भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextपथ्यापथ्यम् ] भाषाटीकासहिता । २११
एणः कुलिङ्गो हरिणो मयूरो लावः शशस्तित्तिरिकुक्कुटौ च ।
क्रौञ्चः कुरङ्गः पृषतश्चकोरः कपिञ्जलो वर्तककालपुच्छौ ॥ ६ ॥
गवामजायाश्च पयो घृतं च हरीतकी पर्वतनिर्झराम्भः ।
एरण्डतैलं सितचन्दनं च द्रव्याणि सर्वाणि पुरेरितानि ।
ज्योत्स्नाप्रियालिङ्गनमप्ययं स्याद्गणः पुराणज्वरिणां सुखाय७
विरेचन (जुल्लाब), वमन, अजन, नस्य, धूम्रपान, अनुवासनवस्ती, शिराका वेधना. संशमन औषधियोंका सेवन, प्रलेप, तैलादिकी मालिश, जलमें घुसकर स्नान करना, सर्व प्रकारके शीतल उपचार, कालाहिरन, चिडा, हरिण, मोर, लवा, खरगोश, तीतर, मुर्गा, (एक प्रकारका बगुला), एक विशेष प्रकारका हिरन-चितकबराहिरन, चकोर, चातक, बत्तक और कालपुच्छ इन सब पशुपक्षियोंका मांस या मांसरस एवं गौ और बकरीका दूध, घी, हरड, पहाडी झरनोंका जल, अण्डीका तैल, सफेद चंदन और पहिले कहेहुए सब पदार्थ तथा निर्मल चन्द्रमाकी चांदनी, सुन्दरस्त्रीका आलिंगन आदि पुराने ज्वरमें हितकर हैं ॥१-७॥
ज्वरमें अपथ्य ।
वमिवेगं दन्तकाष्ठमसात्म्यमतिभोजनम् ।
विरुद्धान्यन्नपानानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ ८ ॥
दुष्टाम्बु क्षारमम्लानि पत्रशाकं विरूढकम् ।
नलदाम्बु च ताम्बूलं कालिन्दं लैकुचं फलम् ॥ ९ ॥
ओडीमत्स्यं च पिण्याकं छत्रकं पिष्टवैकृतम् ।
अभिष्यन्दीनि चैतानि ज्वरितः परिवर्जयेत् ॥ १० ॥
व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चंक्रमणामि च ।
ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्नो बलवान् भवेत् ॥ ११ ॥
वमनके वेगको रोकना, दतौन करना, अपने स्वभावके विरुद्ध भोजन अथवा अत्यन्त भोजन, विरुद्ध (प्रकृति, देश और कालके प्रतिकूल) दाहकारक और गुरुपाकी अन्नपान, दूषितजल, खारी और खट्टेरसवाले पदार्थ, पत्तोंवाले और अंकुरोंवाले शाक, नीम, पान, तरबुज, निंबूके फल, ओडीनामक मछली, तिलकुट, छत्रक (साँपकी छतरी) का शाक. पिठ्ठीके बने (पक्वान्न, मिष्टान्नादि) पदार्थ, विकृत और अभिष्यन्दकारक (शरीरके स्रोतोंको बन्द करनेवाले) पदार्थोंको ज्वररोगी