महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1860, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंययौ तं मद्रकानीकं केकयांश्च परंतप ॥ १६ ॥
शत्रुदमन नरेश! पिता-पुत्र महारथी अर्जुन और अभिमन्युको शत्रुओंद्वारा घिरे हुए देख पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्न कई हजार हाथियों और रथों तथा सैकड़ों-हजारों घुड़सवारों एवं पैदलोंसे घिरकर अपनी विशाल वाहिनीको आगे बढ़ाते तथा क्रोधपूर्वक धनुषकी टंकार करते हुए मद्रों और केकयोंकी सेनापर चढ़ आये ॥ १४—१६ ॥
तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढधन्वना ।
संरब्धरथनागाश्वं योत्स्यमानमशोभत ॥ १७ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले यशस्वी धृष्टद्युम्नसे सुरक्षित हुई वह सेना युद्धके लिये उद्यत हो बड़ी शोभा पाने लगी, उसके रथी, हाथीसवार और घुड़सवार सभी रोषावेशमें भरे हुए थे ॥ १७ ॥
सोऽर्जुनप्रमुखे यान्तं पाञ्चालकुलवर्धनः ।
त्रिभिः शारद्वतं बाणैर्जत्रुदेशे समर्पयत् ॥ १८ ॥
पांचालवंशकी वृद्धि करनेवाले धृष्टद्युम्नने अर्जुनके सामने जाते हुए कृपाचार्यको उनके गलेकी हँसलीपर तीन बाण मारे ॥ १८ ॥
ततः स मद्रकान् हत्वा दशैव दशभिः शरैः ।
पृष्ठरक्षं जघानाशु भल्लेन कृतवर्मणः ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् दस बाणोंसे मद्रदेशीय दस योद्धाओंको मारकर तुरंत ही एक भल्लके द्वारा कृतवर्माके पृष्ठ-रक्षकको मार डाला ॥ १९ ॥
दमनं चापि दायादं पौरवस्य महात्मनः ।
जघान विमलाग्रेण नाराचेन परंतपः ॥ २० ॥
इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव-सेनापतिने निर्मल धारवाले नाराचसे महामना पौरवके पुत्र दमनको भी मार डाला ॥ २० ॥
ततः सांयमनेः पुत्रः पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ।
अविध्यत् त्रिंशता बाणैर्दशभिश्चास्य सारथिम् ॥ २१ ॥
तब शलके पुत्रने तीस बाणोंसे रणदुर्मद धृष्टद्युम्नको और दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको घायल कर दिया ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्तस्य कार्मुकम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने अत्यन्त तीखे भल्लसे शलके पुत्रका धनुष काट दिया ॥ २२ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समर्पयत् ।
अश्वांश्चास्यावधीद् राजन्नुभौ तौ पार्ष्णि सारथी ॥ २३ ॥