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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages
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३६२ ] [ कल्कि पुराण
ततो रघुपतिस्तु ता सुतयुता रुदन्ती पुरो
जगाद दहने पुन प्रविश शोधनायात्मन. ।
इतीरितमवेक्ष्य सा रघुपते पदाब्जे नता
विवेश जनोयुता मणिगणोज्वल भूतलम् ॥५६॥
फिर किसी कारण वश श्रीराम को अपना हृदय कठोर करना
पडा और उन्होन जानकीजी को परित्याग का वन मे पहुँचा दिया । तब
महर्षि बाल्मीकि अपने द्वारा रचित रामायण का स्मरण करके दु खित
चित्त होते हुए जानकीजी का अपने आश्रम मे लिवा लाये ॥५४॥
फिर जानकीजी के कुश और लव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । इन दोनो
राज पुत्रो ने श्रीराम के समीप पहुंच कर उनका यश गाया । फिर महर्षि
वाल्मीकि ने अनिन्दित एव देव-पूजिता जानकीजी को इन दोनो पुत्रो
के सहित श्रीराम को समर्पित कर दिया ॥५५॥ दोनो पुत्रो के सहित
रोती हुई जानकी को अपने सामने खडी देख कर श्रीराम उनसे बोले—
सीते ! तुम अपनी शुद्धि के लिये पुनः अग्नि-प्रवेश करो । उनके यह
वचन सुन कर जानकीजी ने उनके चरणारविन्दो मे प्रणाम किया आदर
अपनी माता पृथिवी के साथ पाताल मे प्रविष्ट हो गईं ॥५६॥
निरीक्ष्य रघुनायको जनकजाप्रयाण स्मरन्
वन्शिष्ठगुरुयोगतोऽनुजयुतोऽगमरस्व पदम् ।
पुर.स्थितजन.स्वकै पशुभिरीश्वर सस्पृशन्
मुदा सरयुजीवन रथवरे परीतो विभुः ॥५७॥
ये शृण्वन्ति रघूद्वहस्य चरित कर्णामृत सादरात्
ससारार्णवशोषणाञ्च पठतामामोदद मोक्षदम् ।
रोगाणामिह शान्तये धनजनस्वर्गादिसम्पत्तये
वंशानामपि वृद्धये प्रभवति श्रीशः परेश प्रभुः ॥५८.।
जानकीजी को इस प्रकार पाताल में गई देख कर रामचन्द्र भी
उनका स्मरण करते हुए अपने गुरु वसिष्ठ, अनुजगण तथा परिजनो

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तृतीया अध्याय-३ ] [ ३६३
और पशुओ के साथ सरयू तट पर गये और प्रसन्न हृदय से जल का
स्पर्श करके दिव्य विमान मे आरूढ होकर अपने लोक को गये ॥५७॥
कानो के लिए अमृत के समान इस राम चरितामृत को जो आदर
सहित सुनेगे उनकी सभी बाधाएँ श्रीराम-कृपा के दूर हो जायेंगी।
रोग नष्ट होगे, वंश-वृद्धि, धन-जन की समृद्धि और स्वर्ग रूप ऐश्वर्य
की प्राप्ति होगी। जो इसका पाठ करेगे, उनके लिए यह ससार-सागर
शुष्क होकर अत्यन्त आनन्द तथा मोक्ष-रूप परम पुरुषार्थ की प्राप्ति
होगी ॥५८॥

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तृतीयांश-
चतुर्थ अध्याय
रामात्कुशोऽभूदतिथिस्ततोऽभून्निषधान्नभ ।
तस्मादभूत्पुण्डरीक' क्षेमधन्वाऽभवत्तत ।१।
देवानीकस्ततो हीन' परिपात्रोऽथ हीनत ।
बलाहकस्ततोऽकंश्र्च रजनाभस्ततोऽभवत ।२।
खगणाद्विधृतस्तस्माद्धिरण्मनाभसङ्गित' ।
तत पुष्पादध्रुवस्तस्मात्स्यन्दनोऽथा म्नवणक. । ३।
तस्माच्छीघ्रोऽभवत्पुत्र पिता मेऽतुलविक्रम. ।
तस्मान्मरु मां केऽपीह बुधउच्चापि सुमित्रकम् ।४।
कलापग्राममासाद्य विद्धि सत्तपसि स्थितम् ।
तवावतार विज्ञाय व्यासात्सत्यवतीसुतात् ।
प्रतीक्ष्य काल लक्षाब्द कले प्राप्तस्तवान्तिकम् ।
जन्मकोट्य घसा राशेर्नाशन वमंशासनम् ।
वंश'कीर्तिकर सर्वकामपूर परात्मन ।६।
उन श्रीराम के पुत्र कुश हुए। कुश के अतिथि, अतिथि के
निषध, निषध के नभ, नभ के पुण्डरीक और पुण्डरीक के पुत्र क्षेमधन्वा
हुए ॥१॥ क्षेमधन्वा के पुत्र देवानीक, देवानीक के हीन, हीन के परि-
पात्र, परिपात्र के बलाहक, बलाहक के अर्क और अर्क के पुत्र रजनाभ
हुए ॥ २।। रजनाभ के खगण, खगण के विधृत, विधृत के हिरण्यनाभ,
हिरण्यनाभ के पुष्प, पुष्प ध्रुव, के ध्रुव के स्यन्दन और स्यन्दन के पुत्र
३६४

