गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
॥ श्रीहरिः ॥
1958
गीता-संग्रह
[ पचीस विभिन्न गीता-ग्रन्थोंका सानुवाद संकलन ]
(चक्रमें अंकित नाम)
भगवतीगीता (पार्वतीगीता), अष्टावक्रगीता, अवधूतगीता, जीवन्मुक्तगीता, गणेशगीता, भिक्षुगीता, परमहंसगीता, षड्जगीता, पिंगलागीता, शम्प्याकगीता, मंकिगीता, आजगरगीता, हारीतगीता, वृत्रगीता, पराशरगीता, हंसगीता, ब्रह्मगीता, यमगीता, अगस्त्यगीता, रामगीता, उत्तरगीता...
गीताप्रेस, गोरखपुर
॥ श्रीहरिः ॥
1958
गीता-संग्रह
[ पच्चीस विभिन्न गीता-ग्रन्थोंका सानुवाद संकलन ]
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० २०७४ छठा पुनर्मुद्रण ६,०००
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( नब्बे रुपये )
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निवेदन
'गीता'—इस शब्दका सनातन-धर्म और संस्कृतिमें अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व है। कुरुक्षेत्रमें युद्धके लिये कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाएँ भयानक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होकर खड़ी थीं। महाविनाशकी स्पष्ट सम्भावना तथा स्वजनोंके मोहके कारण अर्जुन अपने कर्तव्यसे विचलित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे। इन्हीं विषम परिस्थितियोंमें भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको जिस ज्ञानामृतका पान कराकर उत्साहित एवं स्वस्थचित्त किया, वही भगवद्गीता है। महाभारतमें समाहित सात सौ श्लोकोंवाली इस दिव्य रचनामें जो ज्ञान समाहित है, वह मनुष्यमात्रके लिये विषम-से-विषम परिस्थितियोंमें भी संजीवनीतुल्य है। इसी कारण यह जन-जनमें लोकप्रिय होकर मात्र 'गीता' के नामसे प्रख्यात हुई।
युद्धके बाद बहुत काल बीतनेपर जब अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे भगवद्गीताके रूपमें सुने गये ज्ञानको पुनः सुननेकी इच्छा व्यक्त की तो भगवान् कृष्णको अर्जुनका विचलित चित्त होकर वह दिव्यज्ञान भूलना अप्रिय लगा तब उन्होंने अर्जुनसे कहा—
स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने।
न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः॥
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया।
इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम्॥
(महाभारत आश्वमेधिकपर्व १६।१२-१३)
'वह धर्म ब्रह्मपदकी प्राप्ति करानेके लिये पर्याप्त था, वह सारा-का-सारा धर्म उसी रूपमें फिर दोहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है। उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था। अब उस विषयका ज्ञान करानेके लिये मैं एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ।' फिर भगवान्ने अर्जुनको जो नवीन उपदेश दिया, वह उत्तरगीताके रूपमें उपलब्ध होता है,
[ ४ ]
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जिसका विद्वानोंमें बड़ा आदर रहा है। उत्तरगीतापर तो श्रीआद्यशंकराचार्यके गुरु श्रीगौड़पादाचार्यका भाष्य भी सौभाग्यसे उपलब्ध है।
शास्त्र तो अनन्त है; रुचियाँ, आवश्यकताएँ, मनःस्थितियाँ, परिस्थितियाँ इत्यादि भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इसीलिये नाना इतिहास-पुराणादि ग्रन्थोंमें विभिन्न श्रेष्ठ जनोंद्वारा समय-समयपर दिये गये उपदेशोंके साररूपमें अन्यान्य गीताएँ प्राप्त होती हैं। कुछ प्राचीन गीताएँ स्वतन्त्र ग्रन्थके रूपमें भी उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या शताधिक है। इनमें कई गीताएँ अत्यन्त प्रसिद्ध तथा बड़े महत्त्वकी हैं।
