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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages
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करने दी। संसार की समग्र चीजों से मैं समग्र रूप से अलग हो गया। उसी बिंदू में मुझे परमानन्द की अनुभूति हुआ अर्थात उस आनन्द के पीछे ही मन बैठा हुआ था।

तब मैंने देखा, मैं शरीर नहीं हूँ। इन अवस्थाओं में अब एक वो आनन्द आ रहा था, आपने सुना होगा कि आत्मा आनन्द से परिपूर्ण है। यथार्थ में मैं आनन्द में था। अब मैंने कहा, शरीर की अनुभूति से ही पूरे दुख हैं, इसलिए जो भी भाव मन, शरीर हूँ, की तरफ लाता था, मैं वहीं पकड़ लेता था, यही मन है, अब बस हो चुकी है, अब अधिक धोखा नहीं, इसके बाद और कुछ नहीं।

‘मन को मार गगन चढ़ जाई।’ यह किसके द्वारा। मैंने एक चीज पकड़ी हुई थी, वरना मैं बहुत दूर बह जाता, वो था—नाम, जिसने मुझे इसके संकल्प, इसके भावों में, इसके बहाव में नहीं बहने दिया। उस बिंदू पर मैंने देखा, यही मौत है, यही काल है, इसलिए काल के अन्दर संसार के सभी जीव हैं। तब मैंने सोचा कि संसार के सभी जीव कितने बड़े धोखे में हैं। अब उसकी पूर्णता वहीं स्टाप कर दी। किसी भी आदमी को जब आप पूर्णरूप से जान जायेंगे, वो अपनी कला आपके साथ फिर नहीं करने वाला है, क्योंकि आपने उसे हकीकत में जान लिया है। पर इस बिंदु पर सब आदमी नहीं जा पायेंगे। अब आप सोचें, उसके बाद कैसी अनुभूति होगी। मैं शरीर में नीचे नहीं आता था। इसे विदेह मोक्ष कहते हैं। अर्थात—देह में विदेह दर्शै। अब विदेह पद को प्राप्त हो गया। जो इस चीज को जान जाता है, किसी भी समय मन पर विजय प्राप्त कर लेता है। अब वो अकाल हो गया, क्योंकि अब किसी भी देशकाल, अवस्था में मन से त्रुटि नहीं कर पाता है। समग्र विश्व इस मन के अन्दर है। तो मेरे भाई, यह कार्य बुद्धि से नहीं किया जा सकेगा। अब यह थी, नाम की महिमा।

साखियाँ और सब्द

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साखियाँ और सब्द


साखियाँ

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
हे हंसा तू अमर-लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

जीवात्मा को सम्बोधित करते हुए साहिब कह रहे हैं कि हे जीवात्मा ! यह मन ही निरंजन है, जो तुम्हें युगों-2 से भ्रमित कर रहा है। तू तो अमर-लोक का जीव है, वहाँ रहने वाला है, लेकिन काल-पुरुष (मन) के वश में तू आ गया है।

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
पाँच पसीच तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

साहिब स्पष्ट कह रहे हैं कि मन, जिसे निरंजन भी कहा जाता है, निराकार भी कहा जाता है, तुम्हें युगों-युगों से भटका रहा है। यह शरीर तो पिंजड़ा है, जिसमें निर्मल आत्मा को कैद कर दिया है, उसने।

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई ।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना ॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बँध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है, दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह

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में डालता है, उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है, पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे मुँह में डालता है और अंत में परम दुख को प्राप्त होता है। इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अंतिम सत्य मान बैठे हैं, उसी की तरफ जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुख को प्राप्त हो रहे हैं, क्योंकि वे आवागमन से नहीं छूट पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।

पलटू यह मन अधम है, चोरों से बड़ चोर।

गुन तजि ओगुन गहतु है, तातें बड़ा कठोर॥

पलटू साहिब कह रहे हैं कि यह मन बड़ा ही नीच है। यह तो चोरों से भी बड़ा चोर है। यह गुणों को छोड़कर अवगुणों को ही ग्रहण करता है, उन्हें ही पकड़ता है। इसी कारण से यह इतना कठोर हो गया है।

कबीर यह मन मसखरा, कहूँ तो मानै रोस।

जा मारग साहिब मिलै, तहाँ न चालै कोस॥

यह मन तो मसखरा है। अगर इसे डाँट दिया जाए तो नाराज हो जाता है। जिस राह पर परमात्मा की प्राप्ति होनी है, वहाँ तो एक कोस भी चलने को तैयार नहीं है।

कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गँवार।

भजन करन को आलसी, खाने को तैयार॥

यह मन बहुत लालची है, समझने से समझता नहीं है। भजन करने को तो यह आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।

