Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

Page 237Permalink

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०५


कासाच्छ्वासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाच्चिरज्वरात् ।
मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलीशृतं पयः ॥ ४ ॥
लघुपंचमूलकी औषधियोंके द्वारा दूधको सिद्ध करके पीनेसे खाँसी, श्वास, शिरःशूल, पार्श्वशूल और बहुत पुराने दिनोंका ज्वर नष्ट होता है ॥ ४ ॥

क्षीरपाकविधि।
द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीरात्तोयं चतुर्गुणम् ।
क्षीरावशेषः कर्तव्यः क्षीरपाके त्वयं विधिः ॥ ५ ॥
क्षीरपाककी विधि यह है कि, जिस औषधिके साथ दुग्धपाक करना हो तो उस औषधिसे अठगुना दूध और दूधसे चौगुना जल लेकर सबको एकत्र कर पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे ॥ ५ ॥

त्रिकण्टकबलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ।
वर्चोमूत्रविबन्धघ्नं शोथज्वरहरं पयः ॥ ६ ॥
गोखरू, खिरेंटी, कटेरी और सोंठ इन औषधियोंके द्वारा यथाविधि सिद्ध कियेहुए दूधमें गुड डालकर पान करनेसे मल-मूत्रका अवरोध और सूजनसहित ज्वर दूर होता है ॥ ६ ॥

वृश्चीरबिल्ववर्षाभूः पयश्चोदकमेव च ।
पचेत्क्षीरावशिष्टं तु तद्धि सर्वज्वरापहम् ॥ ७ ॥
सफेद पुनर्नवा, बेलकी छाल और लालपुनर्नवा ये सब औषधि समान भाग और सब मिलाकर दो तोले, दूध १६ तोले और जल ६४ तोले लेकर सबको एकत्रकर पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । इस दूधको पान करनेसे सर्वप्रकारके ज्वर शमन होते हैं ॥ ७ ॥

शीतं वोष्णं ज्वरे क्षीरं यथास्वमौषधैः शृतम् ।
एरण्डमूलसिद्धं वा ज्वरे सपरिकर्तिके ॥ ८ ॥
पित्तज्वरमें और वातपित्तज्वरमें शीतल दुग्ध तथा वातज्वर और वातकफज्वरमें उष्ण दुग्ध वातनाशक औषधियोंके साथ पकाकर सेवन कराना चाहिये । एवं ज्वररोगीके गुदामें कतरनेकी समान पीडा होनेपर अण्डकी जडके साथ सिद्ध कियाहुआ दुग्ध पान कराना चाहिये ॥ ८ ॥

नासाज्वरमें आहवारि रस
क्षुद्रैला साभया कृष्णा लौहाभ्रखर्पराणि च ।
समभागं प्रकर्तव्यं द्विभागः पारदो मतः ॥ ९ ॥

Page 238Permalink

२०६ | भैषज्यरत्नावली | [ दुग्ध-

सर्वमेकत्र सम्मर्द्य द्रोणपुष्परसेन च ।
वल्लमात्रं प्रदातव्यं पुनर्नवरसैर्युतम् ॥ १० ॥

छोटी इलायची, हरड, पीपल, लोहा, अभ्रक और खपरिया ये प्रत्येक एक एक तोला और पारा दो तोले लेवे। सबको एकत्र द्रोणपुष्पीके रसमें खरल करके दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे इनमेंसे एक एक गोली पुनर्नवेके रसके साथ सेवन करावे ॥ ९ ॥ १० ॥

प्लीहानं यकृतं शोथमग्निमान्द्यमरोचकम् ।
नासाज्वरं विशेषेण सर्वं च विषमज्वरम् ॥
आह्ववारिरसो ह्येष नाशयेद्विकल्पतः ॥ ११ ॥

यह आह्ववारि नामक रस—प्लीहा, यकृत, शोथ, अग्निकी मंदता, अरुचि, नासा-ज्वर और विशेषकर सब प्रकारके विषमज्वरोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ११ ॥

गन्धककज्जलीविधि ।

कण्टकारी सिन्धुवारस्तथा पूतिकरञ्जकम् ।
एतेषां रसमादाय कृत्वा खर्परखण्डके ॥ १२ ॥
प्रक्षेप्यं गन्धकं तत्र ज्वालां मृद्वग्निना दहेत् ।
गन्धके स्नेहमापन्ने तत्समं पारदं क्षिपेत् ॥ १३ ॥
मिश्रीकृत्य ततो द्वाभ्यां द्रुतं तमवतारयेत् ।
आमर्दयेत्तथां तत्त यथा स्यात्कज्जलप्रभम् ॥ १४ ॥

कटेरी, सिम्हालू और दुर्गन्धकरञ्ज इनके स्वरसको समान भाग लेकर एक मिट्टीके नवीन पात्र (खीपडे) में रखकर उसमें गन्धकको डाल मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब गन्धक अच्छे प्रकारसे पिघलजाय तब उसमें गन्धकके समान भाग पारा डालदेवे फिर जब दोनों मिलकर एकमएक होजायं तब चूल्हेपरसे शीघ्र उतारकर लोहेके दण्डेसे खूब खरल करके कज्जलीसमान बनालेवें ॥ १२–१४ ॥

ततस्तु रक्तिकामस्य माषैकं जीरकस्य च ।
माषैकं लवणस्यापि पर्णे कृत्वा निधापयेत् ॥ १५ ॥
ज्वरे त्रिदोषजे घोरे जलमुष्णं पिबेदनु ।
छर्द्यां शर्करया दद्यात् सामे दद्यात्तथा गुडम् ॥ १६ ॥

Page 239Permalink

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०७

क्षये छागीभवं क्षीरं प्रदद्यादनुपानकम् ।
रक्तातिसारे कुटजमूलवल्कलजं रसम् ॥ १७ ॥
रक्तवान्तौ तथा दद्यादुदुम्बरभवं जलम् ।
सर्वव्याधिहरश्चायं गन्धकः कज्जलीकृतः ।
आयुर्वृद्धिकरश्चैव मृतं चापि प्रबोधयेत ॥ १८ ॥

पश्चात् इस कज्जलीका एकएक रत्तीकी मात्रासे एकएक माशा जीरे और सैंधानमकके चूर्णके साथ एक पानमें रखकर रोगीको सेवन करावे । भयंकर सन्निपातज्वरमें इसपर गरम जलका अनुपान करे । इस कज्जलीको वमन रोगमें खाँडके शर्बतके साथ और आमदोषमें पुराने गुडके साथ देवे । एवं क्षयमें बकरीका दूध, रक्तातिसारमें कुडेकी छालका रस या काढा और रक्तकी वमन होनेपर गूलरके क्वाथका अनुपान करे । यह कज्जली सर्वप्रकारकी दुस्तर व्याधियोंको हरती है एवं आयुकी वृद्धिकर मृतपुरुषकोभी जीवित करती:है ॥ १५–१८ ॥