वस्तुतः वेदोंके तीन भाग हैं—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड एवं ज्ञानकाण्ड। इसमें ज्ञानकाण्ड अन्तिम है इसलिये इसे 'वेदान्त' भी कहते हैं। उपनिषदोंका मुख्य विषय प्रायः यही है। उपनिषदोंमें गूढ़ भाषाशैलीमें वर्णित इसी ज्ञानतत्त्वको प्रायः विभिन्न गीताओंमें सरल, सुबोध भाषाशैलीमें अभिव्यक्त किया गया है। कहीं-कहीं उसे समझानेके लिये मनोरंजक दृष्टान्तों अथवा सहायक अनुकूल पृष्ठभूमिका भी सम्यक् उपयोग किया गया है।
'गीता' के मूलमें संस्कृतका 'गीतम्' शब्द है, परंतु 'उपनिषद्' शब्द स्त्रीलिंग होने तथा उसके अनुकरणके कारण 'गीता' शब्द बना माना जाता है। इसीलिये विभिन्न गीताओंकी पुष्पिकाओंमें भगवद्गीतोपनिषद्, भगवतीगीतोपनिषद्, शिवगीतोपनिषद् इत्यादि पाया जाता है। विभिन्न गीताओंमें भगवान्के भिन्न-भिन्न स्वरूपोंकी विभूतियोंका भी विशद् विवरण तथा श्रोताद्वारा विस्मित होकर की गयी उनकी स्तुतियाँ भी मिलती हैं अतएव 'गीयते स्तूयते यः स गीता'—ऐसा भी कह सकते हैं।
गीताप्रेसद्वारा सर्वमान्य श्रीमद्भगवद्गीता तो विभिन्न भाष्यों, टीकाओंके साथ विभिन्न रूपोंमें प्रारम्भसे ही सतत प्रकाशित हो रही है, परंतु अन्यान्य महत्त्वपूर्ण गीताएँ आज भी जनसामान्यके लिये दुर्लभ हैं। अधिकाधिक गीता-ग्रन्थ प्रमाणिक पाठ तथा सुबोध
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हिन्दी अनुवादके साथ विज्ञ पाठकोंको एकत्र उपलब्ध हो जायँ तथा हमारी आर्ष ज्ञानराशि भी सुरक्षित तथा संरक्षित रहे इसी भावनासे विभिन्न गीताओंका सानुवाद संग्रह प्रकाशित किया जा रहा है। सुविधाजनक आकारवाले प्रस्तुत गुच्छकमें गणेशगीता, हंसगीता, नारदगीता, रामगीता, उत्तरगीता, अष्टावक्रगीता, अवधूतगीता, हारीतगीता, यमगीता, भगवतीगीता इत्यादि कुल २५ गीताओंको सानुवाद संकलित किया गया है। आशा है आर्ष साहित्यके प्रेमी तथा आत्मकल्याणके इच्छुक सभी पाठक इसका अध्ययन करके लाभान्वित होंगे।
—राधेश्याम खेमका
१- गणेशगीता (गणेशपुराण)
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| १. गणेशगीता [गणेशपुराणात्] | ७ |
| २. भिक्षुगीता [श्रीमद्भागवतमहापुराणात्] | ८५ |
| ३. परमहंसगीता [श्रीमद्भागवतमहापुराणात्] | १०२ |
| ४. षड्जगीता [महाभारतात्] | १४९ |
| ५. पिंगलागीता [महाभारतात्] | १६२ |
| ६. शम्पाकगीता [महाभारतात्] | १७७ |
| ७. मंकिगीता [महाभारतात्] | १८३ |
| ८. आजगरगीता [महाभारतात्] | १९५ |
| ९. हारीतगीता [महाभारतात्] | २०५ |
| १०. वृत्रगीता [महाभारतात्] | २११ |
| ११. पुत्रगीता [महाभारतात्] | २४१ |
| १२. कामगीता [महाभारतात्] | २५१ |
| १३. यमगीता ( १ ) [विष्णुमहापुराणात्] | २५७ |
| १४. यमगीता ( २ ) [अग्निमहापुराणात्] | २६९ |
| १५. हंसगीता ( १ ) [श्रीमद्भागवतमहापुराणात्] | २७७ |
| १६. हंसगीता ( २ ) [महाभारतात्] | २८९ |
| १७. नारदगीता [महाभारतात्] | ३०३ |
| १८. उत्तरगीता [महाभारतात्] | ३३७ |
| १९. रामगीता ( १ ) [अध्यात्मरामायणात्] | ३७६ |
| २०. रामगीता ( २ ) [अद्भुतरामायणात्] | ३९८ |
| २१. भगवतीगीता ( पार्वतीगीता ) [देवीपुराणात्] | ४२८ |
| २२. अष्टावक्रगीता [श्रीअष्टावक्रमुनिकृता] | ४७२ |
| २३. अवधूतगीता ( १ ) [भगवान् श्रीदत्तात्रेयकृता] | ५३७ |
| २४. अवधूतगीता ( २ ) [श्रीमद्भागवतमहापुराणात्] | ६२० |
| २५. जीवन्मुक्तगीता [भगवान् श्रीदत्तात्रेयकृता] | ६६७ |
गणेशगीता
