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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 58 of 304

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यह कर्तव्य हो जाता है कि उसे सदैव अपने को उचित एवं शुद्ध प्रतीत होने वाला
अपना मत अवश्य ही प्रकट करना चाहिए; क्योंकि सभा में जाकर व अनुचित होता
देखकर मौन रहने वाला, अर्थात् कुछ न कहने वाला अथवा अनुचित बोलने वाला
सभ्य तो पाप और अपयश का भागी बनता है।
टिप्पणी—सभ्य—न्यायाधिकरण के सदस्य—की नियुक्ति की ही इसलिए
जाती है कि वह अन्याय का उन्मूलन तथा न्याय का संरक्षण करे। यदि किसी
व्यवहार में सभ्य को वादी अथवा प्रतिवादी के विरुद्ध अनुचित को अनुचित कहने
का साहस नहीं है, तो उसके लिए न्याय के मन्दिर में प्रविष्ट होना ही पाप है। सत्य
तो यह है कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथा अनुचित के निरसन के साहस से विहीन व्यक्ति
को सभ्य बनने का कोई अधिकार ही नहीं है। असहाय भाष्यकार के अनुसार—जो
सभ्य न्यायालय में जाकर, व्यवहार के परीक्षण के समय पूरा ध्यान न देकर और
पूर्ण सतर्क न रहकर, अपना ध्यान इधर-उधर लगाते हैं अथवा बातचीत करते
अथवा काग़ज़-पत्र देखने में लग जाते हैं अथवा चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठे रहते
हैं, वादी-प्रतिवादी के बयान को सुनते ही नहीं, सच्चे-झूठे की पहचान ही नहीं
करते, राजा को ऐसे सभ्यों को अयोग्य समझते हुए अपने पद से तत्काल हटा देना
चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि जिस प्रकार सत्य को छिपाने वाले मिथ्याभाषी
कहलाते हैं, उसी प्रकार असत्य को न पकड़ने वाले न्यायाधीश भी मिथ्यावादी हैं
और दोनों एक प्रकार से दण्ड के भागी हैं।
ये सभ्या अधर्मविच्छेदस्थानभूतां सभां प्राप्य वादिप्रतिवादिनोः
सन्देहविच्छेदनार्थिनोरपि अन्यकार्यव्यासक्ता इव किञ्चिदन्यदेव कार्यान्तरं
ध्यायन्त इव तूष्णीं तथा आसते तिष्ठन्ति, एकस्य जयं द्वितीयस्य पराजय-
मवसरप्राप्तमपि न ब्रुवते, ततस्ते सर्वेऽपि अनृतवादिसमाना राज्ञा द्रष्टव्याः।
अनृतवादिविनययोग्याश्च।
ये तु सभ्याः सभां प्राप्त तूष्णीं ध्यायन्त आसते।
यथा प्राप्तं न ब्रुवते सर्वे तेऽनृतवादिनः ॥ 11 ॥
उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि इस पद्य में की गयी है—न्यायालय में आकर 'मिट्टी
के माधो' बनकर चुपचाप बैठे रहने वाले अथवा उपयुक्त अवसर पर यथार्थ—सत्य
को सत्य और असत्य को असत्य—न कहने वाले न्यायाधिकरण के सभी सदस्यों
को भी मिथ्यावादी समझना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को आचारभ्रष्ट एवं कर्तव्य-
च्युत मानकर अपने पद से तत्काल हटा देना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को न्याय के
आसन पर बैठने का कोई अधिकार ही नहीं। न्यायाधिकरण के सदस्यों को तो
अत्यन्त सतर्क होकर, न केवल वादी-प्रतिवादी के वक्तव्य को सुनना चाहिए,
अपितु उनकी मुखमुद्रा और हाव-भावों का भी गहन निरीक्षण करते हुए उनकी
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