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चतुर्थ अध्याय-३ ] [ ३६५
अग्निवर्ण हुए ।३।। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्र हुए, वे अत्यन्त विक्रम
वाले ही मेरे पिता थे । मैं उन्हीं शीघ्र का पुत्र मरु हूँ । कुछ लोग मुझे
बुद्ध और कुछ सुमित्र कहते है ।।४।। अब तक मैं कलाप ग्राम में निवास
करता हुआ तपस्या में रत था । सत्यवती सूनु व्यास जी के मुख से मुझे
आपके अवतार का समग्र ज्ञान हुआ और तब मैं कलियुग की एक लाख
वर्ष तक प्रतीक्षा करने पश्चात् आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ । क्योंकि
आप परमात्मा का सामीप्य प्राप्त होने से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश
हो जाता है तथा धर्म-यश की वृद्धि और सभी कामनाओं की पूर्ति
होती है ।।५-६।।
ज्ञातस्तवान्वयस्त्वञ्च सूर्यवंशसमुद्भवः ।
द्वितीय कोऽपर श्रीमान्महापुरुषलक्षण ।७।
इति कल्किवचः श्रुत्वा देवापिर्मधुराक्षराम् ।
वाणी विनयसम्पन्नः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।८।
प्रलयान्ते नाभिद्मात्तवाभूच्चतुराननः ।
तदोयत नयादत्रे श्चन्द्रस्तस्मात्ततो बुधः ।६।
तस्मात्पुरूरवा जज्ञे ययातिर्नहुषस्ततः . .
देवयान्यां ययातिस्तु यदुं तुर्वसुमेव च ।१०।
शर्मिष्ठायां दना द्रुह्युञ्चानु पूरुञ्च सतते ।
जनयामास भूतादिर्भूतानांव सिसृक्षया ।११।
पूरोज्जन्मेजयस्तस्मात्प्रविन्वानभवत्ततः ।
प्रवीरस्तन्मनस्युर्वै तस्माच्चाभयदोऽभवत् ।१२।
उरुक्षयाच्च त्रय्यरुणस्ततोऽभूत्सुकरोहरिणः ।
वृहत्क्षेत्रादभूद्धस्ती यन्नाम्ना हस्तिनापुरम् ।१३।
कल्कि बोले—तुम्हारी वंशावली सुनकर मैं यह जान गया कि
तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो । परन्तु तुम्हारे साथ यह महापुरुषों के
लक्षणों से सम्पन्न एवं श्रीमान् पुरुष दूसरे कौन हैं ? ।।७।। यह सुन
कर देवापि ने विनयपूर्वक मधुर वाणी से निवेदन किया । वे बोले —

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३६६ ] [ कल्कि पुराण

हे प्रभो ! प्रलय का अन्त होने पर आपके नाभिकमल से ब्रह्माजी की
उत्पत्ति हुई थी । उन ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए । अत्रि के चन्द्रमा,
चन्द्रमा के बुध, बुध के पुरूरवा, पुरूरबा के नहुष और नहुष के पुत्र
ययाति हुए । उन ययाति ने अपनी पत्नी देवयानी के गर्भ से यदु और
तुर्वम नामक दो पुत्रो को जन्म दिया ॥६-१०॥ हे सत्पते ! उन्ही
ययाति ने शर्मिष्ठा नाम को पत्नी से द्रह्यु, अनु और पुरु नामक तीन
पुत्र उत्पन्न किये । जैसे सृष्टिकाल मे भूतादि के द्वारा पचभूतो की
उत्पत्ति होती है, वैसे ही ययाति से इन पाँच पुत्रो की उत्पत्ति हुई
॥११॥ पुरु का पुत्र जन्मेजय हुआ, जन्मेजय के प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्
के प्रवीर, प्रवीर के मनस्यु, मनस्यु के अभयदा अभयदा के उरुक्षय उनके
त्रयरुणि, त्रयरुणि के पुष्करारुणि, पुष्करारुणि के वृहत्क्षेत्र और वृहत्क्षेत्र,
के पुत्र हस्ती हुए । इन हस्ती नामक राजा के नाम पर ही हस्तिनापुर
नामक नगर की स्थापना हुई ॥१२-१३॥
अजमीढोऽहिमीढश्च पुरुमीढस्तु तत्सुताः ।
कजमीढादभूदृक्षस्तस्मात्संवरणात्कुरु ।१४।
कुरोः परिक्षित्सुधनुर्जन्हुर्निषध एव च ।
सुहोत्रोऽभूत्सुधनुषश्चवनाच्च तत कृती ।१५।
ततो बृहद्रथस्तस्मात्कुशाग्रादृषभोऽभवत् ।
तत सत्यजितः पुत्र पुष्पवान्नहुषस्तत ।१४।
बृहद्रथान्यभार्यायां जरासन्ध परन्तप ।
सहदेवस्ततस्मान्सोमापियंच्छु तश्रवा ।१७।
सुरथाद्विदूरथस्तस्मात्सार्वभौमोऽभवत्तत ।
जयसेनाद्रथानोकोऽभूद्यु तायुश्च कोपनः ।१८।
हस्ती के तीन पुत्र हुए । उनके नाम अजमीढ, अहिमीढ और
पुरुमीढ हुए । अजमीढ़ के पुत्र ऋक्ष, ऋक्ष के सवरण और सवरण के
पुत्र कुरु हुए ।१४। कुरु के पुत्र परीक्षित, परीक्षित के सुधनु, जन्हु और
निषध—यह तीन पुत्र हुए । सुधनु के पुत्र सुहोत्र और सुहोत्र के पुत्र

