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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥

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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
युद्ध में विजयी होने पर पृथ्वी पर शासन का और मृत्यु हो जाने पर स्वर्ग में
वास का अधिकार सुनिश्चित है। यहां कर्तव्यपालक राजा के लिए जीवनकाल में
कमनीय कीर्ति और मरने पर परमगति सुरक्षित हो जाती है। इसके अतिरिक्त शास्त्र
यह भी कहता है "कीर्तिर्यस्य सः जीवति" यशस्वी तो अमर हो जाता है।
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥
नारदस्मृति / 39

द्वितीय अध्याय

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द्वितीय अध्याय
सुनिश्चितबलाधानस्त्वर्थी स्वार्थप्रचोदितः ।
लेखयेत् पूर्वपक्षं तु कृतकार्यविनिश्चयः ॥ १ ॥
वादी न्यायाधिकरण को यह आवेदन कर सकता है कि प्रतिवादी साधन-
सम्पन्न होने के अतिरिक्त अपने स्वार्थ से प्रेरित है तथा इस व्यवहार को जीतने का
दृढ़ संकल्प लिये हुए है, अतः वह लिखित प्रमाणों में गड़बड़ी और साक्ष्य आदि
को भड़काने-तोड़ने-जैसा कुछ भी कर सकता है, जिससे मुझे संरक्षण की आवश्यकता
है। मुझे सुरक्षा प्रदान की जाये और मेरा प्रतिद्वन्द्वी मनचाहा अनुचित न कर सके,
इसे सुनिश्चित किया जाये।
पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु प्रत्यर्थी तदनन्तरम् ।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धं प्रतिपक्षं निवेशयेत् ॥ २ ॥
वादी के आवेदन-पत्र में उल्लिखित आशंका के तात्पर्य को समझकर
प्रतिवादी को स्पष्टीकरण के रूप में अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना
चाहिए।
श्वो लेखनं वा स लभेत् त्र्यहं सप्ताहमेव च।
अर्थी तृतीयपादे तु युक्तं सद्यो ध्रुवं जयी ॥ ३ ॥
प्रतिवादी को न्यायालय से वादी द्वारा की गयी शिकायत का उत्तर दूसरे
दिन, अथवा तीन दिनों में अथवा अधिक-से-अधिक एक सप्ताह के भीतर अवश्य
प्रस्तुत कर देना चाहिए। ऐसा न करने पर और व्यवहार के तीसरे चरण लेख-
परीक्षा, साक्ष्य-विचार तथा विवाद (Argument) को पार कर लेने पर व्यवहार को
निर्णीत और वादी को विजयी घोषित मानना चाहिए।
मिथ्या सम्प्रतिपत्तिर्वा प्रत्यवस्कन्दमेव वा।
प्राङ्न्यायविधिसाम्यं वा उत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥
वादी द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध उपस्थापित व्यवहार के प्रतिवादी द्वारा दिये
जाने वाले उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—(१) व्यवहार को मिथ्या बताना,
(२) सम्प्रतिपत्ति—आवेदन की भाषा का अस्पष्ट होना, (३) दुर्बोध—कारण-
विशेष—का उल्लेख न होने की कहना तथा बताना, अर्थात् (४) इस व्यवहार का
अन्य न्यायालय में निरस्त हो गया बताना-प्राङ्न्याय।
40 / नारदस्मृति

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मिथ्यैतन्नाभिजानामि मम तत्र न सन्निधिः।
अजातश्चास्मि तत्काल एवं मिथ्या चतुर्विधम् ॥ 5 ॥
मिथ्या उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—
प्रथम, वादी द्वारा लगाये गये आरोप को मिथ्या बताना, द्वितीय, अभियोग
के विषय के सम्बन्ध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, तृतीय, अभियोग में
उल्लिखित घटनास्थल पर अपनी अनुपस्थिति बताना तथा चतुर्थ, उल्लिखित
घटना के समय अपना जन्म ही न हुआ होना अथवा उस समय अपने को विदेश में
या किसी समारोह में उपस्थित बताना।
मिथ्या च विपरीतं च पुनः शब्दसमागमम्।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 6 ॥
उपर्युक्त चारों मिथ्या उत्तरों के निम्नोक्त रूप से क्रमशः चार प्रत्युत्तर दिये जा
सकते हैं—
प्रथम, प्रतिवादी द्वारा अभियोग को मिथ्या बताना, अर्थात् मिथ्या है।
द्वितीय, प्रतिवादी अभियोग-आरोप के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखता है
तथा मेरे अभियोग-पत्र की भाषा पूर्णतः स्पष्ट सरल और सुबोध है।
तृतीय, अभियोग-पत्र में सभी कारणों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है।
चतुर्थ, यह अभियोग किसी अन्य न्यायालय में कभी निरस्त नहीं हुआ। इस
सम्बन्ध में प्रतिवादी का कथन मिथ्या एवं भ्रामक है।
भाषाया उत्तरं यावत् प्रत्यर्थी विनिवेशयेत्।
अर्थी तु लेखयेत्तावद्यावद्वस्तु विवक्षितम् ॥ 7 ॥
वादी को लिखित आवेदन में केवल अत्यावश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
तथ्य लिखने चाहिए और प्रतिवादी के उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसका
उत्तर न आने तक तथा अभियोग-पत्र की कोई प्रतिलिपि न भेजे जाने तक वादी
अपने आवेदन-पत्र में यथेष्ट संशोधन—जोड़ना-छोड़ना—कर सकता है। प्रतिवादी
को वादी के अभियोग से परिचित किये जाने के उपरान्त उसमें किसी प्रकार का
कोई परिवर्तन-परिवर्द्धन नहीं किया जा सकता। हां, प्रतिवादी के उत्तर के प्रत्युत्तर
में अपनी बात कहने के लिए वह अवश्य स्वतन्त्र है।
टिप्पणी—स्मृति चन्द्रिकाकार किन्हीं आचार्यों द्वारा प्रतिवादी के उत्तर के
आने के उपरान्त भी वादी द्वारा अपने अभियोग-पत्र में संशोधन की अनुमति देने
को अनुचित एवं अवाञ्छनीय मानते हैं—केचिन्निविष्टेऽप्युत्तरे शोधनमिच्छन्ति।
तदनवस्था प्रसंगात् पूर्वोक्तवचनविरोधाच्च हेयम्।
अन्यार्थमर्थहीनं च प्रमाणागमवर्जितम्।
लेख्यं हीनाधिकं भ्रष्टं भाषादोषास्तूदाहृताः ॥ 8 ॥
नारदस्मृति / 41

