गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextगणेशगीता
[गणेशगीता गणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत कुल ग्यारह अध्यायोंमें विस्तृत है। इसमें मूलरूपसे सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीद्वारा राजा वरेण्यको दिये गये ब्रह्मविद्यारूपी उपदेशोंका वर्णन है, जिसे व्यासजीद्वारा अनादि सिद्धयोग कहा गया है। इसे सुनकर राजाको मुक्तिपद प्राप्त हो गया। इसी परम ज्ञानको व्यासजीने सूतजीको सुनाया, फिर क्रमशः ऋषि शौनक तथा परमभागवत शुकदेवजीने इसे प्राप्त किया। उपदेशोंके विषय प्रायः भगवद्गीताके समान ही हैं। इस गीतामें कर्मयोग, सांख्ययोग, भक्तियोग, योगसाधना, प्राणायाम, मानसपूजा, सगुणोपासना, विभूतियोग, गणेशजीके विश्वरूपका दर्शन, त्रिविध प्रकृति तथा उसके अनुसार जीवकी गति आदि अन्यान्य महत्त्वपूर्ण विषयोंका वर्णन है, जो साधन एवं तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे बड़ा कल्याणकारी है। इस गीताके अन्तमें इसके पाठ तथा मनन करनेका माहात्म्य भी वर्णित है। गाणपत्य-सम्प्रदायके अत्यन्त सम्माननीय इस ग्रन्थपर संस्कृत तथा मराठीमें कई टीकाएँ भी मिलती हैं, जो इसकी विशिष्टताकी परिचायक हैं। इसी गणेशगीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
पहला अध्याय
सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम
शुक उवाच
एवमेव पुरा पृष्टः शौनकेन महात्मना।
स सूतः कथयामास गीतां व्यासमुखाच्छ्रुताम् ॥ १ ॥
**शुकदेवजी बोले—**पूर्वकालमें महात्मा शौनकके पूछनेपर सूतजीने व्यासजीके मुखसे श्रवण की हुई गीताका वर्णन किया था॥ १॥
सूत उवाच
अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया।
ततोऽतिरसवत्यातृमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥ २॥
**सूतजी बोले—**हे भगवन्! आपने अष्टादश पुराणोंके साररूप