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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 253 of 1416

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Page 253

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२१


इस अवलेहको प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर एक एक तोला प्रमाण खाय और ऊपरसे दहीका तोड, बकरीका दूध, चम्पेकी जडका रस अथवा केलेकी जडका रस इनमेंसे किसी एक पदार्थको एक तोला पान करे । यह अवलेह प्रवल संग्रहणी बहुत पुराना रक्तातिसार, पक्व अथवा अपक्व अनेक वर्णका और पीडायुक्त अतिसार एवं सूजन और अतिसारयुक्त ज्वरको शीघ्र दूर करता है। अतिसार और संग्रहणीमें यह अवलेह तत्काल प्रत्यक्ष फलदायक है ॥ ४७-४९ ॥

द्वितीय कुटजावलेह ।

कुटजत्वक् पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण शर्करापलविंशतिम् ॥ ५० ॥
दत्त्वा पक्त्वा लेहपाके चूर्णीनीमानि निक्षिपेत् ।
पाठा समङ्गा बिल्वं च धातकी मुस्तकं तथा ॥ ५१ ॥
दाडिमाऽतिविषा लोध्रं शाल्मली वेष्टसर्जकम् ।
रसाञ्जनं धान्यकं च उशीरं बालकं तथा ॥ ५२ ॥
प्रत्येकमेषां कर्शाशं निक्षिपेत्पाकविद्भिषक् ।
शीते च मधुनस्तत्र कुडवार्द्धं विनिक्षिपेत् ॥ ५३ ॥
सर्वरूपमतीसारं ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ।
रक्तस्रुतिं ज्वरं शोथं वमिमर्शोगदं तृषाम् ॥
अम्लपित्तं तथा शूलमग्निमान्द्यं नियच्छति ॥ ५४ ॥

कुडेकी जडकी छाल १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें एक सेर मिश्री डालकर पाक करे । जब पककर वह अवलेहके समान होजाय तब नीचे उतारकर उसमें पाठ, मंजीठ, बेलकी गिरी, धायके फूल, नागरमोथा, अनारका बक्कल, अतीस, लोध, मोचरस, राल, रसौत, धनियाँ, खस और सुगन्धवाला इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण एकएक तोला डालदेवे और शीतल होनेपर आठ तोले शहद डालकर मिलादेवे । उसको पूर्ववत् एक एक तोलेकी मात्रासे सेवन करे और बकरीके दूध अथवा दहीके पानीका अनुपान करे तो यह अवलेह सब प्रकारके अतिसार, समस्त ग्रहणी, रक्तातिसार, ज्वर, सूजन, वमन, बवासीर, तृषा, अम्लपित्त, शूल, मन्दाग्नि आदि रोगोंको शीघ्र शमन करताहै । यह अतिसार और ग्रहणीकी प्रत्यक्ष फलदायिनी है ॥ ५०-५४ ॥