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वादी द्वारा अपने विरुद्ध प्रस्तुत अभियोग-पत्र में प्रतिवादी निम्नोक्त सात दोष
निकाल सकता है—
प्रथम, अन्यार्थ—वाञ्छनीय अर्थ में भिन्न अर्थ की प्रतीति होना।
द्वितीय, अर्थहीनता—अभियोग के आवेदन करने का पात्र ही न होना।
तृतीय, प्रमाण-वर्जित—वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग की पुष्टि में किसी
प्रमाण का न होना।
चतुर्थ, आगम-वर्जित—अभियोग-पत्र का न्याय, धर्म आदि शास्त्रों के तथा
समाज व देश के विरुद्ध होना।
पञ्चम, हीन—अपेक्षित स्थान पर न होना। उपर्युक्त का अपनेक्षित स्थान पर
होना।
षष्ठ, अधिक—विसर्ग, विराम, अल्पविराम, मात्रा तथा स्वर आदि का यथास्थान
प्रयोग न होना।
सप्तम, भ्रष्ट—अभियोग-पत्र का स्वच्छ न होना, तेल, मिट्टी आदि से गन्दा
तथा पानी से भीगा होना एवं शिष्टता का अभाव।
लब्धव्यं येन यद्यस्मात् स तत्तस्मादवाप्नुयात्।
न त्वन्योन्यमथान्यास्मादित्यन्यार्थमिदं त्रिधा ॥ 9 ॥
सातों दोषों का परिचय इस प्रकार है—अभियोग-पत्र की—प्रथम अन्यार्थ—
जो वस्तु जिसको जिससे प्राप्त करनी हो—भाषा से वही अर्थ निकलना चाहिए;
क्योंकि अभिमत से भिन्न वस्तु को, वाञ्छित से भिन्न व्यक्ति से तथा अभीष्ट से
भिन्न व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सन्दर्भ से भिन्न अर्थ देने वाली भाषा का
प्रयोग अन्यार्थ दोष कहलायेगा और यह दोष अभियोग को निरस्त कर सकता है।
मनसाहमपि ध्यातस्त्वन्मित्रेणेह शत्रुवत्।
अतोऽनया महाक्षान्त्या त्वमिहावेदितो मया ॥ 10 ॥
किसी दूसरे की ओर से—उसकी अनुमति-सहमति होने अथवा न होने
(पावर ऑफ अटार्नी) पर—अमुक व्यक्ति मित्रता का ढोंग करता हुआ आपके प्रति
शत्रुता का व्यवहार करता है—जो मुझे रुचिकर नहीं—यह कहते हुए सम्बद्ध
व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में अभियोग चलाना अर्थहीन अभियोग कहलाता है।
यहां विचारणीय तथ्य यह है कि जब सम्बद्ध व्यक्ति को विरोधी से कोई शिकायत
ही नहीं, वह स्वयं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा उसके विरुद्ध कोई पग
नहीं उठाता, तो किसी दूसरे को क्यों कष्ट हो रहा है ? ऐसे मामले में आजकल इस
मुहावरे का प्रयोग किया जाता है—‘‘मुद्दई (वादी) सुस्त, गवाह चुस्त।’’
द्रव्यप्रमाणहीनं यत्फलोपाश्रयवर्जितम्।
प्रमाणवर्जितं नाम लेख्यदोषं तदुत्सृजेत् ॥ 11 ॥
42 / नारदस्मृति

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प्रमाण-वर्जित दोष वह होता है, जिसमें न तो द्रव्य (रुपया-पैसा अथवा
स्वर्ण, रत्न आदि अन्य मूल्यवान् वस्तु) का कोई लिखित प्रमाण होता है और न ही
उसके परिमाण की कोई निश्चित जानकारी होती है। इस प्रकार लेख्य-दोष के
कारण ऐसा अभियोग भी चलने योग्य नहीं होता।
आगमवर्जितं दोषं पूर्ववादे विवर्जयेत्।
एकस्य बहुभिः सार्धं पुरराष्ट्रविरोधकम् ॥ 12 ॥
आगम-वर्जित दोष का अर्थ है—एक के हित के विरुद्ध बहुतों के हित का
जुड़ा होना, अर्थात् व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष, दूसरे शब्दों में व्यक्ति के व्यवहार
का जाति, समाज, नगर और देश के हितों के विरुद्ध होना। कहने की आवश्यकता
नहीं कि ऐसा अभियोग न्यायशास्त्र और लोक-विरुद्ध होने से तत्काल, प्रथम दृष्टि
में ही निरस्त होने योग्य होता है।
बिन्दुमात्राविहीना वा पदवर्णविदुष्टा वा।
हीनाधिका भवेद् व्यर्थी तां यत्नेन विवर्जयेत् ॥ 13 ॥
हीन और अधिक वे दोष हैं, जब अभियोग-पत्र की भाषा में विसर्ग, मात्रा
आदि न लगे हों, अल्पविराम, पद और वर्ण के अभाव हों, जिससे मनमाना अर्थ
निकलता हो, ऐसा अभियोग भी महत्त्वहीन हो जाता है। उदाहरणार्थ, 'पुत्री न
पुत्रः' को 'पुत्री, न पुत्रः' लिखने में अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-भेद हो
जाता है। अभियोग-पत्र में भी इस प्रकार से विराम आदि का यथोचित ध्यान न
रखने से अर्थ-भेद हो जाता है। लोक में भी अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-
भेद का बहुप्रचलित उदाहरण है—'रोको, मत जाने दो', 'रोको मत, जाने दो'।
भ्रष्टं तु दुःखितं यत्स्याज्जलतैलादिभिर्हतम्।
भाषायां तदपि स्पष्टं विस्पष्टार्थं विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
भ्रष्ट-दोष से अभिप्राय है—अभियोग-पत्र का तेल आदि चिकने पदार्थों से,
रेत-मिट्टी आदि मलिन पदार्थों से दूषित तथा पानी से भीगा होना तथा अक्षरों का
कटा-फटा होना, अर्थात् सुवाच्य न रह पाना। ऐसा व्यवहार भी विचारणीय नहीं
रह पाता।
सत्या भाषा न भवति यद्यपि स्यात् प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद् भ्रश्यते धर्मान्नियताद् व्यवहारिकात् ॥ 15 ॥
यदि अभियोग-पत्र की भाषा-शैली शुद्ध, स्वच्छ, दोषरहित, सरल और
सुबोध होने पर भी अभियोग का विषय लोक-प्रचलित एवं व्यवहार में शुद्ध एवं
उपयोगी होने से सर्वमान्य धर्म के अनुकूल (सम्मत) नहीं, तो भी ऐसा अभियोग
अनुमत (Admit) नहीं होता, अपितु प्रथम दृष्टि में ही निरस्त हो जाता है।
गन्धमादनसंस्थस्य मयास्यासीत्तदर्पितम्।
व्यावहारिकधर्मस्य बाह्यमेतन्न सिध्यति ॥ 16 ॥
नारदस्मृति / 43

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अभियोग-पत्र में अविश्वसनीय एवं काल्पनिक तथ्यों के उल्लेख से भी
अभियोग अग्राह्य हो जाता है। उदाहरणार्थ, किसी का गन्धमादन पर्वन पर किसी
वस्तु के लेने और न लौटाने का अभियोग विश्वसनीयता की सीमा से बाहर होने के
कारण ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकती कि लेने और
देने वाला दोनों कभी उक्त स्थान पर थे और दोनों में किसी प्रकार का कोई लेन-
देन हुआ था।
अन्याक्षरनिवेशेन अन्यार्थगमनेन च।
आकुलं च क्रियादानं क्रिया चैवाकुला भवेत्॥ 17 ॥
यदि अभियोग से सम्बन्धित आवेदन-पत्र में लिखे गये तथ्यों पर विवाद
(Argument) के समय व्यक्ति लिखित से अभिव्यक्त होने वाले अर्थ पर दृढ़ न
रहकर उससे भिन्न मन्तव्य प्रकट करता है, अर्थात् वह यह कहता है कि जो लिखा
गया है, वह उसका आशय नहीं था, तो ऐसा अभियोग भी निरस्त होने योग्य होता
है।
उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति किसी पर मानहानि का आरोप लगाते हुए मार-पीट
आदि करने का उल्लेख करता है और बहस में केवल अपशब्द कहना बताता है,
तो ऐसा अभियोग-पत्र निरस्त ही किया जाना चाहिए; क्योंकि इस प्रकार के
लिखित और मौखिक कथन के अन्तर से न केवल न्यायाधिकरण के सदस्य
परेशान हो जाते हैं, अपितु न्याय की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है।
रागादीनां यदेकेन कोपितः करणं वदेत्।
तदादौ तु लिखेत् सर्वं वादिनः फलकादिषु॥ 18॥
यदि कोई व्यक्ति काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों रागादि (राग-द्वेष) के
नाम से जाने जाते हैं। इन तीनों में से किसी एक-क्रोध-में आकर धर्माधिकारी
को मौखिक रूप से अपने पक्ष में निर्णय लिखने के लिए धमकाता है, तो ऐसे
व्यक्ति का नाम तत्काल सूचनापट्ट (नोटिसबोर्ड) पर मोटे-काले अक्षरों में लिख
देना चाहिए।
राजकुलावबोधाय धर्मस्थैः सुविचारितम्।
तस्मादन्यद्व्यपोहां स्याद् वादिनः फलकादिषु॥ 19॥
यदि वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग-पत्र के विषय के एक सीमा तक राजकुल-
उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय के विचार क्षेत्र में आने के कारण
धर्माधिकारियों-निम्न न्यायालय के न्यायाधीशों-द्वारा भली प्रकार विचार किये
जाने पर कुछ अविचारित रह जाता है, तो वादी को उस पर आपित्त करने का
अधिकार नहीं मिलता।
44 / नारदस्मृति

