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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं गणेश पुराण मंगलाचरण

गणेशगीता
हिन्दी टीका सहित

॥ श्रीः ॥
गणेशगीता।
कात्यायनगोत्रोद्भवकामेश्वरनाथसंस्कृतपाठ-
शालामुख्याध्यापकपण्डितज्वालाप्रसाद-
मिश्रकृतभाषाटीकासमलंकृता ।
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

संस्करण : मई २०१३, संवत् २०७०
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
Printers & Publishers :
Khemraj Shrikrishnadass,
Prop: Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.
Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass
Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004,
at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial
Estate, Pune 411 013.

प्रस्तावना.
𑁍𑁍𑁍
संसारमें जन्म ले जिस प्राणीने अपना परलोक न सुधारा
उसका जीवन कुछ इसी जन्ममें नहीं किन्तु अनेक जन्म-
पर्य्यन्त वृथा गया. यह प्रसिद्ध है कि अनेक योनि हैं परन्तु
मुक्तिसाधनके लिये मनुष्यशरीरही है,यह शरीर पाकर मनुष्य
संसारसागरसे पार जानेके निमित्त मानों एक चरण नौकामें
धर चुका. यदि दूसरे चरण रखनेका यत्न न किया तो फिर
महाअंधकारमें पतित होता है। मुक्तिसाधनके निमित्त वेदान्त
ग्रंथोंका विचार और उसके अनुसार कर्त्तव्य करना उचित है
वेदान्तग्रंथोंमें सर्वथा ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन किया है और उसके
साधन वर्णन किये हैं जिनके श्रवण मनन निदिध्यासनसे
महात्मा मुक्तिको प्राप्त होते हैं उन वेदान्तग्रंथोंमें सर्व शिरोमणि
और विख्यात श्रीमद्भगवद्गीता है ऐसा कौन विद्वान् है जो
इसका विचार न करताहो। जिन्हें थोडाभी ज्ञान है वह स्त्रीपुरुष
पूजामें इसका पाठ अवश्य करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता घर घर
विराज रही है और उद्धार कर रही है ठीक उसीकी छायारूप
श्रीमद्वेदव्यासप्रणीत गणेशपुराणान्तर्गत एकादश अध्यायमें
श्रीमद्गणेशगीता है जो वेदान्तका साररूप है। इसमें श्रीगणेशजी

( ४ ) प्रस्तावना ।
और वरेण्यराजाका संवाद है जिसमें गणेशजीने राजाको
ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया है और उसके प्रभावसे राजा मुक्ति
पदवीको प्राप्त हुआहै उसी गणेशगीताकी भाषाटीका श्रीयुत
परमगुणग्राही वैश्यवंशादिवाकर सेठजी श्रीखेमराज-श्रीकृष्ण-
दासजीकी आज्ञासे सरल भाषामें जो सबकी समझमें आसके
किया है और अक्षरार्थ स्पष्टरीतिसे लिख दिया है जिससे जिन्हें
पढनेका थोडाभी ज्ञान है वह भली प्रकार समझ सकें और
तदनुकूल आचरणकर शान्ति लाभ करें. यद्यपि यह ग्रंथ
छोटाहै परन्तु सांख्ययोगवेदान्तका सार इसमें मथकर श्रीगणे-
शजीने वर्णन कियाहै इसके अनुसार कर्त्तव्य करनेसे परम
शान्तिलाभ होती है। इसके देखनेसे यह स्पष्ट विदित होता है
कि ब्रह्ममय होनेसे क्या दशा होजाती है और वह किस
प्रकारके वचन कहता है यह सब कुछ भगवान् गणेशजीके
वचनोंने स्पष्ट कर दिया है जो गणेशजीके भक्तोंका सर्वस्व है.
महात्माओंसे निवेदन है कि इसका अवलोकनकर मेरे परि-
श्रमको सफल कीजिये और दृष्टिदोषसे कहीं त्रुटि रहगई हो
उसे क्षमा कीजिये कारण कि सर्वज्ञ तो परमेश्वर है ॥
पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र
मुहल्ला दिनदारपुरा,
मुरादाबाद.

