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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सप्तम अंक । १४७

सप्तम अंक । १४७

कैसे करिहैं मित्र पै, हम निज कर सों घात ।
अहो भाग्य गति अति प्रबल, मोहि कछु जानि न जात ॥
( प्रकाश अच्छा विष्णुगुप्त ! मगाओ खड्ग “नमस्सर्व्वकार्य्यप्रतिपत्तिहेतवे सुहृत्स्नेहाय ” देखो, मै उपस्थित हूं ।
चाणक्य ।—( राक्षस को खड्ग दे कर हर्ष से ) राजन वृषल ! ५
बधाई है बधाई है । अब अमात्य राक्षस ने तुम पर अनुग्रह किया । अब तुम्हारी दिन दिन बढ़ती ही है ।
राजा ।—यह सब आप की कृपा का फल है ।
( पुरुष आता है । )
पुरुष ।—जय हो महाराज की, जय हो । महाराज ! भद्रभट १०
भागुरायणादिक मलयकेतु को हाथ पैर बाध कर लाए है और द्वार पर खड़े हैं, इस मे महाराज का क्या आज्ञा होती है ?
चाणक्य ।—हा, सुना । अजी ! अमात्य राक्षस से निवेदन करो, अब सब काम वही करेंगे । १५
राक्षस ।—(आप ही आप) कैसे अपने वश मे कर के मुझी से कहलाता है । क्या करै ? ( प्रकाश ) महाराज, चन्द्रगुप्त ! यह तो आप जानते ही हैं कि हम लोगों का मलयकेतु का कुछ दिन तक सम्बन्ध रहा है । इस से उस के प्राण तो बचाने ही चाहिए । २०
राजा ।—( चाणक्य का मुह देखता है )
चाणक्य ।--महाराज ! अमात्य राक्षस का पहिली बात तो सर्व्वथा माननी ही चाहिये ( पुरुष से ) अजी ! तुम भद्रभटादिको से कह दो कि “अमात्य राक्षस के कहने से महाराज चन्द्रगुप्त मलयकेतु को उस के पिता २५

१४८ मुद्राराक्षस -

का राज्य देते हैं” इस से तुम लोग खग जा कर उस को राज पर बिठा आश्रो।
पुरुष ।—जो आज्ञा।
चाणक्य ।—अजी अभी ठहरो, सुनो ! विजयपाल दुर्गपाल से यह कह दो कि अमात्य राक्षस के शस्त्र ग्रहण से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त यह आज्ञा करते हैं कि “चन्दनदास को सब नगरो का जगत्सेठ कर दो।”
पुरुष ।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त ! अब और मै क्या तुम्हारा प्रिय करू ?
१० राजा ।—इस से बढ़ कर और क्या भला होगा ?

मैत्री राक्षस सों भई, मिल्यौ अकटक राज।
नन्द नसे सब अब कहा, यासो बढि सुखसाज ॥

चाणक्य ।—(प्रतिहारी से) विजये ! दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि “अमात्य राक्षस क मेल से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा करते हैं कि हाथी, घोड़ो को छोड कर और सब बन्धुओ का बन्धन छोड़ दो” वा जब अमात्य राक्षस मन्त्री हुए तब अब हाथी घोड़ो का क्या सोच है ? इस से—

छोड़ौ सब गज तुरग अब, कछु मत राखौ बाधि।
२० केवल हम बाधत सिखा, निज प्रतिज्ञा साधि ॥
(शिखा बाघता है)

प्रतिहारी ।—जो आज्ञा (जाती है)।
चाणक्य ।—अमात्य राक्षस ! मै इस से बढ़ कर और कुछ भी आप का प्रिय कर सकताहूँ ?