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वादिभ्यामभ्यनुज्ञातं शेषं च फलके स्थितम्।
ससाक्षिकं लिखेयुस्ते प्रतिपत्तिं च वादिनोः ॥ २० ॥
वादी के अभियोग-पत्र का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने के पश्चात् और प्रतिवादी
द्वारा आरोपों के खण्डन-मण्डन में प्रत्युत्तर तथा साक्षियों के वक्तव्य के उपरान्त
वादी-प्रतिवादी में समझौते और निर्धारित शर्तों को न्यायाधिकरण के लेखक को
उस सरकारी अभिलेख में लिपिबद्ध करना चाहिए।
वादिभ्यां लिखिताच्छेषं यत्पुनर्वादिना स्मृतम्।
तत्प्रत्याकलितं नाम स्वपादे तस्य लिख्यते ॥ २१ ॥
यदि वादी और प्रतिवादी के वक्तव्यों के लिपिबद्ध हो जाने के उपरान्त वादी
कुछ अन्य स्मरण आये तथ्यों को सम्मिलित कराना चाहता है, तो उसे परिशिष्ट
(एडेण्डम) शीर्षक के अन्तर्गत लिया जाना चाहिए। ऐसे उल्लेख को 'प्रत्याकलित'
कहा जाता है।
अर्थिना सन्नियुक्तो वा प्रत्यर्थिप्रहितोऽपि वा।
यो यस्यार्थे विवदते तयोर्जयपराजयौ ॥ २२ ॥
अर्थी और प्रत्यर्थी द्वारा मनोनीत उनके प्रतिनिधि (अटार्नी) जब उनकी ओर
से अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा वाद-विवाद में भाग लेते हैं, तब उन
प्रतिनिधियों के वक्तव्यों आदि के आधार पर व्यवहार किया गया निर्णय-जय-
पराजय-को स्वीकार करने के लिए दोनों पक्ष बाध्य होते हैं।
अभिप्राय यह है कि वादी तथा प्रतिवादी यह नहीं कह सकते कि हमारा
प्रतिनिधि ठीक से कार्य नहीं कर सका अथवा हमने तो भाग ही नहीं लिया।
प्रतिनिधियों की उपस्थिति को भी वादी-प्रतिवादी की उपस्थिति ही माना जायेगा।
यो न भ्राता न च पिता न पुत्रो न नियोगकृत्।
परार्थवादी दण्ड्यः स्याद् व्यवहारेऽपि विब्रुवन् ॥ २३ ॥
व्यवहार-कार्य में प्रवृत्त व्यक्ति का सम्बन्धी-पिता, पुत्र, भाई, पत्नी अथवा
अन्य निकट सम्बन्धी-तथा उसके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि न होने पर भी वादी
अथवा प्रतिवादी के हित-साधन अथवा विरोध के लिए व्यवहार में अनावश्यक
एवं अनुचित रूप से हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति 'परार्थवादी' कहा जाता है। ऐसा
व्यक्ति केवल अवाञ्छनीय-दाल-भात में मूसलचन्द-ही नहीं होता, अपितु
दण्डनीय भी होता है।
अभिप्राय यह है कि असम्बद्ध एवं बाहरी व्यक्ति द्वारा न्यायालय के किसी
मामले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप दण्डनीय अपराध होता है।
पूर्ववादं परित्यज्य योऽन्यमालम्बते पुनः।
वादसंक्रमणाज्ज्ञेयो हीनवादी स वै नरः ॥ २४ ॥
नारदस्मृति / 45

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अभियोग-पत्र में उल्लिखित विषय की उपेक्षा करके अन्यान्य विषयों की
चर्चा में प्रवृत्त होने वाले वादी के पक्ष को दुर्बल ही समझना चाहिए। वस्तुतः वाद-
संक्रमण दुर्बलता का ही परिचायक लक्षण होता है।
सर्वेष्वपि विवादेषु वाक्छलेनापहीयते।
पशुस्त्रीभूम्यृणादाने शास्योऽप्यर्थान्न हीयते ॥ 25 ॥
यों तो न्यायालय में प्रस्तुत सभी प्रकार के मामलों में छल-कपट और धोखा-
धड़ी करने वाले पक्ष की धूर्तता सिद्ध होने पर उसकी पराजय निश्चित होती है,
परन्तु पशु, स्त्री, भूमि तथा ऋण के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में तो छल-
कपट और धोखा-धड़ी सिद्ध होने पर पराजय के साथ-साथ दण्ड भी भुगतना
पड़ता है।
अभियुक्तोऽभियोगस्य यदि कुर्यादपह्नवम्।
अभियोक्ता दिशेद्देश्यं प्रत्यवस्कन्दितो न चेत् ॥ 26 ॥
अभियुक्त प्रतिवादी अपने विरुद्ध अभियोग को मिथ्या तो बताता है, परन्तु
अपने मन्तव्य की पुष्टि में ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता, जबकि वादी प्रतिपाद्य
विषय को प्रमाणों द्वारा सत्य सिद्ध करने में सफल रहता है और इधर प्रतिवादी वादी
के मन्तव्य का खण्डन भी नहीं कर पाता, तो प्रतिवादी को पराजित और वादी को
विजित मानना चाहिए।
पूर्वपादे हि लिखितं यथाक्षरमशेषतः।
अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ 27 ॥
अभियोग के प्रथम चरण-अभियोग-पत्र को जमा कराने के उपरान्त अभियोग
के तृतीय चरण-विवाद के समय-में वादी को अभियोग-पत्र में लिखित तथ्यों
की ही तर्कों और प्रमाणों से पुष्टि करनी होती है। उस समय वादी किसी नये विषय
को प्रस्तुत नहीं कर सकता। उसे अपने को वहीं तक सीमित करना होता है।
क्रियापि द्विविधा प्रोक्ता मानुषी दैविकी तथा।
मानुषी लेख्यसाक्षिभ्यां घटादिर्दैविकी स्मृता ॥ 28 ॥
प्रमाण के अन्तर्गत क्रिया के दो रूप-भेद होते हैं-मानुषी क्रिया तथा दैवी
क्रिया। लिखित पत्र-पत्रिका आदि तथा साक्ष्य मानुषी क्रिया न्याय है। घट, तुला,
अग्नि तथा जल आदि की शपथ लेना दैवी क्रिया है। दैवी क्रिया को दिव्य प्रमाण
भी माना जाता है। जहां कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, वहां इन्हीं दिव्य
प्रमाणों द्वारा काम चलाया जाता है।
दिवा कृते कार्यविधौ ग्रामेषु नगरेषु वा।
सम्भवे साक्षिणां चैव दिव्या न भवति क्रिया ॥ 29 ॥
दिन में, ग्राम-नगर आदि जनपद में घटित घटना की प्रामाणिकता के लिए तो
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लौकिक प्रमाण के अन्तर्गत साक्ष्य आदि से ही काम चलाया जाता है। ऐसी
घटनाओं के विषय में दिव्य प्रमाण स्वीकृत नहीं होता। लौकिक प्रमाण की
अनुपलब्धता में ही दिव्य प्रमाण की आवश्यकता और उपयोगिता आंकी जाती है।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे।
न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया॥ ३०॥
निर्जन वन में अथवा जनशून्य स्थान—ग्राम, नगर आदि के बाहर—रात्रि में
(अन्धकार में) घर के भीतर किसी प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में, डाका डाले जाने
वाले स्थान-भय के कारण लोगों के भाग जाने, छिप जाने पर, धरोहर के रूप में
रखी वस्तु को छिपा लेने की स्थिति में मानुषी प्रमाण की उपलब्धता सम्भव ही
नहीं होती। अतः ऐसे स्थानों अवसरों पर दिव्य प्रमाण हो स्वीकृत होते हैं।
कारणप्रतिपत्त्या च पूर्वपक्षे विरोधिते।
अभियुक्तेन वै भाव्यं विज्ञेयं पूर्वपक्षवत्॥ ३१॥
जिस प्रकार वादी अपने अभियोग को विश्वसनीय बनाने के लिए उसके
समर्थन में लिखित प्रमाण एवं साक्ष्य आदि जुटाता है, उसी प्रकार प्रतिवादी को भी
वादी के अभियोग के खण्डन और अपने पक्ष के समर्थन में पुष्ट प्रमाण जुटाने
चाहिए, तभी उसे अपनी विजय की आशा करनी चाहिए।
पलायते च आहूतो मौनी साक्षिपराजितः।
स्वयमभ्युपपन्नश्च अवसन्नश्चतुर्विधः ॥ ३२॥
निम्नोक्त चार प्रकार अवसन्न, अर्थात् पराजित पक्ष कहलाते हैं—
प्रथम—अभियुक्त व्यक्ति द्वारा धर्माधिकरण के आह्वान-पत्र (समन) को
लेने से कतराना, छिप जाना, भाग जाना, आह्वान-पत्र लाने वाले को घूस देकर
अपने को अनुपस्थित दिखाना अथवा आह्वान-पत्र प्राप्त करके निश्चित तिथि व
समय पर न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होना।
द्वितीय—न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित होने पर मौन रहना अथवा वादी
के आरोपों का खण्डन न करना।
तृतीय—साक्षी को प्रस्तुत न कर पाना अथवा साक्ष्य का पुष्ट न होना अथवा
साक्षी का बिदक-भटक जाना।
चतुर्थ—न्यायालय में अपने पक्ष की प्रस्तुति के लिए वादी द्वारा प्रथम
अपना प्रतिनिधि मनोनीत करना और फिर उसकी कार्य-शैली से सन्तुष्ट न होकर
स्वयं उपस्थित हो जाना।
इन चारों तत्त्वों को प्रतिवादी के पक्ष की दुर्बलता का सूचक ही समझना चाहिए!
अन्यवादी क्रियाद्वेषी नोपस्थाता निरुत्तरः।
आहूतप्रपलायी च हीनः पञ्चविधः स्मृतः ॥ ३३॥
नारदस्मृति / 47

