Skip to content
SarvaKosh
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 155 of 259

Read in context
Page 155

४०८ ] [ कल्कि पुराण
तथा दयावन्त प्रभु का पूजन कर प्रणाम और स्तुति करने लगा ।१९८
धर्म बोला-हे प्रभो ! मैं अपना वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, इसे सुनिये !
मैं ब्रह्मस्वरूप धर्म आपके वक्ष स्थल से उत्पन्न हुआ हूँ । मेरे द्वारा
सभी प्राणियो के कार्यों की सिद्धि होती है ।१६।
देवाना मग्रणीर्हव्यकव्याना कामधुग्विभु ।
तवाज्ञया चराम्येव साधुकीर्त्तिकृदन्वहम् ।२०।
सोऽह कालेन वलिना बालनापि निराकृत. ।
शककाम्बोजशबरै. सर्वैरावासवासिना ।२१।
अधुना तेऽखिलाधार ! पादमूलमुपागता ।
यथा ससारकालाग्निसतप्ता साधवोऽर्दिता, ।२२।
इति वाग्भिरपूर्वाभिर्धर्मेण परितोषित ।
कल्कि' कलङ्कहर श्रीमानाह सहर्षयञ्छनैः ।२३।
धर्मं कृतायुग पश्य नरु चण्डाशुवशजम् ।
मा जानासि यथा जात धातृप्रार्थितविग्रहम् ।२४।
कीटाकँबौद्धदलनमिति मत्वा मुखो भव ।
अवैष्णवानामन्येषाम् तत्रोपद्रवकारिणाम् ।
जिघासुर्यामि सेजाभिश्चर गा त्वं निर्विभंरः ।२५।
देवताओ मे प्रथम गणना योग्य मे यज्ञाश रूप हव्य-कव्य के
अश का आधिकारी हूँ । मैं यज्ञ फल प्रदान करके साधुजन का अभीष्ट
पूर्ण करता हूँ। आपकी आज्ञा से मैं सदैव साधुओ का कार्य सिद्ध करता
हुआ घूमता हूँ ।२०। इस समय शक, कम्बोज, शबर आदि कलियुग के
शासन मे रहते हैं। कालक्रम के कारण मैं उस बलवान् कलि से ही
हारा हुआ हूँ ।२१। हे अखिलाधार ! इस समय साधुजन विश्वरूपी
कालाग्नि से सतप्त एव पीडित है। इसी लिए मैं आपके चरणो की
शरण मे उपस्थित हुआ हूँ ।२२। धर्म के इन अपूर्व वचनो को सुन कर
पाप हारी कल्कि जी सब के लिए प्रसन्न करने वाले वचन कहने लगे
।२३। उन्होने कहा--हे धर्म ! इधर देखो, सत्यग का आगमन हो चुका