गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* गणेशगीता * १९
क्रोधादज्ञानसम्भूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः।
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति॥६०॥
क्रोधसे अज्ञानकी उत्पत्ति और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होनेसे वह प्राणी भी नष्ट हो जाता है॥६०॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान् यस्तु खैश्चरेत्।
स्वाधीनहृदयो वश्यैः सन्तोषं स समृच्छति॥६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आयी इन्द्रियोंसे विषयोंका भोग करके भी चित्तको अपने वशमें रखनेवाले महापुरुष सन्तोष और शान्तिको प्राप्त होते हैं॥६१॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य सन्तोषे विलयो भवेत्।
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत्॥६२॥
सन्तोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार स्थिरप्रज्ञावाले योगीका मन प्रसन्न रहता है॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना।
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम्॥६३॥
हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती और बुद्धिके बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धाके बिना शान्ति नहीं होती और शान्तिके बिना सुख नहीं होता॥६३॥
इन्द्रियाश्वान् विचरतो विषयाननुवर्तते।
यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥
पवन जिस प्रकार नावको जलमें डुबो देता है, वैसे ही जो मन विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ोंके पीछे भागता है, वह प्रज्ञाको हर लेता है॥६४॥