साक्षी के मन्तव्य का खण्डन करने वाला।

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निम्नोक्त पांच को हीन (पराजित) मानना चाहिए—
प्रथम, अन्यवादी—पूछे गये प्रश्नों से उत्तर का कुछ भिन्न होना, अर्थात्
मूल विषय पर स्थिर न रहकर इधर-उधर की प्रयोजन-रहित हांकने वाला।
द्वितीय, क्रियाद्वेषी—अपने ही साक्षी के साक्ष्य का विरोध करने वाला,
साक्षी के मन्तव्य का खण्डन करने वाला।
तृतीय, नोपस्थाता—सूचना प्राप्त होने पर भी निर्धारित तिथि और समय पर
न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होने वाला।
चतुर्थ, निरुत्तर—न्यायाधिकरण द्वारा पूछे गये प्रश्नों का सन्तोषजनक ढंग
से उत्तर न देने वाला, मौन धारण करने वाला अथवा 'मालूम नहीं' आदि भाषा
बोलने वाला।
पञ्चम, आहूतप्रपलायी—आह्वान-पत्र (समन) को ही न लेने वाला, भाग
खड़ा होने वाला अथवा झूठ बोलकर या घूस देकर अपना बचाव करने वाला।
मणयः पद्मरागाद्याः दीनारादि हिरण्मयम्।
मुक्ताविद्रुमशंखाद्याः प्रदुष्टाः स्वामिगामिनः ॥ 34 ॥
यदि कृत्रिम पद्मराग आदि मणियों, दीनार आदि मुद्राओं, स्वर्ण, मुक्ता, विद्रुम
आदि रत्नों तथा शंखों को अकृत्रिम बताकर बेचने वाला व्यापारी ग्राहक द्वारा
वास्तविकता को जानकर लौटाने का अनुरोध किये जाने पर नक़ली सामान लेकर
असली सामान दे देता है, तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिए। यदि वह नक़ली सामान
वापस लेने और असली सामान देने से मुकरता है, तो उसे इस प्रकार से दण्डित
करना चाहिए कि वह अपनी धूर्तता को दोहराने का दुस्साहस ही न कर सके।
गन्धमाल्यमदत्तं तु भूषणं वास एव वा।
पादुकेति राजोक्तं तदाक्रामन् वधमर्हति ॥ 35 ॥
राजा से परितोष-प्रसाद-रूप में राजा की अनुमति-प्राप्त किये बिना राजा
के उपयोग में आने वाले गन्ध—इत्र, फुलेल (फ़ेसक्रीम, टेल्कम पाउडर आदि)
माला, अलंकार (आभूषण) वस्त्र तथा पादुका (जूता)—आदि का उपयोग करने
वाला दण्ड के योग्य होता है।
पण्यमूल्यं भृतिर्न्यासो दण्डो यच्चावहारिकम्।
वृथादानाक्षिकपणा वर्धन्ते नावविक्षिताः ॥ 36 ॥
निम्नोक्त सात प्रकार के धनों में—कितना भी समय क्यों न बीत जाये—किसी
प्रकार की बढ़ोत्तरी—ब्याज, अतिरिक्त लाभ आदि के रूप में—नहीं हो सकती।
(1) किसी वस्तु को बेचने पर प्राप्त होने वाला दाम, (2) श्रम करने पर मिलने
वाला भत्ता अथवा पारिश्रमिक, (3) धरोहर के रूप में रखा गया धन अथवा स्वर्ण
आदि, (4) सरकारी जुर्माना—अर्थ-दण्ड के रूप में देय धन, (5) बेकार पड़ी
48 / नारदस्मृति

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वस्तु से होने वाला लाभ, (6) भाट-चारण आदि को प्रतिज्ञात दान, पुरस्कार आदि
तथा (7) द्यूत-क्रीड़ा में जीता गया धन।
इनकी वसूली में विलम्ब होने पर किसी प्रकार के अतिरिक्त धन-ब्याज
आदि-की मांग नहीं की जा सकती।
मिथ्याभियोगिनो ये स्युर्द्विजानां शूद्रयोनयः।
तेषां जिह्वां समुत्कृत्य राजा शूले निधापयेत् ॥ 37 ॥
राजा को ब्राह्मण आदि उच्च जाति के लोगों पर मिथ्या आरोप लगाकर उन्हें
कलंकित-अपमानित करने वाले शूद्र आदि निम्न जाति के लोगों की जिह्वा को
कटवाकर उन्हें सूली पर लटकवा देना चाहिए।
मृत्यु-दण्ड देने से पूर्व अपशब्द कहने वाली जीभ को कटवाने का उद्देश्य
उन्हें पीड़ित करना है, अर्थात् ऐसा कठोर दण्ड देना है कि कोई भी ऐसी धृष्टता
करने का दुस्साहस ही न कर सके।
टिप्पणी- प्राचीन भारत में इस प्रकार के कठोर दण्ड की व्यवस्था के
कारण ही समाज अनुशासित था तथा वर्ण-व्यवस्था प्रतिष्ठित थी।
असहाय भाष्यकार के अनुसार यदि राजा श्रेष्ठजनों को मिथ्या कलंकित करने
वाले उच्छृंखल छोटे लोगों को नियन्त्रित नहीं करता, तो वह कर्तव्य-च्युत माना
जाता है अथवा अव्यवस्था को जन्म देने का दोषी तथा पापी कहलाता है-
ये क्षुद्राः विक्षेपकारिणो भवन्ति तान् राजा खण्डितजिह्वान् कृत्वा शूले
निधापयेत्। ततस्तेन पापेन न गृह्यते। अन्यथा शिष्ट पालनार्थं दुष्टनिग्रहार्थं
करग्राहिणो राज्ञः एव सः दोष इत्यर्थः।
आज्ञा लेखः पट्टकः शासनं वा
आधिः पत्रं विक्रयो वा क्रयो वा।
राज्ञे कुर्यात् पूर्वमावेदनं य-
स्तस्य ज्ञेयः पूर्वपक्षो विधिज्ञैः ॥ 38 ॥
विधिवेत्ताओं की दृष्टि में कानून का आदर करने वाला तथा किसी प्रकार के
विवाद के उपस्थित होने पर पूर्वपक्षी (वादी) कहलाने का अधिकारी वही है, जो
निम्नोक्त रूप से नियमों का पालन करता है-