ज्वरबलि ।

ज्वरामयगृहीतस्य मुष्टिभिर्नवभिः कृतम् ।
तण्डुलैरोदनं तेन कुर्यात् पुत्तलकं शुभम् ॥ १९ ॥
तं हरिद्रावलिप्ताङ्गं चतुःपीतध्वजान्वितम् ।
हरिद्रारसपूर्णाभिः पुटिकाभिश्चतसृभिः ॥ २० ॥
मण्डितं गन्धपुष्पाद्यैरवकीर्य विसर्जयेत् ।
एवं दिनत्रयं कुर्यात् ज्वररोगोपशान्तये ॥ २१ ॥

" ओदनेन पुत्तलिकां निर्माय वीरणचाचिकायां संस्थाप्य हरिद्राभिरवलिप्य चतुःपीतपताकाभिरलंकृत्य गन्धपुष्पाद्यैरवकीर्य हरिद्रारसपूर्णाश्चतस्रः पुटिकाश्चतुष्कोणेषु संस्थाप्य विष्णुर्नमोऽद्येत्यादिना संकल्प्य ज्वरं ध्यात्वा समावाह्य र्नवकपर्द्दकाक्रीडगन्धपुष्पधूपदीपादिभिः सम्पूज्य सन्ध्यासमये ज्वरितं निर्मञ्छ्य मन्त्रमिमं पठित्वा दिनत्रयबलिं दद्यात् । मन्त्रो यथा–" ॐ नमो भगवते गरुडासनाय त्र्यम्बकाय स्वस्त्यस्तु वस्तुतः स्वाहा । ॐ कँ टँ पॅ शँ वैनतेयाय नमः । ॐ ह्रीं क्षः

Page 240Permalink
२०८भैषज्यरत्नावली ।[ दुग्ध-

क्षेत्रपालाय नमः । ॐ ह्रीँ ठँ ठ भो भो ज्वर शृणु शृणु हल हल गर्ज गर्ज ऐकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकम् अर्द्धमासिकं मासिकं नैमेषिकं मौहूर्तिकं फट्फट् ह्रीं फट् फट् हल हल मुञ्च मुञ्च भूम्यां गच्छ स्वाहा ।" इति पठित्वा एकवृक्षे श्मशाने चतुष्पथे वा विसर्जयेत् । एतत् कर्म्म वास्तु-शुचिदक्षिणप्रदेशे कुर्यात् ॥ २२ ॥"

ज्वररोगीके हाथकी नौ मुट्ठी परिमाण चावल लेकर और भात बनाकर उसका सुन्दर पुतला बनावे । उसको खसके आसनपर स्थापन करके उसपर हल्दीका लेपकर दे और उसके चारों ओर पीले वस्त्रकी चार झंडियें लगावे । फिर उस पुतलेके सर्वांगमें गन्ध पुष्पादि चढाकर हल्दीके रससे भरेहुए चार घडे उसके चारों कोनोंमें रखदेवे । फिर “ ॐ विष्णुः ३ नमः परमात्मनेऽद्य ” इत्यादि संकल्प कर और ज्वरकी मूर्त्तिका ध्यान तथा आवाहन करके उसमें नौ कौडियें लगाकर गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीपादिके द्वारा उसकी यथाविधि पूजा करे और सायंकालके समय उस पुतलेको रोगीके ऊपर उतारकर उपर्युक्त 'ॐ नमो भगवते' इत्यादि मन्त्रको पढकर बलि देवे । इस प्रकार यह कर्म रोगीके रहनेके घरक दक्षिण ओर पवित्र स्थानमें सन्ध्याके समय क्रमशः ३ दिनतक करे । पश्चात् उस मूर्त्तिको किसी एक वृक्षके नीचे या श्मशानमें अथवा चौराहेमें विसर्जन कर देवे ॥ १९-२२ ॥

नक्षत्रजनितरोगफल ।

कृत्तिकायां यदा व्याधिरुत्पन्नो भवति स्वयम् ।
नवरात्रं भवेत् पीडा त्रिरात्रं रोहिणीषु च ॥ २३ ॥

मृगशीर्षे पञ्चरात्रमार्द्रायां मुच्यतेऽसुभिः ।
पुनर्वसौ तथा पुष्ये सप्तरात्रेण मोचनम् ॥ २४ ॥

नवरात्रं तथाऽऽश्लेषे श्मशानान्तं मघासु च ।
द्वौ मासौ पूर्वफाल्गुन्यामुत्तरासु त्रिपञ्चकम् ॥ २५ ॥

हस्ते च सप्तमे मोक्षश्चित्रायामर्द्धमासकम् ।
मासद्वयं तथा स्वात्यां विशाखे दिनविंशतिः ॥ २६ ॥

मित्रे चैव दशाहानि ज्येष्ठायामर्द्धमासकम् ।
मूले न जायते मोक्षः पूर्वाषाढे त्रिपञ्चकम् ॥ २७ ॥

Page 241Permalink

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०९


उत्तरे दिनविंशत्या द्वौ मासौ श्रवणे तथा ।
धनिष्ठायामर्द्धमासो वारुणे च दशाहकम् ॥ २८ ॥
भाद्रपदे द्वन्येकोनविंशतिवासरम् ।
त्रिपक्षं चाहिरुध्न्ये च रेवत्यां दशरात्रकम् ॥ २९ ॥
अहोरात्रं तथाऽश्विन्यां भरण्यां तु गतायुषम् ।
एवं क्रमेण जानीयान्नक्षत्रेषु यथोचितम् ॥ ३० ॥

कृत्तिका नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ९ दिन, रोहिणी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ३ दिन और मृगशिरा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ५ दिनतक रहता है एवं आर्द्रा नक्षत्रमें रोगके उत्पन्न होनेपर रोगी मृत्युको प्राप्त होता है । पुनर्वसु और पुष्यनक्षत्रमें उत्पन्नहुआ रोग सात दिनमें एवं आश्लेषानक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ९ दिनमें दूर होता है । मघानक्षत्रमें रोगके उत्पन्न होनेपर रोगी मरजाता है । पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग २ महीनेतक, उत्तराफाल्गुनीमें १५ दिनतक, हस्तनक्षत्रमें ७ दिनतक, चित्रामें १५ दिनतक स्वातीमें २ मासतक, विशाखामें २० दिनतक, अनुराधामें १० दिनतक और ज्येष्ठानक्षत्रमें १५ दिनतक रहता है । मूलनक्षत्रमें रोग होनेपर रोगी रोगसे मुक्त नहीं होता और पूर्वाषाढा नक्षत्रमें रोग होनेपर १५ दिनमें, उत्तराषाढा नक्षत्रमें २० दिनमें, श्रवण नक्षत्रमें दो महीने, धनिष्ठा नक्षत्रमें १५ दिन, शतभिषा नक्षत्रमें १० दिन, पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रमें १९ दिन, उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें ४५ दिन, रेवती नक्षत्रमें १० दिन, अश्विनी और भरणी नक्षत्रमें रोग उत्पन्न हो तो रोगीको एक दिनरातमें मृत्यु हो जाती है । इस क्रमसे नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुए रोगके यथोचित फलाफलको जानना चाहिये ॥ २३-३० ॥