यहु बन हरिया देखि करि, फूल्यौ फिरै गँवार।

दादू यह मन गिरगला, काल अहेड़ी लार॥

दादू दयाल जी कह रहे हैं कि संसार रूपी बन को हरा-भरा अर्थात् सुखमय समझकर मूर्ख लोग फूले-फूले फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं

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पता है कि मन अर्थात् काल रूपी शिकारी ने ही यहाँ पर सुखों के जाल बिछाकर रखे हैं।

मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधू कोई एक ॥

मन के कहे अनुसार कोई भी कार्य न करो, क्योंकि इस मन का कोई एक मत नहीं है। कभी यह मन कुछ कहता है, कभी कुछ। इसके अनेक मत हैं। लेकिन हमेशा ही यह मन शरीर के सुखों के अनुसार काम करने को ही कहता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए कोई काम करने को नहीं कहता। जो मन की आज्ञा का पालन न करते हुए मन को अपनी आज्ञानुसार चलाता है, ऐसा कोई बिरला ही साधू होता है।

सुर नर मुनि सबको ठगा, मनहिं लिया औतार।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥

साहिब कह रहे हैं कि इस मन ने सुर, नर, मुनि सबको ठगा है। यही मन संसार में अवतार धारण करके आता है। जो इससे बच जाए, वो इसके तीन लोक से छूटकर न्यारा हो जाता है।

कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाय।
भावै गुरु की भक्ति कर, भावै विषय कमाय ॥

साहिब कह रहे हैं कि यह मन तो एक है, एक ही जगह लगेगा। अब तो तेरी, इच्छा पर है। यदि तू चाहे तो इसे विषय विचारों में उलझा दे या फिर इसे गुरु चरणों में लगाकर गुरु की भक्ति कर।

मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइपे, मन ही के परतीत ॥

साहिब कह रहे हैं कि हम मन से हार मान लें तो हम हार जाते हैं और यदि हम मन से जीतने का विश्वास बना लें तो हम जीत भी सकते हैं। इसी तरह सच्चे प्रेम से भरोसा करने पर हम गुरु को भी पा सकते हैं

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अर्थात् मन से ही सब कुछ सम्भव है।

मन के बहुतक रंग हैं, छिन-छिन बदले सोय।

एक रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय ॥

इस मन के अनेक रंग हैं, जो समय-समय पर बदलते रहते हैं अर्थात् कभी तो यह मन अच्छा बन जाता है और कभी बहुत ही बुरा। पर जो हर समय एक ही रंग में रहे अर्थात् हर समय मन को अच्छाई पर ही लगाए रखे, वो कोई बिरला संत ही होता है।

मन पाँचों के वश पड़ा, मन के वश नहिं पाँच।

जित देखूँ तित दौं लगी, जित भागूँ तित आँच ॥

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। लेकिन फिर भी ये मन के वश में नहीं हैं, मन ही इन पाँचों के वश में है। काम मन पर सवार हो जाता है, क्रोध भी मन को ही आता है, अहंकार भी मन पर छाए रहता है। साहिब कहते हैं कि जहाँ देखता हूँ, जहाँ भागता हूँ, वहीं काम, क्रोध आदि की अग्नि जलती दिखाई देती है।

मना मनोरथ छाड़ि दे, तेरा किया न होय।

पानी में घी नीकसै, रुखा खाय न कोय ॥

मन की इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वो तो बिना पंख आकाश में उड़ना चाहता है। इसलिए आकांक्षाओं को त्याग दो, मन द्वारा की गयी आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीं होंगी। मन की इच्छाएँ तो कभी समाप्त ही नहीं होती हैं, इसलिए इन इच्छाओं को पूर्ण नहीं किया जा सकता। यदि जल का मंथन करने से घी निकल सकता तो रूखी रोटी कोई नहीं खाता। यदि मन की सारी इच्छाएँ पूर्ण की जा सकतीं तो संसार में कोई दुखी नहीं होता।

यह मन नीचा मूल है, नीचा कर्म सुहाय।

अमृत छाड़ै मान करि, विषहिं प्रीति करि खाय ॥

यह मन बड़ा ही निकृष्ट है, गन्दा है। गन्दे कार्यों में ही इसे मजा आता है। अमृत समान मीठा फल प्रदान करने वाले आत्म-कल्याण

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के कार्यों को तो अभिमान से त्याग देता है और ज़हर समान कड़वा फल प्रदान करने वाले गन्दे और अनात्म कार्यों से ही प्रेम करता है।

महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर ।
जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ॥

मन को अन्तःकरण में घेर कर दबा लो, मार लो। जब भी यह गलत जगह भागे, गलत इच्छाएँ करे तो गुरु के नाम का अंकुश लगाकर इसे ठीक जगह फेर दो।

सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार ।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥

इस मन ने मनुष्य, मुनिजन, देवतालोग सबको धोखा दिया है। मन ने ही अवतार धारण किये हैं और रक्षक बनकर सामने आया है। जो कोई इस मन के धोखे को समझकर इससे बचकर सद्गुरु की शरण में आ जाता है, वो तीन-लोक से न्यारा होकर चौथे-लोक (अमर-लोक) में चला जाता है।

बात बनाई जग ठग्यो, मन परमोधा नाहिं ।
कहैं कबीर मन लै गया, लख चौरासी माहिं ॥

पाप-पुण्य की बातों में उलझाकर मन सारे संसार को ठगता रहा है। इसे कोई भी समझ नहीं पाया। साहिब कहते हैं कि मन ने ही संसार के सब जीवों को चौरासी की धारा में डाला हुआ है।

यह काम परम-पुरुष (साहिब) का नहीं है। वो किसी को नहीं ठगता, किसी को कष्ट नहीं देता।

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥

जिस तरह बाजीगर बन्दर को साथ लेकर घर-घर नचाता फिरता है, इसी तरह मन रूपी बाजीगर भी जीवात्मा को बन्दर की तरह जैसा भी नाच चाहे, नचवा लेता है।

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काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय ।
कहैं कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥

साहिब कह रहे हैं कि मैंने तो बहुत समझाया कि मन रूपी काल जीव को खा रहा है, पर कोई मेरी बात को मान ही नहीं रहा है, अब मैं क्या करूँ !

कबीर यह मन लालची, समझौं नहीं गँवार ।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार ॥

यह मन बहुत लालची है, समझाने से समझता नहीं है। भजन करने में तो आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।

मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साथ ।
जो माने गुरु वचन को, ताका मता अगाध ॥

सारा संसार मन का दास है, जो जो मन कहता है, वो-वो ही करता जाता है..... उसी की आज्ञा में रहता है, पर गुरु का दास कोई बिरला साधु ही होता है। जो गुरु की आज्ञा को मानता हुआ चलता है, वो गंभीर विचार वाला है।

मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक ।
जो यह मन गुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक ॥

मन ही दाता बन जाता है, मन ही लालची बन जाता है, मन ही राजा समान हृदय वाला हो जाता है और मन ही कंजूस हृदय का बन जाता है। यदि यह मन गुरु में लग जाए तो निश्चय ही गुरु की प्राप्ति हो जाए।

मन चलता तन भी चलै, ताते मन को घेर ।
तन मन दोऊ बस करै, होय राई सुमेर ॥

मन के चलाने से ही शरीर चलता है, इसलिए मन को घेरकर काबू में कर। जब शरीर और मन दोनों बस में हो जायेंगे तो बहुत ऊँचा

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उठ जायेगा ।

मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास ।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, फिरि माया के पास ॥

यह मन तो पंछी की तरह है, जो कभी अच्छा बनकर आकाश में ऊँचा चला जाता है, पर दूसरे ही क्षण फिर नीचे आकर माया में लिपट जाता है.....गन्दा हो जाता है ।

जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर ।
सहजै हीरा नीपजै, जो मन आवै ठौर ॥

जितनी समुद्र में लहरे हैं, उतनी ही मन में इच्छाएँ हैं । बहुत ही चंचल है यह मन । यदि इच्छाएँ समाप्त होकर यह मन शान्त हो जाए तो आत्म-ज्ञान रूपी हीरा सहज ही प्राप्त हो जाए ।

पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हँसा भया, मोती चुनि चुनि खात ॥

गुरु का नाम मिलने से पहले तो यह मन कौवे की तरह था.....अन्य जीवों को मारता फिरता था, पर अब यह कौवे से हँस बन गया है.....ज्ञान रूपी मोती चुन-चुन कर खाता है ।

बिना सीस का मिरग है, चहुँ दिशि चरने जाय ।
बाँधि लगाओ गुरु ज्ञानसों, राखो तत्व समाय ॥

यह मन बिना सिर का पशु है, जो चारों ओर विषय-विकारों की घास चरता रहता है । इसे गुरु ज्ञान की रस्सी से बाँध कर नाम रूपी तत्व में लीन कर दो ।

धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर ।
तन फाटै को औषधी, मन फाटै नहिं ठौर ॥

धरती फट जाए तो जल बरसने से मिल जाती है, कपड़ा फट जाए तो धागे से मिला लिया जाता है, तन फट जाए तो औषध से ठीक हो जाता है, पर यदि मन फट जाए तब कोई रास्ता नहीं है.....फिर नहीं

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कबीर मन मरकट भया, कहूँ न नेक ठहराय ।
सत्य नाम बाँधे बिना, जित भावे तित जाय ॥