(चित्र: भगवान् श्रीगणेशजी)
भगवान् श्रीगणेशजीद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश
गणेशगीता
[गणेशगीता गणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत कुल ग्यारह अध्यायोंमें विस्तृत है। इसमें मूलरूपसे सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीद्वारा राजा वरेण्यको दिये गये ब्रह्मविद्यारूपी उपदेशोंका वर्णन है, जिसे व्यासजीद्वारा अनादि सिद्धयोग कहा गया है। इसे सुनकर राजाको मुक्तिपद प्राप्त हो गया। इसी परम ज्ञानको व्यासजीने सूतजीको सुनाया, फिर क्रमशः ऋषि शौनक तथा परमभागवत शुकदेवजीने इसे प्राप्त किया। उपदेशोंके विषय प्रायः भगवद्गीताके समान ही हैं। इस गीतामें कर्मयोग, सांख्ययोग, भक्तियोग, योगसाधना, प्राणायाम, मानसपूजा, सगुणोपासना, विभूतियोग, गणेशजीके विश्वरूपका दर्शन, त्रिविध प्रकृति तथा उसके अनुसार जीवकी गति आदि अन्यान्य महत्त्वपूर्ण विषयोंका वर्णन है, जो साधन एवं तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे बड़ा कल्याणकारी है। इस गीताके अन्तमें इसके पाठ तथा मनन करनेका माहात्म्य भी वर्णित है। गाणपत्य-सम्प्रदायके अत्यन्त सम्माननीय इस ग्रन्थपर संस्कृत तथा मराठीमें कई टीकाएँ भी मिलती हैं, जो इसकी विशिष्टताकी परिचायक हैं। इसी गणेशगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
पहला अध्याय
सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम
शुक उवाच
एवमेव पुरा पृष्टः शौनकेन महात्मना।
स सूतः कथयामास गीतां व्यासमुखाच्छ्रुताम् ॥ १ ॥
**शुकदेवजी बोले—**पूर्वकालमें महात्मा शौनकके पूछनेपर सूतजीने व्यासजीके मुखसे श्रवण की हुई गीताका वर्णन किया था॥ १॥
सूत उवाच
अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया।
ततोऽतिरसवत्यातृमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥ २॥
**सूतजी बोले—**हे भगवन्! आपने अष्टादश पुराणोंके साररूप
- गणेशगीता * ९
अमृतका मुझे पान कराया, परंतु अब उससे भी अधिक रसीले उत्तम अमृतका पान करनेकी मेरी इच्छा है ॥ २ ॥
येनामृतमयो भूत्वा पुमान् ब्रह्मामृतं यतः।
योगामृतं महाभाग तन्मे करुणया वद ॥ ३ ॥
जिस अमृतको पाकर मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाते हैं, हे महाभाग! उस योगामृतका कृपाकर आप मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
व्यास उवाच
अथ गीतां प्रवक्ष्यामि योगमार्गप्रकाशिनीम्।
नियुक्ता पृच्छते सूत राज्ञे गजमुखेन या ॥ ४ ॥
व्यासजी बोले—हे सूतजी! योगमार्गको प्रकाशित करनेवाली गीताका अब तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको राजा वरेण्यके पूछनेपर सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीने कहा था ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच
विघ्नेश्वर महाबाहो सर्वविद्याविशारद।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ योगं मे वक्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
राजा वरेण्य बोले—हे विघ्नेश्वर! हे महाभुज! हे सर्वविद्याओंके पण्डित! हे सम्पूर्ण शास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले! आप मुझसे योगमार्गका वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच
सम्यग्व्यवसिता राजन् मतिस्तेऽनुग्रहान्मम।
शृणु गीतां प्रवक्ष्यामि योगामृतमयीं नृप ॥ ६ ॥
श्रीगजानन बोले—हे राजन्! मेरी कृपासे तुम्हारी बुद्धि निर्मल और स्थिर हो गयी है, सुनो, मैं योगामृतसे परिपूर्ण गीता तुमसे कहता हूँ ॥ ६ ॥