  1. किसी सम्पत्ति के क्रय-विक्रय से पूर्व राजा से लिखित आवेदन करके
    अनुमति प्राप्त करना।
  2. क्रय-विक्रय को पञ्जीयन कराना।
  3. लेन-देन के सभी मामलों में राजकीय अभिमत-पत्रों (स्टाम्प-पेपर्स) का
    प्रयोग करना।
  4. शासकीय अभिलेख में प्रविष्टि कराना तथा
    नारदस्मृति / 49
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  1. धरोहर और बन्धक रखने से तथा इन दोनों के क्रय विक्रय से पूर्व
    प्रशासन से अपेक्षित अनुमति प्राप्त करना।
    इस प्रकार क़ानून का पालन करने वाले व्यक्ति को प्रथम तो कभी किसी
    झंझट का सामना करना ही नहीं पड़ता, अन्यथा किसी झंझट के उपस्थित होने पर
    पूर्वपक्षी मानकर उसे गौरव दिया जाता है।
    साक्षिकदूषणे कार्यं पूर्वसाक्षिविशोधनम्।
    शुद्धेषु साक्षिषु ततः पश्चात् साक्ष्यं विशोधयेत् ॥ ३९ ॥
    वादी के साक्षी के अभिमत (Bona-fide) होने के सम्बन्ध में प्रतिवादी द्वारा
    आपत्ति किये जाने पर अथवा साक्षी के साक्ष्य में दोष निकालने पर खण्डन-
    संशोधन आदि का दायित्व वादी पर होता है। साक्षी की निर्दोषिता सिद्ध होने पर ही
    उसका साक्ष्य ग्राह्य होता है। प्रामाणिकता के विवादित रहने पर साक्षी को वक्तव्य
    देने का अवसर ही नहीं देना चाहिए।
    साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणे दर्शनं पुनः।
    स्वचर्यावसितानां तु नास्ति पौनर्भवो विधिः ॥ ४० ॥
    न्यायाधिकरण द्वारा नियुक्त सदस्यों (ज्यूरिस्टों) के प्रमाद, भूल-चूक,
    असावधानी अथवा त्रुटि के कारण पराजित व्यक्ति अपने व्यवहार के पुनर्विचार के
    लिए आवेदन कर सकता है, परन्तु साक्षियों के साक्ष्य में हुई भूल-चूक, त्रुटि तथा
    प्रमाद आदि के कारण पराजित व्यक्ति पुनर्विचार के लिए आवेदन का अधिकारी
    नहीं होता।
    स्वयमभ्युपपन्नोऽपि स्वचर्यावसितोऽपि सन्।
    क्रियावसन्नोऽप्यर्हेत परं सम्भावधारणम्॥ ४१ ॥
    वादी द्वारा स्वयं प्रस्तुत प्रमाणों और साक्ष्य आदि के निरस्त हो जाने पर भी
    उसे तब तक पराजित मानकर दण्डित नहीं किया जा सकता, जब तक कि विचारों
    की निष्पत्ति (Arguments and Cross Arguments) द्वारा तथ्यों का अन्तिम निर्णय
    नहीं हो जाता। दण्डाधिकारी को इससे पूर्व किसी प्रकार का निष्कर्ष निकालने और
    निर्णय थोपने का कोई अधिकार नहीं; क्योंकि तर्क-प्रस्तुति के समय पासा पलट
    सकता है।
    पक्षानुत्सार्य तु सभ्यैः कार्यों विनिश्चयः सदा।
    अनुत्सारितनिर्णिंक्ते विरोधः प्रेत्य चेह च॥ ४२ ॥
    प्रमाणों और साक्ष्य के अतिरिक्त तर्क-प्रस्तुति, विवाद और व्यक्तिगत सुनवाई
    तथा पूछ-ताछ आदि के उपरान्त सभ्यों—ज्यूरी के सदस्यों—द्वारा व्यवहार के सभी
    पक्षों पर विचार करते समय वादी तथा प्रतिवादी को कभी सामने नहीं आने देना
    चाहिए, अर्थात् किसी के प्रति अनुग्रह-विग्रह का भाव नहीं रखना चाहिए। निर्णय
    50 / नारदस्मृति
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से किसी को होने वाले लाभ-हानि की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। सर्वथा तटस्थ
होकर निर्णय करना चाहिए। ऐसा न करने वाला न्यायाधिकरण इस लोक में
अपयश और परलोक में दुर्गति का भागी होता है।
सभ्यैरेव जितः पश्चाद्राज्ञा शास्यः स्वशास्त्रतः।
जयिने चापि देयं स्याद्याथावज्जयपत्रकम्॥ ४३॥
सभ्यों—न्यायाधिकरण के मनोनीत सदस्यों—द्वारा विजित एवं पराजित घोषित
दोनों पक्षों को न्यायालय द्वारा प्राधिकृत अधिकारी अपने हस्ताक्षर और शासकीय
मुद्रा में अंकित संविधान-सम्मत प्रमाण-पत्र जारी करता है।
टिप्पणी—विजेता को दिये जाने वाले प्रमाण-पत्र में व्यवहार की क्रम-
संख्या, व्यवहार प्रारम्भ होने और निर्णय होने की तिथि, व्यवहार का वर्ग, न्यायाधिकरण
का स्तर, अधिकार-क्षेत्र, लगाये गये आरोप का स्वरूप, उपस्थापित प्रमाण एवं
साक्ष्य तथा प्राड्विवाक (वकीलों) द्वारा किये गये तर्क-वितर्कों के अतिरिक्त सभ्यों
द्वारा संविधान की धारा-विशेष के अन्तर्गत किये गये विचार के संक्षिप्त विवरण के
उपरान्त निर्णय का स्पष्ट उल्लेख रहना चाहिए। प्रमाण-पत्र को प्रामाणिक रूप देने
के लिए सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर, पद तथा न्यायालय की मोहर लगी होनी
चाहिए।
व्यवहारमुखं चैतत् पूर्वमुक्तं स्वयम्भुवा।
मुखशुद्धौ हि शुद्धिः स्याद् व्यवहारस्य नान्यथा॥ ४४॥
व्यवहारमातृका ब्रह्माजी के कथन के अनुसार व्यवहार का मुख—अग्रभाग—
है। मुख शुद्ध होने पर ही व्यवहार शुद्ध होता है—ऐसी ब्रह्माजी की मान्यता है।
ब्रह्माजी के अनुसार मुख शुद्ध न होने पर, अर्थात् वाणी शुद्ध न होने पर व्यक्ति के
व्यवहार के शुद्ध होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
टिप्पणी—नीतिशास्त्र में तो मन की शुद्धि को प्रधानता देते हुए माना गया है
कि मन का भाव (चिन्तन) वाणी-रूप में जिह्वा पर आता है और वचन के अनुरूप
व्यक्ति कार्य करता है। इन्हीं तीनों—मन, वाणी और क्रिया—की एकरूपता को
सज्जनता का तथा भिन्नता को दुर्जनता का लक्षण माना गया है।
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥
परन्तु यहां न्याय-प्रक्रिया में मन के भावों की उपेक्षा करते हुए दिये गये
बयान (वाणी) को ही महत्त्व दिया गया है।
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥
नारदस्मृति / 51

