत्रुघ्नजी का मन खिल उठा। दूसरे दिन हाथ जोड़कर मुनि से आज्ञा लेकर शत्रुघ्न आगे बढ़े। जिस समय वे मधुवन नगर में पहुँचे उसी समय रावण की बहिन कुम्भीनसी का बेटा लवणासुर पशुओं को मारकर अपने नगर में लौट रहा था। शत्रुघ्न ने देखा कि यह अवसर ठीक है, क्योंकि उसके हाथ में भाला नहीं है। बस, शत्रुघ्न ने उसे घेरकर प्रहार करना शुरू कर दिया। उधर लवणासुर ने भी गरजकर एक पेड़ उखाड़कर शत्रुघ्न पर प्रहार किया, पर बीच में ही उन्होंने अपने बाणों से उसे चूर-चूर कर दिया। बाद शत्रु ने एक शिला उठाकर शत्रुघ्न पर फेंकी, पर शत्रुघ्न ने ऐन्द्र अस्त्र चलाकर उसे भी चूर-चूर कर दिया। तब वह राक्षस बवण्डर के समान शत्रुघ्न पर टूट पड़ा पर उन्होंने वैष्णव अस्त्र से प्रहार कर उसे यमपुर भेज दिया। उसे मारने के बाद शत्रुघ्न को अनुभव हुआ कि मेघनाद को मारनेवाले लक्ष्मण का मैं सच्चा भाई हूँ।
लवणासुर के वध से प्रसन्न होकर मुनियों ने शत्रुघ्न को खूब आशीर्वाद दिया और शत्रुघ्न ने यमुना के किनारे मथुरा नाम की नगरी बसायी जहाँ संयमी और सुखी लोग रहने लगे।
इधर मन्त्रद्रष्टा वाल्मीकिजी ने दशरथ तथा जनक दोनों के मित्र होने के नाते सीताजी के पुत्रों का जातकर्म आदि संस्कार बड़ी विधि से किया। ज्येष्ठ पुत्र के उत्पन्न होते समय सीताजी की प्रसव-पीड़ा गाय की पूँछ के बालों से दूर की थी और छोटे पुत्र के समय कुश से दूर की थी इसलिए उनका नाम लव और कुश रखा। जब वे बच्चे बड़े हुए तब ऋषि ने उन्हें वेद-वेदाङ्ग पढ़ाया और फिर अपनी रचना आदिकाव्य रामायण का गान कराया। उन दोनों ने अपनी माँ के आगे राम का यश गा-गाकर उनका मन बहलाया। लौटते समय शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रम पर इसलिए नहीं गये कि मेरे सत्कार में ऋषि का अमूल्य समय नष्ट होगा। शत्रुघ्न ने सीधे अयोध्या आकर राजसभा में जाकर श्रीराम को प्रणाम किया और सारा समाचार कह सुनाया। श्रीराम सब सुनकर बड़े प्रभावित हुए और शत्रुघ्न को गले लगाकर उनका बड़ा सत्कार किया :
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श्रीराम के पूछने पर शत्रुघ्न ने सारी बातें तो बतायीं पर सीताजी के पुत्र होने की चर्चा नहीं की, क्योंकि वाल्मीकिजी ने उनसे कह रखा था कि समय आने पर मैं स्वयं दोनों पुत्रों को राम को सौंप दूँगा।
कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को ड्योढ़ी पर अपनी गोद से उतारकर फूट-फूटकर रोने लगा। जब राम ने उसके शोक का कारण पूछा तो उन्हें बड़ी लज्जा हुई क्योंकि इक्ष्वाकु वंश के राजाओं के राज्य में किसी की अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। यह कहकर यमराज को जीतने की इच्छा से पुष्पक विमान का स्मरण कर उसपर चढ़कर चलने लगे तो आकाश-वाणी हुई कि श्रीराम ! आपके राज्य में वर्ण सम्बन्धी दोष आ गया है, उसे खोजकर दूर करो। यह सुनकर श्रीराम पृथ्वी पर चक्कर लगाने लगे। घूमते-घूमते एक स्थान पर उन्होंने देखा कि एक पेड़ की शाखा पर उलटा लटका एक मनुष्य नीचे जलती हुई आग का धुआँ पी-पीकर तप कर रहा है। तब उन्होंने उससे पूछा—तुम कौन हो और क्या कर रहे हो ? तब वह बोला—मैं इन्द्रपद पाने के लिए तप कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है और मैं शूद्र हूँ। तब राम ने सोचा कि इसके अनधिकार कर्म से पाप फैल रहा है, फलस्वरूप ब्राह्मण का पुत्र मर गया है। अतः इससे विरत करने के लिए बाण उठाकर उसका शिर काट गिराया। राजा का दण्ड पाने से शूद्र को सद्गति मिल गयी और ब्राह्मण का पुत्र जी उठा। कुछ दिन के बाद राम ने अश्वमेध के लिए घोड़ा छोड़ा। देश के ऋषि, महर्षि एवं राजर्षि इकट्ठे होने लगे। बिना पत्नी के यज्ञ होना सम्भव नहीं था, राम ने दूसरा विवाह भी नहीं किया था, अतः सोने की सीता बनाकर राम ने अपनी पत्नी के रूप में बैठाकर यज्ञ आरम्भ किया। वाल्मीकिजी के शिष्य सीता के पुत्र लव-कुश उनकी आज्ञा से उनका बनाया हुआ रामायण गाते हुए इधर-उधर घूमने लगे। किन्नरों के समान मधुर कंठवाले बालकों के गीत सुनकर यह बात राम के कानों तक भी पहुँची। उन्होंने बालकों को बुलाकर भाइयों के साथ उनके गीत एवं रूप की मधुरता को आश्चर्य के साथ देखा और सुना। सारी सभा स्तब्ध हो गयी। एकटक होकर श्रीराम और उन दोनों बालकों का एकदम मिलता-जुलता रूप रङ्ग देखा। उनमें अन्तर केवल इतना ही था कि वे दोनों अभी कुमार थे तथा वन-वासियों के वस्त्र पहने हुए थे तथा श्रीराम प्रौढ़ थे एवं राजसी वस्त्र पहने हुए थे। जनता को उस समय और आश्चर्य हुआ जब उन्होंने प्रेम से श्रीराम का दिया