न योगं योगमित्याहुर्योगो योगो न च श्रियः।
न योगो विषयैर्योगो न च मात्रादिभिस्तथा ॥ ७ ॥
‘योग’ इस शब्दका ही अर्थ योग नहीं, लक्ष्मीकी प्राप्ति होनेका
१० * गीता-संग्रह *
नाम योग नहीं, विषय-सुखकी प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं और
इन्द्रियसम्पन्न होनेका नाम भी योग नहीं है ॥ ७॥
योगो यः पितृमात्रादेर्न स योगो नराधिप।
यो योगो बन्धुपुत्रादेर्यश्चाष्टभूतिभिः सह॥ ८॥
हे राजन्! माता-पिताके समागमका नाम योग नहीं है। आठ
प्रकारकी सिद्धि और बन्धुपुत्रादिकी प्राप्तिका नाम भी योग नहीं
है॥ ८॥
न स योगः स्त्रिया योगो जगदद्भुतरूपया।
राज्ययोगश्च नो योगो न योगो गजवाजिभिः॥ ९॥
अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, राज्यकी
प्राप्ति तथा हाथी-घोड़ेकी प्राप्तिका नाम भी योग नहीं है॥ ९॥
योगो नेन्द्रपदस्यापि योगो योगार्थिनः प्रियः।
योगो यः सत्यलोकस्य न स योगो मतो मम॥ १०॥
इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा प्रिय सिद्धिकी
इच्छा अथवा सत्यलोककी प्राप्तिको भी मैं योग नहीं मानता॥ १०॥
शैवस्य योगो नो योगो वैष्णवस्य पदस्य यः।
न योगो भूप सूर्यत्वं चन्द्रत्वं न कुबेरता॥ ११॥
हे राजन्! शिवपदकी प्राप्ति होना, वैष्णवपदकी प्राप्ति होना,
सूर्य-चन्द्र और कुबेरके पदकी प्राप्ति होनेका भी नाम योग नहीं
है॥ ११॥
नानिलत्वं नानलत्वं नामरत्वं न कालता।
न वारुण्यं न नैर्ऋत्यं योगो न सार्वभौमता॥ १२॥
वायुस्वरूप, अग्निस্বরূপ, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्वरूप,
निर्ऋतिस्वरूप अथवा सम्पूर्ण पृथ्वीके आधिपत्य पानेका नाम भी योग
नहीं है॥ १२॥
- गणेशगीता * ११
योगं नानाविधं भूप युञ्जन्ति ज्ञानिनस्ततम्।
भवन्ति वितृषा लोके जिताहारा विरेतसः॥ १३॥
हे राजन्! योग अनेक प्रकारका है, परंतु [यथार्थ योग वही है] जिसको पाकर ज्ञानीलोग विषयोंको जीतकर ब्रह्मचर्यपूर्वक संसारसे विरक्त हो जाते हैं॥ १३॥
पावयन्त्यखिलांल्लोकान् वशीकृतजगत्त्रयः।
करुणापूर्णहृदया बोधयन्त्यपि कांश्चन॥ १४॥
ज्ञानीलोग तीनों लोकोंको वशमें करके सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है और वे सत्पात्रोंको ज्ञान भी प्रदान करते हैं॥ १४॥
जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी।
निमील्याक्षीणि पश्यन्तः परं ब्रह्म हृदि स्थितम्॥ १५॥
वे जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी सरोवरमें मग्न रहते हैं और नेत्र मूँदकर अपने हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते रहते हैं॥ १५॥
ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृते।
भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते॥ १६॥
योगसे वशीभूत किये अपने चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हुए वे सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझते हैं॥ १६॥
येन केनचिदाच्छिन्ना येन केनचिदाहताः।
येन केनचिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः॥ १७॥
करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले।
अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेन्द्रियाः॥ १८॥
कहीं किसी प्रकारसे स्वयंको छिपाये हुए, कहीं किसीसे प्रताडित, कहीं किसीसे बुलाये गये और कहीं किसीसे आश्रित होकर दयापूर्ण हृदयसे क्रोधको जीते हुए जितेन्द्रिय वे योगी लोकोंपर अनुग्रह करनेके
१२ * गीता-संग्रह *
लिये ही पृथ्वीपर विचरते हैं॥ १७-१८॥
देहमात्रभृतो भूप समलोष्टाश्मकाञ्चनाः।
