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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

प्रथम अङ्क । ४६

प्रथम अङ्क । ४६

चाणक्य ।—शारङ्गरव !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरु जी !
चाणक्य ।—देख तो यह कैसी भीड़ है ।
शिष्य ।—( बाहर जाकर फिर आश्चर्य से आकर ) महाराज !
शकटदास को सूली पर से उतार कर सिद्धार्थक लेकर भाग गया । ५
चाणक्य ।— ( आप ही आप ) वाह सिद्धार्थक ! काम का
आरम्भ तो किया ( प्रकाश ) हैं क्या ले गया ? ( क्रोध से )
बेटा ! दौड़ कर भागुरायण से कहो कि उस को
पकड़े । १०
शिष्य ।—( बाहर जाकर आता है ) ( विषाद से ) गुरुजी !
भागुरायण तो पहिले ही से कही भाग गया है ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) निज काज साधने के लिये जाय
( क्रोध से प्रकाश ) भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुराज, बलगुप्त
राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्म्मा से कहो कि दुष्ट १५
भागुरायण को पकड़े ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आकर विषाद से )
महाराज ! बड़े दुःख की बात है कि सब बेड़े का बेड़ा
हलचल हो रहा है । भद्रभट इत्यादि तो सब पिछली
ही रात भाग गये । २०
चाणक्य ।—( आप ही आप ) सब काम सिद्ध करै ( प्रकाश )
बेटा, सोच मत करो ।
जे बात कछु जिय धारि भागे भले सुख सों भागहीं ।
जे रहे तेह जाहि तिन को, सोच मोहि जिय कछु नही ॥
सत सैन हूं सो अधिक साधिनि, काज की जेहि जग कहै । २५
सो नन्दकुल की खननहारी, बुद्धि नित मो मै रहै ॥

५०
मुद्राराक्षस—

(उठ कर और आकाश की ओर देख कर) अभी भद्रभटादिकों को पकड़ता हूं (आप ही आप) राक्षस ! अब मुझ से भाग के कहा जायगा, देख—

एकाकी मद्गलित गज, जिमि नर लावहि बाधि।
५ चन्द्रगुप्त के काज मे, तिमि तोहि धरि है साधि॥

(सब जाते हैं)—(जवनिका गिरती है)

इति प्रथमांक

द्वितीय अंक ।

स्थान—राजपथ

( मदारी आता है )

**मदारी।—**अललललललल, नाग लाये सांप लाये ।
तन्त्र युक्ति सब जानही, मण्डल रचहि विचार ।
मन्त्र रक्षही ते करहि, अहि नृप को उपचार ॥

( * आकाश मे देख कर ) महाराज ! क्या कहा ? तू कौन है ? महाराज ! मै जीर्णविष नाम सपेरा हूं (फिर आकाश की ओर देख कर ) क्या कहा कि मै भी साप का मन्त्र जानता हूं खेलूंगा ? तो आप काम क्या करते हैं, यह तो कहिये ?
(फिर आकाश की ओर देख कर ) क्या कहा—मै राजसेवक हूं ? यो आप तो साप के साथ खेलते ही है । (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा, कैसे ? मन्त्र और जड़ी बिन मदारी और अंकुस बिन मतवाले हाथी का हाथीवान, वैसे ही नये अधिकार के संग्रामविजयी राजा के सेवक—ये तीनों अवश्य नष्ट होते हैं (ऊपर देख कर ) यह देखते २ कहा चला गया ? (फिर ऊपर देख कर ) क्या महाराज ! पूछते हो कि इन पिटारियों मे क्या है ? इन पिटारियों मे मेरी जीविका के सर्प हैं। (फिर ऊपर देख कर ) क्या कहा कि मै देखूंगा ? वाह वाह महाराज ! देखिये देखिये, मेरी बोहनी हुई, कहिये इसी स्थान पर खोलूं ? परन्तु यह स्थान अच्छा नही


* आकाश में देख कर' या 'ऊपर देख कर' का आशय यह है मानो दूसरे से बात करता है।

५२ मुद्राराक्षस -

है, यदि आप को देखने की इच्छा हो तो आप इस स्थान मे
आइये मै दिखाऊ (फिर आकाश की ओर देख कर) क्या
कहा कि यह स्वामी राक्षस मन्त्री का घर है, इस मे मै घुसने
न पाऊ गा, तो आप जाय, महाराज ! मै तो अपनी जीविका के
५ प्रभाव से सभी के घर जाता आता हू। अरे क्या वह गया
(चारो ओर देख कर) अहा, बडे आश्चर्य की बात है, जब मै
चाणक्य की रक्षा मे चन्द्रगुप्त को देखता हू तब समझता हू कि
चन्द्रगुप्त ही राज्य करैगा, पर जब राक्षस की रक्षा मे मलयकेतु
को देखता हूं तब चन्द्रगुप्त का राज गया सा दिखाई देता है।
१० क्योंकि—

चाणक्य ने लै जदपि बाधी बुद्धिरूपी डोर सों।
करि अचल लक्ष्मी मौर्यकुल मै नीति के निज जोर सों।
पै तदपि राक्षस चातुरी करि हाथ मे ताकों करै।
गहि ताहि खींचत आपुनी दिसि मोहि यह जानी परै।

१५ सो इन दोनो परम नीतिचतुर मन्त्रियों के विरोध मे नन्द-
कुल की लक्ष्मी संशय मे पडी है

दोऊ सचिव विरोध सों, जिमि वन जुग गजराय।
हथिनी सी लक्ष्मी बिचल, इत उत झोंका खाय॥

तो चलू अब मन्त्री राक्षस से मिलू।
२० (जवनिका उठती है और आसन पर बैठा राक्षस और पास
प्रियम्बदक नामक सेवक दिखाई देते हैं)

राक्षस।— (ऊपर देखकर आखो मे आस भरकर) हा ! बड़े
कष्ट की बात ह—

गुन नीति बलसों जीति अरि, जिमि आपु जादवगन हयो।
२५ तिमि नन्द को यह बिपुल कुल, बिधि बाम सों सब नसि गयो॥
एहि सोच मै मोहि दिवस अरु निसि, नित्य जागत बीतही।
यह लखौ चित्र बिचित्र मेरे भाग के बिनु भीतही ॥