कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसाक्षात् काल स्वरूप है । परन्तु क्षण, दण्ड और लवादि अ गो के
द्वारा इस समय उपाधि सहित हो गए है । यह सम्पूर्ण विश्व आपकी
ही माया से प्रकट हुआ है ।५। आपकी ही सत्ता का अनुभव करते हुए
यह पक्ष, दिवस, रात्रि, मास, ऋतु, सम्वत्सर, युगादि काल एव चौदहो
मनु-यह सभी नियमित रूप से विचरण करते है ।६।
स्वायम्भुवस्तु प्रथमस्तत स्वारोचिषो मनु ।
तृतीय उत्तमस्ताच्चतुर्थस्तामस स्मृत ।७।
पञ्चमो रैवत षष्टश्चाक्षुष परिकीर्त्तित ।
वैवस्वत सप्तमो वै ततः सावर्णिरष्टम ।८।
नवमो दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्तत ।
दशमो धर्म्मसावर्णिरेकादशः स उच्यते ।६।
रुद्रसावर्णिकस्तत्र मनुर्वै द्वादश स्मृत ।
त्रयोदशमनुर्वेदसावर्णिलोकविश्रुतः ।१०।
चतुर्दशेंद्रसावर्णिरेते तव विभूतयः ।
यान्त्यायान्ति प्रकाशन्ते नामरूपादिभेदत ११।
द्वादशाब्दसहस्रेण देवानाञ्च चतुर्युगम् ।
चत्वारि त्रीणि द्वे चैक सहस्रगणित मतम् ।१२।
तावच्छतानि चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव हि ।
सन्ध्याक्रमेण तेषान्तु सन्ध्यांशोऽपि तथाविध ।१३।
पहले मनु स्वायंभुव, दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे
तामस, पाँचवे रैवत छठवे चाक्षुष, सातवे वैवस्वत, आठवे सावर्णि,
नवे दक्षसावर्णि, दसवे ब्रह्मसावर्णि, ग्यारहवे धर्म सावर्णि, बारहवे
रुद्र सावर्णि, तेरहवे वेद सावर्णि और चौदहवे इन्द्र सावर्णि-यह चौदहो
मनु आपकी ही विभूति रूप है । यह सब अपने-अपने नाम रूपादि के
भेद से चलते हुए प्रकाशित होते हैं ।७-११। बारह हजार दिव्य वर्षो
की एक चतुर्युगी होती है, जिसके अनुसार चार हजार दिव्य वर्षो का
सत्युग, तीन हजार दिव्य वर्षो का त्रेता, दो हजार दिव्य वर्षो का द्वापर