ज्वरमुक्तके लक्षण ।

स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूपाको मुखस्य च ।
क्षवथुश्चान्नलिप्सा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ३१ ॥

पसीनेका आना, शरीरमें हल्कापन, शिरमें खुजली, मुखपर फुंसियोंका निकलना, छींकोंका आना आर भोजनमें इच्छा होना ये सब लक्षण ज्वरके दूर होनेके हैं ॥ ३१ ॥

ज्वरमुक्त रोगीको वर्जनीय पदार्थ ।

व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चंक्रमणानि च ।
ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् ॥ ३२ ॥

१४

Page 242Permalink

२१० भैषज्यरत्नावली । [ ज्वर-

ज्वर दूर होनेके पश्चात् रोगी जबतक अच्छे प्रकारसे बलवान् न होजाय तबतक परिश्रम, स्त्रीसहवास, स्नान और अधिक भ्रमण ये सब त्यागने चाहिये ॥ ३२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां दुग्धप्रकरणम् ।

अथ पथ्यापथ्यविधिः ।

नवीनज्वरमें अपथ्य ।
स्नानं विरेकं सुरतं कषायं व्यायाममभ्यञ्जनमह्नि निद्राम् ।
दुग्धं घृतं वैद्दलमामिषं च तक्रं सुरां स्वादु गुरु द्रवं च ॥
अन्नं प्रवातं भ्रमणं च क्रोधं त्यजेत्प्रयत्नात्तरुणज्वरार्त्तः ॥ १॥
स्नान, विरेचन, मैथुन, कषायरसवाले पदार्थ, व्यायाम (कसरत आदि परिश्रम), तैलकी मालिश, दिनमें सोना, दूध, घी, दाल, मांस, मट्ठा, मदिरा, मधुररसवाले पदार्थ, भारी और पतले पदार्थ, अन्न, पूर्वदिशाकी वायु अथवा प्रबलवायु इनका सेवन, भ्रमण और क्रोध इन सबको नवीनज्वरवाला रोगी अवश्य त्याग देवे १

मध्यज्वरमें पथ्य ।
पुरातनाः षष्टिकशालयश्च वार्त्ताकुशोभाञ्जनकारवेल्लम् ।
वेत्राग्रमोचाऽथ फलं पटोलं कर्कोटंकं मूलकपूतिके च ॥ २ ॥
मुद्गैर्मसूरैश्चणकैः कुलत्थैर्मकुष्ठकैर्वा विहितश्च यूषः ।
पाठामृतावास्तुकतण्डुलीयजीवन्तिशाकानि च काकमाची ३
द्राक्षाकपित्थानि च दाडिमानि वैकंकतान्येव पचेलिमानि ।
लघूनि सात्म्यानि च भेषजानि पथ्यानि मध्यज्वरिणाममूनि४
पुराने साठीके चावल और शालिधानोंके चावल, बैंगन, सहिंजना. करेला, बेंतके अंकुर, केलेका मोचा अथवा फल, परवल, ककोडा, मूली, पोईका साग, मूंग, मसूर, चने, कुलथी और मोठ इनका यूष, एवं पाठ, गिलोय, बथुएका शाक, चौलाई, जीवन्तीका शाक, मकोय, दाख, कैथ, अनार और कण्टाई आदि पकेहुए फल एवं हल्की और सात्म्य (स्वभावानुकूल) औषधियाँ मध्यज्वरमें हितकर हैं ॥ २-४ ॥

पुराने ज्वरमें पथ्य ।
विरेचनं छर्दनमञ्जनं च नस्यं च धूमोऽप्यनुवासनं च ।
शिराव्यधः संशमनं प्रदेहोऽभ्यङ्गावगाहः शिशिरोपचारः ॥ ६॥

Page 243Permalink

पथ्यापथ्यम् ] भाषाटीकासहिता । २११


एणः कुलिङ्गो हरिणो मयूरो लावः शशस्तित्तिरिकुक्कुटौ च ।
क्रौञ्चः कुरङ्गः पृषतश्चकोरः कपिञ्जलो वर्तककालपुच्छौ ॥ ६ ॥
गवामजायाश्च पयो घृतं च हरीतकी पर्वतनिर्झराम्भः ।
एरण्डतैलं सितचन्दनं च द्रव्याणि सर्वाणि पुरेरितानि ।
ज्योत्स्नाप्रियालिङ्गनमप्ययं स्याद्गणः पुराणज्वरिणां सुखाय७

विरेचन (जुल्लाब), वमन, अजन, नस्य, धूम्रपान, अनुवासनवस्ती, शिराका वेधना. संशमन औषधियोंका सेवन, प्रलेप, तैलादिकी मालिश, जलमें घुसकर स्नान करना, सर्व प्रकारके शीतल उपचार, कालाहिरन, चिडा, हरिण, मोर, लवा, खरगोश, तीतर, मुर्गा, (एक प्रकारका बगुला), एक विशेष प्रकारका हिरन-चितकबराहिरन, चकोर, चातक, बत्तक और कालपुच्छ इन सब पशुपक्षियोंका मांस या मांसरस एवं गौ और बकरीका दूध, घी, हरड, पहाडी झरनोंका जल, अण्डीका तैल, सफेद चंदन और पहिले कहेहुए सब पदार्थ तथा निर्मल चन्द्रमाकी चांदनी, सुन्दरस्त्रीका आलिंगन आदि पुराने ज्वरमें हितकर हैं ॥१-७॥

ज्वरमें अपथ्य ।

वमिवेगं दन्तकाष्ठमसात्म्यमतिभोजनम् ।
विरुद्धान्यन्नपानानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ ८ ॥
दुष्टाम्बु क्षारमम्लानि पत्रशाकं विरूढकम् ।
नलदाम्बु च ताम्बूलं कालिन्दं लैकुचं फलम् ॥ ९ ॥
ओडीमत्स्यं च पिण्याकं छत्रकं पिष्टवैकृतम् ।
अभिष्यन्दीनि चैतानि ज्वरितः परिवर्जयेत् ॥ १० ॥
व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चंक्रमणामि च ।
ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्नो बलवान् भवेत् ॥ ११ ॥

