मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
चतुर्थ अङ्क । ६६
चतुर्थ अङ्क । ६६
और भी—
जो नृप बालक सो रहत, सदा सचिव के गोद ।
बिन कछु जग देखे सुने, सो नहि पावत मोद ॥
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) तो हम अच्छे हैं, कि सचिव के अधिकार में नहीं ( प्रकाश ) अमात्य ! यद्यपि यह [५]
ठीक है तथापि जहा शत्रु के अनेक छिद्र हैं तहा एक इसी सिद्धि से सब काम न निकलैगा ।
**राक्षस ।—**कुमार के सब काम इसी से सिद्ध होंगे । देखिए,
चाणक्य को अधिकार छूट्यौ चन्दू है राजा नए ।
पुर नन्द में अनुरक्त तुम निज बल सहित चढते भए ॥ [१०]
जब आप हम—( कह कर लज्जा से कुछ ठहर जाता है )
तुव बस सकल उद्यम सहित रन मति करी ।
वह कौन सी नृप ! बात जो नहि सिद्धि ह्वै है ता घरी ॥
**मलयकेतु ।—**अमात्य ! जो अब आप ऐसा लड़ाई का समय देखते हैं तो देर कर के क्यों बैठे हैं ? देखिए— [१५]
इन को ऊंचो सीस है, बाको उच्च करार ।
श्याम दोऊ वह जल श्रवत, ये गण्डन मधु धार ॥
उते भँवर को शब्द इत, भँवर करत गुजार ।
निज सम तेहि लखि नास्ति हैं, दन्तन तोरि कुठार ॥
सीस सोन सिन्दूर सों, ते मतङ्ग बल दाप । [२०]
सोन सहज ही सोखि हैं, निश्चय जानहु आप ॥*
और भी ।
गरजि गरजि गभीर रव, बरसि बरसि मधुधार ।
सत्रु नगर गज घेरिहैं, घन जिमि बिबुध पहार ॥
(शस्त्र उठाकर भागुरायण के साथ जाता है) [२५]
* पटना घेरने में सोन उतर कर जाना था ।
१०० मुद्राराक्षस-
राक्षस। —कोई है?
[ प्रियम्बदक आता है ]
प्रियम्बदक। —आज्ञा !
राक्षस। —देख तो द्वार पर कौन भिक्षुक खड़ा है?
५ प्रियम्बदक। —जो आज्ञा [ बाहर जा कर फिर आता है
अमात्य ! एक क्षपणक भिक्षुक।
राक्षस। —( असगुन जान कर आप ही आप ) पहिले ही
क्षपणक का दर्शन हुआ।
प्रियम्बदक। —जीवसिद्धि नाम।
१० राक्षस। —अच्छा, बोलाकर ले आ।
प्रियम्बदक। —जो आज्ञा ( जाता है )
( क्षपणक आता है )
क्षपण। — पहिले कटु परिणाम मधु औषध सम उपदेस।
मोह व्याधि के वैद्य गुरु, तिनको सुनहु अदेस ॥
[ पास जाकर ] उपासक ! धर्म लाभ हो !
१५ राक्षस — जोतिषी जी, बताओ, अब हम लोग प्रस्थान किस
दिन करें ?
क्षपणक। —( कुछ सोच कर ) उपासक ! मुहूर्त्त तो देखा।
आज भद्रा तो पहर पहिले ही छूट गई है और तिथि भी
सम्पूर्णचन्द्रा पौर्णमासी है और आप लोगों को उत्तर से
२० दक्षिण जाना है और नक्षत्र भी दक्षिण ही है।
अथ ये सूरहि चन्द के, उदये गमन प्रशस्त ।*
पाइ लगन बुध केतु तौ, उदयो हू भो अस्त ॥
* भद्रा छूट गई अर्थात कल्याण को तो आप न जब चन्द्रगुप्त का पक्ष छोड़ा तभी छोड़ा और संपूर्ण चन्द्रा पौर्णमासी है अर्थात चन्द्रगुप्त का प्रताप पूर्ण व्याप्त है। उत्तर नाम प्राधान्य पक्ष छोड़ कर दक्षिण अर्थात् यम की दिशा को जाना है। नक्षत्र दक्षिण है अर्थात् आपका बाम ( विरुद्ध पक्ष ) नक्षत्र और आप का दक्षिण पक्ष [ मलयकेतु ] नक्षत्र [ बिना छत्र के ] है। अथए इत्यादि, तुम जो सूर हो उसकी