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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1858)

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एकषष्टितमोऽध्यायः

अभिमन्युका पराक्रम और धृष्टद्युम्नद्वारा शलके पुत्रका वध

संजय उवाच

द्रौणिर्भूरिश्रवाः शल्यश्चित्रसेनश्च मारिष ।
पुत्रः सांयमनेश्चैव सौभद्रं पर्यवारयन् ।। १ ।।
संजय कहते हैं—माननीय राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शल्य, चित्रसेन तथा शलके पुत्रने सुभद्राकुमार अभिमन्युको आगे बढ़नेसे रोका ।। १ ।।

संसक्तमतितेजोभिस्तमेकं ददृशुर्जनाः ।
पञ्चभिर्मनुजव्याघ्रैर्गजैः सिंहशिशुं यथा ।। २ ।।
जैसे सिंहका बच्चा पाँच हाथियोंसे भिड़ा हुआहो, उसी प्रकार सुभद्राकुमार अभिमन्यु उन अत्यन्त तेजस्वी पाँच पुरुषसिंहोंसे अकेला ही युद्ध कर रहा था। यह बात वहाँ सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखी ।। २ ।।

नातिलक्ष्यतया कश्चिन्न शौर्ये न पराक्रमे ।
बभूव सदृशः कार्ष्णिर्नास्त्रे नापि च लाघवे ।। ३ ।।
लक्ष्य वेधने, शौर्य प्रकट करने, पराक्रम दिखाने, अस्त्रज्ञान प्रदर्शित करने तथा हाथोंकी फुर्तीमें कोई भी अभिमन्युकी समानता न कर सका ।। ३ ।।

तथा तमात्मजं युद्धे विक्रमन्तमरिंदमम् ।
दृष्ट्वा पार्थः सुसंयत्तं सिंहनादमथानदत् ।। ४ ।।
अपने शत्रुसूदन पुत्र अभिमन्युको युद्धमें इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक पराक्रम प्रकट करते देख कुन्तीपुत्र अर्जुनने सिंहके समान गर्जना की ।। ४ ।।

पीडयानं तु तत् सैन्यं पौत्रं तव विशाम्पते ।
दृष्ट्वा त्वदीया राजेन्द्र समन्तात् पर्यवारयन् ।। ५ ।।
प्रजानाथ! राजेन्द्र! आपके पौत्र अभिमन्युको कौरवसेनाको पीड़ा देते देख आपके ही सैनिकोंने सब ओरसे घेर लिया ।। ५ ।।

ध्वजिनीं धार्तराष्ट्राणां दीनशत्रुरदीनवत् ।
प्रत्युद्ययौ स सौभद्रस्तेजसा च बलेन च ।। ६ ।।
अपने शत्रुओंको दीन बना देनेवाले सुभद्राकुमारने दैन्यरहित होकर अपने तेज और बलसे कौरवसेनापर धावा किया ।। ६ ।।

तस्य लाघवमार्गस्थमादित्यसदृशप्रभम् ।
व्यदृश्यत महच्चापं समरे युध्यतः परैः ।। ७ ।।