तृतीय अध्याय

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तृतीय अध्याय
नानियुक्तेन वक्तव्यं व्यवहारे कथञ्चन ।
नियुक्तेन तु वक्तव्यमपक्षपतितं वचः ॥ १ ॥
वादी अथवा प्रतिवादी द्वारा अधिकृत अथवा नियुक्त न किया गया कोई भी
व्यक्ति उनकी ओर से उनके प्रतिनिधि के रूप में कुछ नहीं कर सकता। न्यायालय
को सम्बद्ध पक्षों द्वारा बिना अधिकार-पत्र प्राप्त किये वकील आदि को उनकी ओर
से उनका व्यवहार प्रस्तुत करने अथवा तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति कदापि नहीं
देनी चाहिए।
अनियुक्तो नियुक्तो वा शास्त्रज्ञो वक्तुमर्हति ।
दैवीं स वाचं वदति यः शास्त्रमनुजीवति ॥ २ ॥
सभ्यों-न्यायाधिकरण के सदस्यों- अथवा तथा न्यायाधिकारियों द्वारा लोभ,
पक्षपात, राग-द्वेष अथवा अज्ञानवश किसी एक पक्ष के प्रति अन्याय होता देखकर
शास्त्रवेत्ता विद्वान् सम्बद्ध अथवा प्रभावित पक्ष द्वारा नियुक्त होने पर अथवा अनियुक्त
होने पर भी न्याय की रक्षा के लिए धर्मसम्मत वाणी बोल सकता है, अर्थात् उसकी
ओर से पुनर्विचार के लिए याचना तथा बहस कर सकता है। इसे आज की भाषा
में प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की मांग कहा जा सकता है।
इस सम्बन्ध में स्मृतिकार नारद अन्याय के निवारण के लिए शास्त्रसम्मत
तथ्य की ओर ध्यान न दिलाने को 'देवभाषा', अर्थात् ईश्वरीय प्रयास की संज्ञा देते
हैं।
युक्तरूपं वदन् सभ्यो नाप्नुयाद् द्वेषकिल्विषे ।
ब्रुवाणस्त्वन्यथा सद्यस्तदेवोभयमाप्नुयात् ॥ ३ ॥
सभ्यों के युक्तियुक्त, शास्त्रसम्मत तथा तथ्यों पर आधृत, अर्थात् व्यक्तिगत
राग द्वेष से सर्वथा रहित निर्णय से किसी को होने वाली क्षति के लिए वे उत्तरदायी
नहीं होते, उन्हें किसी प्रकार पाप का भागी नहीं बनना पड़ता। इसके विपरीत, यदि
वे लोभ, भय अथवा पक्षपात से प्रेरित होकर किसी को लाभ पहुंचाने के रूप में
न्याय का गला घोटने पर, न केवल लोक में अपयश का पात्र बनते हैं, अपितु मृत्यु
के उपरान्त नरक में भी गिरते हैं।
52 / नारदस्मृति

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राजा तु धार्मिकान् सभ्यानियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान्।
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः सद्गवा इव॥ 4 ॥
जिस प्रकार भार ढोने में समर्थ, स्वस्थ, सबल एवं हृष्ट-पुष्ट बैलों को ही
गाड़ी में जोतने से गाड़ी वेग से चलती है, उसी प्रकार राजा को न्याय-प्रक्रिया को
सुव्यवस्थित एवं न्यायसंगत ढंग से चलाने के लिए भली प्रकार सुपरीक्षित, धर्मात्मा,
शुचि, निर्लोभ, राग-द्वेष से मुक्त, समाज में प्रतिष्ठित एवं सच्चरित्र विधिशास्त्रियों
की ही न्यायाधिकरण के सदस्यों के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए।
धर्मशास्त्रार्थकुशलाः कुलीनाः सत्यवादिनः।
समा शत्रौ च मित्रे च नृपतेः स्युः सभासदः ॥ 5 ॥
न्यायाधिकरण के सदस्यों की अर्हता-पात्रता के सम्बन्ध में स्मृतिकार ने पांच
विशेषताओं का उल्लेख किया है—