साहिब कहते हैं कि यह मन तो बन्दर की तरह उछल-कूद करने वाला है । यह कभी अच्छा बनकर नहीं रह सकता । सच्चे नाम से बाँधे बिना तो यह जहाँ दिल करे, चला जायेगा ।

सबद

सोई काल धरे औतारा

राम कृष्ण औतारी आहीं । भोगे कर्म जाड़ तन माहीं ॥
दस औतार निरंजन धरिया । सोऊ काल बस भौं में परिया ॥
सोई निरंजन सोई निरंकारा । सोई काल धरै औतारा ॥
कर्म भाव तिन देही पाई । करै भोग भौं में भरमाई ॥
सारा जग बेदन भरमैया । औतारी साँचे गोहरैया ॥
दीनदयाल पुरुष है न्यारा । निराकार काल के पारा ॥
निरंकार तह काल न जावै । वहँ की गम जोती नहिं पावै ॥
वो स्वामी है अगम अगाही । जह संतन ने सुरति समाई ॥
सुरति समाड़ पुरुष को देखा । मिला पुरुष गम अगम अलेखा ॥
उनका लेखा बेद न पावै । नेति नेति चारों गोहरावै ॥
पंचम बेद सुषम नहिं जाना । षष्ठम प्रसंग बेद कहै नाना ॥
चारि बेद पुनि गुप्त रहाई । तामें कागद लगै न स्याही ॥
तुम पुनि पुरुष भेद नहिं जाना । दसो बेद कहै नहिं पहिचाना ॥
दसो बेद से भेद न्यारा । पुरुष भेद नहिं पावै पारा ॥
निरंकार जोती नहिं जाना । जहँ पहुँचे कोड़ संत सुजाना ॥
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा । पाया अगम गम्य का चीन्हा ॥

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पत्थर पानी दूर बहावा। तब घर अगम राह को पावा ॥
बेद कितेब पुरान उठाये। तब लिखि सुरति अगम को धाये ॥
नेम अचार चार नहीं माना। बोलै सब घट माहिं दिखाना ॥
बोल अबोल दोऊ के पारा। तहँवा तुलसी सुरति सवारा ॥
छर अच्छर निःअच्छर पारा। देखा तुलसी निरखि निहारा ॥
अगम अगाध पुरुष दरबारा। तुलसी मिलै सुरति की लारा ॥
तन में देखि ब्रह्मण्ड पसारा। सो हिये हेर सुरति की लारा ॥
हिये में हेर फोड़ ब्रह्मण्ड। हिये की लार सार नौखण्डा ॥
अंतर हेर हिये के माई। अंड फोड़ ब्रह्मण्ड दिखाई ॥
अंतर खोज कीन्ह हिये माई। अंतर हिये माहि दरसाई ॥
तन में तोड़ फोड़ हिये कीन्हा। अंतर सार हिये में चीन्हा ॥

दस औतार काल के भाई

दस औतार काल के भाई। तामें नरसिंह है दस माहीं ॥
हरनाकुस का उदर बिदारा। ये जानौ सब काल पसारा ॥
वे दयाल एक सब माहीं। वो कहौ केहि का मारन जाई ॥
हरनाकुस कौ मारि बिदारा। पुनि पहलाद राज बैठारा ॥
राज भोग जिन कीन्हा भाई। सो तेहि पुत्र बिलोचन राई ॥
वे लोचन केवलि भयौ सोई। जा को बावन बाँधे जोई ॥
जो मुक्ति वा की होड़ जाते। बली छुड़ावन केहि विधि आते ॥
आवागमन मुक्ति नहीं भाई। बली छुड़ावन कस कस आई ॥
भागवत में देखौ यह सारखी। बली काज आये अस भारखी ॥
जो पहलाद मुक्ति को जाता। आवागमन केहि कारन आता ॥
सहाय करी नरसिंह बतावा। पिता मारि राज जिन पावा ॥
राज करै सो नरकै जाई। कस कस ताकी मुक्ति बताई ॥
जो नरसिंध जिवत ले जाता। तौ ता की हम मानै बाता ॥
राज थापि तेहि भोग करावा। भोग भोग भौ खानै आवा ॥

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ताकी मुक्ति साखि बतलावौ। कहि झूठी झूठी समझावौ ॥
सुवा पढ़ावत गनिका तारी। सहजै होत जक्त सब मुक्ति ॥
सुवा सुवा घर घर में होते। तौ मुक्ति का सोच न करते ॥
धूू तप की तुम साखि बताई। गोपीचंद भरथरी भाई ॥
पढ़ पढ़ सुवा मुक्ति जो होते। तौ पुनि राज काहे को तजते ॥
धूू को तप की बिधि बताया। राज छाड़ि तन खाक मिलाया ॥
गनिका मुक्ति सहज बतलावौ। धूू जी राज गये किमि गावौ ॥
कभि सुवा पढ़ते सहज बतावा। कभि कभि कष्ट तपस्या गावा ॥
ये तौ बिधि मिली नहीं भाई। ये सब झूठ झूठ सी गाई ॥