वमनके वेगको रोकना, दतौन करना, अपने स्वभावके विरुद्ध भोजन अथवा अत्यन्त भोजन, विरुद्ध (प्रकृति, देश और कालके प्रतिकूल) दाहकारक और गुरुपाकी अन्नपान, दूषितजल, खारी और खट्टेरसवाले पदार्थ, पत्तोंवाले और अंकुरोंवाले शाक, नीम, पान, तरबुज, निंबूके फल, ओडीनामक मछली, तिलकुट, छत्रक (साँपकी छतरी) का शाक. पिठ्ठीके बने (पक्वान्न, मिष्टान्नादि) पदार्थ, विकृत और अभिष्यन्दकारक (शरीरके स्रोतोंको बन्द करनेवाले) पदार्थोंको ज्वररोगी

Page 244Permalink
२१२भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वरातिसार-

त्यागदेवे । एवं परिश्रम, स्त्रीप्रसंग, स्नान और भ्रमणादिकमोंको ज्वररोगी जबतक अच्छे प्रकारसे बलवान् न होजाय तबतक कदापि न करे ॥ ८-११ ॥

आरोग्यस्नानकाल ।

धनिष्ठा श्रवणा स्वाती ज्येष्ठा शतभिषा तथा ।
रविमन्दभौमवाराश्चन्द्रोऽशुभविवर्जितः ॥ १२ ॥
केन्द्रस्थाश्चाशुभाः शस्ता व्यतीपातादिवासराः ।
तिथिर्न शस्ता प्रतिपत्तृतीया नवमी तथा ॥ १३ ॥
स्नानाय रोगमुक्तानां दशमी च त्रयोदशी ।
बुधेन्दुगुरुशुक्राणां वाराः स्नाने न शोभनाः ॥
रोगान्मुक्तस्य नाश्लेषा रोहिणी भद्रदायिनी ॥ १४ ॥

धनिष्ठा, श्रवण, स्वाती, ज्येष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों एवं रविवार, शनिवार और मंगलवारोंमें यदि चन्द्रमा शुभ हो और केन्द्रस्थानमें न गया हो तो रोगीको रोगमुक्त होनेपर आरोग्यस्नान कराना चाहिये । इसमें व्यतीपातादिके दिनभी श्रेष्ठ मानेगये हैं। प्रतिपदा, तृतीया, नवमी, दशमी और त्रयोदशी इन तिथियों तथा बुध, सोम, बृहस्पति और शुक्र इन वारोंको रोगसे मुक्त हुए रोगीको स्नान करानेके लिये त्यागदेवे । एवं आश्लेषा रोहिणी और भद्रायुक्त तिथि भी आरोग्यस्नान करनेवाले रोगीके लिये वर्जित हैं ॥ १२-१४ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां ज्वरचिकित्सा ।


अथ ज्वरातिसार-चिकित्सा ।

पित्तज्वरे पित्तभवोऽतिसार-
स्तथाऽतिसारे यदि वा ज्वरः स्यात् ।
दोषस्य दूष्यस्य समानभावाद्
ज्वरातिसारः कथितो भिषग्भिः ॥ १ ॥

यदि पैत्तिकज्वरमें पित्तकी गरमीके कारण अतिसार (दस्त) हों अथवा अतिसाररोगमें ज्वर होजाय तो दोष और दूष्यकी समानता होनेके कारण इससे मिलित रोगको वैद्यलोग ज्वरातिसार कहते हैं ॥ १ ॥

Page 245Permalink

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २१३


ज्वरातिसारयोरुक्तं भेषजं यत् पृथक् पृथक् ।
न तन्मिलितयोः कुर्यादन्योन्यं वर्द्धयेद्यतः ॥ २ ॥
प्रायो ज्वरहरं भेदि स्तम्भनं त्वतिसारनुत् ।
अतोऽन्योन्यविरुद्धत्वाद्धर्द्धनं तत्परस्परम् ॥
ततस्तौ प्रतिकुर्वीत विशेषोक्तैश्चिकित्सितैः ॥ ३ ॥

ज्वर और अतिसार रोगमें जो जो पृथक् पृथक् औषधियाँ कही हैं, ज्वरातिसार-रोगमें वे औषधियाँ मिलाकर नहीं देना चाहिये । कारण—वे आपसमें विरोधी हैं अर्थात् ज्वरनाशक औषधियाँ प्रायः भेदक होती हैं और अतिसारनाशक औषधियाँ प्रायः मलस्तम्भक होती हैं । इसलिये दोनों प्रकारकी औषधियाँ परस्पर विरुद्ध गुणोंवाली होनेसे एक दूसरे रोगोंको बढाती हैं । अतएव ज्वरातिसाररोगमें उक्त दोनों प्रकारकी औषधियोंका प्रतिकार कर जो विशेष चिकित्सा कही है, उसीके अनुसार वैद्योंको चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥ ३ ॥

ज्वरातिसारिणामादौ कुर्याल्लङ्घनपाचने ।
प्रायस्तावामसम्बन्धं विना न भवतो यतः ॥ ४ ॥
ज्वरातिसारे पेयादिक्रमः स्याल्लङ्घिते हितः ।
ज्वरातिसारी पेयां वा पिबेत्साम्लां शृतां नरः ॥ ५ ॥

ज्वरातिसारके रोगीको पहिले लंघन करावे फिर पाचक औषधि देवे । कारण दोनों रोग प्रायः आम रसके बिना उत्पन्न नहीं होते हैं । ज्वरातिसारमें लंघन करानेके बाद पेयादि देना हितकर है । इसमें रोगीको अनार आदि खट्टे रसवाले पदार्थोंके रसके द्वारा पेया बनाकर पान कराना चाहिये ॥ ४ ॥ ५ ॥

ह्रीबेरादि ।

ह्रीबेरातिविषामुस्तबिल्वनागरधान्यकैः ।
पिबेत् पिच्छाविबन्धघ्नं शूलदोषामपाचनम् ॥
सरक्तं हन्त्यतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम् ॥ ६ ॥

सुगन्धवाला, अतीस, नागरमोथा, बेलकी जड, सोंठ और धनियाँ इनका क्वाथ सेवन करनेसे मलकी पिच्छिलता, विबन्ध और शूल नष्ट होते हैं तथा आमदोषका परिपाक होकर रक्तातिसार, ज्वरातिसार अथवा केवल अतिसार रोग दूर होताहै ॥ ६ ॥

Page 246Permalink

२१४ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-

पाठादि ।
पाठामृता पर्पटमुस्तविश्वकिराततिक्तेन्द्रयवान् विपच्य ।
पिबन् हरत्येव हरेत सर्वान् ज्वरातिसारानपि दुर्निवारान् ॥७॥
पाठ, गिलोय, पित्तपापडा, नागरमोथा, सोंठ, चिरायता और इन्द्रजौ इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करनेसे तत्काल ही दुस्तर ज्वरातिसार नष्ट होते हैं ॥७॥