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हुआ पुरस्कार भी लौटा दिया। जब श्रीराम ने उनसे पूछा कि तुम्हें यह किसने सिखाया है और किस कवि की रचना है? तब उन्होंने वाल्मीकिजी का नाम बता दिया। तब अपने भाइयों के साथ वाल्मीकिजी के पास जाकर प्रणामपूर्वक उन्होंने अपने को छोड़कर सारा राज्य उनके चरणों में भेंट कर दिया। दयालु ऋषि ने श्रीराम से कहा—ये दोनों गायक कुमार सीताजी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं और तुम्हारे पुत्र हैं। अब तुम्हें चाहिए कि सीता को स्वीकार कर लो। तब श्रीराम ने कहा—मुनिवर! आपकी पतोहू सीता लङ्का में मेरे सामने ही अग्नि में शुद्ध हो चुकी है, पर रावण की दुष्टता से मेरी प्रजा को विश्वास नहीं होता। अतः यदि सीता अपनी शुद्धता का प्रमाण देकर प्रजा को विश्वास दिलाये तब मैं आपकी आज्ञा से पुत्रों के साथ इन्हें स्वीकार कर सकता हूँ। श्रीराम की प्रतिज्ञा सुनकर वाल्मीकिजी ने शिष्यों को भेजकर सीताजी को बुलाया और दूसरे दिन इकट्ठी हुई प्रजा के सामने वाल्मीकिजी लव, कुश और सीताजी को साथ लेकर श्रीराम के आगे उपस्थित हुए। उन्हें देखते ही सब लोगों ने अपना शिर नीचे कर लिया, क्योंकि उन्हें लज्जा लगी कि हम लोगों ने व्यर्थ ही इस साध्वी पर कलङ्क लगाया। वाल्मीकिजी ने सीताजी से कहा—बेटी! अपने पति के आगे जनता का सन्देह दूर कर दो। तदनुसार शिष्यों द्वारा लाया गया गंगाजल हाथ में लेकर सीताजी ने आचमन करके कहा—यदि मन, वचन, कर्म किसी प्रकार से भी अपना पातिव्रत्य भंग न किया हो तो हे पृथ्वी माता! तुम मुझे अपनी गोद में ले लो। सीताजी के ऐसा कहते ही पृथ्वी फटी, उसमें से बिजली के समान चमकीला तेजोमण्डल निकला। उसके बीच सिंहासन पर बैठी हुई पृथ्वी प्रगट होकर सीताजी को अपनी गोद में लेकर पाताल में समा गयी। किसी प्रकार यज्ञ समाप्त कर श्रीराम ने सबको छुट्टी दे दी। श्रीराम ने भरत को सिन्धु देश का राज्य दिया, भरत ने गन्धर्वों को जीतकर अपने योग्य पुत्र तक्ष और पुष्कल को तक्ष और पुष्कल दिया। राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने अपने दोनों पुत्र अङ्गद और चित्रकेतु को कारापथ का राजा बनाया। यह सब हो जाने पर एक दिन काल ने आकर श्रीराम से एकान्त में मिलकर वैकुण्ठ चलने की प्रार्थना की। बाद श्रीराम ने कुश को कुशावती का राजा बनाया और लव को शरावती का। पुनः अग्निहोत्र की आग लेकर उत्तर की तरफ चल दिये और गोप्रतर में सरयू स्नान कर विमान पर चढ़कर स्वर्ग चले गये।
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षोडश सर्ग
लव आदि सात रघुवंशी वीरों ने अपने सबसे बड़े भाई कुश को अपना मुखिया बनाया, क्योंकि भ्रातृप्रेम उनके कुल का धर्म ही था। एक दिन आधी रात के समय कुश को एक स्त्री दिखाई दी। उसका वेश देखने से मालूम पड़ता था कि उसका पति परदेश चला गया है। कुश के आगे वह स्त्री हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। उसे देखकर कुश ने पूछा कि शुभे ! तुम कौन हो ? उसने उत्तर दिया—राजन् ! मैं अयोध्यापुरी की नगरदेवी हूँ। आजकल तुम्हारे जैसे प्रतापी राजा के रहते हुए भी मेरी बुरी दशा हो गयी है। स्वामी के न रहने से कोठे-अटारियों के टूट जाने से अलका-सी रमणीय मेरी निवासभूमि उदास लगती है। सरयू के तट पर बनी झोपड़ियाँ भी सूनी पड़ी रहती हैं। अतः तुम राम के समान अपनी इस राजधानी को छोड़कर अपनी कुल-परम्परा की राजधानी अयोध्या में चलकर रहो। जब कुश ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली तब वह अन्तर्धान हो गयी। कुश ने रात की आश्चर्यभरी घटना प्रातःकाल सभा में ब्राह्मणों से कहकर कुशावती को वेदपाठी ब्राह्मणों को सौंप दी और सेना के साथ शुभ मुहूर्त में अयोध्या के लिए चल दिये। कुशावती से चलती हुई कुश की सेना विन्ध्याचल को पार कर गंगाजी पर हाथियों का पुल बनाकर पार उतर गयी। कुश ने गंगाजी को प्रणाम किया क्योंकि कपिल मुनि के कोप से जले हुए उनके पूर्वज सगरपुत्र उसी गंगाजी के जल की कृपा से स्वर्ग पहुँचे थे।
इस प्रकार कुश कुछ दिन मार्ग में बिताकर सरयूजी के किनारे पहुँचे जहाँ उनके पूर्वजों ने बड़े-बड़े यज्ञ करके यज्ञ-स्तम्भों को गाड़ दिया था। अयोध्या के उपवनों में फूले हुए वृक्षों, सरयू के शीतल जल तथा उपवनों के पुष्पवायुओं ने सेना के साथ कुश का स्वागत किया। जैसे इन्द्र की आज्ञा से बादल पृथ्वी को हरी-भरी कर देता है वैसे ही कुश ने कारीगरों की सहायता से अयोध्या का कायापलट कर दिया। अयोध्या के हाटों में सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ सजी हुई थीं। वह नगरी ऐसी सुन्दर लगने लगी मानो कोई स्त्री दिव्य आभूषण धारण किये हुए हो। अयोध्या पुनः पहले-सी सुन्दरी लगने लगी। उसमें निवास कर जानकी-पुत्र कुश को ऐसा सुख मिला जैसा कि न तो उन्हें अप्सराओं से भरे स्वर्ग के स्वामी बनने की इच्छा रह गयी, न कुबेर की अलकापुरी ही लेने की। सरोवरों में कमल, वनों में चमेली की सुगन्ध मनोहर लगने लगी।