काल के फंद की खबर नाहीं

अंध रे अंध संसार सब अंध है, काल के फंद की खबर नाहीं।
करत उन्माद विष स्वाद संसार का, मगन मस्तान है तासु माहीं ॥
नैन मद अंध अरु बैन मुख छार है, चलन गुमान में छाँह देखै ॥
कहैं कबीर नर नारि सब एक से, काल चपेट हैं नाहिं पेखै ॥

सारा संसार अंधा है। किसी को भी काल के जाल का पता नहीं है। सभी संसार के विषय-विकारों रूपी विष का सेवन कर पागल बने रहते हैं, जिसके फलस्वरूप उनकी विवेक की आँखें फूट चुकी हैं, मुख से कड़वी बातें ही निकलती रहती हैं। वो घमण्ड के साथ चलते हैं और समझते हैं कि वे सही दिशा में जा रहे हैं। साहिब कहते हैं कि स्त्री-पुरुष सब काल के जाल में फँसे हुए हैं और उसके जाल को समझ नहीं पा रहे हैं।

निरंजन ख्याल पसारा हो

सुनो कोई साधु प्रेम लगाय के, निरंजन ख्याल पसारा हो ॥
धरती आकाश रचा अमृत मण्डल, तीन लोक विस्तारा हो।

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ब्रह्मा विष्णु महेश्वर प्रगटे, इनके सिर दीना भारा हो ॥
ठोर ठोर तीरथ ब्रत थापत, ठगवत को संसारा हो।
लख चौरासी जीव भुलाना, कोई न पावे पारा हो ॥
बार बार भस्म कर डारे, फिर फिर देड़ अवतारा हो।
सतगुरु मिले तो शब्द लखावे, भवसागर करे पारा हो ॥
सतगुरु के शब्द चीन्हे बिना रे, बहो जाय संसारा हो।
माया मोहि सकल जग बँधा, कोई न पावे पारा हो ॥
भागत जीव ठोर नहीं पावत, अटकत काल के द्वारा हो।
देख करामात सब कोई भूले, सिद्ध साध बेवहारा हो ॥
अमर लोक में पुरुष विदेही, रोकत उनका द्वारा हो।
सेवा कीन पुरुष वर दीना, धर्मराय बटपारा हो ॥
विषया रूप आप बन बैठे, जीवन करत आहारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महादेव कहे यह, नहीं पावे कोऊ पारा हो ॥
इन तीनों से निरंजन पारा, निरंजन से पुरुष निन्यारा हो।
कठिन काल से बचा चाहो, गहो शब्द टकसारा हो ॥
कहे कबीर अमर लो होवे, जो निज होय हमारा हो।
कठिन काल सों लेहु उबारी, बहुरि न आवे संसारा हो ॥

कह रहे हैं कि निरंजन ने धरती, आकाश, स्वर्ग आदि तीन लोक में बनाकर अपना जाल फैलाया हुआ है। उस निरंजन और उसकी शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उत्पन्न हुए, जिनके सिर पर उसने सारा भार दे दिया है। जगह-जगह पर उसने तीर्थ स्थान, ब्रत आदि दुनिया को ठगने के लिए बना रखे हैं। चौरासी लाख योनियों के सभी जीव इसकी दुनिया में भूले हुए हैं और कोई भी इसका पार नहीं पा रहा है। यह बार-बार जीवों को भस्म करके फिर-फिर प्रगट करता है। यदि सद्गुरु मिल जाएँ तो वो सार-शब्द देकर भवसागर से पार कर देते हैं। बिना सद्गुरु के सार-शब्द के जीव संसार-सागर में बह जाता है। माया-मोह आदि में सारा संसार बँधा हुआ है और कोई भी इससे पार नहीं पा

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रहा है। जीव जगह-जगह बचने के लिए भाग रहे हैं, भटक रहे हैं, पर काल के द्वार पर ही माथा पटक रहे हैं, वहीं अटक रहे हैं। कोई सिद्धि शक्तियों को देख भ्रमित हो रहा है, कोई किसी साधु की करामात देखकर भ्रमित हो रहा है। ये सब निरंजन के ही जाल हैं, जो जीव को अमर-लोक के सच्चे साहिब के द्वार पर नहीं जाने देते हैं। परम-पुरुष की सेवा करके इस निरंजन ने उनसे तीन लोक में राज्य करने का वर माँग लिया है। यह स्वयं विषयों का आनन्द लेता है और फिर उनका कष्ट जीवों को देकर उन्हें खा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी उसकी इस चाल को नहीं समझते हैं। इन त्रिदेव से निरंजन न्यारा है और निरंजन से भी परम-पुरुष न्यारा है। यदि इस कठिन काल निरंजन से बचना चाहते हो तो सद्गुरु के सार-शब्द को पकड़े रहो। क्योंकि फिर वो हमारा हंस हो जाता है और दुबारा काल के इस संसार में नहीं आता।

