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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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Page 14
  • गणेशगीता * १३

तथा गणेश—] इन पाँच प्रकारसे मैं पूर्वकालमें उत्पन्न हुआ हूँ, मैं जगत्के कारणका भी कारण हूँ, मुझको अज्ञानीलोग नहीं जानते ॥ २४ ॥

मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश ॥ २५ ॥
वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च ।
सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि ॥ २६ ॥
तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च ।
मनुष्याः पर्वताः साध्याः सिद्धा रक्षोगणास्तथा ॥ २७ ॥

अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल और दसों दिशाएँ, आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यक्ष, वृक्ष, पक्षियोंके समूह, इक्कीस स्वर्ग, नाग, सात वन, मनुष्य, पर्वत, साध्य, सिद्ध, राक्षस इत्यादि सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ २५—२७ ॥

अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः ।
अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः ॥ २८ ॥

मैं ही सबका साक्षी, सम्पूर्ण जगत्का नेत्र, सभी कर्मोंसे अलिप्त, निर्विकार, अप्रमेय, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूँ ॥ २८ ॥

अहमेव परं ब्रह्माव्ययानन्दात्मकं नृप ।
मोहयत्यखिलान् माया श्रेष्ठान् मम नरानमून् ॥ २९ ॥

हे राजन्! मैं ही अव्यय आनन्दस्वरूप परब्रह्म हूँ, मेरी माया सम्पूर्ण जगत्को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको भी मोहित करती है ॥ २९ ॥

सर्वदा षड्विकारेषु तानियं योजयेद् भृशम् ।
हित्वाजापटलं जग्मुरनेकैर्जन्मभिः शनैः ॥ ३० ॥
विरज्य विन्दति ब्रह्म विषयेषु सुबोधतः ।
अच्छेद्यं शस्त्रसङ्घातैरदाह्यमनलेन च ॥ ३१ ॥