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एक दिन कुश की इच्छा हुई कि सरयू के जल में स्त्रियों के साथ विहार करें । अन्त में वे उनके साथ जलक्रीड़ा में लीन हो गये । स्त्रियों के साथ सरयू में जलक्रीडा करते हुए वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो देवराज इन्द्र आकाशगंगा में अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हों । अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को जो जैत्र आभूषण दिया था उसे राम ने कुश को राज्य के समय ही दे दिया था । क्रीड़ा करते समय वह रत्न जल में गिर गया, किसी को पता तक नहीं चला । बाद कुश ने उसे ढूंढने के लिए धीवरों को आज्ञा दी, पर वह मिल न सका । तब धीवरों ने कहा—महाराज, मालूम पड़ता है कि इस जल में रहनेवाले कुमुद नामक नाग ने लोभ से उसे चुरा लिया है। तब कुश ने क्रोध कर तट पर खड़े होकर धनुष को ठीक किया ओर उसपर नागों को नाश करनेवाला अस्त्र चढ़ा लिया । उस धनुष के चढ़ाते ही उस जल से अचानक ही एक कन्या को आगे किये हुए नागराज कुमुद इस प्रकार निकले मानो लक्ष्मी को लेकर कल्पवृक्ष निकल रहा हो । वह प्रणाम करके बोला—राजन् ! यह मेरी कन्या गेंद खेल रही थी, उसकी थपकी से गेंद ऊपर उछल गया । उसे देखने के लिए जब आंखें ऊपर उठायीं तो देखा कि यह आपका आभूषण तारे के समान नीचे गिर रहा है। इसने झट उसे पकड़ लिया। आप इसे लीजिए और यह मेरी छोटी बहन कुमुद्वती जीवनभर आपकी सेवा करेगी, आप अपनी पत्नी के रूप में इसे स्वीकार करें। कुश ने आभूषण लेकर कहा कि आज से आप मेरे सम्बन्धी बन गये । बाद कुमुद ने अपने कुटुम्बियों को बुलाकर बड़े धूमधामसे कुमुद्वती का कुश से विवाह कर दिया । अनन्तर उसके साथ आनन्दपूर्वक कुश राज्य करने लगे ।
सप्तदश सर्ग
जैसे रात के ब्राह्म मुहूर्त में बुद्धि को नयापन मिल जाता है वैसे ही कुश को कुमुद्वती से अतिथि नामक पुत्र प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं को पवित्र कर देता है वैसे ही सुशिक्षित अतिथि ने माता और पिता के दोनों कुलों को पवित्र कर दिया । कुश ने चतुर्विध विद्याओं के अध्ययन के बाद राजकन्याओं से अतिथि का विवाह कर दिया । अतिथि भी कुश के समान ही कुलीन, शूर और जितेन्द्रिय थे । इसलिए कुश अपने पुत्र को अपना ही दूसरा रूप समझते थे । अपने कुल के अनुसार कुश भी एक बार युद्ध में इन्द्र की सहायता करने के लिए गये थे । वे शक्तिशाली दुर्जय राक्षस
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को मारकर स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। जैसे कुमुदों को खिलानेवाले चन्द्रमा के अस्त होने पर चांदनी भी स्वयं अस्त हो जाती है वैसे ही कुमुद्वती भी कुश के साथ सती हो गयी। युद्ध में जाते समय कुश ने जो आज्ञा दी थी उसी के अनुसार मन्त्रियों ने उनके पुत्र अतिथि को राजा बनाया। उनके शिर पर गिरती हुई अभिषेक की धारा ऐसी सुन्दर लगती थी कि मानो शिवजी के शिर पर गंगाजी की धारा गिर रही हो। मन्त्रों से पवित्र जल से स्नान करते समय उनके शरीर का तेज अधिक बढ़ता जा रहा था। अभिषेक के बाद ब्राह्मणों को उन्होंने काफी धन दिया। अयोध्या के बड़े-बड़े मन्दिरों में देवताओं की पूजा की गयी और उन्होंने राजा अतिथि पर कृपा की। अभिषेक के समय बड़ा उत्सव मनाया गया। जैसे वृक्ष को फला-फूला देखकर जान लिया जाता है कि विशेष फल लगेंगे वैसे ही अतिथि के प्रसन्न मुख को देखकर सेवक जान जाते थे कि इनसे विशेष धन मिलेगा आलप छोड़कर अतिथि ने प्रजा का काम किया। राजा अतिथि ने जो मुँह से कहा उसे पूरा किया। जिसको कुछ दे दिया उससे लिया नहीं। यौवन, सौन्दर्य, ऐश्वर्य जिनके पास रहता है वे मतवाले हो जाते हैं, पर राजा अतिथि के पास सब थे फिर भी उनमें अभिमान नहीं था। वे बड़े राजनीतिज्ञ थे। उनकी बातें गुप्त रहती थी, कार्य होने पर ही मालूम पड़ता था। जैसे खुले आकाश में सूर्य की किरणों के फैल जाने से कुछ भी छिपा नहीं रहता वैसे ही अतिथि ने चारों ओर दूतों का ऐसा जाल बिछा दिया कि प्रजा की कोई बात उनसे छिपी नहीं थी। राजाओं के लिए शास्त्रों ने दिन और रात के जो कर्तव्य निर्धारित किये हैं उन सबको राजा अतिथि विश्वास के साथ करते थे। उनकी गुप्तचर व्यवस्था बड़ी सुन्दर थी, किसी को पता नहीं चलता था। जो भी कार्य वे करते थे वे सभी कल्याणकारी होते थे। उन्होंने काम और अर्थ के लिए धर्म को कभी नहीं छोड़ा। वे तीनों के साथ एक-सा व्यवहार करते थे। उन्होंने धन इकट्ठा इसलिए किया कि समय पर दीनों को दिया जाय और लोककल्याण का काम हो। कुश के प्रयत्न से बढ़ी हुई शस्त्रास्त्र चलाना जाननेवाली जो सेना थी उसे अतिथि अपने शरीर के समान प्यार करते थे। जैसे सर्प के शिर से मणि नहीं निकाली जा सकती वैसे ही शत्रु इनकी शक्तियों को अपनी ओर नहीं खींच सकते थे। उन्होंने विघ्नों से तपस्वियों की रक्षा की, चोरों से प्रजाओं की सम्पत्तियों को बचाया। जिस प्रकार वे रक्षा कर रहे थे पृथ्वी भी उसी प्रकार उन्हें ऐश्वर्य देती थी। खानों
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ने रत्न दिये, खेतों ने अन्न दिया और वनों ने उन्हें हाथी दिये। इस प्रकार सभी उपायों से राजनीति चलाते हुए मन्त्रियों की सहायता से उपायों का निर्विघ्न फल प्राप्त किया। युद्धक्षेत्र में अतिथि को देखकर शत्रुओं के छक्के छूट जाते थे और वे प्राण लेकर भाग जाते थे। जो अतिथि के पास जाते थे उन्हें वे पर्याप्त धन दे देते थे। जैसे देवता लोग इन्द्र की आज्ञा मानते हैं वैसे ही राजा लोग अतिथि की आज्ञा मानते थे। अश्वमेध के समय जिन ब्राह्मणों ने यज्ञ कराया उनका सत्कार अतिथि ने कुबेर के समान किया। इन्द्र ने उनके राज्य में वर्षा की, धर्मराज ने धर्मवृद्धि की, यमराज ने रोग बढ़ना रोक दिया और कुबेर ने इनका राजकोष भर दिया। इस प्रकार सभी लोकपालों ने इनके प्रताप से प्रसन्न होकर इनकी सहायता की।