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चतुर्थ अध्याय-४ ] [ ३६७
च्यवन हुए ।१५। च्यवन के बृहद्रथ बृहद्रथ के कुशाग्र, कुशाग्र के ऋषभ,
ऋषभ के सत्यजीत, सत्यजीत के पुष्पवान् तथा पुष्पवान् के पुत्र नहुष
हुए ।१६। बृहद्रथ की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शत्रु पीडक जरासन्ध हुए ।
जरासन्ध के सहदेव, सहदेव के सोमापि और सोमापि के पुत्र श्रुतश्रवा
हुए ।१७। श्रुतश्रवा के पुत्र सुरथ हुए । सुरथ के विदूरथ, विदूरथ के
सार्वभौम, सार्वभौम के जयसेन, जयसेन के रथानीक और रथानीक के
पुत्र क्रोधी स्वभाव के युतायु हुए ।१८।
तस्माद्देवातिथिस्तस्मादृक्षस्तस्माद्दिलीपकः ।
तस्मात्प्रतीपकस्तस्य देवापिरहमोश्वर ! ।१६।
राज्य शान्तनवे दत्वा तपस्येकधिया चिरम् ।
कलापग्राममासाद्य त्वा दिदृक्षुरिहागत ।२०।
मरुणाऽनेन मुनिभिरेभिः प्राप्य पदाम्बुजम् ।
तव कालकरालास्याद्यास्याम्यात्मवता पदम् ।२१।
तयोरेव वच श्रुत्वा कल्किः कमलोचनः ।
प्रहस्य मरुदेवापी समाश्वास्य समब्रवीत् ।२२।
युवा परमधर्म्मज्ञौ राजानौ विदितावुभौ ।
मदादेशकरौ भूत्वा निजराज्यं भरिष्यथ . ।२३।
युतायु के पुत्र देवातिथि हुए ! देवातिथि के ऋक्ष, ऋक्ष के दिलीप
और दिलीप के पुत्र प्रतीपक हुए । हे प्रभो ! मैं उन्ही प्रतीपक का पुत्र
देवापि हूँ ।१६। मैंने शान्तनु को अपने राज्य पर आसीन किया और
स्वयं कलाप ग्राम मे रह कर एकचित्त हो तपस्या करता था । अब
आपके दर्शन की कामना से ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ ।२०। मैंने मरु
और मुनिवरो के सहित यहाँ आकर आपके चरणारबिन्द को प्राप्त
किया है । इसके फल स्वरूप मैं काल के कराल गाल मे गिरने से बच
गया, आत्म तत्वज्ञो का पद हमे मिल जायगा ।२१। मरु और देवापि की
बातो को सुन कर पद्माक्ष कल्किजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होने
आश्वासन भरे शब्दो मे उनसे कहा । कल्कि बोले—मै जान गया कि

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३६८ ] [ कल्कि पुराण
आप दोनो परम धर्मज्ञ राजा हैं। इस समय आप मेरे आदेश को
मान कर राज्य ग्रहण कर उसका परिपालन करो ।२२-२३।
मरो त्वामभिषेक्ष्यामि निजयोध्यापुरेऽधुना ।
हत्वा म्लेच्छानधर्मिष्ठान्प्रजाभूतविहिंसकान् ।२४।
देवापे तव राज्ये त्वा हस्तिनापुरपत्तने ।
अभिषेक्ष्यामि राज्ये हत्वा पुक्कसकान्रणे ।२५।
मथुरायामहं स्थित्वा हरिष्यामि तु वो भयम् ।
शय्याकर्णानुष्ट्रमुखानेकजङ्घान्विनोदरान् ।२६।
हत्वा कृत युगं कृत्वा पालयिष्याम्यहं प्रजाः ।
तपोवेशं व्रतं त्यक्त्वा समारुह्य रथोत्तमम् ।२७।
युवां शस्त्रास्त्रकुशलौ सेनागणपरिच्छदौ ।
भूत्वा महारथौ लोके मया सह चरिष्यथः ।२८।
हे मरो ! अब मैं प्रजाओ का पीडन करने वाले, जीव-हिंसक
अधर्मी म्लेच्छों का सहार करके आपको अपनी राजधानी अयोध्या मे
अभिषिक्त करूंगा ।२४। हे देवापे ! हे राजन्ये ! युद्ध क्षेत्र मे पुक्कसो को
मार कर मैं आपकी राजधानी हस्तिनापुर के राज्य पर आपको अभि-
षिक्त करूँगा ।२५। मैं मथुरा नगरी मे निवास करता हुआ तुम्हारे भय
को नष्ट करूँगा तथा शय्याकरण, उष्ट्रमुख और एकजघ आदि को
मार कर सत्युग की स्थापना और प्रजा की रक्षा करूँगा । तुम अभी
इस तपस्वी वेश का त्यागन करो और श्रेष्ठ रथ पर आरोहण करो
।२६-२७। तुम सभी शस्त्रास्त्र विद्या मे पारगत एव महारथी हो, अतः
हमारे साथ ही विचरण करो ।२८।
विशाखयूपभूपालस्तनयां भिनयान्विताम् ।
विवाहे रुचिरापाङ्गीं सुन्दरीं त्वा प्रदास्यति ।२६।
साधो भूपाल लोकानां स्वस्तये कुरु मे वचः ।
रुचिराश्वसुतां शान्तां देवापे त्वं समुद्वह ।३०।
इत्याश्वासकथां कल्केः श्रुत्वा तौ मुनिभिः सह ।
विस्मयाविष्टहृदयौ मेनाते हरिमीश्वरम् ।३१।
इति ब्रुवत्यभयदे आकाशात्सूर्य्यसंन्निभौ ।

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चतुर्थ-अध्याय-४ ] [ ३६६
रथौ नानमणिब्रातघटितौ कामगौ पुरः ।
समायातौ ज्वलद्दिव्यशस्त्रास्त्रैः परिवारितौ ।३२।
ददृशुस्ते सदो मध्ये विश्वकर्म्मविनिर्मितौ ।
भूपा मुनिगणा सभ्या सहर्षा किमितीरिता ।३३।
हे मरो ! विशाखयूप नरेश अपनी परम शीलवती तथा
छविरागी कन्या को तुम्हे विवाह देगा । अत तुम ससार का
कल्याण करने के उद्देश्य से मेरे वचनो का पालन करो ।
हे देवापे ! तुम भी रुचिराश्व की शान्त नाम्नी सुपुत्री से विवाह
कर लो ॥३०॥ कल्किजी के यह आश्वासन युक्त वचन सुन कर मुनियो
के सहित देवापि अत्यन्त विस्मित हुए और फिर सन्देह छोड़ कर यह
विश्वास करने लगे कि कल्कि ही भगवान् विष्णु एव साक्षात् ईश्वर हैं
॥३१॥ कल्किजी ने जैसे ही यह अभयप्रद वचन कहे वैसे ही आकाश
मार्ग से स्वच्छा पूर्वक चलने वाले अनेक रत्न दि से निर्मित दो रथ
अवतीर्ण हुए । सूर्य के समान तेजोमय उन रथो मे उज्ज्वल दिव्य
शस्त्रास्त्र भरे हुए थे ।।३२।। उस समय उपस्थित सभी मुनिगण और
राजागण विश्वकर्मा द्वारा निर्मित रथो को उतरे हुए देख कर 'यह क्या'
—'यह क्या' कहते हुए विस्मय एव हर्ष प्रकट करने लगे ।।३३।।
युवामादित्यसोमेन्द्रयमवैश्रवणाङ्गजौ ।
राजानौ लोकरक्षार्थमाविर्भूतौ विदन्त्यमी ।३४।
कालेनाच्छादिताकारौ मय सङ्गादिहोदितौ ।
युवा रथावारुहतां शकदत्त ममाज्ञया ।३५।
एव वदति विश्वेशे पद्मनाथे सनातने ।
देवा बवर्षु कुसुमंस्तुष्टुतुर्मु नयोऽग्रतः ।३६।
गङ्गावारिपरिक्लिन्नशिरोभूतिपरागवान् ।
शगे पर्व्वतजासङ्गशिववत्पवनो ववौ ।३७।
तत्रायातः प्रमुदिततनुस्तप्तचामीकराभौ
धर्मावासः सुरुचिरजटाचीरभृद्दण्डहस्तः