एतादृशा महाभाग्याः स्युश्चक्षुर्गोचराः प्रिय॥ १९॥
तमिदानीमहं वक्ष्ये शृणु योगमनुत्तमम्।
श्रुत्वा यं मुच्यते जन्तुः पापेभ्यो भवसागरात्॥ २०॥
प्रिय राजन्! वे केवल देहमात्रको ही धारण करनेवाले, मिट्टी-पत्थर तथा स्वर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले—इस प्रकारके महाभाग पुरुष जिस योगके द्वारा दृष्टिगोचर हो जाते हैं, उस श्रेष्ठ योगको मैं तुमसे अब कहता हूँ; सुनो, जिसके श्रवण करनेसे प्राणी पापोंसे और भवसागरसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥
शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप।
याभेदबुद्धिर्योगः स सम्यग्योगो मतो मम॥ २१॥
हे राजन्! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो अभेदबुद्धिरूप योग है, उसीको मैं यथार्थ योग मानता हूँ॥ २१॥
अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च।
कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया॥ २२॥
मैं ही अपनी लीलासे अनेक वेष धारण करता हुआ इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ॥ २२॥
अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः।
अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय॥ २३॥
हे प्रिय! मैं ही महाविष्णु, मैं ही सदाशिव, मैं ही महाशक्ति और मैं ही सूर्य हूँ॥ २३॥
अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा।
अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम्॥ २४॥
एकमात्र मैं ही मनुष्योंका स्वामी हूँ,
- गणेशगीता * १३
तथा गणेश—] इन पाँच प्रकारसे मैं पूर्वकालमें उत्पन्न हुआ हूँ, मैं जगत्के कारणका भी कारण हूँ, मुझको अज्ञानीलोग नहीं जानते ॥ २४ ॥
मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश ॥ २५ ॥
वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च ।
सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि ॥ २६ ॥
तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च ।
मनुष्याः पर्वताः साध्याः सिद्धा रक्षोगणास्तथा ॥ २७ ॥
अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल और दसों दिशाएँ, आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यक्ष, वृक्ष, पक्षियोंके समूह, इक्कीस स्वर्ग, नाग, सात वन, मनुष्य, पर्वत, साध्य, सिद्ध, राक्षस इत्यादि सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ २५—२७ ॥
अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः ।
अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः ॥ २८ ॥
मैं ही सबका साक्षी, सम्पूर्ण जगत्का नेत्र, सभी कर्मोंसे अलिप्त, निर्विकार, अप्रमेय, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूँ ॥ २८ ॥
अहमेव परं ब्रह्माव्ययानन्दात्मकं नृप ।
मोहयत्यखिलान् माया श्रेष्ठान् मम नरानमून् ॥ २९ ॥
हे राजन्! मैं ही अव्यय आनन्दस्वरूप परब्रह्म हूँ, मेरी माया सम्पूर्ण जगत्को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको भी मोहित करती है ॥ २९ ॥
सर्वदा षड्विकारेषु तानियं योजयेद् भृशम् ।
हित्वाजापटलं जग्मुरनेकैर्जन्मभिः शनैः ॥ ३० ॥
विरज्य विन्दति ब्रह्म विषयेषु सुबोधतः ।
अच्छेद्यं शस्त्रसङ्घातैरदाह्यमनलेन च ॥ ३१ ॥
१४
* गीता-संग्रह *
अक्लेद्यं भूप भुवनैरशोष्यं मारुतेन च।
अवध्यं वध्यमानेऽपि शरीरेऽस्मिन्नराधिप ॥ ३२ ॥
