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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 45 of 304

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प्रमाण-वर्जित दोष वह होता है, जिसमें न तो द्रव्य (रुपया-पैसा अथवा
स्वर्ण, रत्न आदि अन्य मूल्यवान् वस्तु) का कोई लिखित प्रमाण होता है और न ही
उसके परिमाण की कोई निश्चित जानकारी होती है। इस प्रकार लेख्य-दोष के
कारण ऐसा अभियोग भी चलने योग्य नहीं होता।
आगमवर्जितं दोषं पूर्ववादे विवर्जयेत्।
एकस्य बहुभिः सार्धं पुरराष्ट्रविरोधकम् ॥ 12 ॥
आगम-वर्जित दोष का अर्थ है—एक के हित के विरुद्ध बहुतों के हित का
जुड़ा होना, अर्थात् व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष, दूसरे शब्दों में व्यक्ति के व्यवहार
का जाति, समाज, नगर और देश के हितों के विरुद्ध होना। कहने की आवश्यकता
नहीं कि ऐसा अभियोग न्यायशास्त्र और लोक-विरुद्ध होने से तत्काल, प्रथम दृष्टि
में ही निरस्त होने योग्य होता है।
बिन्दुमात्राविहीना वा पदवर्णविदुष्टा वा।
हीनाधिका भवेद् व्यर्थी तां यत्नेन विवर्जयेत् ॥ 13 ॥
हीन और अधिक वे दोष हैं, जब अभियोग-पत्र की भाषा में विसर्ग, मात्रा
आदि न लगे हों, अल्पविराम, पद और वर्ण के अभाव हों, जिससे मनमाना अर्थ
निकलता हो, ऐसा अभियोग भी महत्त्वहीन हो जाता है। उदाहरणार्थ, 'पुत्री न
पुत्रः' को 'पुत्री, न पुत्रः' लिखने में अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-भेद हो
जाता है। अभियोग-पत्र में भी इस प्रकार से विराम आदि का यथोचित ध्यान न
रखने से अर्थ-भेद हो जाता है। लोक में भी अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-
भेद का बहुप्रचलित उदाहरण है—'रोको, मत जाने दो', 'रोको मत, जाने दो'।
भ्रष्टं तु दुःखितं यत्स्याज्जलतैलादिभिर्हतम्।
भाषायां तदपि स्पष्टं विस्पष्टार्थं विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
भ्रष्ट-दोष से अभिप्राय है—अभियोग-पत्र का तेल आदि चिकने पदार्थों से,
रेत-मिट्टी आदि मलिन पदार्थों से दूषित तथा पानी से भीगा होना तथा अक्षरों का
कटा-फटा होना, अर्थात् सुवाच्य न रह पाना। ऐसा व्यवहार भी विचारणीय नहीं
रह पाता।
सत्या भाषा न भवति यद्यपि स्यात् प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद् भ्रश्यते धर्मान्नियताद् व्यवहारिकात् ॥ 15 ॥
यदि अभियोग-पत्र की भाषा-शैली शुद्ध, स्वच्छ, दोषरहित, सरल और
सुबोध होने पर भी अभियोग का विषय लोक-प्रचलित एवं व्यवहार में शुद्ध एवं
उपयोगी होने से सर्वमान्य धर्म के अनुकूल (सम्मत) नहीं, तो भी ऐसा अभियोग
अनुमत (Admit) नहीं होता, अपितु प्रथम दृष्टि में ही निरस्त हो जाता है।
गन्धमादनसंस्थस्य मयास्यासीत्तदर्पितम्।
व्यावहारिकधर्मस्य बाह्यमेतन्न सिध्यति ॥ 16 ॥
नारदस्मृति / 43