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४०० ] [ कल्कि पुराण
लोकातीतो निजतनूमरुन्नाशिताऽधर्म्मसघ-
स्तेजोराशि सनकसदृशो मस्करी पुष्कराक्षः ।३८।
तभी कल्किजी ने कहा — यह सभी को विदित है कि तुम दोनो
राजवंश मे विश्व-रक्षा और पृथिवी के पालनार्थ उत्पन्न हुए हो ।
तुम्हारी उत्पत्ति सूर्य, चन्द्र, यम और कुबेर के अंश से हुई है ॥३४॥
अब तक तुम अपने रूप को छिपाये रहे हो । परन्तु अब, जब यहाँ मेरे
पास आये हो तो मेरी आज्ञा से इन्द्र द्वारा भेजे गये इन रथो पर आरूढ
हो जाओ ॥३५॥ पद्मापति कल्किजी के द्वारा उक्त वचन कहे जाने
पर आकाश से देवताओ ने पुष्पवृष्टि और मुनियो ने स्तुति की ॥३६॥
मन्द वायु प्रवाहित होने लगा । शिवजी के जटा जाल से उन्मुक्त गङ्गा-
जल के मिलन से विभूति भीग गई । मन्द पवन ने उस विभूति के कण
रूपी परागो को उडा कर पार्वती के अंगो मे लगाते हुए कल्याण गुण
की प्राप्ति की ॥३७॥ तभी सनक मुनि के समान अत्यन्त तेजस्वी,
धर्म भवन रूप सुरुचिर जटाओ को धारण किये और हाथ मे दण्ड
लिये एक ब्रह्मचारी वहाँ आये । उनकी देह कान्ति तप्त स्वर्ण के समान
चमचमा रही थी । मनोहर वस्त्रधारी उन कमललोचन दिव्य महापुरुष
के मुख पर अक्षय भाव परिलक्षित हो रहा था । उनके तेजोमय शरीर
का स्पर्श होते ही संसार के सम्पूर्ण पापो का क्षय हो रहा था ॥३८॥
—❀—

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तृतीयांश—
पंचम अध्याय
अथ कल्कि समालोक्य सदसाम्पतिभिः सह ।
समुत्थाय ववन्दे त पाद्यार्घ्याचमनादिभि. ।१।
वृद्ध संवेश्य त भिक्षु सर्वाश्रमनमस्कृतम् ।
पप्रच्छ को भवानत्र मम भाग्यादिहागतः ।२।
प्रायशो मानवा लोके लोकाना पारणेच्छया ।
चरन्ति सर्वसुहृद. पूर्णा विगतकल्मषा. ।३।
अह कृतयुग श्रीश तवादेशकर परम् ।
तवाविर्भावविभवमीक्षणार्थमिहागतम् ।४
निरुपाधिर्भवान्काल. सोपाधित्वमुपागत. ।
क्षणदण्डलवाद्यङ्गैर्मयया रचित स्वया ।५।
पक्षाहोरात्रमासर्तु' सवत्सरयुगादय ।
तवेक्षया चरन्त्येते मनवश्च चतुर्दश :६।
शुक बोल—इस ब्रह्मचारी को देखते ही भगवान् कल्कि ने
अपने सभासदो के सहित उठ कर पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि से
उनका पूजन किया ।१। सभी आश्रमो के द्वारा नमस्कार योग्य उन
भिक्षु ब्रह्मचारी को आदर पूर्वक बैठा कर कल्किजी ने प्रश्न किया—
आप कौन हैं ? हमारे सौभाग्य से ही आपका यहाँ आगमन हुआ है ।२।
पापों से परे रहने वाले जो सत्पुरुष सब के सुहृद है, वे लोक-कल्याणार्थ
ही पृथिवी पर विचरण किये करते हैं ।३। भिक्षु ने कहा—हे श्रीपते !
मैं आपका आज्ञाकारी सत्युग हूँ । आपके अवतार का प्रत्यक्ष प्रभाव
देखने के निमित्त ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । ४। आप निरुपाधि एवं
४०१