॥ श्रीः ॥
श्रीगणेशाय नमः ।
गणेशगीता
भाषाटीका सहित
दोहा-विघ्नहरण मंगलकरण, शरण सुखददातार ॥
श्रीगणेश पदकमलयुग, वन्दौं वारंवार ॥ १ ॥
श्लोक-ब्रह्माणमथ विष्णुं च शिवं गणपतिं तथा ॥
अम्बिकां शारदां चापि वन्दे विघ्नोपशांतये ॥१॥
शुक उवाच ।
एवमेव पुरा पृष्टः शौनकेन महात्मना ॥
स सूतः कथयामास गीतां व्यासमुखाच्छ्रुताम् १

( ६ ) गणेशगीता-अ० १.
इसीप्रकारसे पूर्वकालमें महात्मा शौनकके पूछनेपर सूत-
जीने व्यासजीके मुखसे श्रवण कीहुई गीताको वर्णन कियाथा १
सूत उवाच ।
अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया ॥
ततोऽतिरसवत्पातुमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥२॥
सूतजी बोले हे भगवन् ! वेदव्यासजी आपने अष्टादश पुरा-
णका साररूप अमृत मुझे पान कराया, परन्तु अब उससेभी
अधिक रसीले उत्तम अमृतपान करनेकी मुझे इच्छा है ॥२॥
येनामृतमयो भूत्वा पुमान्ब्रह्मामृतं यतः ॥
योगामृतं महाभाग तन्मे करुणया वद ॥३॥
जिस अमृतको पानकर योगी ब्रह्मरूपको प्राप्त होजाते हैं
हे महाभाग ! वह कृपाकर आप मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
व्यास उवाच ।
अथ गीतां प्रवक्ष्यामि योगमार्गप्रकाशिनीम्॥
नियुक्ता पृच्छते सूत राज्ञे गजमुखेन या ॥४॥
व्यासजी बोले हे सूतजी ! योग मार्गकी प्रकाश करने-
वाली गीताका तुमसे वर्णन करताहूं कि जिसको वरेण्य

भाषाटीकासमेत । (७)
राजाके पूछनेपर सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीने
कहाथा ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच ।
विघ्नेश्वर महाबाहो सर्वविद्याविशारद ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ योगं मे वक्तुमर्हसि ॥५॥
वरेण्य राजा बोला कि हे विघ्न दूर करने हारे ! हे महा-
भुज ! हे सर्व विद्याओंके पंडित ! हे संपूर्ण शास्त्रके तत्त्वको
जानने वाले, आप मुझसे योगमार्गका वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
सम्यग्व्यवसिता राजन्मतिस्तेऽनुग्रहान्मम ॥
शृणु गीतां प्रवक्ष्यामि योगामृतमयीं नृप ॥६॥
श्रीभगवान् बोले. राजन्! मेरी कृपासे तुम्हारी बुद्धि निर्मल
और शास्त्रको ग्रहण करनेवाली है, सुनो मैं योगाऽमृत गीता
तुमसे कहताहूं ॥ ६ ॥
न योगं योगमित्याहुर्योगो योगो न च श्रियः॥
न योगो विषयैर्योगो न च मात्रादिभिस्तथा॥७॥
‘योग” इस शब्दकाही नाम योग नहीं, लक्ष्मीकी
प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं, विषय सुखकी प्राप्ति होनेका

