भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २०९
उत्तरे दिनविंशत्या द्वौ मासौ श्रवणे तथा ।
धनिष्ठायामर्द्धमासो वारुणे च दशाहकम् ॥ २८ ॥
भाद्रपदे द्वन्येकोनविंशतिवासरम् ।
त्रिपक्षं चाहिरुध्न्ये च रेवत्यां दशरात्रकम् ॥ २९ ॥
अहोरात्रं तथाऽश्विन्यां भरण्यां तु गतायुषम् ।
एवं क्रमेण जानीयान्नक्षत्रेषु यथोचितम् ॥ ३० ॥
कृत्तिका नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ९ दिन, रोहिणी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ३ दिन और मृगशिरा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ५ दिनतक रहता है एवं आर्द्रा नक्षत्रमें रोगके उत्पन्न होनेपर रोगी मृत्युको प्राप्त होता है । पुनर्वसु और पुष्यनक्षत्रमें उत्पन्नहुआ रोग सात दिनमें एवं आश्लेषानक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग ९ दिनमें दूर होता है । मघानक्षत्रमें रोगके उत्पन्न होनेपर रोगी मरजाता है । पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें उत्पन्न हुआ रोग २ महीनेतक, उत्तराफाल्गुनीमें १५ दिनतक, हस्तनक्षत्रमें ७ दिनतक, चित्रामें १५ दिनतक स्वातीमें २ मासतक, विशाखामें २० दिनतक, अनुराधामें १० दिनतक और ज्येष्ठानक्षत्रमें १५ दिनतक रहता है । मूलनक्षत्रमें रोग होनेपर रोगी रोगसे मुक्त नहीं होता और पूर्वाषाढा नक्षत्रमें रोग होनेपर १५ दिनमें, उत्तराषाढा नक्षत्रमें २० दिनमें, श्रवण नक्षत्रमें दो महीने, धनिष्ठा नक्षत्रमें १५ दिन, शतभिषा नक्षत्रमें १० दिन, पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रमें १९ दिन, उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें ४५ दिन, रेवती नक्षत्रमें १० दिन, अश्विनी और भरणी नक्षत्रमें रोग उत्पन्न हो तो रोगीको एक दिनरातमें मृत्यु हो जाती है । इस क्रमसे नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुए रोगके यथोचित फलाफलको जानना चाहिये ॥ २३-३० ॥
ज्वरमुक्तके लक्षण ।
स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूपाको मुखस्य च ।
क्षवथुश्चान्नलिप्सा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ३१ ॥
पसीनेका आना, शरीरमें हल्कापन, शिरमें खुजली, मुखपर फुंसियोंका निकलना, छींकोंका आना आर भोजनमें इच्छा होना ये सब लक्षण ज्वरके दूर होनेके हैं ॥ ३१ ॥
ज्वरमुक्त रोगीको वर्जनीय पदार्थ ।
व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चंक्रमणानि च ।
ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् ॥ ३२ ॥
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