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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

द्वितीय खण्ड

ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता
पद-भाष्य
एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व- | इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत
मात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्यः | तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति
अहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति | कराया हुआ शिष्य यह न समझ
मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः | बैठे कि 'ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे
शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदि- | अच्छी तरह जानता हूँ' इस
त्यादि । | अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [ इस
निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये
आचार्यने 'यदि मन्यसे'इत्यादि कहा।
नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति | पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह
निश्चिता प्रतिपत्तिः । | जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान
तो इष्ट ही है ।
सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रति- | सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित
पत्तिः; न हि सु वेदा- | ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु
ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः | 'मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ'
हमिति । यद्धि वेद्यं | ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य
वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु | वस्तु वेत्ताकी विषय होती है वही
वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् | अच्छी तरह जानी जा सकती है;
अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । | जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि-
के दाहका विषय दाह्य पदार्थ ही
हो सकता है उसका स्वरूप नहीं
सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति | हो सकता । 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका
सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः। | आत्मा (अपना-आप) ही है' यह
समस्त वेदान्तोंका भलीभाँति निश्चय
इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
पद-भाष्य
प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों-
इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया
इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’
ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय
‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है
दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस
संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय-
जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है;
इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए
वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां
न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा
शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी
| तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी
| बुद्धिका निराकरण करना उचित
| ही है ।
| जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि-
| द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा
| सकता उसी प्रकार जाननेवालेके
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे
शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना
स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको
ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी
स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे
विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको
उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने
विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके
| प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त-
| कर अब उसकी बुद्धिको विचलित
| करते हैं ।