अष्टादश सर्ग
शत्रुओं का नाश करनेवाले राजा अतिथि की रानी निषधराज की कुमारी थी। उससे अतिथि ने निषध पर्वत के समान बलवान् एक पुत्र उत्पन्न किया जिसका नाम निषध रखा। जैसे समय की वर्षा से खेतों को देखकर संसार के प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं वैसे ही अत्यन्त प्रतापी युवराज निषध को देखकर राजा अतिथि भी प्रसन्न हुए। कुमुद्वती के पुत्र अतिथि ने अधिक दिनों तक सुख भोगा, पुनः निषध को राजपाट सौंपकर अपने पुण्यों के बल से पाये हुए स्वर्ग लोक में सुख भोगने चले गये। कमल जैसे नेत्रवाले, समुद्र के समान गम्भीर चित्तवाले और नगर की अर्गला के समान बाहुवाले अद्वितीय वीर निषध ने भी सागर तक फैली हुई पृथ्वी का भोग किया। उनके पीछे अग्नि के समान तेजस्वी उनके पुत्र नल राजा हुए। उन्हें आकाश के समान सांवला नभ नामक पुत्र हुआ जो लोगों को वैसा ही प्यारा हुआ जैसे सावन का महीना। धर्मात्मा नल ने उस पुत्र को उत्तर कोशल का राज्य सौंपकर स्वयं जंगलों में जाकर मृगों के साथ रहने लगे। नभ को पुण्डरीक नामक पुत्र हुआ। पिता के स्वर्ग चले जाने के बाद कमल धारण करनेवाली लक्ष्मी ने उन्हें ही विष्णु मानकर वर लिया। उस पुण्डरीक ने प्रजा का कल्याण करने में समर्थ और शान्त स्वभाववाले अपने पुत्र क्षेमधन्वा को राज सौंप दिया और स्वयं शान्त होकर जंगल में तपस्या करने चले गये। उनको देवानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बड़े-बड़े यज्ञ करने-वाले क्षेमधन्वा अपने ही समान पुत्र को राज्य सौंपकर स्वर्ग चले गये। देवानीक
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का सम्मान शत्रु और मित्र दोनों समान रूप से करते थे । देवानीक के पुत्र का नाम अहीनग था । उसने कभी नीचों का साथ नहीं किया इसलिए व्यसनों से दूर रहकर सारी पृथ्वी का शासन किया । उस शत्रुविजयी राजा के स्वर्गवास के अनन्तर उनके प्रतापी पुत्र अयोध्या के राजा बने । उनको शील नामक बलवान् पुत्र हुआ । शील के उन्नाभ नामक पुत्र हुआ जो सब राजाओं में श्रेष्ठ थे उनका पुत्र वज्रनाभ हुआ । वे अपने पुण्य से स्वर्ग के राजा बने । उनके पीछे शंखण नामक उनका पुत्र सारी पृथ्वी का राजा हुआ । उसके बाद अश्विनीकुमारों जैसा सुन्दर और सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र राजा हुए । उनका दूसरा नाम व्युषिताश्व भी था । उन्होंने काशी विश्वनाथ की आराधना कर विश्वसह नामक पुत्र प्राप्त किया । उनको हिरण्यनाभ उत्पन्न हुआ उनका पुत्र कौशल्य हुआ । उनके पुत्र का नाम वसिष्ठ था वसिष्ठ के पुत्र शिरोमणि हुए । उनको पुत्र नामक पुत्र हुआ । पुत्र की पत्नी से पुष्य नामक पुत्र हुआ उनके पुत्र ध्रुवसन्धि हुए उनके पुत्र सुदर्शन हुए जो बड़े प्रतापी और शक्तिशाली राजा हुए । मन्त्रियों ने चित्र मँगाकर सुन्दर राजकुमारियों से उनका शुभ विवाह कराया ।
ऊनविंश सर्ग
विद्वान् राजा सुदर्शन ने अग्नि के समान तेजस्वी अपने पुत्र अग्निवर्ण को राजा बना दिया और नैमिषारण्य में रहने लगे । वहां वे तीर्थजल पीते, भूमि पर बिछे कुश पर आसीन होते, फल कन्दमूल के आहार की इच्छा छोड़कर तप करने लगे । पिता से प्राप्त पृथ्वी के पालन में अग्निवर्ण को कुछ कठिनाई नहीं हुई । कुछदिनों तक तो उन्होंने स्वयं राजकार्य देखा पर पुनः मन्त्रियों पर भार डालकर कामुक के समान जीवन का रस लेने लगे । नित्य नये उत्सवों में संलग्न होकर क्षणभर भी भोगविलास के बिना नहीं रह सकते थे । हमेशा रनिवास में रहते थे । उनके दर्शन के लिए जनता अधीर रहती थी । वह पराक्रमी राजा सुन्दरी स्त्रियों के साथ हस्तिनी के साथ गजराज के समान क्रीड़ासक्त हो गया । उसकी गोद में बैठने योग्य दो ही वस्तुएँ थीं एक वीणा दूसरी सुन्दरी स्त्रियां । वह सदा नयी-नयी वस्तुओं को चाहता हुआ नित्य नाच, गान, वाद्य आदि में लीन हो गया । वह राजा राज-काज छोड़कर इन्द्रिय सुखों का रस लेता हुआ ऋतुएँ बिताता था । इतना व्यसन में लीन होने पर भी दूसरे राजा उसके राज्य पर