वह माया सदा काम-क्रोधादि छः विकारोंमें इन प्राणियोंको लगा देती है। (योग)-से जब शनैः-शनैः अनेक जन्मके मायाके कपट दूर हो जाते हैं, तब यह प्राणी विषयोंसे जागकर और उनसे विरक्त होकर [इस] ब्रह्मको जानता है, जो ब्रह्म शस्त्रसमूहोंसे कट नहीं सकता और अग्निसे दग्ध नहीं हो सकता, जलसे गल नहीं सकता, पवनसे सूख नहीं सकता और हे राजन् ! जो इस शरीरके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता ॥ ३०—३२ ॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रशंसन्ति श्रुतीरिताम्।
त्रयीवादरता मूढास्ततोऽन्यन्मन्वतेऽपि न ॥ ३३ ॥
वेदत्रयीमें श्रद्धा रखनेवाले तथा केवल कर्म करनेवाले मूढ लोग श्रुतिमें कही हुई फलप्रतिपादक वाणीकी ही प्रशंसा करते हैं, दूसरी बातको स्वीकार नहीं करते ॥ ३३ ॥
कुर्वन्ति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम्।
स्वर्गैश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगबुद्धयः ॥ ३४ ॥
इसी कारण वे जन्म और मृत्युके फलको देनेवाले कर्मोंको सदा करते रहते हैं, वे स्वर्गके ऐश्वर्योंके भोगमें ही लगे रहते हैं, उन भोगबुद्धिवालोंकी चेतना नष्ट हो जाती है ॥ ३४ ॥
सम्पादयन्ति ते भूप स्वात्मना निजबन्धनम्।
संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः ॥ ३५ ॥
हे राजन् ! वे स्वयं ही अपने निमित्त बन्धन बनाते हैं, मूढ़ और कर्मपरायण मनुष्य संसारचक्रमें पड़े रहते हैं ॥ ३५ ॥
यस्य यद्विहितं कर्म तत्कर्तव्यं मदर्पणम्।
ततोऽस्य कर्मबीजानामुच्छिन्नाः स्युर्महाङ्कुराः ॥ ३६ ॥
जिसके लिये जो कर्मविधान है, वह कर्म मुझे अर्पण कर देना
* गणेशगीता * । १५
चाहिये, तभी इन प्राणियोंके कर्मरूप बीजोंके महान् अंकुर नष्ट हो सकते हैं॥ ३६॥
चित्तशुद्धिश्च महती विज्ञानसाधिका भवेत्।
विज्ञानेन हि विज्ञातं परं ब्रह्म मुनीश्वरैः॥ ३७॥
चित्तकी शुद्धि ही विज्ञानकी प्राप्तिमें प्रधान साधन होती है, विज्ञानके द्वारा ही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है॥ ३७॥
तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप।
न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा॥ ३८॥
हे राजन्! इस कारण जो भी कर्म करे, वह बुद्धियुक्त होकर करे। किसीको स्वकर्म और स्वधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये॥ ३८॥
जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विन्दति।
आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते॥ ३९॥
यदि कोई कर्मका त्याग करेगा तो उससे उसे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होगी। ज्ञानमें प्रथम अधिकार भी कर्मसे ही प्राप्त होता है॥ ३९॥
कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति।
स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते॥ ४०॥
कर्मसे शुद्धहृदय होकर (साधक) अभेदबुद्धिको प्राप्त होता है, उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर हो जाता है॥ ४०॥
योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम्।
पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥ ४१॥
बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थ्यालोकयेत्पुमान्।
सुखे दुःखे तथामर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥ ४२॥
हे राजन्! मैं दूसरा उत्तम योग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बन्धु तथा प्रियजनमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर-भीतर एक-सी दृष्टि रखते हुए, सुख-दुःख, क्रोध, हर्ष, भय—इनमें समान रहना चाहिये॥ ४१-४२॥
१६ * गीता-संग्रह *
रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च।
