गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- गणेशगीता * १७
और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है, उस बुद्धिके योगका ही नाम योग है और उसी बुद्धिके न होनेसे यह प्राणी धर्म-अधर्मका त्याग कर देता है, इस कारण योगमें बुद्धि लगाना उचित है, कर्तव्य कर्मोंमें कुशलता ही योग है ॥ ४८-४९॥
धर्माधर्मफले त्यक्त्वा मनीषी विजितेन्द्रियः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्तः स्थानं संयात्यनामयम्॥ ५०॥
जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् व्यक्ति धर्म और अधर्मके फलका त्याग करके जन्म-बन्धनसे मुक्त होकर अनामय परमपदको प्राप्त होता है॥ ५०॥
यदा ह्यज्ञानकालुष्यं जन्तोर्बुद्धिः क्रमिष्यति।
तदासौ याति वैराग्यं वेदवाक्यादिषु क्रमात्॥ ५१॥
जब इस प्राणीकी बुद्धि अविद्याके अन्धकारसे—अविद्यासे रहित होगी, तब क्रमसे इस प्राणीका सकाम वेदवाक्यादिकोंमें वैराग्य हो जाता है॥ ५१॥
त्रयीविप्रतिपन्नस्य स्थाणुत्वं यास्यते यदा।
परात्मन्यचला बुद्धिस्तदासौ योगमाप्नुयात्॥ ५२॥
जब तीनों वेदोंमें प्रतिपादित किये गये सकाम कर्मसे यह बुद्धि पूर्णतः और परमात्मामें लगकर निश्चल हो जाती है, तब इस प्राणीको योगकी प्राप्ति होती है॥ ५२॥
मानसानखिलान् कामान् यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय।
स्वात्मनि स्वेन सन्तुष्टः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते॥ ५३॥
हे प्रिय! जब यह बुद्धिमान् व्यक्ति मनकी सम्पूर्ण इच्छाओंका त्याग कर दे और अपने आत्मामें आपहीसे सन्तुष्ट हो जाय, तब यह स्थिरबुद्धि कहलाता है॥ ५३॥
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसङ्गमे।
गतसाध्वसरुद्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते॥ ५४॥
किसी प्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न रखनेवाला, दुःखमें