नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextनिम्नोक्त पांच को हीन (पराजित) मानना चाहिए—
प्रथम, अन्यवादी—पूछे गये प्रश्नों से उत्तर का कुछ भिन्न होना, अर्थात्
मूल विषय पर स्थिर न रहकर इधर-उधर की प्रयोजन-रहित हांकने वाला।
द्वितीय, क्रियाद्वेषी—अपने ही साक्षी के साक्ष्य का विरोध करने वाला,
साक्षी के मन्तव्य का खण्डन करने वाला।
तृतीय, नोपस्थाता—सूचना प्राप्त होने पर भी निर्धारित तिथि और समय पर
न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होने वाला।
चतुर्थ, निरुत्तर—न्यायाधिकरण द्वारा पूछे गये प्रश्नों का सन्तोषजनक ढंग
से उत्तर न देने वाला, मौन धारण करने वाला अथवा 'मालूम नहीं' आदि भाषा
बोलने वाला।
पञ्चम, आहूतप्रपलायी—आह्वान-पत्र (समन) को ही न लेने वाला, भाग
खड़ा होने वाला अथवा झूठ बोलकर या घूस देकर अपना बचाव करने वाला।
मणयः पद्मरागाद्याः दीनारादि हिरण्मयम्।
मुक्ताविद्रुमशंखाद्याः प्रदुष्टाः स्वामिगामिनः ॥ 34 ॥
यदि कृत्रिम पद्मराग आदि मणियों, दीनार आदि मुद्राओं, स्वर्ण, मुक्ता, विद्रुम
आदि रत्नों तथा शंखों को अकृत्रिम बताकर बेचने वाला व्यापारी ग्राहक द्वारा
वास्तविकता को जानकर लौटाने का अनुरोध किये जाने पर नक़ली सामान लेकर
असली सामान दे देता है, तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिए। यदि वह नक़ली सामान
वापस लेने और असली सामान देने से मुकरता है, तो उसे इस प्रकार से दण्डित
करना चाहिए कि वह अपनी धूर्तता को दोहराने का दुस्साहस ही न कर सके।
गन्धमाल्यमदत्तं तु भूषणं वास एव वा।
पादुकेति राजोक्तं तदाक्रामन् वधमर्हति ॥ 35 ॥
राजा से परितोष-प्रसाद-रूप में राजा की अनुमति-प्राप्त किये बिना राजा
के उपयोग में आने वाले गन्ध—इत्र, फुलेल (फ़ेसक्रीम, टेल्कम पाउडर आदि)
माला, अलंकार (आभूषण) वस्त्र तथा पादुका (जूता)—आदि का उपयोग करने
वाला दण्ड के योग्य होता है।
पण्यमूल्यं भृतिर्न्यासो दण्डो यच्चावहारिकम्।
वृथादानाक्षिकपणा वर्धन्ते नावविक्षिताः ॥ 36 ॥
निम्नोक्त सात प्रकार के धनों में—कितना भी समय क्यों न बीत जाये—किसी
प्रकार की बढ़ोत्तरी—ब्याज, अतिरिक्त लाभ आदि के रूप में—नहीं हो सकती।
(1) किसी वस्तु को बेचने पर प्राप्त होने वाला दाम, (2) श्रम करने पर मिलने
वाला भत्ता अथवा पारिश्रमिक, (3) धरोहर के रूप में रखा गया धन अथवा स्वर्ण
आदि, (4) सरकारी जुर्माना—अर्थ-दण्ड के रूप में देय धन, (5) बेकार पड़ी
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