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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 17 of 675

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Page 17

१६ * गीता-संग्रह *


रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च।
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभे मृतावपि॥ ४३॥
रोगकी प्राप्ति हो चाहे भोगकी प्राप्ति हो, जय हो या विजय हो, लक्ष्मीकी प्राप्ति हो या अप्राप्ति हो, हानि-लाभ, जन्म-मरण—इन सबमें मनको समान रखना उचित है॥ ४३॥

समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम्।
सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिले॥ ४४॥
द्विजे ह्रदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि।
विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च॥ ४५॥
गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च।
सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते॥ ४६॥
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर-भीतर मुझे स्थित जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु, ब्राह्मण, सरोवर, पापहारी महानदी, तीर्थ, क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग, गन्धर्व, मनुष्य और पक्षी—इन सबमें जो मुझे सदा समान दृष्टिसे देखता है, वही योगको जाननेवाला कहलाता है॥ ४४–४६॥

सम्पराहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः।
सर्वत्र समताबुद्धिः स योगी भूप मे मतः॥ ४७॥
हे राजन्! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही मेरी दृष्टिमें योगी है॥ ४७॥

आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः।
स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥ ४८॥
धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि।
अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधिषु कौशलम्॥ ४९॥
अपने धर्ममें आसक्त चित्तवाले प्राणीकी दैवयोगसे जो आत्मा