नागरादि ।
नागरातिविषा मुस्तभूनिम्बामृतवत्सकैः ।
सर्वज्वरहरः क्वाथः सर्वातीसारनाशनः ॥ ८ ॥
सोंठ, अतीस, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय और कुडेकी छाल इनका क्वाथ सर्वप्रकारके अतिसारको नष्ट करताहै ॥ ८ ॥

उशीरादि ।
उशीरं बालकं मुस्तं धन्याकं विश्वभेषजम् ।
समङ्गा धातकी लोध्रं बिल्वं दीपनपाचनम् ॥ ९ ॥
हन्त्यरोचकपिच्छामविबन्धं सातिवेदनम् ।
सशोणितमतीसारं सज्वरं वाऽथ विज्वरम् ॥ १० ॥
खस, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनियां, सोंठ, वाराहक्रान्ता, ( लज्जाव
धायके फूल, लोध और बेलकी गिरी इनका क्वाथ दीपन और पाचन है। इस क्वाथको पान करनेसे अरुचि, पिच्छिलता, मलबद्धता, पीडासहित रक्तातिसार, ज्वररहित या ज्वरसहित अतिसार दूर होता है ॥ ९ ॥ १० ॥

शुण्ठीदशमूल ।
दशमूलीकषायेण विश्वमक्षसमं पिबेत् ।
ज्वरे चैवातिसारे च सशोथे ग्रहणीगदे ॥ ११ ॥
अतिसार और शोथयुक्त संग्रहणीरोगमें दशमूलके क्वाथमें थोडा सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ११ ॥

गुडूच्यादि ।
गुडूच्यतिविषाधान्यशुण्ठीबिल्वाब्दबालकैः ।
पाठाभूनिम्बकुटजचन्दनोशीरपद्मकैः ॥ १२ ॥
कषायः शीतलः पेयो ज्वरातीसारशान्तये ।
हल्लासारोचकच्छर्द्दिपिपासादाहशान्तिकृत् ॥ १३ ॥

Page 247Permalink

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २१५

गिलोय, अतीस, धनियाँ, साँठ, बेलकी गिरी, नागरमोथा, सुगन्धवाला, पाठ, चिरायता, कुडेकी छाल, लालचन्दन, खस और पद्माख इनका शीतल क्वाथ पान करनेसे ज्वरातिसार, उबकाई, अरुचि, वमन, प्यास और दाह शान्त होती है॥१२॥१३॥

कलिङ्गादि ।

कलिङ्गाऽतिविषा शुण्ठी किराताम्बु यवासकम् ।
ज्वरातीसारसन्तापं नाशयेदविकल्पतः ॥ १४ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, सोंठ, चिरायता, सुगन्धवाला और धमासा इनका क्वाथ पान करनेसे ज्वर और अतिसार निस्सन्देह दूर होता है ॥ १४ ॥

घनजलादि।

घनजलपाठातिविषापथ्योत्पलधान्यरोहिणीविश्वैः ।
सेन्द्रयवैः कृतमम्भः सातीसारं ज्वरं जयति ॥ १५ ॥
नागरमोथा, सुगन्धवाला, पाठ, अतीस, हरड, नीलकमल, धनियाँ, कुटकी, सोंठ, इन्द्रजौ इनका क्वाथ बनाकर पानकरनेसे अतिसारसहित ज्वर दूर होता है ॥ १५ ॥

धान्यनागरादि।

धान्यनागरबिल्वाब्दबालकैः साधितं जलम् ।
आमशूलहरं ग्राह्यं दीपनं पाचनं परम् ॥ १६ ॥
धनियाँ, सोंठ, बेलकी गिरी, नागरमोथा और सुगन्धवाला इनका बनाया हुआ क्वाथ आम और शूलको हरनेवाला, संग्राही एवं दीपन और पाचक है ॥ १६ ॥

बिल्वादि ।

बिल्वबालकभूनिम्बूगुडूचीमुस्तवत्सकैः ।
कषायः पाचनः शोथज्वरातीसारनाशनः ॥ १७ ॥
बेलगिरी, सुगन्धवाला, चिरायता, गिलोय, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ आमपाचक एवं सूजन और ज्वरातिसारको हरनेवाला है ॥ १७ ॥

कुटजादि ।

कुटजो नागरं मुस्तममृताऽतिविषा तथा ।
एभिः कृतं पिबेत्क्वाथं ज्वरातीसारनाशनम् ॥ १८ ॥
कुडेकी छाल, सोंठ, नागरमोथा, गिलोय और अतीस इनके द्वारा बनाया हुआ क्वाथ पान करनेसे ज्वरातीसार शमन होता है ॥ १८ ॥

Page 248Permalink
२१६भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वरातिसार-

पाठादि ।

पाठेन्द्रभूनिम्बघनामृतानां सपर्यटैः क्वाथ इहैव शस्तः ।
आमातिसारं च जयेद् द्रुतं वा ज्वरेण युक्तं सहजं च तीव्रम् ॥१९॥
पाठ, इन्द्रजौ, चिरायता, नागरमोथा, गिलोय और पित्तपापडा इनका क्वाथ सेवन करनेसे ज्वरयुक्त तीव्र और सहज आमातिसाररोग तत्काल नष्ट होता है ॥ १९ ॥

किरातादि ।

किराताब्दामृताविश्वचन्दनोदीच्यवत्सकैः ।
शोथातिसारशमनं विशेषाज्ज्वरनाशनम् ॥ २० ॥
चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, लालचन्दन, सुगन्धवाला और इन्द्रजौ इनका क्वाथ सूजन, अतिसार और विशेषकर ज्वरको नष्ट करता है ॥ २० ॥

विडङ्गादि ।

विडङ्गातिविषा मुस्तं पाठा दारु कलिङ्गकम् ।
मरिचेन समायुक्तं शोथातीसारनाशनम् ॥२१॥
वायविडङ्ग, अतीस, नागरमोथा, पाठ, देवदारु और इन्द्रजौ इनके क्वाथमें कालीमिरचोंका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे सूजन और अतिसार दूर होता है ॥ २१ ॥

शुण्ठ्यादि ।

शुण्ठीबालकमुस्तं बिल्वं पाठा विषा च धान्यानि ।
पानकमरुचिच्छर्दिज्वरातिसारं विनाशयति ॥ २२ ॥
सोंठ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, बेलगिरी, पाठ, अतीस और धनियां इनका क्वाथ पानकरनेसे अरुचि, वमन, ज्वर और अतिसार नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥

वत्सकादि ।

वत्सकश्च सुरदारु रोहिणी धान्यबिल्वमगधात्रिकण्टकम् ।
निम्बबीजगपिप्पलीवृकीक्वाथ एष ज्वर-सारयोर्हितः ॥ २३ ॥
इन्द्रजौ, देवदारु, कुटकी, धनियां, बेलकी गिरी, पीपल, गोखुरु, नीमके बीज, गजपीपल और पाठ इनका क्वाथ ज्वर और अतिसारको नष्ट करनेकी उत्तम औषधि है ॥ २३ ॥