साधो यह मन है बड़ा जालिम

साधो यह मन है बड़ा जालिम।
जा को मन से काम परो है, तिसही है है मालूम॥
मन कारन जो उनको छाया, तेहि छाया में अटकै।
निरगुन सरगुन मन की बाजी, खरे सयाने अटकै॥
मन ही चौदह लोक बनाया, पाँच तत्त्व गुन कीन्है।
तीन लोक जीवन बस कीन्है, परै न काहू चीन्है।
जो कोउ कहै हम मन को मारा, जाके रूप न रेखा।
छिन छिन में कितनौ रंग ल्यावै, जे सपनेहु नहिं देखा॥
रसातल इकइस ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै।
षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै॥
सब के ऊपर नाम निअच्छर, तहैं लै मन को राखै।
तब मन की गति जान परै यह, सत कबीर मुख भाखै॥

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साहिब कह रहे हैं कि विचार करो ! यह मन बड़ा ही जालिम है । जिसका इस मन से पाला पड़ता है, वो ही इसे समझ सकता है । मन के कारण ही संसार का भ्रम दिखाई दे रहा है । इसी भ्रम में सब अटक के हैं । सगुण-निर्गुण दोनों मन का खेल है, जिसमें बड़े-बड़े चतुर भी अटक हुए हैं । ये 14 लोक भी मन ने ही पाँच तत्व और तीन गुण से बनाए हैं । 14 लोक में जीवों को फँसा दिया है, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा है । जो कोई कहे कि उसने मन को मार लिया है, तो समझो कि झूठ बोल रहा है, क्योंकि मन की कोई रूप-रेखा नहीं है । यह तो एक पल में इतने रंग दिखाता है कि जो सपने भी नहीं देखे होते । यह 21 ब्रह्माणों में सब पर शासन चलाता है । जितने भी रस हैं, उन सब का भोग करने वाला मन राजा ही है, फिर उसे बस में कैसे किया जा सकता है ! सबके परे एक निःअच्छर नाम है, जब उसमें मन को लगाया जाता है, तब ही यह मन समझ में आता है । साहिब कह रहे हैं कि यह बात मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूँ ।

यह मन जालिम जोर रे

बरजे नहीं माने, यह मन जालिम जोर रे ॥
जो कोई मन को पकड़ा चाहे, भागत साँकर तोड़ रे ॥
सुर नर मुनि सब पछि पछि हारे, हाथ न आवे चोर रे ॥
जो हँसा सतगुरु के होई, राखे ममता छोट रे ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बचो गुरु की ओट रे ॥

हे हँसा ! यह मन बड़ा जालिम और ताकतवर है, रोके नहीं रुकता । कोई उसे पकड़ने की कोशिश करे, वश में करने का प्रयास करे तो यह जंजीर तोड़ कर भाग जाता है । सुर, नर, मुनि सब इसे वश में करते-करते हार गये, पर यह चोर किसी के वश में नहीं आया । जो हँस सद्गुरु की शरण ग्रहण करता है, वो संसार की ममता को त्यागकर इसे अपने वश कर लेता है । इसलिए साहिब कह रहे हैं मेरी बात सुनकर उस पर विचार करो और सद्गुरु की शरण में आकर बच लो ।

<!-- image: Three decorative floral or geometric symbols arranged horizontally. -->

दो शब्द संगत की ओर से

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दो शब्द संगत की ओर से

आप जब इस संसार में आए, तब महाकलयुग शुरू हो गया था। आम आदमी ही नहीं, भक्ति करने वाला इंसान भी भटक चुका था। आपने आकर केवल धार्मिक क्रांति ही नहीं लाई बल्कि समाज सुधार का काम भी किया। जहाँ धर्म में व्यवसाय, राजनीति, रोमांस आदि ने स्थान ले लिया था, वहीं समाज में हिंसा, छल, कपट, ठगी, बेईमानी, चरित्रहीनता सहित अनेक बुराइयाँ अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थीं। कहीं सयाने बाबे हमारी माँ, बहन, बेटियों को नचा रहे थे तो कहीं नकली ज्योतिषि समाज को भटका रहे थे। आपने समाज को जगाया, बचो इनसे। इसके लिए आपको इस महाकलयुग में पाखण्डियों द्वारा बहुत निंदा झेलनी पड़ी।