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आक्रमण नहीं करते थे। जैसे दक्ष के शाप से चन्द्रमा को क्षय हो गया था वैसे ही अधिक विलास में आसक्त रहने के कारण उसे भी क्षय हो गया और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उसका शरीर पीला पड़ गया, दुर्बलता के कारण उसने आभूषण पहनना भी छोड़ दिया। नौकरों के कन्धे का सहारा लेकर चलने लगा। बोली धीमी पड़ गयी यक्ष्मा रोग से सूखकर विरहियों के समान दिखाई देने लगा। राजा के क्षय रोग से पीड़ित होने पर सूर्य्यकुल ऐसा रह गया जैसे एक कलाभर बचा हुआ कृष्णपक्ष की चतुर्दशी का चन्द्रमा हो। जब प्रजा पूछती थी कि राजा को कोई भयानक रोग तो नहीं है। उस समय मन्त्री लोग यह कहकर समझाते कि राजा इस समय पुत्रोत्पत्ति के लिए व्रत आदि कर रहे हैं, इसीलिए दुर्बल होते जा रहे हैं। अनेक रानियों के रहते हुए भी वह राजा पुत्र का मुंह नहीं देख पाया। जैसे वायु के आगे दीपक का कुछ भी वश नहीं चलता वैसे ही राजा भी रोग से नहीं बचाया जा सका। पुरोहितों से मिलकर मन्त्रियों ने रोग-शान्ति के बहाने राजा के शव को राजभवन के उपवन में ही चुपचाप जलती आग में रख दिया और मन्त्रियों ने झट नेताओं को इकट्ठा कर सर्वसम्मति से उस पटरानी को राजसिंहासन पर बैठा दिया जिसमें गर्भ के शुभ चिह्न दिखाई देते थे। राजा की दुःखदमृत्यु से रानी की आँखों में गरम-गरम आँसुओं से तपे हुए गर्भ पर अभिषेक के शीतल जल पड़े तब वह गर्भ शीतल हो गया। इस प्रकार गर्भ ग्रहण किए वह महारानी प्रजा की भलाई के लिए मन्त्रियों की सलाह से भली भांति राजकार्य चलाती रही जिसकी आज्ञा को कोई टाल नहीं सकता था। रघुवंश के अनुसार इसी महारानी के गर्भ से उत्पन्न बालक रघुवंश का अन्तिम राजा माना गया है।
॥ श्रीः ॥
रघुवंशम्
'सञ्जीवनी'-'चन्द्रकला'-टीकाद्वयोपेतम्
—: ० :—
प्रथमः सर्गः
मातापितृभ्यां जगतो नमो वामार्धजानये ।
सद्यो दक्षिणदृक्पातसंकुचद्वामदृष्टये ॥ १ ॥
अन्तरायतिमिरोपशान्तये शान्तपावनमचिन्त्यवैभवम् ।
तन्नरं वपुषि कुञ्जरं मुखे मन्महे किमपि तुन्दिलं महः ॥ २ ॥
शरणं करवाणि शर्मदं ते चरणं वाणि ! चराचरोपजीव्यम् ।
करुणामसृणैः कटाक्षपातैः कुरु मामम्ब ! कृतार्थसार्थवाहम् ॥ ३ ॥
वाणीं काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासिकी-
मन्तस्तन्त्रमरंस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् ।
वाचामाकलयद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां
लोकेऽभूद्यदुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यशः ॥ ४ ॥
मल्लिनाथकविः सोऽयं मन्दात्मानुजिघृक्षया ।
व्याचष्टे कालिदासीयं काव्यत्रयमनाकुलम् ॥ ५ ॥
कालिदासगिरां सारं कालिदासः सरस्वती ।
चतुर्मुखोऽथवा साक्षाद्विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥ ६ ॥
तथाऽपि दक्षिणावर्तनाथाद्यैः क्षुण्णवर्त्मसु ।
वयं च कालिदासोक्तिष्ववकाशं लभेमहि ॥ ७ ॥
भारती कालिदासस्य दुर्व्याख्याविषमूर्च्छिता ।
एषा सञ्जीवनी टीका तामद्योज्जीवयिष्यति ॥ ८ ॥
इहान्वयमुखेनैव सर्वं व्याख्यायते मया ।
नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥ ९ ॥
| २ | रघुवंशमहाकाव्ये |
|---|
इह खलु सकलकविशिरोमणिः कालिदासः "काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे" इत्याद्यलङ्कारिकवचनप्रामाण्यात्काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनतां, 'काव्यालापांश्च वर्जयेद्' इत्यस्य निषेधशास्त्रस्यासत्काव्यविषयतां च पश्यन् रघुवंशाख्यमहाकाव्यं चिकीर्षुः, चिकीर्षितार्थविघ्नपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनभूतविशिष्टदेवतानमस्कारस्य शिष्टाचारपरिप्राप्तत्वाद् 'आशीर्नमस्क्रियावस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम्' इत्याशीर्वादाद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुखलक्षणत्वात्, काव्यनिर्माणस्य विशिष्टशब्दार्थप्रतिपत्तिमूलकत्वेन विशिष्टशब्दार्थयोश्च 'शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा । अर्थरूपं यदखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः' इति वायुपुराणसंहितावचनबलेन पार्वतीपरमेश्वरायत्तदर्शनात्तत्प्रतिपित्सया तावेवाभिवादयते—
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥ १ ॥
अन्वयः—( अहं ) वागर्थौ इव संपृक्तौ जगतः पितरौ पार्वतीपरमेश्वरौ वागर्थप्रतिपत्तये वन्दे ।
**सञ्जीवनी—**वागिति । वागर्थाविवेत्येकं पदम् । इवेन सह नित्यसमासो विभक्त्यलोपश्च । पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं चेति वक्तव्यम् । एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यम् । वागर्थाविव शब्दार्थाविव सम्पृक्तौ नित्यसम्बद्धावित्यर्थः । नित्यसम्बद्धयोरुपमानत्वेनोपादानात् । 'नित्यः शब्दार्थसम्बन्धः' इति मीमांसकः । जगतो लोकस्य पितरौ । माता च पिता च पितरौ । 'पिता मात्रा' इति द्वन्द्वैकशेषः । 'मातापितरौ पितरौ मातरपितरौ प्रसूजनयितारौ' इत्यमरः । एतेन शर्वशर्वयोः सर्वजगज्जनकत्या वैशिष्टद्यमिष्टार्थप्रदानशक्तिः परमकारुणिकत्वं च सूच्यते । पर्वतस्यापत्यं स्त्री पार्वती 'तस्यापत्यम्' इत्यण् । 'टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्०' इत्यादिना ङीप् । पार्वती च परमेश्वरश्च पार्वतीपरमेश्वरौ । परमशब्दः सर्वोत्तमत्वद्योतनार्थः । मातुरभ्यर्हितत्वादल्पाक्षरत्वाच्च पार्वतीशब्दस्य पूर्वनिपातः । वागर्थप्रतिपत्तये शब्दार्थयोः सम्यग्ज्ञानार्थं वन्देऽभिवादये । अत्रोपमाऽलङ्कारः स्फुट एव । तथोक्तं—"स्वतः सिद्धेन भिन्नेन सम्पन्नेन च धर्मतः । साध्यमन्येन वर्णस्य वाच्यं चेदेकगोपमा" इति प्रायिकश्चोपमाऽलङ्कारः । कालिदासोक्तकाव्यादौ । भूदेवताकस्य सर्वगुरोर्मगणस्य प्रयोगाच्छुभलाभः सूच्यते । तदुक्तं—"शुभदो मो भूमिमयः" इति वकारस्यामृतबीजत्वप्रचयगमनादिसिद्धिः ।
जिस परात्पर ब्रह्म का संसार लेता नाम है ।
