मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
द्वितीय अंक। ५३
द्वितीय अंक। ५३
अथवा
बिनु भक्तिमूले, बिनहि स्वारथ हेतु, हम यह पन लियो।
बिनु प्राण के भय, बिनु प्रतिष्ठा लाभ, सब अबलौ कियो॥
सब छोड़ि कै परदासता एहि हेत नित प्रति हम करैं।
जो स्वर्ग मै हूं स्वामि मम निज शत्रु हत लखि सुख भरै॥ ५
(आकाश की ओर देख कर दुख से) हा! भगवती लक्ष्मी!
तू बड़ी अगुणज्ञा है क्योंकि—
निज तुच्छ सुख के हेतु तजि, गुणरासि नन्द नृपाल कौं।
अब शूद्र मै अनुरक्त ह्वै लपटी सुधा मनु ब्याल कौं॥
ज्यों मत्त गज के मरत मद की धार ता साथहि नसै। १०
त्यों नन्द के साथहि नसी किन निलज अजहूं जग बसै॥
अरे पापिन!
का जग मै कुलवन्त नृप, जीवत रह्यौ न कोय?
जो तू लपटी शूद्र सों, नीच गामिनी होय॥
अथवा १५
वारवधू जन को अहै, सहजहि चपल सुभाव।
तजि कुलीन गुनियन करहि, ओछे जन सों चाव॥
तो हम भी अब तेरा आधार ही नाश किए देते हैं (कुछ सोचकर) हम मित्रवर चन्दनदास के घर अपना कुटुम्ब छोड़कर बाहर चले आए सो अच्छा ही किया। क्योंकि एक तो २० अभी कुसुमपुर को चाणक्य घेरा नहीं चाहता, दूसरे यहा के निवासी महाराज नन्द मे अनुरक्त है, इस से हमारे सब उद्योगों में सहायक होते हैं। वहा भी विषादिक से चन्द्रगुप्त के नाश करने को और सब प्रकार से शत्रु का दाव घात व्यर्थ करने को बहुत सा धन देकर शकटदास को छोड़ ही दिया २५ है। प्रतिक्षण शत्रुओं का भेद लेने को और उन का उद्योग
५४ मुद्राराक्षस—
नाश करने को भी जीवसिद्धि इत्यादि सुहृद नियुक्त ही है।
सो अब तो—
बिष वृक्ष, अहिसुत, सिंहपोत समान जा दुखरास कों।
नृपनन्द निजसुत जानि पाल्यो, सकुल निज असु नाश कों ॥
५ ता चन्द्रगुप्तहि बुद्धि सर मम तुरत मारि गिराइहै।
जो दुष्ट दैव न कवच बनिकै असह आड़े आइहै ॥
( कञ्चुकी आता है )
कञ्चुकी ।—( आप ही आप )
नृपनन्द काम समान चानक नीति जरजर जर भयो।
१० पुनि धर्म्म सम पुर देह सों नृप चन्द्र क्रम सों बढ़ि लयो ॥
अवकास लहि तोह लोभ राक्षस जदपि जीतन जाइहै।
पै सिथिल बल ने नाहि कोउ बिधि चन्द्र पै जय पाइहै ॥
(देखकर) यह मन्त्री राक्षस है ( आगे बढ़ कर ) मन्त्री !
आप का कल्याण हो।
१५ राक्षस ।—जाजलक ! प्रणाम करता हू। अरे प्रियम्बदक !
आसन ला।
प्रियम्बदक । (आसन ला कर) यह आसन है, आप बैठें।
कञ्चुकी ।—(बैठकर) मन्त्री, कुमार मलयकेतु ने आप को यह
कहा है कि “आप ने बहुत दिनों से अपने शरीर का सब
२० शृङ्गार छोड़ दिया है इस से मुझे बड़ा दुख होता है।
यद्यपि आप को अपने स्वामी के गुण नहीं भूलते और
उन के वियोग के दुख मे यह सब कुछ नहीं अच्छा
लगता तथापि मेरे कहने से आप इन को पहिरें।”
(आभरण दिखाता है) मन्त्री ! ये आभरण कुमार ने अपने
अङ्ग से उतार कर भेजे है, आप इन्हें धारण करें।
२५ राक्षस ।—जाजलक ! कुमार से कह दो कि तुम्हारे गुणों के
आगे मैं स्वामी के गुण भूल गया। पर—