( ८ ) गणेशगीता-अ० १.
नाम योग नहीं, इंद्रिय सम्पन्न होनेका नाम योग
नहीं है ॥ ७ ॥
योगो यः पितृमात्रादेर्न स योगो नराधिप ॥
यो योगो बन्धुपुत्रादेर्यश्चाष्टभूतिभिः सह ॥८॥
हे राजन् ! माता पिताके समागमका नाम योग नही,
आठ प्रकारकी सिद्धि और बंधुपुत्रादिकी प्राप्तिका नामभी
योग नहीं है ॥ ८ ॥
न स योगः स्त्रिया योगो जगदद्भुतरूपया ॥
राज्ययोगश्च नो योगो न योगो गजवाजिभिः९॥
अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है,
राज्यकी प्राप्ति तथा हाथी घोडेकी प्राप्तिका नाम योग
नहीं है ॥ ९ ॥
योगो नेन्द्रपदस्यापि योगो योगार्थिनः प्रियः॥
योगो यःसत्यलोकस्य न स योगो मतो मम १० .
इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा प्रिय
सिद्धिकी इच्छा करनेका नाम योग नहीं है, सत्यलोककी
प्राप्तिकोभी मैं योग नहीं मानता ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेत। ( ९ )
शैवस्य योगो नो योगो वैष्णवस्य पदस्य यः ॥
न योगो भूप सूर्य्यत्वं चन्द्रत्वंन कुबेरता ॥११॥
शिवपदकी प्राप्तिहोनी, वैष्णवपदकी प्राप्तिहोनी उसका भी
नाम योग नहीं, हे राजन् ! सूर्य चंद्र और कुबेरके पदकी
प्राप्ति होनेकाभी नाम योग नहीं ॥ ११ ॥
नानिलत्वं नानलत्वं नामरत्वं न कालता ॥
न वारुण्यं न नैर्ऋत्यं योगो न सार्वभौमता ॥१२॥
वायुस्वरूप, अग्निस্বরূপ, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्व-
रूप, निर्ऋतिस्वरूप, सम्पूर्ण पृथ्‍वीके राजपानेका नाम भी
योग नहीं है ॥ १२ ॥
योगं नानाविधं भूप युञ्जन्ति ज्ञानिनस्ततम् ॥
भवंति वितृषा लोके जिताहारा विरेतसः ॥१३॥
हे राजन् ! योग अनेक प्रकारका है, परन्तु योग वही है,
जिसको प्राप्त होकर ज्ञानी लोग संसारसे विरक्त होते हैं
तथा आहार जीतकर इच्छा रहित होते हैं ॥ १३ ॥
पावयन्त्यखिलांल्लोकान्वशीकृतजगत्त्रयाः ॥
करुणापूर्णहृदया बोधयन्त्यपि कांश्चन ॥१४॥

(१०) गणेशगीता-अ १.
ज्ञानीलोग तीनों जगत्को अपने वशमें करके सम्पूर्ण
जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है,
वह किसीको बोधभी करते हैं ॥ १४ ॥
जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी ॥
निमील्याक्षीणि पश्यंतः परं ब्रह्म हृदिस्थितम् १५
वह जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी पदमें मग्न होते हैं,
और नेत्रमूंदकर हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते हैं॥१५॥
ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृतम् ॥
भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते १६
योगसे वशीभूत किये चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हैं,
सम्पूर्ण प्राणियोंको ज्ञानी अपनी तुल्य जानते हैं ॥ १६ ॥
येन केनचिदाच्छिन्ना येनकेनचिदाहताः ॥
येन केन चिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः ॥ १७॥
कहीं किसी कारणसे आच्छन्न कहीं किसीसे ताडित, कहीं
किसीसे आकर्षित, कहीं किसीसे आश्रित ॥ १७ ॥
करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले ॥
अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेंद्रियाः।१८॥

भाषाटीकासमेत । ( ११ )
दयापूर्ण हृदय होकर पृथ्वीमें भ्रमण करते हैं, क्रोधको
जीते जितेन्द्रिय हुए, लोकोंपर अनुग्रह करनेको विचरते हैं १८
देहमात्रभृतो भूप समलोष्टाश्मकाञ्चनाः ॥
एतादृशा महाभाग्याःस्युश्चक्षुर्गोचराःप्रिय॥१९॥
हे राजन् ! वे केवल देहमात्रकोही धारण करनेहारे, मिट्टी,
पत्थर सुवर्णमें समान दृष्टि करनेवाले, इस प्रकारके महाभाग
पुरुष जिस योगके द्वारा दृष्टिगोचर होजाते हैं ॥ १९ ॥
तमिदानीमहं वक्ष्ये शृणु योगमनुत्तमम् ॥
श्रुत्वा यं मुच्यते जन्तुःपापेभ्यो भवसागरात् २०
उस श्रेष्ठ योगको मैं तुमसे इस समय कहता हूं जिसके
श्रवण करनेसे यह प्राणी पापोंसे और भवसागरसे पार हो
जाता है ॥ २० ॥
शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप॥
याऽभेदबुद्धिर्योगःस सम्यग्योगो मतो मम २१॥
हे राजन् ! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो ,अभेद
बुद्धि करनी है उसीका नाम मैं यथार्थ योग मानताहूं ॥२१॥
अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च ॥
कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया २२॥