भूनिम्बादि ।

भूनिम्बबिल्वबालकगुडूचीमुस्तवत्सकैः ।
कषायः पाचनः शोथज्वरातीसार नाशनः ॥ २४ ॥

Page 249Permalink

चिकित्सा ] भाषार्टीकासहिता । २१७

चिरायता, बेलकी गिरी, सुगन्धवाला, गिलोय, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ पाचक और शोथ तथा ज्वरातिसारको दूर करनेवाला है ॥ २४ ॥

कणादि।

कणाकरिकणालाजक्वाथो मधुसितायुतः ।
पीतो ज्वरातिसारस्य तृष्णामाशु विनाशयेत् ॥ २५ ॥

पीपल, गजपीपल और खीलें इनका क्वाथ बनाकर शीतल करके उसमें शहद और मिश्री डालकर पीनेसे ज्वरातिसाररोगीकी तृषा शमन होती है ॥ २५ ॥

पञ्चमूल्यादि ।

पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।
पाठाभूनिम्बह्रीबेरकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ २६ ॥
हन्ति सर्वानतीसारान् ज्वरदोषं वमिं तथा ।
सशूलोपद्रवं कासं श्वासं हन्यात्सुदारुणम् ॥ २७ ॥
पञ्चमूली तु सामान्या योज्या पैत्ते कनीयसी ।
महती पञ्चमूली तु वातश्लेष्मातुरे हिता ॥ २८ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बडी कटेरी, कटेरी, गोखरू, खिरेंटी, बेलकी गिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, पाठ, चिरायता, सुगन्धवाला, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इन औषधियोंका यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करनेसे समस्त अतिसार, ज्वर, वमन, शूल आदि उपद्रवासहित खाँसी और दारुण श्वासरोग शमन होता है। पित्तकी अधिकता होनेपर इसमें लघुपंचमूल और वाताधिक्यमें बृहत्पञ्चमूलका क्वाथ हितकर है ॥ २६-२८ ॥

बृहत्पञ्चमूल्यादि ।

पञ्चमूली शृङ्गवेरशृङ्गाटकञ्चटं घनम् ।
जम्बूदाडिमपत्रं च बला बालं गुडूचिका ॥ २९ ॥
पाठा बिल्वं समंगा च कुटजत्वक्फलं तथा ।
धान्यकं धातकीक्वाथं विषाजीरकसंयुतम् ॥ ३० ॥
पिबेद् ज्वरातिसारे च सरक्ते वाप्यरक्तके ।
अपि योगशतैस्त्यक्ते चासाध्ये सर्वरूपके ॥ ३१ ॥

बेलकी गिरी, स्योनापाठा, कुंमेर, पाढल, अरणी, सोंठ, सिंघाडेके पत्ते, जलचौलाई, नागरमोथा, जामुनके पत्ते, खिरेंटी, सुगन्धवाला, गिलोय, पाठ, बेल, वारा-

Page 250Permalink

२१८ | भैषज्यरत्नावली । | [ ज्वरातिसार-


हक्रान्ता (लज्जावन्ती), कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, धनियाँ और धायके फूल इनके क्वाथमें अतीस और जीरेका थोडा चूर्ण डालकर पान करनेसे ज्वरातिसार, रक्तातिसार और केवल आतिसाररोगमें आरोग्य लाभ होता है। जिसमें सैकड़ों औषधियोंसे भी कुछ लाभ नहीं होता ऐसा असाध्य अतिसार रोग भी इससे दूर होता है ॥ २९-३१ ॥

धान्यशुण्ठी ।

धान्यकं विश्वसंयुक्तमामघ्नं वह्निदीपनम् ।
वातश्लेष्मज्वरहरं शूलातीसारनाशनम् ॥ ३२ ॥

धनियाँ और सोंठका क्वाथ आमनाशक, अग्निप्रदीपक, वातश्लेष्मज्वर, शूल और अतिसारको नष्ट करनेवाला है ॥ ३२ ॥

बिल्वपञ्चक ।

शालपर्णीं पृश्निपर्णीं बला बिल्वं सदाडिमम् ।
बिल्वपञ्चकमित्येतत्क्वाथं कृत्वा प्रदापयेत् ॥
अतीसारे ज्वरे छद्यौँ शस्यते बिल्वपञ्चकम् ॥ ३३ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी और अनारके छिलके इन औषधियोंके समूहको बिल्वपंचक कहते हैं। इस बिल्वपंचकका क्वाथ बनाकर अतिसार, ज्वर और वमनरोगमें पान कराना चाहिये ॥ ३३ ॥

उत्पलषट्क ।

पृश्निपर्णीबलाबिल्वधनिकानागरोत्पलैः ।
ज्वरातिसारयोर्वापि पिबेत्साम्लं शृतं नरः ॥ ३४ ॥

पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलकी गिरी, धनियाँ, सोंठ और कमोदिनी (नीलोफर) इनके क्वाथमें अनारका रस डालकर पान करनेसे ज्वर और अतिसार रोग नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

उत्पलाद्यचूर्ण ।

उत्पल दाडिमत्वक् च पद्मकेशरमेव च ।
पिबेत्तण्डुलतोयेन ज्वरातीसारशान्तये ॥ ३५ ॥

ज्वर और अतिसारको शमन करनेके लिये नीलोत्पल (नीलोफर), अनारके बक्कल और कमलकेशर इनका चूर्ण बनाकर चावलोंके जलके साथ पान करना चाहिये ॥ ३५ ॥

Page 251Permalink

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २१९


व्योषाद्यचूर्ण ।

व्योषं वत्सकबीजं च निम्बंभूनिम्बमार्कवम् ।
चित्रकं रोहिणीं पाठां दार्वीमतिविषां समम् ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वं तत्तुल्या वत्सकत्वचः ॥ ३६ ॥
सर्वमेकत्र संयोज्य पिबेत्तण्डुलवारिणा ।
सक्षौद्रं वा लिहेदेतत्पाचनं ग्राहि भेषजम् ॥
तृष्णाऽरुचिप्रशमनं ज्वरातीसारनाशनम् ॥ ३७ ॥
प्रमेहं ग्रहणीदोषं गुल्मं प्लीहानमेव च ।
कामलां पाण्डुरोगं च श्वयथुं च विनाशयेत् ॥ ३८ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, इन्द्रजौ, नीमकी छाल, चिरायता, भाँगग, चीतेकी जड, कुटकी, पाठ, दारुहल्दी और अतीस इनको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे और सब चूर्णकी बराबर भाग कुडेकी छालका चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिलालेवे । इस चूर्णको तीन चार माशेकी मात्रासे चावलोंके जलके साथ पीनेसे या शहदके साथ चाटनेसे तृष्णा, अरुचि, ज्वरातिसार, प्रमेह, ग्रहणी, गुल्म, प्लीहा, कामला, पाण्डुरोग और सूजन आदिरोग नष्ट होते हैं । यह चूर्ण पाचक और ग्राह्य है ३६-३८