समरभूमिमें शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए अभिमन्युका विशाल धनुष अस्त्रलाघवके पथपर स्थित हो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ७ ॥
स द्रौणिमिषुणैकेन विद्ध्वा शल्यं च पञ्चभिः ।
ध्वजं सांयमनेश्चैव सोऽष्टाभिश्चिच्छिदे ततः ॥ ८ ॥
उसने अश्वत्थामाको एक और शल्यको पाँच बाणोंसे घायल करके शलके ध्वजको आठ बाणोंसे काट डाला ॥ ८ ॥
रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेषितां सौमदत्तिना ।
शितेनोरगसंकाशां पत्रिणापजहार ताम् ॥ ९ ॥
फिर भूरिश्रवाकी चलायी हुई स्वर्णदण्डविभूषित सर्पसदृश महाशक्तिको तीखे बाणसे छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ९ ॥
शल्यस्य च महावेगानस्यतः समरे शरान् ।
(धनुश्चिच्छेद भल्लेन तीव्रवेगेन फाल्गुनिः ।)
निवार्यार्जुनदायादो जघान चतुरो हयान् ॥ १० ॥
शल्य समरभूमिमें बड़े वेगशाली बाणोंका प्रहार कर रहे थे; किंतु अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीव्र वेगवाले भल्लसे उनके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और उनकी प्रगतिको रोककर पार्थकुमारने चारों घोड़ोंको मार गिराया ॥ १० ॥
भूरिश्रवाश्च शल्यश्च द्रौणिः सांयमनिः शलः ।
नाभ्यवर्तन्त संरब्धाः कार्ष्णेर्बाहुबलोदयम् ॥ ११ ॥
भूरिश्रवा, शल्य, अश्वत्थामा तथा सांयमनि (सोमदत्तपुत्र) शल—ये सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए थे, तथापि अभिमन्युके बाहुबलकी वृद्धिको रोक न सके ॥ ११ ॥
ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्रैश्च सह केकयैः ।
पञ्चविंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ॥ १२ ॥
धनुर्वेदविदो मुख्या अजेयाः शत्रुभिर्युधि ।
सहपुत्रं जिघांसन्तं परिवव्रुः किरीटिनम् ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! तब आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर त्रिगतों तथा केकयोंसहित मद्रदेशके पचीस हजार योद्धाओंने शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले पुत्रसहित किरीटधारी अर्जुनको घेर लिया। वे सब-के-सब धनुर्वेदके प्रधान ज्ञाता और युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३ ॥
तौ तु तत्र पितापुत्रौ परिक्षिप्तौ महारथौ ।
ददर्श राजन् पाञ्चाल्यः सेनापतिररिंदम ॥ १४ ॥
स वारणरथौघानां सहस्रैर्बहुभिर्वृतः ।
वाजिभिः पत्तिभिश्चैव वृतः शतसहस्रशः ॥ १५ ॥
धनुर्विस्फार्य संक्रुद्धो नोदयित्वा च वाहिनीम् ।

ययौ तं मद्रकानीकं केकयांश्च परंतप ॥ १६ ॥
शत्रुदमन नरेश! पिता-पुत्र महारथी अर्जुन और अभिमन्युको शत्रुओंद्वारा घिरे हुए देख पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्न कई हजार हाथियों और रथों तथा सैकड़ों-हजारों घुड़सवारों एवं पैदलोंसे घिरकर अपनी विशाल वाहिनीको आगे बढ़ाते तथा क्रोधपूर्वक धनुषकी टंकार करते हुए मद्रों और केकयोंकी सेनापर चढ़ आये ॥ १४—१६ ॥
तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढधन्वना ।
संरब्धरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ॥ १७ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले यशस्वी धृष्टद्युम्नसे सुरक्षित हुई वह सेना युद्धके लिये उद्यत हो बड़ी शोभा पाने लगी, उसके रथी, हाथीसवार और घुड़सवार सभी रोषावेशमें भरे हुए थे ॥ १७ ॥
सोऽर्जुनप्रमुखे यान्तं पाञ्चालकुलवर्धनः ।
त्रिभिः शारद्वतं बाणैर्जत्रुदेशे समर्पयत् ॥ १८ ॥
पांचालवंशकी वृद्धि करनेवाले धृष्टद्युम्नने अर्जुनके सामने जाते हुए कृपाचार्यको उनके गलेकी हँसलीपर तीन बाण मारे ॥ १८ ॥
ततः स मद्रकान् हत्वा दशैव दशभिः शरैः ।
पृष्ठरक्षं जघानाशु भल्लेन कृतवर्मणः ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् दस बाणोंसे मद्रदेशीय दस योद्धाओंको मारकर तुरंत ही एक भल्लके द्वारा कृतवर्माके पृष्ठ-रक्षकको मार डाला ॥ १९ ॥
दमनं चापि दायादं पौरवस्य महात्मनः ।
जघान विमलाग्रेण नाराचेन परंतपः ॥ २० ॥
इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव-सेनापतिने निर्मल धारवाले नाराचसे महामना पौरवके पुत्र दमनको भी मार डाला ॥ २० ॥
ततः सांयमनेः पुत्रः पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ।
अविध्यत् त्रिंशता बाणैर्दशभिश्चास्य सारथिम् ॥ २१ ॥
तब शलके पुत्रने तीस बाणोंसे रणदुर्मद धृष्टद्युम्नको और दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको घायल कर दिया ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्तस्य कार्मुकम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने अत्यन्त तीखे भल्लसे शलके पुत्रका धनुष काट दिया ॥ २२ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समर्पयत् ।
अश्वांश्चास्यावधीद् राजन्नुभौ तौ पार्ष्णि सारथी ॥ २३ ॥

राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्र ही पचीस बाणोंसे शलपुत्रको घायल कर दिया तथा उसके घोड़ों एवं दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी मृत्युके मुखमें डाल दिया ॥ २३ ॥
स हताश्वे रथे तिष्ठन् ददर्श भरतर्षभ ।
पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! जिसके घोड़े मार दिये गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शलके पुत्रने महामना धृष्टद्युम्नके पुत्रको देखा ॥ २४ ॥
स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् ।
पदातिस्तूर्णमानर्च्छद् रथस्थं पुरुषर्षभः ॥ २५ ॥
तब पुरुषश्रेष्ठ शलपुत्र तुरंत ही एक अत्यन्त भयंकर लोहेकी बनी हुई बड़ी तलवार हाथमें ले पैदल ही रथपर बैठे हुए पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चला ॥ २५ ॥
तं महौघमिवायान्तं खात् पतन्तमिवोरगम् ।
भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ॥
दीप्यमानमिवादित्यं मत्तवारणविक्रमम् ।
अपश्यन् पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २७ ॥
उस युद्धमें पाण्डवों तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने मतवाले गजराजके समान पराक्रमी और सूर्यके समान दीप्तिमान् शलपुत्रको आते देखा। वह महान् वेगशाली जलप्रवाह, आकाशसे गिरते हुए सर्प तथा कालकी भेजी हुई मृत्युके समान जान पड़ता था। उसके हाथमें नंगी तलवार थी ॥ २६-२७ ॥
तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः ।
शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८ ॥
बाणवेगमतीतस्य तथाभ्याशमुपेयुषः ।
त्वरन् सेनापतिः क्रुद्धो बिभेद गदया शिरः ॥ २९ ॥
वह विरोधभाव लेकर धावा कर रहा था। उसके हाथमें तीखी तलवार थी। उसने अपने अंगोंमें कवच धारण कर रखा था। वह बाणके वेगको लाँघकर अत्यन्त निकट आ पहुँचा था। उस दशामें पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्नने तुरंत क्रोधपूर्वक गदासे आघात करके उसके मस्तकको विदीर्ण कर दिया ॥ २८-२९ ॥
तस्य राजन् सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् ।
हतस्य पततो हस्ताद् वेगेन न्यपतद् भुवि ॥ ३० ॥
राजन्! उसके मारे जानेपर शरीरसे चमकीला कवच और हाथसे तलवार उसके गिरनेके साथ ही वेगपूर्वक पृथ्वीपर गिरी ॥ ३० ॥
तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् ।
पुत्रः पाञ्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥

पाञ्चालराजका भयानक पराक्रमी पुत्र महामना धृष्टद्युम्न गदाके अग्रभागसे शलपुत्रको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३१॥
तस्मिन् हते महेष्वासे राजपुत्रे महारथे।
हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष॥ ३२॥
आर्य! उस महाधनुर्धर महारथी राजकुमारके मारे जानेपर आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया॥ ३२॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धो दृष्ट्वा निहतमात्मजम्।
अभिदुद्राव वेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम्॥ ३३॥
अपने पुत्रको मारा गया देख संयमनकुमार शलने कुपित होकर रणदुर्मद पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नपर बड़े वेगसे धावा किया॥ ३३॥
तौ तत्र समरे शूरौ समेतौ युद्धदुर्मदौ।
ददृशुः सर्वराजानः कुरवः पाण्डवास्तथा॥ ३४॥
युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले वे दोनों शूरवीर उस समरभूमिमें एक दूसरेसे भिड़ गये। कौरव और पाण्डव दोनों पक्षोंके समस्त भूपाल उनका युद्ध देखने लगे॥ ३४॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धः पार्षतं परवीरहा।
आजघान त्रिभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम्॥ ३५॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शलने जैसे महावत किसी महान् गजराजको अंकुशोंसे मारे, उसी प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नको क्रोधपूर्वक तीन बाणोंसे घायल किया॥ ३५॥
तथैव पार्षतं शूरं शल्यः समितिशोभनः।
आजघानोरसि क्रुद्धस्ततो युद्धमवर्तत॥ ३६॥
इसी प्रकार संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यने भी क्रुद्ध होकर शूरवीर धृष्टद्युम्नकी छातीपर प्रहार किया। फिर तो वहाँ भयंकर युद्ध छिड़ गया॥ ३६॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे सांयमनिपुत्रवधे एकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनके युद्धमें शलपुत्रके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३६ १/२ श्लोक हैं।]