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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 247 of 1416

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Page 247

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २१५

गिलोय, अतीस, धनियाँ, साँठ, बेलकी गिरी, नागरमोथा, सुगन्धवाला, पाठ, चिरायता, कुडेकी छाल, लालचन्दन, खस और पद्माख इनका शीतल क्वाथ पान करनेसे ज्वरातिसार, उबकाई, अरुचि, वमन, प्यास और दाह शान्त होती है॥१२॥१३॥

कलिङ्गादि ।

कलिङ्गाऽतिविषा शुण्ठी किराताम्बु यवासकम् ।
ज्वरातीसारसन्तापं नाशयेदविकल्पतः ॥ १४ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, सोंठ, चिरायता, सुगन्धवाला और धमासा इनका क्वाथ पान करनेसे ज्वर और अतिसार निस्सन्देह दूर होता है ॥ १४ ॥

घनजलादि।

घनजलपाठातिविषापथ्योत्पलधान्यरोहिणीविश्वैः ।
सेन्द्रयवैः कृतमम्भः सातीसारं ज्वरं जयति ॥ १५ ॥
नागरमोथा, सुगन्धवाला, पाठ, अतीस, हरड, नीलकमल, धनियाँ, कुटकी, सोंठ, इन्द्रजौ इनका क्वाथ बनाकर पानकरनेसे अतिसारसहित ज्वर दूर होता है ॥ १५ ॥

धान्यनागरादि।

धान्यनागरबिल्वाब्दबालकैः साधितं जलम् ।
आमशूलहरं ग्राह्यं दीपनं पाचनं परम् ॥ १६ ॥
धनियाँ, सोंठ, बेलकी गिरी, नागरमोथा और सुगन्धवाला इनका बनाया हुआ क्वाथ आम और शूलको हरनेवाला, संग्राही एवं दीपन और पाचक है ॥ १६ ॥

बिल्वादि ।

बिल्वबालकभूनिम्बूगुडूचीमुस्तवत्सकैः ।
कषायः पाचनः शोथज्वरातीसारनाशनः ॥ १७ ॥
बेलगिरी, सुगन्धवाला, चिरायता, गिलोय, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ आमपाचक एवं सूजन और ज्वरातिसारको हरनेवाला है ॥ १७ ॥

कुटजादि ।

कुटजो नागरं मुस्तममृताऽतिविषा तथा ।
एभिः कृतं पिबेत्क्वाथं ज्वरातीसारनाशनम् ॥ १८ ॥
कुडेकी छाल, सोंठ, नागरमोथा, गिलोय और अतीस इनके द्वारा बनाया हुआ क्वाथ पान करनेसे ज्वरातीसार शमन होता है ॥ १८ ॥