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साक्षात् काल स्वरूप है । परन्तु क्षण, दण्ड और लवादि अ गो के
द्वारा इस समय उपाधि सहित हो गए है । यह सम्पूर्ण विश्व आपकी
ही माया से प्रकट हुआ है ।५। आपकी ही सत्ता का अनुभव करते हुए
यह पक्ष, दिवस, रात्रि, मास, ऋतु, सम्वत्सर, युगादि काल एव चौदहो
मनु-यह सभी नियमित रूप से विचरण करते है ।६।
स्वायम्भुवस्तु प्रथमस्तत स्वारोचिषो मनु ।
तृतीय उत्तमस्ताच्चतुर्थस्तामस स्मृत ।७।
पञ्चमो रैवत षष्टश्चाक्षुष परिकीर्त्तित ।
वैवस्वत सप्तमो वै ततः सावर्णिरष्टम ।८।
नवमो दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्तत ।
दशमो धर्म्मसावर्णिरेकादशः स उच्यते ।६।
रुद्रसावर्णिकस्तत्र मनुर्वै द्वादश स्मृत ।
त्रयोदशमनुर्वेदसावर्णिलोकविश्रुतः ।१०।
चतुर्दशेंद्रसावर्णिरेते तव विभूतयः ।
यान्त्यायान्ति प्रकाशन्ते नामरूपादिभेदत ११।
द्वादशाब्दसहस्रेण देवानाञ्च चतुर्युगम् ।
चत्वारि त्रीणि द्वे चैक सहस्रगणित मतम् ।१२।
तावच्छतानि चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव हि ।
सन्ध्याक्रमेण तेषान्तु सन्ध्यांशोऽपि तथाविध ।१३।
पहले मनु स्वायंभुव, दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे
तामस, पाँचवे रैवत छठवे चाक्षुष, सातवे वैवस्वत, आठवे सावर्णि,
नवे दक्षसावर्णि, दसवे ब्रह्मसावर्णि, ग्यारहवे धर्म सावर्णि, बारहवे
रुद्र सावर्णि, तेरहवे वेद सावर्णि और चौदहवे इन्द्र सावर्णि-यह चौदहो
मनु आपकी ही विभूति रूप है । यह सब अपने-अपने नाम रूपादि के
भेद से चलते हुए प्रकाशित होते हैं ।७-११। बारह हजार दिव्य वर्षो
की एक चतुर्युगी होती है, जिसके अनुसार चार हजार दिव्य वर्षो का
सत्युग, तीन हजार दिव्य वर्षो का त्रेता, दो हजार दिव्य वर्षो का द्वापर

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पंचम अध्याय-३ ] [ ४०३
और एक हज़ार दिव्य वर्षों का कलियुग होता है ।१३। इन चारो युगो
का सध्याक्रम ( संधिकाल ) क्रमश चार सौ, तीन सौ, दो सौ, और एक
सौ वर्ष का होता है । इन चारो युगो की शेष सध्या का क्रम भी इसी
प्रकार समझना चाहिये ।१३।
एकसप्ततिकं तत्र युगं भुङ्क्ते मनुर्भुवि ।
मनूनामपि सर्वेषामेव परिणतिर्भवेत् ।
दिवा प्रजापतेस्तत्तु निशा सा परिकीर्त्तिता ।१४
अहोरात्रञ्च पक्षस्ते माससंवत्सरर्तवः ।
सद्गुणाधिकृतं कालो ब्रह्मणो जन्ममृत्युकृत् ।१५।
शतसंवत्सरे ब्रह्मा लय प्राप्नोति हि त्वधि ।
लयान्ते त्वन्नाभिमध्यादुत्थितः सृजति प्रभुः ।१६।
तत्र कृतयुगान्तेऽहं कालं सद्धर्म्मपालकम् ।
कृतकृत्याः प्रजा यत्र तन्नाम्ना मां कृतं विदुः ।१७।
इति तद्वच आश्रुत्य कल्किर्निजजनावृतः ।
प्रहर्षमतुलं लब्धा श्रुत्वा तद्वचनामृतम् ।१८।
अवहित्यमुपालक्ष्य युगस्याह जनान्हितान् ।
योद्धुकामं कलेः पुर्यां हृष्टो विशसने प्रभुः ।१६,
गजरथतुरगान्नरराँश्च योधाम्कनकविचित्रविभूषणा-
चिताङ्गान् । धृतविविधवरास्त्रशस्त्रशूगान्गुधिनिपु-
णानगरायध्वमानयध्वम् ।२०।
प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्र्युगी तक पृथिवी को भोगते है ।
इसी प्रकार सब मनु बदलते रहते हैं । चौदहवे मनु जितने समय तक
पृथिवी का भोग करते हैं, उतना समय ब्रह्मा का एक दिवस होता है ।
इतने ही परिमाण की ब्रह्मा की एक रात्रि होती ।१४। इसी प्रकार
दिवस-रात्रि, पक्ष, मास, सवत्सर और ऋतु आदि की उपाधि से
ब्रह्माजी की जन्म-मृत्यु आदि का विधान होता है ।१५। ब्रह्मा अपनी
सौ वर्ष की आय पूर्ण होने पर वह स्वय मे लय हो जाते है । फिर

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४०४ ] कल्कि-पुराण

जब प्रलय काल बीत जाता है तब आपके नाभि कमल से उनका पुन,
उद्भव होता है ।१६। मैं उक्त काल का अ श रूप ही कृतयुग हूँ।
मेरे द्वारा श्रेष्ठ धर्म पाला जाता है । मेरे द्वारा सम्पूर्णां प्रजा धर्म का
अनुष्ठान करते हुए धन्य हो जाती है इसी लिए ज्ञानीजन मुझे कृतयुग
कहते है ।१७। सत्ययुग के इस प्रकार के वचनो को सुन कर अपने जनो
के सहित कल्किजी परम हर्षित हुए ।१८। कलियुग के नाश मे समर्थ
कल्किजी ने सत्ययुग को आया देख कर कलियुग के शासन मे स्थित
विशसन नामक नगरी मे युद्ध करने की इच्छा करते हुए अपने अनुया-
यियो से बोले ।१६। हाथी पर आरूढ होकर युद्ध करने वाले, अश्व और
रथ पर चढ कर युद्ध करने वाले तथा पदाति सैनिक जो देह पर अद्भुत
स्वर्णाभूषण और शस्त्रास्त्रो के धारण करने वाले हैं, ऐमे युद्ध-कुशल
वीरो की गणना करो ।२०।