कहीं उग्रवादी कहा गया। दुनिया भी कितनी भोली है, मान लिया। फौज में नौकरी करने वाले को उग्रवादी कहा। कितने बेवकूफ थे पाखण्डी। फिर मानने वाले तो भोले भाले थे, विचार भी नहीं किया। कहीं आपको मजनू कहा गया। आप तो किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करते हैं और न ही आपने शादी की। यदि आपको जरूरत होती तो शादी कर लेते। यह भी किसी ने विचार नहीं किया। कहीं चमार कहा गया। आपके गुरु के लिए भी किसी की यह सोच रही थी। किसी ने उनकी जाति पूछी थी। आपके गुरु जी ने कहा कि जाति पाति पूछे न कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।। तो उसने कहा कि यह तो रविदास जी ने कहा था, क्योंकि वे जाति से चमार थे। तब आपका दिल हुआ कि बता दूँ कि गुरु जी ब्राह्मण हैं, पर गुरु जी ने इशारे से मना कर दिया। बाद में कहा कि अपनी जाति बतानी ही नहीं है। आप तो स्वयं साहिब हैं, फिर आपकी जाति जो पूछे वो मूर्ख ही है। फिर पाखण्डियों ने आपको अनेक यातनाएं

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देने की कोशिश की, कहीं जहर दिया, कहीं जिंदा जलाने का प्रयास किया, कहीं तलवारों से मरवाने की कोशिश की, पर आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका।

साहिब आए काल जगत में, निंदे सबही कोय।

महाकलयुग देत है दस्तक, पाखण्ड जय जय होय ॥

पर आप चुप नहीं हुए, जो संदेश समाज को शुरू से दिया, उससे कभी हटे नहीं, कहीं आपने अपने शब्दों में बदलाव नहीं लाया। महाकलयुग में आप अनेक यातनाएं सहते हुए समाज को बुराइयों से, पाखण्डियों से बचा रहे हैं। इस कलयुग में जो काम आप कर रहे हैं, न आज कोई कर रहा, न आगे कर पायेगा।

इस अनथक बेमिसाल शूरवीर सदगुरु मधु परमहंस जी के चरणों में अर्पण दो शब्द लिखने के लिए हमारी कलम नहीं रुक रही। जिसने 17 साल की आयु से ही भारत की थल सेना के महार गुप में रह कर अपनी देश सेवा के दौरान ही संसार के, भूले भटके लोगों को भक्ति का ठीक रास्ता दिखाने के लिए संत सम्राट् सदगुरु कबीर साहिब द्वारा दिया सच का प्रतीक, 'सत्य का झंडा' उठाया। निरंजन की भक्ति को छोड़कर सत्य पुरुष की भक्ति करने को कहा है।

मिठास के प्रतीक 'मधु' परमहंस जी के विशाल हृदय से निकलने वाली निर्मल धारा ने भक्ति के क्षेत्र में एक सैलाब व क्रांति ला रखी है। जिसने पाखण्डवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।

मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन

गुरु और सतगुरु में अंतर

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और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं 'नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा'। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।

“जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।”

सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥

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पूरे संसार में गुरु और सतगुरु को एक ही सत्ता पर
स्थापत कर एक ही बात बोला जा रहा है।
आओ गुरु और सतगुरु के रहस्य को जाने

