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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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अर्थात् मन से ही सब कुछ सम्भव है।

मन के बहुतक रंग हैं, छिन-छिन बदले सोय।

एक रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय ॥

इस मन के अनेक रंग हैं, जो समय-समय पर बदलते रहते हैं अर्थात् कभी तो यह मन अच्छा बन जाता है और कभी बहुत ही बुरा। पर जो हर समय एक ही रंग में रहे अर्थात् हर समय मन को अच्छाई पर ही लगाए रखे, वो कोई बिरला संत ही होता है।

मन पाँचों के वश पड़ा, मन के वश नहिं पाँच।

जित देखूँ तित दौं लगी, जित भागूँ तित आँच ॥

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। लेकिन फिर भी ये मन के वश में नहीं हैं, मन ही इन पाँचों के वश में है। काम मन पर सवार हो जाता है, क्रोध भी मन को ही आता है, अहंकार भी मन पर छाए रहता है। साहिब कहते हैं कि जहाँ देखता हूँ, जहाँ भागता हूँ, वहीं काम, क्रोध आदि की अग्नि जलती दिखाई देती है।

मना मनोरथ छाड़ि दे, तेरा किया न होय।

पानी में घी नीकसै, रुखा खाय न कोय ॥

मन की इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं। वो तो बिना पंख आकाश में उड़ना चाहता है। इसलिए आकांक्षाओं को त्याग दो, मन द्वारा की गयी आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीं होंगी। मन की इच्छाएँ तो कभी समाप्त ही नहीं होती हैं, इसलिए इन इच्छाओं को पूर्ण नहीं किया जा सकता। यदि जल का मंथन करने से घी निकल सकता तो रूखी रोटी कोई नहीं खाता। यदि मन की सारी इच्छाएँ पूर्ण की जा सकतीं तो संसार में कोई दुखी नहीं होता।

यह मन नीचा मूल है, नीचा कर्म सुहाय।

अमृत छाड़ै मान करि, विषहिं प्रीति करि खाय ॥

यह मन बड़ा ही निकृष्ट है, गन्दा है। गन्दे कार्यों में ही इसे मजा आता है। अमृत समान मीठा फल प्रदान करने वाले आत्म-कल्याण