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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 148 of 259

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Page 148

तृतीयांश—
पंचम अध्याय
अथ कल्कि समालोक्य सदसाम्पतिभिः सह ।
समुत्थाय ववन्दे त पाद्यार्घ्याचमनादिभि. ।१।
वृद्ध संवेश्य त भिक्षु सर्वाश्रमनमस्कृतम् ।
पप्रच्छ को भवानत्र मम भाग्यादिहागतः ।२।
प्रायशो मानवा लोके लोकाना पारणेच्छया ।
चरन्ति सर्वसुहृद. पूर्णा विगतकल्मषा. ।३।
अह कृतयुग श्रीश तवादेशकर परम् ।
तवाविर्भावविभवमीक्षणार्थमिहागतम् ।४
निरुपाधिर्भवान्काल. सोपाधित्वमुपागत. ।
क्षणदण्डलवाद्यङ्गैर्मयया रचित स्वया ।५।
पक्षाहोरात्रमासर्तु' सवत्सरयुगादय ।
तवेक्षया चरन्त्येते मनवश्च चतुर्दश :६।
शुक बोल—इस ब्रह्मचारी को देखते ही भगवान् कल्कि ने
अपने सभासदो के सहित उठ कर पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि से
उनका पूजन किया ।१। सभी आश्रमो के द्वारा नमस्कार योग्य उन
भिक्षु ब्रह्मचारी को आदर पूर्वक बैठा कर कल्किजी ने प्रश्न किया—
आप कौन हैं ? हमारे सौभाग्य से ही आपका यहाँ आगमन हुआ है ।२।
पापों से परे रहने वाले जो सत्पुरुष सब के सुहृद है, वे लोक-कल्याणार्थ
ही पृथिवी पर विचरण किये करते हैं ।३। भिक्षु ने कहा—हे श्रीपते !
मैं आपका आज्ञाकारी सत्युग हूँ । आपके अवतार का प्रत्यक्ष प्रभाव
देखने के निमित्त ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । ४। आप निरुपाधि एवं
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