जिसने रचा यह विश्व अद्भुत ललित लीलाधाम है ॥
प्रथमः सर्गः ३
रघुवंश का आदर्श जो मानवशिरोमणि राम है।
उस ईश को श्रीकृष्णमणि का बार बार प्रणाम है ॥
**भाषार्थ—**शब्द और अर्थ के समान सदा सम्मिलित, संसार के माता-पिता भगवान् शिव और पार्वती को वाणी और अर्थ की सिद्धि के लिए नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
क्व ? सूर्यप्रभवो वंशः क्व ? चाल्पविषया मतिः ।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥ २ ॥
**अन्वयः—**सूर्यप्रभवः वंशः क्व, अल्पविषया मतिः च क्व, दुस्तरं सागरं मोहात् उडुपेन तितीर्षुः अस्मि ।
क्वेति । प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः कारणम् । ‘ऋदोरप्’ । ‘अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्’ इति साधुः । सूर्यः प्रभवो यस्य सः सूर्यप्रभवो वंशः क्व ? अल्पो विषयो ज्ञेयोऽर्थो यस्या सा मे मतिः प्रज्ञा च क्व ? द्वौ क्वशब्दौ महदन्तरं सूचयतः । सूर्यवंशमाकलयितुं न शक्नोमीत्यर्थः । तथा च तद्विषयप्रबन्धनिरूपणं तु दूरापास्तमिति भावः । तथा हि दुस्तरं तरितुमशक्यम् । ‘ईषद्वुःसुषु०’ इत्यादिना खल्प्रत्ययः । सागरं मोहादज्ञानादुडुपेन प्लवेन । ‘उडुपं तु प्लवः कोलः’ इत्यमरः । अथवा चर्मावनद्धेन यानपात्रेण । ‘चर्मावनद्धमुडुपं प्लवः काष्ठं करण्डवत्’ इति सज्जनः । तितीर्षुस्तरीतुमिच्छुरस्मि भवामि । तरतेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । अल्पसाधनैरधिकारम्भो न सुकर इति भावः । इदं च वंशोत्कर्ष कथनं स्वप्रबन्धमहत्त्वार्थमेव । तदुक्तम्—‘प्रतिपाद्यमहिम्ना च प्रबन्धो हि महत्तरः’ इति ।
**भाषार्थ—**कहाँ सूर्य से उत्पन्न वंश और कहाँ अल्प विषय जानने वाली मेरी बुद्धि ! (मैं) दुस्तर समुद्र को अज्ञानता के कारण छोटी नाव से पार करना चाहता हूँ ॥ २ ॥
मन्दः सन् महाकाव्यं चिकीर्षुः कविः स्वासामर्थ्यं कथयति—
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः ॥ ३ ॥
**अन्वयः—**मन्दः कवियशःप्रार्थी प्रांशुलभ्ये फले लोभात् उद्बाहुः वामन इव उपहास्यतां गमिष्यामि ।
मन्द इति । किं च मन्दो मूढः । ‘मूढाल्पापटुनिर्भाग्या मन्दाः स्युः’ इत्यमरः । तथाऽपि कवियशःप्रार्थी कवीनां यशः काव्यनिर्माणेण जातं तत्प्रार्थनशीलोऽहंप्रांशुनोन्नतपुरुषेण लभ्ये प्राप्ये फले फलविषये लोभादुद्बाहुः फलग्रहणायोच्छ्रितहस्तो
४ | रघुवंशमहाकाव्ये
वामनः खर्व इव । 'खर्वो ह्रस्वश्च वामनः' इत्यमरः । उपहास्यतामुपहासविषयताम् 'ऋहलोर्ण्यत्' इति ण्यत्प्रत्ययः गमिष्यामि प्राप्स्यामि ।
भावार्थ— कवियों की कीर्ति की अभिलाषी ( मैं ) लम्बे मनुष्यों के द्वारा पाने योग्य फल की ओर लोभ से ऊपर हाथ उठाये हुए बौने पुरुष के समान उपहासास्पद होऊँगा ॥ ३ ॥
मन्दश्चेत्तर्हि त्यज्यतामयमुद्योग इत्यत आह—
अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः ।
मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥ ४ ॥
अन्वयः— अथवा पूर्वसूरिभिः कृतवाग्द्वारे अस्मिन् वंशे वज्रसमुत्कीर्णे मणौ सूत्रस्य इव मे गतिः अस्ति ।
अथवेति । अथवा पक्षान्तरे पूर्वैः सूरिभिः कविभिर्वाल्मीक्यादिभिः कृतवाग्द्वारे कृतं रामायणादिप्रबन्धरूपा या वाक् सैव द्वारं प्रवेशो यस्य तस्मिन् । अस्मिन्सूर्यभवे वंशे कुले । जन्मनैकलक्षणः सन्तानो वंशः । वज्रेण मणिवेधकसूचीविशेषेण । 'वज्रं त्वची कुलिशशस्त्रयोः । मणिवेधे रत्नभेदे' इति केशवः । समुत्कीर्णे विद्धे मणौ रत्ने सूत्रस्येव मे मम गतिः सञ्चारोऽस्ति । वर्णनीये रघुवंशे मम वाक्प्रसरोऽस्तीत्यर्थः ।
भावार्थ— पूर्व में वर्तमान विद्वानों द्वारा वर्णन किये गये इस वंश में सूई से छेदे हुए मणि में सूत्र के समान मेरी गति है ॥ ४ ॥
एवं रघुवंशे लब्धप्रवेशस्तद्वर्णनां प्रतिजानानः 'सोऽहम्' इत्यादिभिः पञ्चभिः श्लोकैः कुलकेनाह—
सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् ।
आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ ५ ॥
यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामाच्चितार्थिनाम् ।
यथाऽपराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ ६ ॥
त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् ।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ ७ ॥
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।
वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥ ८ ॥
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन् ।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः ॥ ९ ॥
अन्वयः— आजन्मशुद्धानाम् आफलोदयकर्मणाम् आसमुद्रक्षितीशानाम् आनाकरथवर्त्मनाम् यथाविधिहुताग्नीनाम् यथाकामाच्चितार्थिनाम् यथापराधदण्डानाम्
प्रथमः सर्गः ५
यथाकालप्रबोधिनाम् त्यागाय संभृतार्थानाम् सत्याय मितभाषिणाम् यशसे विजगी-