  1. धर्मशास्त्र में निपुणता।
  2. न्याय-प्रक्रिया में विदग्धता।
  3. कुलीनता।
  4. सत्यवादिता तथा
  5. मित्र-शत्रु के प्रति समान व्यवहार।
    टिप्पणी—धर्मशास्त्रों, स्मृतितन्त्रों व ऋषियों के वचनों में अनेक सांकेतिक
    तथा पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग रहता है, जिनके गूढ़ अर्थों को समझना सर्वसाधारण
    के लिए अत्यन्त कठिन होता है। अतः सभ्य (सभासद) के लिए विद्वत्ता के साथ-
    साथ विदग्धता का होना भी आवश्यक है, अन्यथा मन्दमति व्यक्ति शास्त्र-वचन के
    अर्थ का अनर्थ करके सारी न्याय-व्यवस्था को ही प्रभावित-दूषित कर सकता है।
    न्याय-प्रक्रिया में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार की प्रबल सम्भावना रहती है। कुलीन
    व्यक्ति अपने अभिजात्य संस्कारों, उच्च परम्पराओं, शिक्षा तथा परिवेश आदि के
    प्रभाव से अन्याय-पथ पर चलने से घबराता है, जबकि संस्कारों से वर्जित व्यक्ति
    प्राप्त अवसर का लाभ उठाने को ही महत्त्व देता है। इसी प्रकार स्वभाव से सत्य
    बोलना तथा किसी के प्रति राग-द्वेषवश मित्र-शत्रु-भाव न रखना भी न्याय-
    प्रक्रिया की महत्त्वपूर्ण अपेक्षा है।
    महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार—देश-विशेष तथा काल-विशेष में प्रचलित
    प्रथाओं एवं परम्पराओं के ज्ञान को धर्मशास्त्र के ज्ञान के अन्तर्गत समझना चाहिए।
    इसके अतिरिक्त लौकिक सत्य की रक्षा के अन्तर्गत विवेकशीलता—सत्य और
    असत्य में अन्तर करने की योग्यता—भी सभ्यों की नियुक्ति के लिए एक अपेक्षित
    गुण है।
    नारदस्मृति / 53
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तत्प्रतिष्ठः स्मृतो धर्मो धर्ममूलश्च पार्थिवः ।
सह सद्भििरतो राजा व्यवहारान् विशोधयेत् ॥ 6 ॥
न्याय-प्रक्रिया के अन्तर्गत स्मृति-धर्मशास्त्र-के आधार पर ही न्याय तथा
धर्म की प्रतिष्ठा होती है, अर्थात् न्यायाधिकारियों को न्याय करने के रूप में धर्म की
प्रतिष्ठा करनी होती है। इसके लिए उन्हें धर्मशास्त्र का सहारा लेना होता है। अतः
उनके लिए शास्त्रों की सम्यक् जानकारी होना आवश्यक हो जाता है। धर्म का मूल
राजा है, अर्थात् यदि राजा धर्मात्मा है, तो निश्चित है कि वह धर्मात्माओं को ही
गौरव देगा और प्रजा भी धर्मप्रिय होगी। इस सम्बन्ध में 'यथा राजा तथा प्रजा' की
उक्ति सर्वविदित है। राजा धर्मशील, कुलीन, सदाचार एवं विचक्षण सभ्यों के
सहयोग-विचार-विमर्श-से ही व्यवहारों का निरीक्षण-परीक्षण एवं निर्णय करता
है। अकेला राजा तो सब कुछ नहीं कर सकता, उसे सदैव सहायकों, परामर्शदाताओं
तथा विश्वस्त मित्रों की आवश्यकता रहती है। यदि सहायक कुलीन, पण्डित,
निष्पक्ष तथा विवेकशील हैं, तो वे राजा का पथ-प्रदर्शन ही नहीं करते, अपितु उस
पर नियन्त्रण रखने में भी समर्थ होते हैं।
शुद्धेषु व्यवहारेषु शुद्धिं यान्ति सभासदः ।
शुद्धिश्च तेषां धर्माद्धि धर्ममेव वदेत्ततः ॥ 7 ॥
व्यवहार की शुद्धि से न्यायाधिकारियों की शुद्धि होती है, अर्थात् जब व्यवहार
के निर्णय में राग-द्वेष तथा काम, क्रोध व लोभवश उत्पन्न पक्षपात को आड़े नहीं
आने दिया जाता, पूर्णतः निष्पक्षता एवं तटस्थता बरती जाती है तथा दुग्ध और जल
को पृथक् करने में विवेक का परिचय दिया जाता है, तब न्यायाधिकारियों का लोक
में सम्मान और यश बढ़ता है। इस प्रकार धर्म की रक्षा से ही न्यायाधिकारियों की
वास्तविक शुद्धि होती है और यह धर्म ही उनके यश का प्रसार-विस्तार करता है।
अभिप्राय यह है कि धर्म की रक्षा करने वालों को ही लोक में प्रतिष्ठा मिलती
है, धर्म की उपेक्षा करने वाले अपमानित-कलंकित हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में
महाभारत का प्रस्तुत कथन दर्शनीय है।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ 8 ॥
जहां किसी भी व्यवहार में धर्म की अधर्म के हाथों और न्याय की अन्याय
के हाथों हत्या होती है, सत्य असत्य के हाथों प्रताड़ित-पराजित होता है, वहां
न्यायाधिकारी भी लोक में निन्दित, कलंकित और अपमानित होते हैं।
टिप्पणी - यह तो एक सुनिश्चित तथ्य है कि पूर्वाग्रह अथवा पक्षपातवश
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अथवा अज्ञानवश कुछ लोग कुछ समय के लिए अन्याय का समर्थन भले कर लें,
परन्तु अन्ततः सत्य की ही विजय होती है। समाज में प्रचलित मान्यता है- सत्य
वही, जो सिर चढ़ बोले। हत्या के सम्बन्ध में अंग्रेजी भाषा की सुप्रचलित उक्ति-
Murder must Come out, अर्थात् खून सिर पर चढ़कर बोलता है-के समान
सत्य भी सिर चढ़कर बोलता है, उसे छिपाना-नकारना तो ढोंग ही हो सकता है।
इसके अतिरिक्त यह भी एक नग्न सत्य है कि सत्य और न्याय की हत्या करने वाला
व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित क्यों न हो, समाज की दृष्टि में एकदम गिर
जाता है। इस प्रकार स्मृतिकार नारद का यह कथन-अन्याय का पक्ष ग्रहण करने
से न तो अन्याय प्रतिष्ठित हो पाता है और न ही न्याय की हत्या करने वाला कहीं
सुख-शान्ति से बैठ पाता है-एक अनुभवसिद्ध एवं त्रिकालशुद्ध सत्य है, जिसकी
उपेक्षा किसी भी स्थिति में कदापि सम्भव नहीं।
मनु के अनुसार-जिस प्रकार शस्त्र के घाव से पीड़ित व्यक्ति का उपचार न
करने वाला चिकित्सक कर्तव्यच्युत और लोकनिन्दित होता है, उसी प्रकार विश्वास
लेकर व्यवहार-निर्णय के लिए उपस्थित वादी को न्याय न देने वाला धर्माधिकारी
पाप का भागी होता है-
तत्र यथा लोकः शस्त्राभिघातपीड़ितो वैद्यपार्श्वमागच्छति। तत्र च ते
सभासदस्तस्य तदवस्थधर्मस्य, अधर्मस्योद्धरणव्यापारनियुक्ताधिकारिणोऽपि
यदा तत्पापशल्यं न कृन्तन्ति नापनयन्ति तदा संक्रमणतन्त्रप्रयोगसंक्रामित-
वृश्चिकविषेणैव उपेक्षितपापशल्येन त एव सभासदो विद्धा भवन्ति।
विद्धे धर्मे ह्यधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते।
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ 9 ॥
जिस न्यायाधिकरण में अन्याय का प्रवर्तन होता है, न्यायाधिकरण के उस
व्यवहार से केवल वादी और प्रतिवादी ही प्रभावित नहीं होते, अपितु न्यायाधिकारी
भी उससे बुरी तरह क्षतिग्रस्त होते हैं। उनके सम्मान को क्षति पहुंचती है और उनके
व्यक्तित्व को बट्टा लगता है।
टिप्पणी-जिस प्रकार पशु के शरीर में घुसे, अपने बाण को निकालने की
चेष्टा करने वाला व्याध स्वयं भी (उस बाण से आहत हो जाता है) पीठ के बल
गिर पड़ता है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और न्याय की हत्या करने वाला व्यक्ति भी
आत्मग्लानि से व्यथित होकर सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत नहीं कर पाता।
सभायां न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम्।
अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ 10 ॥
यदि सभ्य-न्यायाधिकरण के सदस्य-में सत्य बोलने का साहस नहीं है,
तो उसे सभा (न्यायालय) में जाना ही नहीं चाहिए। न्यायालय में गये सभ्य का तो
नारदस्मृति / 55

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यह कर्तव्य हो जाता है कि उसे सदैव अपने को उचित एवं शुद्ध प्रतीत होने वाला
अपना मत अवश्य ही प्रकट करना चाहिए; क्योंकि सभा में जाकर व अनुचित होता
देखकर मौन रहने वाला, अर्थात् कुछ न कहने वाला अथवा अनुचित बोलने वाला
सभ्य तो पाप और अपयश का भागी बनता है।
टिप्पणी—सभ्य—न्यायाधिकरण के सदस्य—की नियुक्ति की ही इसलिए
जाती है कि वह अन्याय का उन्मूलन तथा न्याय का संरक्षण करे। यदि किसी
व्यवहार में सभ्य को वादी अथवा प्रतिवादी के विरुद्ध अनुचित को अनुचित कहने
का साहस नहीं है, तो उसके लिए न्याय के मन्दिर में प्रविष्ट होना ही पाप है। सत्य
तो यह है कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथा अनुचित के निरसन के साहस से विहीन व्यक्ति
को सभ्य बनने का कोई अधिकार ही नहीं है। असहाय भाष्यकार के अनुसार—जो
सभ्य न्यायालय में जाकर, व्यवहार के परीक्षण के समय पूरा ध्यान न देकर और
पूर्ण सतर्क न रहकर, अपना ध्यान इधर-उधर लगाते हैं अथवा बातचीत करते
अथवा काग़ज़-पत्र देखने में लग जाते हैं अथवा चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठे रहते
हैं, वादी-प्रतिवादी के बयान को सुनते ही नहीं, सच्चे-झूठे की पहचान ही नहीं
करते, राजा को ऐसे सभ्यों को अयोग्य समझते हुए अपने पद से तत्काल हटा देना
चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि जिस प्रकार सत्य को छिपाने वाले मिथ्याभाषी
कहलाते हैं, उसी प्रकार असत्य को न पकड़ने वाले न्यायाधीश भी मिथ्यावादी हैं
और दोनों एक प्रकार से दण्ड के भागी हैं।
ये सभ्या अधर्मविच्छेदस्थानभूतां सभां प्राप्य वादिप्रतिवादिनोः
सन्देहविच्छेदनार्थिनोरपि अन्यकार्यव्यासक्ता इव किञ्चिदन्यदेव कार्यान्तरं
ध्यायन्त इव तूष्णीं तथा आसते तिष्ठन्ति, एकस्य जयं द्वितीयस्य पराजय-
मवसरप्राप्तमपि न ब्रुवते, ततस्ते सर्वेऽपि अनृतवादिसमाना राज्ञा द्रष्टव्याः।
अनृतवादिविनययोग्याश्च।
ये तु सभ्याः सभां प्राप्त तूष्णीं ध्यायन्त आसते।
यथा प्राप्तं न ब्रुवते सर्वे तेऽनृतवादिनः ॥ 11 ॥
उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि इस पद्य में की गयी है—न्यायालय में आकर 'मिट्टी
के माधो' बनकर चुपचाप बैठे रहने वाले अथवा उपयुक्त अवसर पर यथार्थ—सत्य
को सत्य और असत्य को असत्य—न कहने वाले न्यायाधिकरण के सभी सदस्यों
को भी मिथ्यावादी समझना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को आचारभ्रष्ट एवं कर्तव्य-
च्युत मानकर अपने पद से तत्काल हटा देना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को न्याय के
आसन पर बैठने का कोई अधिकार ही नहीं। न्यायाधिकरण के सदस्यों को तो
अत्यन्त सतर्क होकर, न केवल वादी-प्रतिवादी के वक्तव्य को सुनना चाहिए,
अपितु उनकी मुखमुद्रा और हाव-भावों का भी गहन निरीक्षण करते हुए उनकी
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पादोऽधर्मस्य कर्त्तारं पादः साक्षिणमृच्छति।