<table border="1"> <thead> <tr> <th>“गुरु”</th> <th>“सतगुरु”</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td> <ol style="list-style-type: none;"> <li>1. गुरु रास्ता बताने वाला है।</li> <li>2. गुरु का नाम लिखने, पढ़ने, बोलने और जपने में आता है।</li> <li>3. गुरु शास्त्रों की शक्शी देकर अपना तत्व स्थापत करता है।</li> <li>4. गुरु केवल काया-नाम का गयाता है।</li> <li>5. काया का नाम मुर्दा नाम है जो देही को दिया जाता है।</li> </ol> </td> <td> <ol style="list-style-type: none;"> <li>1. सतगुरु धुर पहुंचान वाला है।</li> <li>2. सतगुरु का नाम एक गुप्त पावर है जो जीवन भर आखरी सुआंस तक सेवक की सुरक्षा करती है यह गुप्त पावर जो लिखने पढ़ने बोलने में वही आता है।</li> <li>3. सतगुरु किसी शास्त्र का मुहताज नहीं है। वह अपने अनुभव से देखा हुआ तत्व स्थापत करता है।</li> <li>4. सतगुरु ही केवल विदेह-नाम का गयाता है।</li> <li>5. सतगुरु का नाम जिन्दा नाम है। जो सुरति को दिया जाता है।</li> </ol> </td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>“गुरु”</th> <th>“सतगुरु”</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td> <p>6. गुरु की पहुँच केवल दशम-द्वार तक है।</p> <p>7. गुरु भक्ति केवल नाम-कमाई पर केंद्रित है।</p> <p>8. गुरु भक्ति केवल सगुण-निगुण दायरे तक ही सीमित है।</p> <p>9. गुरु तीन-लोक का गयाता है।</p> <p>10. गुरु आत्मा का गयान नहीं दे सकता।</p> <p>11. गुरु मुक्ति नहीं दे सकता।</p> <p>12. गुरु मन-माया की सीमा में बँधा हुआ व्यक्तित्व है।</p> <p>13. गुरु परमपुरुष का भेद नहीं जानता।</p> <p>14. गुरु किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से पार करने की क्षमता नहीं रखता।</p> <p>15. गुरु की पहुँच केवल निराकार सत्ता (काल निरंजन) तक ही है।</p> <p>16. गुरु द्वारा बताए हुए सभी देशों अथवा धुनों का जिकर किया जा सकता है।</p> </td> <td> <p>6. सतगुरु की पहुँच ग्यारहवें द्वार तक है।</p> <p>7. सतगुरु भक्ति पूरी तरह गुरु ‘कृपा’ पर केंद्रित है।</p> <p>8. सतगुरु भक्ति की सीमा अनन्त तक है, जो सगुण-निगुण से भी आगे है।</p> <p>9. सतगुरु चौथे-लोक का गयाता है।</p> <p>10. सतगुरु आत्मा का समर्पण गयान देता है।</p> <p>11. सतगुरु ही केवल पूर्ण-मुक्ति का दाता है।</p> <p>12. सतगुरु मन-माया की सीमा से ऊपर मुक्त एक अमर व्यक्ति तत्त्व है।</p> <p>13. सतगुरु खुद परमपुरुष में मिला हुआ और उन्हीं का तदरूप है।</p> <p>14. सतगुरु अपनी कृपा से किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से हमेशा के लिए पार करने की क्षमता रखता है।</p> <p>15. सतगुरु की पहुँच सीधा परमपुरुष तक है।</p> <p>16. सदगुरु के सार शब्द अथवा अमर लोक का खुलासा नहीं किया जा सकता।</p> </td> </tr> </tbody> </table>

कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा

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कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा

मैंं सिरजौं मैंं मारऊँ, मैंं जारौं मैंं खाऊँ ।
जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥

मैंं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ ।
मैंं ही विमूढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ ।
मैंं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ ।
मैंं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ ।

मैंं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ ॥
मैंं ही आद्यशक्ति का पति शरीरों का रचयिता हूँ ।
मैंं ही त्रिदेवों का पिता-गुरु और आराध्य हूँ ।
मैंं ही वायु ध्वनि से वेद-शब्द शून्य में ओंकार हूँ ।
मैंं ही वेदों में परमेश्वर और पंचतत्व आधार हूँ ।

मैंं 'मन' ही सृष्टि से परे रारंकार हूँ ॥
मैंं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ ।
मैंं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ ।
मैंं ही सप्त आकाश और सप्तसागर पाताल हूँ ।
मैंं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ ।

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मैं 'मन' ही सकल सृष्टि का करतार हूँ॥

मैं ही शून्य मण्डलों से परे घनघोर अंधकार हूँ॥

मैं ही त्रिदेवों दशावतारों का विधाता ध्यान हूँ॥

मैं ही आत्म शक्ति के बन्धन का जीवों में कर्म विधान हूँ॥

मैं ही माया संग शरीरों में आत्मावरण और ज्ञान हूँ॥

मैं 'मन' ही जीवात्मा की गुण अवगुण पहचान हूँ॥

मैं ही शुभ अशुभ और पुण्य-पाप का सृजक हूँ॥

मैं ही तीरथ व्रत यज्ञ जप तप कर्म निर्माता हूँ॥

मैं ही धर्म अधर्म के जीवन कर्मों का व्याख्याता हूँ॥

मैं ही वैकुण्ठ और स्वर्ग-नरक कर्मफल प्रदाता हूँ॥

मैं 'मन' ही कर्म संचय स्रोत बन जाता हूँ॥

मैं ही एक उज्ज्वल पक्ष, दया करूणा का वरदान हूँ॥

मैं ही जीवों में तम रूप काम-क्रोध की खान हूँ॥

मैं ही तपस्वी ऋषि मुनि योगी का सिद्धिदाता हूँ॥

मैं ही मनुष्य की मनोकामना, सुख-दुःख हो जाता हूँ॥

मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ॥

मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ॥

मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ॥

मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ॥