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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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बढ़ गयी। अनन्तर श्रीराम ने बाजा-गाजा के साथ नागरिकों को आनन्दित करते हुए राजधानी अयोध्या में प्रवेश किया और सुग्रीव आदि मित्रों को विविध सामग्रियों से सम्पन्न भवनों को देकर चित्रमात्र से अवशिष्ट पिता-राजा दशरथ के पूजागृह में आँखों से अश्रु बहाते हुए प्रवेश करके कैकेयी को प्रणाम करके मीठे वचनों से उनकी लज्जा को दूर किया। अनन्तर अभिनन्दन करने के लिए आये हुए अगस्त्य आदि मुनियों का सत्कार कर राम ने उनसे रावण के जन्म का वृत्तान्त श्रवण किया। एक पक्ष के बाद श्रीराम ने सीताजी के द्वारा सत्कार कराकर सुग्रीव, विभीषण आदि को विदा कर पुष्पक विमान को कुबेर के पास भेज दिया और भाइयों के साथ धर्मपूर्वक न्यायपूर्ण शासन करते हुए प्रजाओं को सुख पहुँचाया। कुछ दिनों के बाद सीताजी को गर्भ रह गया। श्रीराम ने गर्भिणी-मनोरथ के लिए उनसे जब पूछा, तब उन्होंने गङ्गातटवर्ती तपोवनों को देखने की इच्छा प्रकट की। उसी समय गुप्तचरों के द्वारा सीता के विषय में लोकापवाद सुनकर श्रीराम ने उस लोकापवाद को दूर करने के विचार से लक्ष्मण के द्वारा वाल्मीकि मुनि के आश्रम के पास सीताजी को छोड़ आने की आज्ञा दे दी। तदनुसार लक्ष्मण ने सीताजी को रथ पर बैठाकर तपोवन देखने के बहाने गङ्गा के तट पर ले जाकर उतार दिया और बड़े दुःख से श्रीराम का आदेश सुना दिया, जिसे सुनते ही सीताजी मूच्छित हो गयीं। लक्ष्मण के प्रयास से होश में आने पर सीताजी ने बिना अपराध के परित्याग करने-वाले श्रीराम को दोष नहीं दिया, किन्तु वे अपने भाग्य को ही कोसने लगीं। बाद लक्ष्मण ने दुःख से उनके चरणों पर गिरकर कहा—आर्ये ! मुझे क्षमा कीजिए, मैं पराधीन हूँ। सीताजी ने उनको उठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा—लक्ष्मण ! उठो, तुम्हारा कल्याण हो, मेरी सासुओं से मेरा प्रणाम कहना और उनके पुत्र के द्वारा निहित मेरे गर्भ का शुभ चिन्तन करने को कह देना। और

बड़े भाई से मेरा यह वचन भी कहना—राजन्, साधारण प्रजा के समान मेरा भी पालन करना आपका धर्म है। लङ्का में सबके सामने प्रत्यक्ष अग्नि में विशुद्ध होने पर भी आपने मुझे मिथ्या लोकापवाद के भय से जो छोड़ दिया है, क्या यह आपके पावन कुल के योग्य है ? मालूम पड़ता है कि राजलक्ष्मी का परित्याग कर आप मेरे साथ वन को चले गये थे, उसी से नाराज होकर उसने राजभवन में मेरा रहना सहन नहीं किया है। अब मैं सूर्य में दृष्टि लगाकर तप करूँगी कि अगले जन्म में भी आप ही मेरे पतिदेव हों। सीताजी के वचन को