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभे मृतावपि॥ ४३॥
रोगकी प्राप्ति हो चाहे भोगकी प्राप्ति हो, जय हो या विजय हो, लक्ष्मीकी प्राप्ति हो या अप्राप्ति हो, हानि-लाभ, जन्म-मरण—इन सबमें मनको समान रखना उचित है॥ ४३॥
समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम्।
सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिले॥ ४४॥
द्विजे ह्रदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि।
विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च॥ ४५॥
गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च।
सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते॥ ४६॥
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर-भीतर मुझे स्थित जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु, ब्राह्मण, सरोवर, पापहारी महानदी, तीर्थ, क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग, गन्धर्व, मनुष्य और पक्षी—इन सबमें जो मुझे सदा समान दृष्टिसे देखता है, वही योगको जाननेवाला कहलाता है॥ ४४–४६॥
सम्पराहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः।
सर्वत्र समताबुद्धिः स योगी भूप मे मतः॥ ४७॥
हे राजन्! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही मेरी दृष्टिमें योगी है॥ ४७॥
आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः।
स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥ ४८॥
धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि।
अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधिषु कौशलम्॥ ४९॥
अपने धर्ममें आसक्त चित्तवाले प्राणीकी दैवयोगसे जो आत्मा
- गणेशगीता * १७
और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है, उस बुद्धिके योगका ही नाम योग है और उसी बुद्धिके न होनेसे यह प्राणी धर्म-अधर्मका त्याग कर देता है, इस कारण योगमें बुद्धि लगाना उचित है, कर्तव्य कर्मोंमें कुशलता ही योग है ॥ ४८-४९॥
धर्माधर्मफले त्यक्त्वा मनीषी विजितेन्द्रियः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्तः स्थानं संयात्यनामयम्॥ ५०॥
जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् व्यक्ति धर्म और अधर्मके फलका त्याग करके जन्म-बन्धनसे मुक्त होकर अनामय परमपदको प्राप्त होता है॥ ५०॥
यदा ह्यज्ञानकालुष्यं जन्तोर्बुद्धिः क्रमिष्यति।
तदासौ याति वैराग्यं वेदवाक्यादिषु क्रमात्॥ ५१॥
जब इस प्राणीकी बुद्धि अविद्याके अन्धकारसे—अविद्यासे रहित होगी, तब क्रमसे इस प्राणीका सकाम वेदवाक्यादिकोंमें वैराग्य हो जाता है॥ ५१॥
त्रयीविप्रतिपन्नस्य स्थाणुत्वं यास्यते यदा।
परात्मन्यचला बुद्धिस्तदासौ योगमाप्नुयात्॥ ५२॥
जब तीनों वेदोंमें प्रतिपादित किये गये सकाम कर्मसे यह बुद्धि पूर्णतः और परमात्मामें लगकर निश्चल हो जाती है, तब इस प्राणीको योगकी प्राप्ति होती है॥ ५२॥
मानसानखिलान् कामान् यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय।
स्वात्मनि स्वेन सन्तुष्टः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते॥ ५३॥
हे प्रिय! जब यह बुद्धिमान् व्यक्ति मनकी सम्पूर्ण इच्छाओंका त्याग कर दे और अपने आत्मामें आपहीसे सन्तुष्ट हो जाय, तब यह स्थिरबुद्धि कहलाता है॥ ५३॥
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसङ्गमे।
गतसाध्वसरुद्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते॥ ५४॥
किसी प्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न रखनेवाला, दुःखमें