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तृतीयांश—
षष्ठ अध्याय
इति तौ मरुदेवापौ श्रुत्वा कल्केर्वचः पुरः ।
कृतोद्वाहौ रथारूढौः समायातौ महाभुजौ । १।
नानायुधधरैः सैन्यैरावृतौ शूरमानिनौ ।
बद्धगोधाऽङ्गुलित्राणौ दंशितौ बद्धहस्तकौ । २।
कार्ष्णायसशिरस्त्राणौ धनुर्द्धरधुरन्धरौ ।
अक्षौहिणीभिः षडभिस्तु कम्पयन्तौ भुव भरैः । ३।
विशाखयूपभूपस्तु गजलक्षैः समावृतः ।
अश्वैः सहस्रनियुतैः रथैः सप्तसहस्रकैः ।४।
पदातिभिर्द्विलक्षैश्च रत्नछद्धृतकार्मुकैः ।
वातोद्धतोत्तरोष्णीषैः सर्वतः परिवारितः । ५।
रुधिराश्वसहस्राणां पञ्चाशद्भिर्महारथैः ।
गजैर्दशशतैर्मत्तैर्नवलक्षैर्वृतो बभौ ।६।
सूतजी बोले—कलिकी की आज्ञा से मरु और देवापि ने विवाह
कर लिया और वे दोनो महाबाहु दिव्य रथो पर आरूढ हुए वहाँ आ
पहुचे ।१। अपने महाबली होने का अभिमान रखनेवाले वे दोनो वीर
अपने देह को सुरक्षित किये हुए और अङ्गुलियो मे त्राण धारण किये
हुए थे। अस्त्रशस्त्रो से भले प्रकार सुसज्जित उन वीरो के साथ अग-
णित सेना थी । २। वे अपने शिरो पर कार्ष्णाय वर्ण का शिरस्त्राण
धारण किये थे तथा सर्व श्रेष्ठ धनुप बाणों से सज्जित अपनी छः अक्षो-
४०५ २

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४०६ ] [ कल्कि पुराण
हिणी सेना से पृथिवी को कम्पित कर रहे थे ।३। विशाखयूप-नरेश भी
अपनी एक लाख हाथी, एक करोड़ घोड़ो और सात हजार रथो मे
सम्पन्न सेना के साथ थे ।४। उनके साथ दो लाख पैदल सैनिक धनुष
बाणों से सुसज्जित थे । वायु के झोको से उनके स फे और दुकूल हिल
रहे थे ।५। इनके अतिरिक्त पचास हजार लाल वर्ण के अश्व, दस हजार
मदमत्त गज एव अनेको महारथी तथा नौ लाख पदाति थे ।६।
अक्षौहिणीभिर्दशभि कल्कि परपुरञ्जय ।
समाबभौस्तथा देवैरेवमिन्द्रो दिवि स्वराट् ।७।
भ्रातृपुत्रसुहृद्भिश्च मुदित सैनिकैर्वृत ।
ययौ दिग्विजयकाङ्क्षा जगतामीश्वर प्रभुः ।८।
काले तस्मिन्द्विजो भूत्वा धर्म्मः परिजनैः सह ।
समाजागान कलिना बलिनापि निराकृत । ६।
ऋत प्रसादभय सुख मुदमुथ स्वयम् ।
योभमर्थं तनोऽदर्प स्मृति क्षेम प्रतिश्रयम् ।१०।
नरनारायणो चोभौ हरेरंशौ तपावनौ ।
धर्म्मस्त्वेतान्समादाय पुत्रान्स्त्रींश्चागतस्त्वरन् ।११।
श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्नतिः
बुद्धिर्मेधा तितिक्षा च ह्रीमुर्त्तिर्धर्म्मपालकाः ।१२।
एतास्तेन सहायता निजबन्धुगणैः सह ।
कल्किमालोकित तत्र निजकार्य्य निवेदितुम् ।१३।
शत्रु पुरो के विजेता कल्किजी स्वर्ग मे सुशोभित सुरपति इन्द्र
के समान दस अक्षौहिणी सेना के साथ अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए ।७।
इस प्रकार भाई, पुत्र, सुहृद और सैन्य-समूह से सम्पन्न होकर जगदी-
श्वर कल्किजी ने दिग्विजय की इच्छा से प्रस्थान किया ।८। तभी कलियुग
के द्वारा निग्रह किया हुआ धर्म ब्राह्मण वेश मे वहा उपस्थित हुआ
।६। ऋत, प्रसाद, अभय, सुख प्रसन्नता, योग, अर्थ, अदर्प, स्मृति,
क्षेम और प्रतिश्रय नामक उसके सेवक साथ थे ।१०। भगवान् विष्णु

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षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०७
के अंश रूप तपोनिष्ठ नर-नारायण को तथा अपने स्त्री पुत्रादि को
साथ लेकर धर्म शीघ्रता पूर्वक वहाँ आ गया ।११। श्रद्धा, मैत्री, दया,
शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री आदि
धर्म की रक्षा मे तत्पर यह सभी साकार रूप में अपने बान्धवों से युक्त
होकर कल्किजी के दर्शनार्थ और स्वकार्य निवेदनार्थ वहाँ उपस्थित
हुए ।१२-१३।
कल्किर्द्विजं समासाद्य पूजयित्वा यथाविधि ।
प्रोवाच विनयापन्नं कस्त्वं कस्मादिहागतः ।१४।
स्त्रीभिः पुत्रैश्च सहितः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।
कस्य वा विषयाद्राजंस्तत्तत्त्वं वद तावतः ।१५।
पुत्राः स्त्रियश्च ते दीना हीनस्वबलपौरुषाः ।
वैष्णवाः साधवो यद्वत्पाखण्डैश्च तिरस्कृताः ।१६।
कल्केरिति वचः श्रुत्वा धर्मः शर्म निजं स्मरन् ।
प्रोवाच कमलानाथमनाथस्त्वतिकातरेः ।१७।
पुत्रैः स्त्रीभिर्निजजनैः कृताञ्जलिपुटैर्हरिम् ।
स्तुत्वा नत्वा पूजयित्वा मुदितं तं दयापरम् ।१८।
शृणु कल्के ममाख्यानं धर्मोऽहं ब्रह्मरूपिणः ।
तव वक्षःस्थलाज्जातः कामदं मवदेहिनाम् ।१९।
भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण को देखते ही विनय पूर्वक एवं
विधिवत् उसका पूजन किया और बोले-आप कौन हैं ? कहाँ से आगमन
हुआ ? ।१४। क्षीण पुण्य मनुष्य के समान आप अपने स्त्री पुत्रादि के
सहित किस राज्य से यहाँ आये हैं, यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताइये
।१५। जैसे वैष्णव साधु पाखण्ड के पराजित हो जाते हैं, वैसे ही आप
बल-पौरुष से हीन होकर स्त्री पुत्रादि के सहित अत्यन्त कातर क्यो हो रहे
हैं ? ।१६। अत्यन्त कातर और अनाथ रूप में आया हुआ धर्म पद्मा-
पति कल्किजी के वचन सुन कर अपने कल्याणार्थ निवेदन करने लगा
।१७। उसने अपने अनुयायियों के सहित हाथ जोड़े और आनन्द-धाम

