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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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  • गणेशगीता * ११

योगं नानाविधं भूप युञ्जन्ति ज्ञानिनस्ततम्।
भवन्ति वितृषा लोके जिताहारा विरेतसः॥ १३॥
हे राजन्! योग अनेक प्रकारका है, परंतु [यथार्थ योग वही है] जिसको पाकर ज्ञानीलोग विषयोंको जीतकर ब्रह्मचर्यपूर्वक संसारसे विरक्त हो जाते हैं॥ १३॥

पावयन्त्यखिलांल्लोकान् वशीकृतजगत्त्रयः।
करुणापूर्णहृदया बोधयन्त्यपि कांश्चन॥ १४॥
ज्ञानीलोग तीनों लोकोंको वशमें करके सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है और वे सत्पात्रोंको ज्ञान भी प्रदान करते हैं॥ १४॥

जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी।
निमील्याक्षीणि पश्यन्तः परं ब्रह्म हृदि स्थितम्॥ १५॥
वे जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी सरोवरमें मग्न रहते हैं और नेत्र मूँदकर अपने हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते रहते हैं॥ १५॥

ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृते।
भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते॥ १६॥
योगसे वशीभूत किये अपने चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हुए वे सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझते हैं॥ १६॥

येन केनचिदाच्छिन्ना येन केनचिदाहताः।
येन केनचिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः॥ १७॥
करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले।
अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेन्द्रियाः॥ १८॥
कहीं किसी प्रकारसे स्वयंको छिपाये हुए, कहीं किसीसे प्रताडित, कहीं किसीसे बुलाये गये और कहीं किसीसे आश्रित होकर दयापूर्ण हृदयसे क्रोधको जीते हुए जितेन्द्रिय वे योगी लोकोंपर अनुग्रह करनेके