कलिंगादिगुटिका ।

कलिंगबिल्वनिम्बाम्रं कपित्थं सरसाञ्जनम् ।
लाक्षा हरिद्रे ह्रीबेरं कट्फलं शुकनासिकाम् ॥ ३९ ॥
लोध्रं मोचरसं शङ्खं धातकीं वटशुंगकम् ।
पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन वटकानक्षसम्मितान् ॥ ४० ॥
छायाशुष्कान् पिबेत् क्षिप्रं ज्वरातीसारशान्तये ।
रक्तप्रसाधना ह्येते शूलातीसारनाशनाः ॥ ४१ ॥

इन्द्रजौ, बेलगिरी, नीमकी छाल, आमकी गुठलीकी मींग, कैथके पत्ते, रसौंत, लाख, हल्दी, दारुहल्दी, सुगन्धवाला, कायफल, अरलूकी छाल, लोध, मोचरस, शंखभस्म, धायके फूल, बडके अंकुर इन सबको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पीसकर दो तोलेकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे । इनके सेवनसे ज्वरातिसार, रक्तातिसार, शूलसंयुक्त अतीसार नष्ट होजाता है ॥ ३९-४१ ॥

Page 252Permalink
२२०भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वरातिसार-

कुटजावलेह ।

कुटजत्वक् पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण शर्कराप्रस्थकं पचेत् ॥ ४२ ॥
ततो लेहे घनीभूते चूर्णानीमानि दापयेत् ।
लवंगं जीरकं मुस्तं धातकी बिल्ववालकम् ॥ ४३ ॥
एला पाठा त्वचं शृंगी जातीफलमधूरिका ।
शक्रकाऽतिविषा क्षारं काकोली च रसाञ्जनम् ॥ ४४ ॥
शाल्मली वेष्टकं यष्टी समंगा रक्तचन्दनम् ।
वटशुंगं खादिरं च जम्ब्वाम्रपल्लवं तथा ॥ ४५ ॥
एषामक्षसमं चूर्णं प्रक्षिपेत् पाकविद् भिषक् ।
सिद्धेऽवतारिते शीते मधुनः कुडवं न्यसेत् ॥ ४६ ॥

कुडेकी जडकी छाल सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर वह चौथाई भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर इस क्वाथमें ६४ तोले मिश्री या शुद्धचीनी मिलाकर पकावे। पककर जब पाक अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उसमें लौंग, जीरा, नागरमोथा, धायके फूल, बेलकी गिरी, सुगन्धवाला छोटी इलायची, पाठ, दालचीनी, काकडासिंगी, जायफल, सौंफ, इन्द्रजौ, अतीस, जवाखार, काकोली, रसौंत, मोचरस, मुलहठी, मंजीठ, लालचन्दन, वडके अंकुर, खैर, जामुन और आमके पत्ते इन औषधियोंके दो दो तोले परिमाण बारीक चूर्णको डालदेवे। जब उत्तम प्रकारसे पाक सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें ६४ तोले शहद मिलादेवे ॥ ४२-४६ ॥

खादयेत्कर्षमात्रं तु चानुपानविधिं शृणु ।
अनुपानं प्रदातव्यं दधिमस्तु त्वजापयः ॥ ४७ ॥
चांपेयकदलीमूलस्वरसं कर्षमानतः ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ ४८ ॥
रोगं रक्तातिसारं च चिरकालसमुद्भवम् ।
पक्कापक्रमतीसारं नानावर्णं सवेदनम् ॥
शोथातीसारसहितं ज्वरमाशु व्यपोहति ॥ ४९ ॥

द्वितीय कुटजावलेह ।

Page 253Permalink

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२१


इस अवलेहको प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर एक एक तोला प्रमाण खाय और ऊपरसे दहीका तोड, बकरीका दूध, चम्पेकी जडका रस अथवा केलेकी जडका रस इनमेंसे किसी एक पदार्थको एक तोला पान करे । यह अवलेह प्रवल संग्रहणी बहुत पुराना रक्तातिसार, पक्व अथवा अपक्व अनेक वर्णका और पीडायुक्त अतिसार एवं सूजन और अतिसारयुक्त ज्वरको शीघ्र दूर करता है। अतिसार और संग्रहणीमें यह अवलेह तत्काल प्रत्यक्ष फलदायक है ॥ ४७-४९ ॥

द्वितीय कुटजावलेह ।

कुटजत्वक् पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण शर्करापलविंशतिम् ॥ ५० ॥
दत्त्वा पक्त्वा लेहपाके चूर्णीनीमानि निक्षिपेत् ।
पाठा समङ्गा बिल्वं च धातकी मुस्तकं तथा ॥ ५१ ॥
दाडिमाऽतिविषा लोध्रं शाल्मली वेष्टसर्जकम् ।
रसाञ्जनं धान्यकं च उशीरं बालकं तथा ॥ ५२ ॥
प्रत्येकमेषां कर्शाशं निक्षिपेत्पाकविद्भिषक् ।
शीते च मधुनस्तत्र कुडवार्द्धं विनिक्षिपेत् ॥ ५३ ॥
सर्वरूपमतीसारं ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ।
रक्तस्रुतिं ज्वरं शोथं वमिमर्शोगदं तृषाम् ॥
अम्लपित्तं तथा शूलमग्निमान्द्यं नियच्छति ॥ ५४ ॥

कुडेकी जडकी छाल १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें एक सेर मिश्री डालकर पाक करे । जब पककर वह अवलेहके समान होजाय तब नीचे उतारकर उसमें पाठ, मंजीठ, बेलकी गिरी, धायके फूल, नागरमोथा, अनारका बक्कल, अतीस, लोध, मोचरस, राल, रसौत, धनियाँ, खस और सुगन्धवाला इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण एकएक तोला डालदेवे और शीतल होनेपर आठ तोले शहद डालकर मिलादेवे । उसको पूर्ववत् एक एक तोलेकी मात्रासे सेवन करे और बकरीके दूध अथवा दहीके पानीका अनुपान करे तो यह अवलेह सब प्रकारके अतिसार, समस्त ग्रहणी, रक्तातिसार, ज्वर, सूजन, वमन, बवासीर, तृषा, अम्लपित्त, शूल, मन्दाग्नि आदि रोगोंको शीघ्र शमन करताहै । यह अतिसार और ग्रहणीकी प्रत्यक्ष फलदायिनी है ॥ ५०-५४ ॥

