मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextकाल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय ।
कहैं कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥
साहिब कह रहे हैं कि मैंने तो बहुत समझाया कि मन रूपी काल जीव को खा रहा है, पर कोई मेरी बात को मान ही नहीं रहा है, अब मैं क्या करूँ !
कबीर यह मन लालची, समझौं नहीं गँवार ।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार ॥
यह मन बहुत लालची है, समझाने से समझता नहीं है। भजन करने में तो आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।
मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साथ ।
जो माने गुरु वचन को, ताका मता अगाध ॥
सारा संसार मन का दास है, जो जो मन कहता है, वो-वो ही करता जाता है..... उसी की आज्ञा में रहता है, पर गुरु का दास कोई बिरला साधु ही होता है। जो गुरु की आज्ञा को मानता हुआ चलता है, वो गंभीर विचार वाला है।
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक ।
जो यह मन गुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक ॥
मन ही दाता बन जाता है, मन ही लालची बन जाता है, मन ही राजा समान हृदय वाला हो जाता है और मन ही कंजूस हृदय का बन जाता है। यदि यह मन गुरु में लग जाए तो निश्चय ही गुरु की प्राप्ति हो जाए।
मन चलता तन भी चलै, ताते मन को घेर ।
तन मन दोऊ बस करै, होय राई सुमेर ॥
मन के चलाने से ही शरीर चलता है, इसलिए मन को घेरकर काबू में कर। जब शरीर और मन दोनों बस में हो जायेंगे तो बहुत ऊँचा