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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 250 of 1416

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Page 250

२१८ | भैषज्यरत्नावली । | [ ज्वरातिसार-


हक्रान्ता (लज्जावन्ती), कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, धनियाँ और धायके फूल इनके क्वाथमें अतीस और जीरेका थोडा चूर्ण डालकर पान करनेसे ज्वरातिसार, रक्तातिसार और केवल आतिसाररोगमें आरोग्य लाभ होता है। जिसमें सैकड़ों औषधियोंसे भी कुछ लाभ नहीं होता ऐसा असाध्य अतिसार रोग भी इससे दूर होता है ॥ २९-३१ ॥

धान्यशुण्ठी ।

धान्यकं विश्वसंयुक्तमामघ्नं वह्निदीपनम् ।
वातश्लेष्मज्वरहरं शूलातीसारनाशनम् ॥ ३२ ॥

धनियाँ और सोंठका क्वाथ आमनाशक, अग्निप्रदीपक, वातश्लेष्मज्वर, शूल और अतिसारको नष्ट करनेवाला है ॥ ३२ ॥

बिल्वपञ्चक ।

शालपर्णीं पृश्निपर्णीं बला बिल्वं सदाडिमम् ।
बिल्वपञ्चकमित्येतत्क्वाथं कृत्वा प्रदापयेत् ॥
अतीसारे ज्वरे छद्यौँ शस्यते बिल्वपञ्चकम् ॥ ३३ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी और अनारके छिलके इन औषधियोंके समूहको बिल्वपंचक कहते हैं। इस बिल्वपंचकका क्वाथ बनाकर अतिसार, ज्वर और वमनरोगमें पान कराना चाहिये ॥ ३३ ॥

उत्पलषट्क ।

पृश्निपर्णीबलाबिल्वधनिकानागरोत्पलैः ।
ज्वरातिसारयोर्वापि पिबेत्साम्लं शृतं नरः ॥ ३४ ॥

पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलकी गिरी, धनियाँ, सोंठ और कमोदिनी (नीलोफर) इनके क्वाथमें अनारका रस डालकर पान करनेसे ज्वर और अतिसार रोग नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

उत्पलाद्यचूर्ण ।

उत्पल दाडिमत्वक् च पद्मकेशरमेव च ।
पिबेत्तण्डुलतोयेन ज्वरातीसारशान्तये ॥ ३५ ॥

ज्वर और अतिसारको शमन करनेके लिये नीलोत्पल (नीलोफर), अनारके बक्कल और कमलकेशर इनका चूर्ण बनाकर चावलोंके जलके साथ पान करना चाहिये ॥ ३५ ॥