Page 254Permalink

३२२ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-

सिद्धप्राणेश्वर रस ।

गन्धेशाभ्रं पृथग्वेदभागमन्यच्च भागिकम् ।
सर्जिटङ्कयवक्षाराः पञ्चव लवणानि च ॥ ५५ ॥
वराव्योषेन्द्रबीजानि द्विजीराग्नियमानिकाः ।
सहिङ्गु बीजसारं च शतपुष्पा सुचूर्णिता ॥ ५६ ॥
सिद्धप्राणेश्वरः सूतः प्राणिनां प्राणदायकः ।
माषकं भक्षयेदस्य नागवल्लीदलैर्युतम् ॥ ५७ ॥
उष्णोदकानुपानं च दद्यात्तत्र पलत्रयम् ।
ज्वरातिसारेऽतिसृतौ केवले वा ज्वरेऽपि च ॥ ५८ ॥
घोरे त्रिदोषजे रोगे ग्रहण्यामसृगामये ।
वातरोगे च शूले च शूले च परिणामजे ॥ ५९ ॥

शुद्धगन्धक, शुद्धपारा और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक चार चार तोले, एवं सज्जी, सुहागा, जवाखार, सैंधानमक, साँभरनमक, विरियासंचरनमक, कचियानमक, कालानमक, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, इन्द्रजौ, जीरा, कालाजीरा, चीतेकी जड, अजवायन, हींग, वायविडंग और सोया ये प्रत्येक औषधि एकएक तोला लेवे। सबको एकत्र जलके द्वारा उत्तमप्रकारसे खरल करके एक एक माशेकी गोलियाँ बनालेवे। यह सिद्धप्राणेश्वर नामवाला रस प्राणियोंके लिये जीवनदाता है। इसकी एकएक गोली पानके साथ भक्षण करे और इसपर तीन पल प्रमाण गरम जलका अनुपान करे। इस रसको ज्वरातिसार, केवल अतिसार अथवा ज्वरमें तथा भयंकर त्रिदोषजनित रोग, ग्रहणी, रक्तविकार, वातरोग, शूल और परिणामजन्य-शूलमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ५५–५९ ॥

कनकसुन्दररस ।

हिङ्गुलं मरिचं गन्धं पिप्पली टङ्कणं विषम् ।
कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ ६० ॥
मर्दयेद्याममात्रं तु चणमात्रा वटी कृता ।
भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः ॥ ६१ ॥
अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतीसारं च नाशयेत् ।
पथ्यं दध्योदनं दद्याद्यद्वा तक्रौदनं चरेत् ॥ ६२ ॥

Page 255Permalink

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२३

सिंगरफ, मिरच, शुद्ध गन्धक, पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और धतूरेके बीज इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रसमें एक प्रहरतक खरल कर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह कनकसुन्दररस सेवन करतेही संग्रहणी, मन्दाग्नि, ज्वर और प्रबल अतीसारको नष्ट करता है । इसपर दही भात अथवा मट्ठे और भातका पथ्य देना चाहिये ॥ ६०-६२ ॥

बृहत्कनकसुन्दररस ।

शुद्धं सूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा ।
स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रवैर्दिनार्द्धकम् ॥ ६३ ॥
सूततुल्यं मृतं चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ६४ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, मिरच, सुहागेकी खील और धतूरेके बीज सबको समान भाग लेकर भारंगीके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर उसमें पारेके बराबरभाग अभ्रकभस्म मिलादेवे तो बृहत्कनकसुन्दररस सिद्ध होता है । इसको दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करनेसे अत्युग्र पित्तातिसार दूर होता है ॥ ६३॥६४ ॥

गगनसुन्दररस ।

टङ्कण दरदं गन्धमभ्रकं च समं समम् ।
दुग्धिकाय्रा रसेनैव भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ ६५ ॥
द्विगुञ्जं मधुना देयं श्वेतसर्जस्य वल्लकम् ।
विविधं नाशयेद्रक्तं ज्वरातीसारमुल्बणम् ॥ ६६ ॥
पथ्यं तक्रं पयश्छागमामशूलं विनाशयेत् ।
अग्निवृद्धिकरो ह्येष रसो गगनसुन्दरः ॥ ६७ ॥

सुहागा, सिंगरफ, गन्धक और अभ्रक इन प्रत्येकको समान भाग लेकर दुद्धीके रसमें ३ दिनतक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली सफेद रालके दो रत्ती प्रमाण चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे विविध-प्रकारका रक्तविकार, ज्वर, अत्युग्र अतिसार और आमशूल नष्ट होता है और यह गगनसुन्दर रस विशेषकर जठराग्निकी वृद्धि करता है । इसपर मट्ठा और बकरीका दूध पथ्य है ॥ ६५-६७ ॥

कनकप्रभावटी ।

सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टङ्कणकं विषं च ।
गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां विदध्यात् ॥

Page 256Permalink

२२४ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-

घोरातिसारग्रहणीज्वराग्निमान्द्यं निहन्यात्कनकप्रमेयम् ।
दध्योदनं पथ्यमनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम् ॥
धतूरेके बीज, मिरच, हंसपदी ( हंसराज ), पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रस वा क्वाथमें एक दिन-तक खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह कनकप्रभा वटी सेवन करतेही प्रबल अतिसार, ग्रहणी, ज्वर और अग्निमान्द्य आदि रोगोंको नष्ट करती है । इसपर दही भातका पथ्य, शीतलजल एवं तीतर और लवा पक्षीका मांसरस सेवन करना चाहिये ॥ ६८ ॥ ६९ ॥

मृतसंजीवनी वटी ।

मागधी वत्सनाभं च तयोस्तुल्यं च हिङ्गुलम् ।
मृतसंजीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ ७० ॥
मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी ।
पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥
विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ ७१ ॥
पीपल १ भाग, शुद्ध वत्सनाभ १ भाग और सिंगरफ २ भाग इनको एकत्र जम्बीरीनींबूके रसमें उत्तम प्रकारसे खरलकर मूलीके बीजकी बराबर गोलियाँ बना-लेवे । एकएक गोली शीतजलके साथ सेवन करनेसे ज्वर और अतिसार ( दस्त ) शीघ्र दूर होते हैं । विषूचिका और अतिदारुण सन्निपातज्वरमें यह मृतसंजीवनी नामक वटी अतीव हितकारी है ॥ ७० ॥ ७१ ॥

आनन्दभैरव रस ।

हिङ्गुलं च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् ।
जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद्यामकद्वयम् ॥ ७२ ॥
कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सन्निपातिके ।
अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥
गुञ्जामात्रा प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ७३ ॥
सिंगरफ, शुद्ध मीठातेलिया, त्रिकुटा, सुहागा और शुद्धगन्धक सबको सम भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर जम्बीरीनींबूके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह आनन्दभैरवरस सेवन करतेही खाँसी, श्वास, अति-सार, संग्रहणी, सन्निपातज्वर, अपस्मार, वातविकार, प्रमेह, अजीर्ण और मन्दाग्नि इन रोगोंको दूर करताहै ॥ ७२ ॥ ७३ ॥