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वास्तविकता को समझने का प्रयास करना चाहिए।
पादोऽधर्मस्य कर्त्तारं पादः साक्षिणमृच्छति।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १२ ॥
न्यायाधिकारियों के प्रमाद, पक्षपात, उपेक्षा अथवा अन्यमनस्कता के कारण
उनके द्वारा किये गये ग़लत निर्णय के फलस्वरूप जब सत्य और न्याय की पराजय
तथा असत्य और अन्याय की विजय होती है, तो चार चरणों वाले धर्म के एक
चरण को खण्डित करने का पाप स्वयं पापाचरण करने वाले व्यक्ति को, द्वितीय
चरण को खण्डित करने का पाप साक्षी (मिथ्या साक्ष्य भरने वाला) को, तृतीय
चरण को क्षतिग्रस्त करने का पाप न्यायाधिकारियों को और चतुर्थ चरण को
खण्डित करने का पाप स्वयं राजा को लगता है और इन सबको अपने-अपने भाग
के पाप का दण्ड भुगतना पड़ता है।
अभिप्राय यह है कि अपने कर्तव्य का सम्यक् निर्वाह न करने वाले सभ्य-
न्यायाधिकरण के सदस्य- अपने अपराध के कारण स्वयं तो डूबते ही हैं, अपनी
नियुक्ति के रूप में अपने को अनुगृहीत करने वाले अपने स्वामी राजा (आज के
समय राष्ट्रपति अथवा विधिमन्त्री) को भी अपने साथ ले डूबते हैं, उन्हें भी
कलंकित और नरकगामी बनाते हैं।
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्त्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥ १३ ॥
इस सबके विपरीत न्यायाधिकारियों की सजगता, नीर-क्षीर-विवेकक्षमता
तथा एकाग्रता के कारण जहां अपराधी को ही अपराधी घोषित किया जाता है और
निर्दोष को मिथ्या आरोप से मुक्त किया जाता है, वहां कर्ता ही अपने सारे पाप का
दण्ड भुगतता है, न साक्षी, न ही न्यायाधिकारी और न ही राजा, कर्ता को उसके
पाप के मिलने वाले दण्ड के सहभागी होते हैं।
अभिप्राय यह है कि न्यायाधिकारियों की सजगता न केवल स्वयं उन्हें,
अपितु राजा को और साक्षी को भी दण्डमुक्त करती है। इस प्रकार उन पर अपने
कर्तव्य-निर्वहण का तिगुना भार और दायित्व है, जिसमें कोताही का अर्थ अपने
साथ दूसरों को भी ले डूबना है।
अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति निरपेक्षः सकण्टकान् ।
परोक्षमर्थवैकल्याद् भाषते यः सभां गतः ॥ १४ ॥
जिस प्रकार अन्धा व्यक्ति मछली में विद्यमान कांटे को न देख-निकाल पाने
के कारण कांटे-सहित मछली को खाने से कण्ठ में धंसे कांटे से असीम वेदना-
यहां तक कि मृत्यु-का पात्र बनता है, उसी प्रकार शास्त्रज्ञानविहीन व्यक्ति भी
नारदस्मृति / 57

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लोकन्यायपालिका का सदस्य नियुक्त किये जाने पर, अपनी नीर-क्षीर -विवेकशक्ति
के अभाव के कारण मनमानी करने से निन्दा, हास्य तथा अपमान का पात्र बनने के
साथ, साथ घोर पाप का भागी भी बनता है।
अभिप्राय स्पष्ट है कि राजा को योग्य एवं अधिकारी व्यक्ति को ही सभ्य के
रूप में नियुक्त करना चाहिए। राजा को इस सम्बन्ध में विशेष सतर्क रहने की
आवश्यकता है; क्योंकि उसे यह ज्ञात होना चाहिए कि अनुपयुक्त व्यक्ति द्वारा किये
गये अनीतिपूर्ण निर्णय के पाप के चतुर्थांश का भागी वह स्वयं (राजा) भी होता है।
अतः अनजाने में अपने खाते में जमा होने वाले पाप से बचने के लिए सदस्यों की
नियुक्ति के प्रति सावधान रहने में ही उसका अपना हित है।
नीतिशास्त्र के अनुसार- शास्त्रज्ञान ही मनुष्य के सच्चे नेत्र हैं, जिनके अभाव
में व्यक्ति चक्षुष्मान् होता हुआ भी अन्धा ही है।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।
जिस प्रकार व्यक्ति नेत्रों से देखकर वस्तु की ग्राह्यता-अग्राह्यता का निर्णय
करता है, उसी प्रकार शास्त्र से ही शुद्ध-अशुद्ध का, उपयुक्त-अनुपयुक्त का तथा
धर्म-अधर्म का निर्णय होता है। शास्त्रसम्मत धर्म है और शास्त्रविरुद्ध अधर्म है।
इस प्रकार शास्त्र-ज्ञान से ही सत्य-असत्य का परिचय प्राप्त होता है। इसी शास्त्र-
ज्ञान से प्राप्त करणीय-अकरणीय के विवेक को तीसरा नेत्र (सभी प्राणियों के दो
चर्मचक्षु होते हैं, अतः प्रज्ञा अथवा विवेक को तीसरी आंख) भी कहा जाता है।
इसी तीसरी आंख को खोलने पर, अर्थात् विवेक के जाग्रत होने पर शिव ने अपने
को घेरने आये कामदेव को भस्म कर दिया था। कुमारसम्भव के अनुसार-
क्रोधं प्रभो संहर संहरेति यावद्गिरः खे परितः चरन्ति।
तावत्स वह्निः भवनेत्रजन्मा चकार भस्मं मदनं हि तत्क्षणम्॥
तस्मात्सभ्यः सभां प्राप्य रागद्वेषविवर्जितः।
वचस्तथाविधं ब्रूयाद्यथा न नरकं व्रजेत्॥ 15॥
सभ्यों को लोकसभा में जाने पर राग द्वेष, अनुग्रह-निग्रह अथवा रोष-
आक्रोश आदि से सर्वथा मुक्त होकर पूर्णतः निष्पक्ष एवं तटस्थ भाव से व्यवहार को
सुनना तथा पक्ष-विपक्ष में निर्णय देना चाहिए। उदासीन भाव से न्याय करने वाला
सभ्य कभी नरकगामी नहीं बनता।
यथा शल्यं भिषग् विद्वानुद्धरेद् यन्त्रशक्तितः।
प्राड्विवाकस्तथा शल्यमुद्धरेद् व्यवहारतः॥ 16॥
जिस प्रकार कुशल चिकित्सक किसी प्राणी के शरीर में धंसे कांटे को
निकालने के लिए यन्त्र (नुकीली शलाका) का प्रयोग करता है, उसी प्रकार सभ्यों
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