षूणाम् प्रजायै गृहमेधिनाम् शैशवे अभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणां वार्द्धके
मुनिवृत्तीनां अन्ते योगेन तनुत्यजाम् रघूणाम् अन्वयम् तनुवाग्विभवः अपि तद्गुणैः
कर्णम् आगत्य चापलाय प्रचोदितः सन् अहम् वक्ष्ये ।
स इति । सोऽहं 'रघूणामान्वयं वक्ष्ये' इत्युत्तरेण सम्बन्धः । किविधानां
रघूणामित्यत्रोत्तराणि विशेषणानि योज्यानि । आजन्मनः । जन्मारभ्येत्यर्थः ।
'आङ् मर्यादाऽभिविध्योः' इत्यव्ययीभावः । शुद्धानाम् । सुप्सुपेति समासः । एव-
मुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम् । आजन्मशुद्धानाम् । निषेकादिसंस्कारसम्पन्नानामित्यर्थः ।
आफलोदयमाफलसिद्धेः कर्म येषां ते तथोक्तास्तेषाम् । प्रारब्धान्तर्गामिनामित्यर्थः ।
आसमुद्रं क्षितेरीशानाम् सार्वभौमानामित्यर्थः । आनाकं रथवर्त्म येषां तेषाम् ।
इन्द्रसहचारिणामित्यर्थः । अत्र सर्वत्राङोऽभिविध्यर्थत्वं द्रष्टव्यम् । अन्यथा
मर्यादाऽर्थत्वे जन्मादिषु शुद्धयभावप्रसङ्गात् । यथेति । विधिमनतिक्रम्य यथाविधि ।
'यथाऽसादृश्ये' इत्यव्ययीभावः । तथा हुतशब्देन सुप्सुपेति समासः । एवं 'यथा-
कामर्चित'—इत्यादीनामपि द्रष्टव्यम् । यथाविधि हुता अग्नयो यैस्तेषाम् ।
यथाकाममभिलाषमनतिक्रम्यार्चितार्थिनाम् । यथाऽपराधमपराधमनतिक्रम्य दण्डो
येषां तेषाम् । यथाकालं कालमनतिक्रम्य प्रबोधिनां प्रबोधनशीलानाम् । चतुर्भि-
र्विशेषणैर्देवतायजनातिथिसत्कारदण्डधरत्वप्रजापालनसमयजागरुकत्वादीनि विव-
क्षितानि । त्यागायेति । त्यागाय सत्पात्रे विनियोगस्त्यागस्तस्मै । 'त्यागो विहा-
पितं दानम्' इत्यमरः । संभृतार्थानां सञ्चितधनानाम् । न तु दुर्व्यापाराय ।
सत्याय मितभाषिणां मितभाषणशीलनाम् । न तु पराभवाय । यशसे कीर्तये ।
'यशः कीर्तिः समज्या च' इत्यमरः । विजिगीषूणां विजेतुमिच्छूनाम् । न त्वर्थ-
संग्रहाय । प्रजायै संतानाय गृहमेधिनां दारपरिग्रहाणाम् । न तु कामोपभोगाय ।
अत्र 'त्यागाय' इत्यादिषु 'चतुर्थी तदर्थार्थ—' इत्यादिना तादर्थ्ये चतुर्थीसमास-
विधानज्ञापकाच्चतुर्थी । गृहैर्दारैर्मेधन्ते सङ्गच्छन्त इति गृहमेधिनः । 'दारेष्वपि
गृहाः पुंसि' इत्यमरः । 'जाया च गृहिणी गृहम्' इति हलायुधः । 'मेधृ सङ्गमे' इति
धातोर्णिनिः । एभिर्विशेषणैः परोपकारित्वं सत्यवचनत्वं यशःपरत्वं पितॄणां शुद्धत्वं
च विवक्षितानि ॥ शैशव इति । शिशोर्भावः शैशवं बाल्यम् । 'प्राणभृज्जातिवयो-
वचनोद्गात्र—'इत्यञ्प्रत्ययः । 'शिशुत्वं शैशवं बाल्यम्' इत्यमरः । तस्मिन्
वयस्यभ्यस्तविद्यानाम् । एतेन ब्रह्मचर्याश्रमो विवक्षितः । यूनो भावो यौवनं
तारुण्यम् । युवादित्वादण्प्रत्ययः । 'तारुण्यं यौवनं समे' इत्यमरः । तस्मिन् वयसि
६ रघुवंशमहाकाव्ये
विषयैषिणां भोगाभिलाषिणाम् । एतेन गृहस्थाश्रमो विवक्षितः । वृद्धस्य भावो वार्धकं वृद्धत्वम् । 'द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च' इति वुञ्प्रत्ययः । 'वार्द्धकं वृद्धसंघाते वृद्धत्वे वृद्धकर्मणि' इति विश्वः । सङ्घातार्थे च 'वृद्धाच्च' इति वक्तव्यात्सामूहिको वुञ् । तस्मिन् वार्द्धके वयसि मुनीनां वृत्तिरिव वृत्तिर्येषां तेषाम् । एतेन वानप्रस्थाश्रमो विवक्षित अन्ते शरीरत्यागकाले योगेन परमात्मध्यानेन । 'योगः संनहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु' इत्यमरः । तनुं देहं त्यजन्तीति तनुत्यजां देहत्यागिनाम् । 'कायो देहः क्लीबपुंसोः स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनूः' इत्यमरः । 'अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति क्विप् । एतेन भिक्ष्वाश्रमो विवक्षितः ॥ रघूणामिति । सोऽहं लब्धप्रवेशः । तनुवाग्विभवोऽपि स्वल्पवाणीप्रसारोऽपि सन् । तेषां रघूणां गुणैस्तद्गुणैः । आजन्मशुद्ध्यादिभिः कर्तृभिः कर्णं मम श्रोत्रमागत्य चापलाय चापलं चपलकर्माविमृश्यकरणरूपं कर्तुम् । युवादित्वात्कर्मण्यण् । 'क्रियाऽर्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः' इत्यनेन चतुर्थी । प्रचोदितः प्रेरितः सन् । रघूणामन्वयं सद्विषयप्रबन्धं वक्ष्ये । कुलकम् ।
**भावार्थ—**जन्म से ही शुद्ध, फल की प्राप्ति तक कर्म करने वाले, समुद्र पर्यन्त पृथ्वी के मालिक, स्वर्गंतक रथ को ले जानेवाले, विधिपूर्वक यज्ञों से अग्नि को तृप्त करनेवाले, याचकों को मनोनुकूल दान देनेवाले, अपराध के अनुसार दण्ड देनेवाले, उचित समय पर जागरूक, दान के लिए धन का संग्रह करने वाले, सत्य के लिए कम बोलने वाले, यश की इच्छा से विजय चाहने वाले, सन्तान के लिए विवाह करनेवाले, बाल्यावस्था में विद्या पढ़ने वाले, युवावस्था में भोग की इच्छा रखने वाले, वृद्धावस्था में मुनियों की तरह जंगलों में रह कर तपस्या करने वाले और अन्त में योगाभ्यास के द्वारा शरीर त्यागने वाले, रघुवंशियों के गुणों से आकृष्ट होकर मैं ( अल्पमति होकर भी ) उनके वंश का वर्णन करूँगा ॥ ५–९ ॥
सम्प्रति स्वप्रबन्धपरीक्षार्थं सतः प्रार्थयते—
तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः ।
हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा ॥ १० ॥
**अन्वयः—**सदसद्व्यक्तिहेतवः सन्तः तं श्रोतुम् अर्हन्ति, हि हेम्नः विशुद्धिः श्यामिका अपि वा अग्नौ संलक्ष्यते ॥ १० ॥
तमिति । तं रघुवंशाख्यं प्रबन्धं सदसतोगुणदोषयोर्व्यक्तेर्हेतवः कर्तारः सन्तः श्रोतुमर्हन्ति । तथा हि । हेम्नो विशुद्धिर्निर्दोषस्वरूपं श्यामिकाऽपि लोहान्तर
प्रथमः सर्गः
संसर्गात्मको दोषोऽपि वाऽग्नौ संलक्ष्यते, नान्यत्र; तद्वदत्रापि सन्त एवं गुणदोषविवेकाधिकारिणः । नान्य इति भावः ।
भावार्थ—सत्यासत्य का विवेचन करनेवाले सज्जन लोग उसके सुनने के योग्य हैं, क्योंकि सोने की अच्छाई और बुराई की परीक्षा आग में ही होती है ॥१०॥
वर्ण्यं वस्तूपक्षिपति श्लोकद्वयेन—
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् ।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ ११ ॥
अन्वयः—मनीषिणां माननीयः वैवस्वतः नाम मनुः छन्दसां प्रणवः इव महीक्षिताम् आद्यः आसीत् ।
वैवस्वत इति । मनस ईषिणो मनीषिणो धीराः । विद्वांस इति यावत् । पृषोदरादित्वात्साधुः । तेषां माननीयः पूज्यः । छन्दसां वेदानाम् । 'छन्दः पद्ये च वेदे च' इति विश्वः । प्रणवः ओंकार इव । महीं क्षियन्तीशत इति महीक्षितः क्षितीश्वराः । क्षिधातोरैश्वर्यार्थात्क्विप् तुगागमश्च । तेषामाद्य आदिभूतः । विवस्वतः सूर्यस्यापत्यं पुमान्वैवस्वतो नाम वैवस्वत इति प्रसिद्धो मनुरासीत् ।
भावार्थ—विद्वानों के सम्मान्य वैवस्वत मनु वेदों में ॐकार के समान राजाओं में प्रथम हुए ॥ ११ ॥
वर्ण्ये रघुवंशे प्रधानपुरुषस्य रघोः पितृनामकथनम्—
तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः ।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव ॥ १२ ॥
अन्वयः—शुद्धिमति तदन्वये शुद्धिमत्तरः दिलीप इति राजेन्दु क्षीरनिधौ इन्दुः इव प्रसूतः ।
तदिति । शुद्धिरस्यास्तीति शुद्धिमान् । तस्मिञ्छुद्धिमति तदन्वये तस्य मनोरन्वये वंशे । 'अन्ववायोऽन्वयो वंशो गोत्रं चाभिजनं कुलम्' इति हलायुधः । अतिशयेन शुद्धिमाञ्छुद्धिमत्तरः । 'द्विवचनविभज्योप' इत्यादिना तरप् । दिलीप इति प्रसिद्धो राजा इन्दुरिव राजेन्दू राजश्रेष्ठः । 'उपमितं व्याघ्रादिभिः' इत्यादिना समासः क्षीरनिधाविन्दुरिव प्रसूतो जातः ।
भावार्थ—वैवश्वत मनु के उस पवित्र वंश में अतिपवित्र दिलीप नामक श्रेष्ठ राजा क्षीरसागर में चन्द्रमा के समान उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
:८ रघुवंशमहाकाव्ये
'व्यूढ' इत्यादिस्त्रिभिः श्लोकैर्दिलीपं विशिनष्टि—
व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।
आत्मकर्मक्षमं देहं क्षात्रो धर्म इवाश्रितः ॥ १३ ॥
**अन्वयः—**व्यूढोरस्कः वृषस्कन्धः शालप्रांशुः महाभुजः ( स ) आत्मकर्मक्षमं देहम् आश्रितः क्षात्रः धर्म इव ( स्थितः ) ।
व्यूढेति । व्यूढं विपुलमुरो यस्य स व्यूढोरस्कः । 'उरःप्रभृतिभ्यः कप्' इति कप्प्रत्ययः । 'व्यूढं विपुलं भद्रं स्फारं समं वरिष्ठं च' इति यादवः । वृषस्य स्कन्धः इव स्कन्धो यस्य स तथा । 'सप्तम्युपमान—' इत्यादिनात्तरपदलोपी बहुव्रीहिः । शालो वृक्ष इव प्रांशुरुन्नतः शालप्रांशुः । 'प्राकारवृक्षयोः शालः शालः सर्जतरुः स्मृतः' इति यादवः । 'उच्चप्रांशून्नतोदग्रोच्छ्रितास्तुङ्गे' इत्यमरः । महाभुजो महाबाहुः । आत्मकर्मक्षमं स्वव्यापारानुरूपं देहमाश्रित प्राप्तः क्षात्रः क्षत्रसंबन्धो धर्म इव स्थितः । मूर्तिमान् पराक्रम इव स्थित इत्युत्प्रेक्षा ।
**भाषार्थ—**विशाल वक्षःस्थल वाले वृष के समान उन्नत स्कन्ध वाले सखुआ के वृक्ष के समान लम्बी २ भुजावाले ( वे दिलीप ) अपने कर्म के अनुसार देह धारण किये हुए थे । मालूम होता था कि वे क्षत्रियों के मूर्तिमान् धर्म हैं ॥१३॥
सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोऽभिभाविना ।
स्थितः सर्वोन्नतेनोर्वी क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ॥ १४ ॥
**अन्वयः—**सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोऽभिभाविना सर्वोन्नतेन आत्मना मेरुः इव उर्वी क्रान्त्वा स्थितः ।
सर्वेति । सर्वातिरिक्तसारेण सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽधिकबलेन । 'सारो बले स्थिरांशे च' इत्यमरः । सर्वाणि भूतानि तत्तेजसाऽभिभवतीति सर्वतेजोऽभिभावी तेन । सर्वेभ्यः उन्नतेनात्मना शरीरेण 'आत्मा देहे धृतौ जीवे स्वभावे परमात्मनि' इति विश्वः । मेरुरिव । उर्वी क्रान्त्वाऽऽक्रम्य स्थितः । मेरावपि विशेषणानि तुल्यानि । "अष्टाभिश्च सुरेन्द्राणां मात्राभिर्निर्मितो नृपः । तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा" इति मनुवचनाद्राज्ञः सर्वतेजोऽभिभावित्वं ज्ञेयम् ।
**भाषार्थ—**सभी प्राणियों से अधिक बलशाली सभी जीवों को अपने तेज से पराभूत करनेवाले सबसे उन्नतशील शरीर के द्वारा सुमेरु के समान पृथ्वी को आक्रान्त करके स्थित थे ॥ १४ ॥
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः ।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥ १५ ॥