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४०८ ] [ कल्कि पुराण
तथा दयावन्त प्रभु का पूजन कर प्रणाम और स्तुति करने लगा ।१९८
धर्म बोला-हे प्रभो ! मैं अपना वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, इसे सुनिये !
मैं ब्रह्मस्वरूप धर्म आपके वक्ष स्थल से उत्पन्न हुआ हूँ । मेरे द्वारा
सभी प्राणियो के कार्यों की सिद्धि होती है ।१६।
देवाना मग्रणीर्हव्यकव्याना कामधुग्विभु ।
तवाज्ञया चराम्येव साधुकीर्त्तिकृदन्वहम् ।२०।
सोऽह कालेन वलिना बालनापि निराकृत. ।
शककाम्बोजशबरै. सर्वैरावासवासिना ।२१।
अधुना तेऽखिलाधार ! पादमूलमुपागता ।
यथा ससारकालाग्निसतप्ता साधवोऽर्दिता, ।२२।
इति वाग्भिरपूर्वाभिर्धर्मेण परितोषित ।
कल्कि' कलङ्कहर श्रीमानाह सहर्षयञ्छनैः ।२३।
धर्मं कृतायुग पश्य नरु चण्डाशुवशजम् ।
मा जानासि यथा जात धातृप्रार्थितविग्रहम् ।२४।
कीटाकँबौद्धदलनमिति मत्वा मुखो भव ।
अवैष्णवानामन्येषाम् तत्रोपद्रवकारिणाम् ।
जिघासुर्यामि सेजाभिश्चर गा त्वं निर्विभंरः ।२५।
देवताओ मे प्रथम गणना योग्य मे यज्ञाश रूप हव्य-कव्य के
अश का आधिकारी हूँ । मैं यज्ञ फल प्रदान करके साधुजन का अभीष्ट
पूर्ण करता हूँ। आपकी आज्ञा से मैं सदैव साधुओ का कार्य सिद्ध करता
हुआ घूमता हूँ ।२०। इस समय शक, कम्बोज, शबर आदि कलियुग के
शासन मे रहते हैं। कालक्रम के कारण मैं उस बलवान् कलि से ही
हारा हुआ हूँ ।२१। हे अखिलाधार ! इस समय साधुजन विश्वरूपी
कालाग्नि से सतप्त एव पीडित है। इसी लिए मैं आपके चरणो की
शरण मे उपस्थित हुआ हूँ ।२२। धर्म के इन अपूर्व वचनो को सुन कर
पाप हारी कल्कि जी सब के लिए प्रसन्न करने वाले वचन कहने लगे
।२३। उन्होने कहा--हे धर्म ! इधर देखो, सत्यग का आगमन हो चुका

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षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०६
है । यह मरु नामक सूर्यव शी नरेश हैं । तुम्हे यह विदित ही है कि मैंने
ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थित होकर ही यह देह धारण किया है ।२४। कीटक
मे बौद्धो का दलन किया और जो तुम्हारे प्रति अधिक उपद्रव करने
मे तत्पर रहते हैं तथा जो वैष्णव नही है, उन्हे नष्ट करने के लिए मैं
सना सहित विचार कर रहा हूँ । अब तुम भी भय-रहित होकर पृथिवी
पर पनिशील रहो ।२५।
का भीतिस्ते क्व मोहोऽस्ति यज्ञदानतपोव्रतै. ।
सहितै सच्र विभो ! मयि सत्ये व्युपस्थिते ।२६ ।
अह यामि त्वयागच्छ स्वपुत्रैर्बान्धवै सह ।
विशा जयार्थं त्व शत्रुनिग्रहार्थं जगत्प्रिय ।२७।
इति कल्केर्वच श्रुत्वा धर्म. परमहर्षित ।
गन्तु कृतमतिस्तेन आधिपत्यममु' स्मरन् ।२८।
सिद्धाश्रमे निजनानवस्थाप्य स्त्रियश्च तः ।२६।
सन्नद्ध. साधुसत्कारवेदब्रह्ममहारथः।
नानाशास्त्रान्वेषणेषु सकलपवरकार्मुक. ।३०।
सप्तस्वराश्वो भूदेवसारथिर्वन्हिराश्रयः
क्रिय.भेदबलोपेत प्रवयौधर्म्मनायकः ।३१।
हे धर्म ! मैं स्वयं उपस्थित हूँ, सत्युग भी आ ही चुका है, तब
तुम भयभीत क्यो हो ? तुम व्यर्थ मोहित क्यो हो रहे हो ? अब तुम
यज्ञ, दान और व्रत के सहित पृथिवी पर स्वच्छन्द विचरण करो ।२६।
हे जगत्प्रिय ! तुम अपने पुत्र एव बाँधवो सहित शत्रुओ के निग्रह और
दिग्विजय के उद्देश्य से प्रस्थान करो । मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा ।२७।
कल्किजी के यह वचन सुन कर धर्म अत्यन्त आनन्दित हुआ और
अपने अधिपत्य का स्मरण करता हुआ, कल्किजी के साथ प्रस्थान मे
तत्पर हुआ ।२८। उस समय उसने अपनी स्त्री को सिद्धाश्रम मे स्थित
किया ।२६। धर्म का युद्ध-वेश साधु-सत्कार था । वेद और ब्रह्म महारथ
के रूप मे साकार हुए तथा विविध शास्त्रो के अन्वेषण ने धनुष का रूप
धारण किया ।३०। वेद के सात स्वर उसके रथ के अश्व हुए, ब्राह्मण

