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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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ब्रह्मा विष्णु महेश्वर प्रगटे, इनके सिर दीना भारा हो ॥
ठोर ठोर तीरथ ब्रत थापत, ठगवत को संसारा हो।
लख चौरासी जीव भुलाना, कोई न पावे पारा हो ॥
बार बार भस्म कर डारे, फिर फिर देड़ अवतारा हो।
सतगुरु मिले तो शब्द लखावे, भवसागर करे पारा हो ॥
सतगुरु के शब्द चीन्हे बिना रे, बहो जाय संसारा हो।
माया मोहि सकल जग बँधा, कोई न पावे पारा हो ॥
भागत जीव ठोर नहीं पावत, अटकत काल के द्वारा हो।
देख करामात सब कोई भूले, सिद्ध साध बेवहारा हो ॥
अमर लोक में पुरुष विदेही, रोकत उनका द्वारा हो।
सेवा कीन पुरुष वर दीना, धर्मराय बटपारा हो ॥
विषया रूप आप बन बैठे, जीवन करत आहारा हो।
ब्रह्मा विष्णु महादेव कहे यह, नहीं पावे कोऊ पारा हो ॥
इन तीनों से निरंजन पारा, निरंजन से पुरुष निन्यारा हो।
कठिन काल से बचा चाहो, गहो शब्द टकसारा हो ॥
कहे कबीर अमर लो होवे, जो निज होय हमारा हो।
कठिन काल सों लेहु उबारी, बहुरि न आवे संसारा हो ॥

कह रहे हैं कि निरंजन ने धरती, आकाश, स्वर्ग आदि तीन लोक में बनाकर अपना जाल फैलाया हुआ है। उस निरंजन और उसकी शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उत्पन्न हुए, जिनके सिर पर उसने सारा भार दे दिया है। जगह-जगह पर उसने तीर्थ स्थान, ब्रत आदि दुनिया को ठगने के लिए बना रखे हैं। चौरासी लाख योनियों के सभी जीव इसकी दुनिया में भूले हुए हैं और कोई भी इसका पार नहीं पा रहा है। यह बार-बार जीवों को भस्म करके फिर-फिर प्रगट करता है। यदि सद्गुरु मिल जाएँ तो वो सार-शब्द देकर भवसागर से पार कर देते हैं। बिना सद्गुरु के सार-शब्द के जीव संसार-सागर में बह जाता है। माया-मोह आदि में सारा संसार बँधा हुआ है और कोई भी इससे पार नहीं पा