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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 55 of 304

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Page 55

राजा तु धार्मिकान् सभ्यानियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान्।
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः सद्गवा इव॥ 4 ॥
जिस प्रकार भार ढोने में समर्थ, स्वस्थ, सबल एवं हृष्ट-पुष्ट बैलों को ही
गाड़ी में जोतने से गाड़ी वेग से चलती है, उसी प्रकार राजा को न्याय-प्रक्रिया को
सुव्यवस्थित एवं न्यायसंगत ढंग से चलाने के लिए भली प्रकार सुपरीक्षित, धर्मात्मा,
शुचि, निर्लोभ, राग-द्वेष से मुक्त, समाज में प्रतिष्ठित एवं सच्चरित्र विधिशास्त्रियों
की ही न्यायाधिकरण के सदस्यों के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए।
धर्मशास्त्रार्थकुशलाः कुलीनाः सत्यवादिनः।
समा शत्रौ च मित्रे च नृपतेः स्युः सभासदः ॥ 5 ॥
न्यायाधिकरण के सदस्यों की अर्हता-पात्रता के सम्बन्ध में स्मृतिकार ने पांच
विशेषताओं का उल्लेख किया है—

  1. धर्मशास्त्र में निपुणता।
  2. न्याय-प्रक्रिया में विदग्धता।
  3. कुलीनता।
  4. सत्यवादिता तथा
  5. मित्र-शत्रु के प्रति समान व्यवहार।
    टिप्पणी—धर्मशास्त्रों, स्मृतितन्त्रों व ऋषियों के वचनों में अनेक सांकेतिक
    तथा पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग रहता है, जिनके गूढ़ अर्थों को समझना सर्वसाधारण
    के लिए अत्यन्त कठिन होता है। अतः सभ्य (सभासद) के लिए विद्वत्ता के साथ-
    साथ विदग्धता का होना भी आवश्यक है, अन्यथा मन्दमति व्यक्ति शास्त्र-वचन के
    अर्थ का अनर्थ करके सारी न्याय-व्यवस्था को ही प्रभावित-दूषित कर सकता है।
    न्याय-प्रक्रिया में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार की प्रबल सम्भावना रहती है। कुलीन
    व्यक्ति अपने अभिजात्य संस्कारों, उच्च परम्पराओं, शिक्षा तथा परिवेश आदि के
    प्रभाव से अन्याय-पथ पर चलने से घबराता है, जबकि संस्कारों से वर्जित व्यक्ति
    प्राप्त अवसर का लाभ उठाने को ही महत्त्व देता है। इसी प्रकार स्वभाव से सत्य
    बोलना तथा किसी के प्रति राग-द्वेषवश मित्र-शत्रु-भाव न रखना भी न्याय-
    प्रक्रिया की महत्त्वपूर्ण अपेक्षा है।
    महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार—देश-विशेष तथा काल-विशेष में प्रचलित
    प्रथाओं एवं परम्पराओं के ज्ञान को धर्मशास्त्र के ज्ञान के अन्तर्गत समझना चाहिए।
    इसके अतिरिक्त लौकिक सत्य की रक्षा के अन्तर्गत विवेकशीलता—सत्य और
    असत्य में अन्तर करने की योग्यता—भी सभ्यों की नियुक्ति के लिए एक अपेक्षित
    गुण है।
    नारदस्मृति / 53