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४१० ] [ कल्कि पुराण
सारथि, अग्नि आसन रूप आश्रय हुआ । इस प्रकार धर्म रूप नायक
क्रियानुष्ठान रूपी महाबल से समन्वित होकर चल दिया । ३१ ।
यज्ञदानतप पात्रैयमैश्च नियमैर्वृतः ।
खशकाम्बोजकान्त्सर्वाञ्छबराञ्बर्व्वरापि ।३२।
जेतु कल्किययौ यत्र कलेरावासमीप्सितम् ।
भूतवासबलोपेत सारमेयवराकुलम् ।।३३।।
गोमासपूतिगन्धाढ्य काकोलूकशिवावृतम् ।
स्त्रीणा दुर्द्यूतक लहविवादव्यसनाश्रयम् .३४।
घोर जगद्भूयकर कामिनीस्वामिन गृहम् ।
कलिः श्रुत्वोद्यमं कल्के पुत्रपौत्रवृत क्रुधा ।३५।
पुराद्विशसनात्प्रायात्प्रे चकाक्षरथोपरि :
धर्मः कलि समालोक्य ऋषिभि. परिवारितः ।३६।
युयुधे तेन सहसा कल्किवाक्यप्रचोदित; ।
ऋतेन दम्भः सङ्ग्रामे प्रसादो लोभमाह्वयत् ।३७।
इस प्रकार यज्ञ, दान, तप, यम, नियम आदि से सम्पन्न हुए
भगवान् कल्कि खश, कम्बोज, शबर तथा बर्बर आदि म्लेच्छो की विजय
कामना से कलि के आवास वाले स्थान मे पहुचे । वहा भूतो का दृढ
आवास होने से उस स्थान मे सब ओर श्वान भूँकते थे । ३२-३३ ।
इस स्थान मे गो मास की दुर्गंध आ रही थी । कौओ और उल्लुओ से
पूर्ण तथा द्यूत का आश्रय एव स्त्रियो के विवाद रूपी क्लेश इसमे भरा
हुआ था ।३४। ससार के लिए भयप्रद यह नगरी भय कर प्रतीत होती
थी । यहाँ के पुरुष स्त्रियो की आज्ञा के अनुवर्ती थे । वहाँ का अधीश्वर
कल्कि जी का आक्रमण सुन कर अपने पुत्र-पौत्रादि के सहित उल्लू की
ध्वजा वाले रथ पर आरूढ होकर विशसनपुरी से बाहर आया । उस
कलि को देख कर भगवान् कल्कि की आज्ञानुसार ऋषियो के सहित
धर्म ने उसके साथ सग्राम प्रारम्भ किया । दभ से ऋत और लोभ से
प्रसाद भिड़ गया ।३५-३७।

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षष्ठ अध्याय-३ ] [ ४११
समयादभय क्रोधो भयं सुखमुपाययौ ।
निरयो मुदमासाद्य युयुधे विविधायुधैः ।३८।
आधियोगेन च व्याधि क्षेमेण च बलीयसा ।
प्रश्रयेण तथा ग्लानिर्जरा स्मृतिमुपाह्वयत् ।३६।
एव वृत्तो महाघोरो युद्ध परमदारुणः ।
त द्रष्टुमागता देवा ब्रह्माद्याः खे विभूतिभिः ।४०।
मरु खशंश्च काम्बोजैर्युयुधे भीमविक्रमैः ।
देवापिः समरे चौनैर्बर्बरैस्तद्गणैरपि ।४१।
विशाखयूपभूपाल पुलिन्दै श्वपचै सह ।
युयुधे त्रिविधे शस्त्रैरस्त्रैर्दिव्यैर्महाप्रभैः ।४२।
कल्कि कोकविकोकाभ्या वाहिनीभिर्वरायुधै ।
तौ तु कोकविकोकौ च ब्रह्मणो वरदर्पितौ ।४३।
क्रोध के साथ अभय और भय के साथ सुख का युद्ध होने लगा ।
निरय ने प्रीति के पास आकर उस पर शस्त्रास्त्रो से प्रहार किये ।३८।
आधि से योग का, व्याधि से क्षेम का, ग्लानि से प्रश्रय का और जरा से
स्मृति का संग्राम होने लगा ।३६। इस प्रकार अत्यन्त घोर एवं दारुण
संग्राम उपस्थित हो गया । ब्रह्मादि देवगण अपनी-अपनी विभूतियो के
सहित नभमण्डल मे स्थित होकर युद्ध देखने लगे ।४०। भीषण पराक्रमी
खश और कम्बोजो से मरु का युद्ध हुआ । देवापि ने चौन और बर्बरों
की सेना से संग्राम किया ।४१। विशाखयूप नरेश पुलिन्द और
श्वपचादि से महा पराक्रमी विविध अपने दिव्यास्त्रो के सहित भिडे हुए
थे ।४२। कोक-विकोक के साथ स्वय भगवान् कल्कि श्रेष्ठ शस्त्रास्त्र
लेकर सेना सहित युद्ध मे तत्पर हुए । यह कोक-विकोक ब्रह्मा जी से
वर प्राप्त करने के कारण अत्यन्त अहकारी हो गए थे ।४३।
भ्रातरौ दानवश्रेष्ठौ मत्तौ युद्धविशारदौ ।
एकरूपौ महासत्त्वौ देवाना भयवर्द्धनौ ।४४।
पदातिकौ गदाहस्तौ वज्राङ्गौ जयिनौ दिशाम् ।