कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०६
है । यह मरु नामक सूर्यव शी नरेश हैं । तुम्हे यह विदित ही है कि मैंने
ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थित होकर ही यह देह धारण किया है ।२४। कीटक
मे बौद्धो का दलन किया और जो तुम्हारे प्रति अधिक उपद्रव करने
मे तत्पर रहते हैं तथा जो वैष्णव नही है, उन्हे नष्ट करने के लिए मैं
सना सहित विचार कर रहा हूँ । अब तुम भी भय-रहित होकर पृथिवी
पर पनिशील रहो ।२५।
का भीतिस्ते क्व मोहोऽस्ति यज्ञदानतपोव्रतै. ।
सहितै सच्र विभो ! मयि सत्ये व्युपस्थिते ।२६ ।
अह यामि त्वयागच्छ स्वपुत्रैर्बान्धवै सह ।
विशा जयार्थं त्व शत्रुनिग्रहार्थं जगत्प्रिय ।२७।
इति कल्केर्वच श्रुत्वा धर्म. परमहर्षित ।
गन्तु कृतमतिस्तेन आधिपत्यममु' स्मरन् ।२८।
सिद्धाश्रमे निजनानवस्थाप्य स्त्रियश्च तः ।२६।
सन्नद्ध. साधुसत्कारवेदब्रह्ममहारथः।
नानाशास्त्रान्वेषणेषु सकलपवरकार्मुक. ।३०।
सप्तस्वराश्वो भूदेवसारथिर्वन्हिराश्रयः
क्रिय.भेदबलोपेत प्रवयौधर्म्मनायकः ।३१।
हे धर्म ! मैं स्वयं उपस्थित हूँ, सत्युग भी आ ही चुका है, तब
तुम भयभीत क्यो हो ? तुम व्यर्थ मोहित क्यो हो रहे हो ? अब तुम
यज्ञ, दान और व्रत के सहित पृथिवी पर स्वच्छन्द विचरण करो ।२६।
हे जगत्प्रिय ! तुम अपने पुत्र एव बाँधवो सहित शत्रुओ के निग्रह और
दिग्विजय के उद्देश्य से प्रस्थान करो । मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा ।२७।
कल्किजी के यह वचन सुन कर धर्म अत्यन्त आनन्दित हुआ और
अपने अधिपत्य का स्मरण करता हुआ, कल्किजी के साथ प्रस्थान मे
तत्पर हुआ ।२८। उस समय उसने अपनी स्त्री को सिद्धाश्रम मे स्थित
किया ।२६। धर्म का युद्ध-वेश साधु-सत्कार था । वेद और ब्रह्म महारथ
के रूप मे साकार हुए तथा विविध शास्त्रो के अन्वेषण ने धनुष का रूप
धारण किया ।३०। वेद के सात स्वर उसके रथ के अश्व हुए, ब्राह्मण