१८ * गीता-संग्रह *
अनुद्विग्न, भय, क्रोध और रागसे रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है ॥ ५४ ॥
यथायं कमठोऽङ्गानि सङ्कोचयति सर्वतः।
विषयेभ्यस्तथा खानि सङ्कर्षेद्योगतत्परः ॥ ५५ ॥
जिस प्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंगोंको सिकोड़ लेता है, इसी प्रकारसे योगीको उचित है कि वह विषयोंसे इन्द्रियोंको समेट ले ॥ ५५ ॥
व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्य वर्ष्मिणः।
विना रागं न रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति ॥ ५६ ॥
भोजन त्यागनेवाले साधकके विषय तो नष्ट हो जाते हैं, परंतु उनका अनुभव बना रहता है। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे वह राग भी नष्ट हो जाता है ॥ ५६ ॥
विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः।
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरन्ति बलतो मनः ॥ ५७ ॥
हे राजन्! इन्द्रियगण मोक्षके लिये प्रयत्न करनेवाले विद्वान् पुरुषका भी मन बलात् हर लेती हैं। इस कारण बुद्धिमान् पुरुषको इन्द्रियोंको वशमें करनेका यत्न करना चाहिये ॥ ५७ ॥
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत्।
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ॥ ५८ ॥
इन्द्रियोंको वशमें करके योगीको सदा मेरे परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो गयी हैं, उसीको स्थितप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥
चिन्तयानस्य विषयान् सङ्गस्तेषूपजायते।
कामः सञ्जायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्धते ॥ ५९ ॥
विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उनमें अनुराग हो जाता है, आसक्ति (अनुराग)-से कामना होती है और उससे क्रोधकी उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥
* गणेशगीता * १९
क्रोधादज्ञानसम्भूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः।
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति॥६०॥
क्रोधसे अज्ञानकी उत्पत्ति और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होनेसे वह प्राणी भी नष्ट हो जाता है॥६०॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान् यस्तु खैश्चरेत्।
स्वाधीनहृदयो वश्यैः सन्तोषं स समृच्छति॥६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आयी इन्द्रियोंसे विषयोंका भोग करके भी चित्तको अपने वशमें रखनेवाले महापुरुष सन्तोष और शान्तिको प्राप्त होते हैं॥६१॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य सन्तोषे विलयो भवेत्।
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत्॥६२॥
सन्तोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार स्थिरप्रज्ञावाले योगीका मन प्रसन्न रहता है॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना।
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम्॥६३॥
हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती और बुद्धिके बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धाके बिना शान्ति नहीं होती और शान्तिके बिना सुख नहीं होता॥६३॥
इन्द्रियाश्वान् विचरतो विषयाननुवर्तते।
यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥
पवन जिस प्रकार नावको जलमें डुबो देता है, वैसे ही जो मन विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ोंके पीछे भागता है, वह प्रज्ञाको हर लेता है॥६४॥