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कबीर के विचार और अनमोल वचन

पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।

कबीर · संत कबीर · कबीरदास · कबीर साहेब · Kabir · Kabir Das162 वचनकबीर के बारे में →

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जाण दसवाँ द्वारा देहुरा, तामे जोति पिछाण

मन ही मथुरा है, दिल ही द्वारका और शरीर ही काशी है। भीतर के दसवें द्वार को मंदिर समझो और उसमें प्रभु की ज्योति को पहचानो।

— Sant Kabir
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कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचै तित जाउँ

कबीर कहते हैं कि मैं राम का कुत्ता हूँ, मेरा नाम मोती है। मेरे गले में राम की रस्सी है, वह जिधर खींचे मैं उधर जाता हूँ। यह पूर्ण समर्पण का भाव है।

— Sant Kabir
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सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै

सारा संसार खा-पीकर सोने में ही सुखी है। कबीर दुखी हैं, क्योंकि वे सत्य को जानकर जागते हैं और प्रभु के विरह में रोते हैं।

— Sant Kabir
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अँखड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि निहारि जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि

प्रभु की राह देखते-देखते आँखों के आगे अँधेरा छा गया और राम-राम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए।

— Sant Kabir
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बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ

विरह रूपी साँप शरीर में बस गया है, उस पर कोई मंत्र काम नहीं करता। राम से बिछुड़ा व्यक्ति जीता नहीं, और जीता है तो बावला हो जाता है।

— Sant Kabir
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जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान

जिस हृदय में प्रेम नहीं, उसे श्मशान समझो। वह लुहार की धौंकनी जैसा है, जो साँस तो लेती है पर उसमें प्राण नहीं होते।

— Sant Kabir
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ऊजल पहिरै कापड़ा, पान सुपारी खाय एक हरि के नाम बिन, बाँधा जमपुर जाय

सफ़ेद उजले कपड़े पहनकर और पान-सुपारी खाकर ठाठ से रहने वाला भी हरि के नाम के बिना अंत में यम के द्वार बँधा हुआ जाता है।

— Sant Kabir
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सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार

सोना और सज्जन सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं, पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, जो एक धक्के में ही दरक जाता है।

— Sant Kabir
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ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होय सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदै सोय

ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या, यदि कर्म ऊँचे नहीं हैं। सोने के कलश में शराब भरी हो तो सज्जन उसकी निंदा ही करते हैं।

— Sant Kabir
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माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय भगता के पीछे फिरे, सनमुख भाजे सोय

माया और छाया एक जैसी हैं, यह कोई विरला ही जानता है। जो उससे मुँह फेर लेता है, उसके पीछे चलती है और जो उसके पीछे भागता है, उससे दूर भागती है।

— Sant Kabir
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मूँड़ मुड़ाए हरि मिलें, सब कोई लेय मुड़ाय बार बार के मूँड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय

सिर मुँड़ाने से हरि मिलते तो सब मुँड़ा लेते। भेड़ का ऊन तो बार-बार कटता है, फिर भी वह बैकुंठ नहीं जाती। बाहरी वेश से भक्ति नहीं होती।

— Sant Kabir
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प्रेम पियाला जो पिये, सीस दच्छिना देय लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय

प्रेम का प्याला वही पीता है जो दक्षिणा में अपना सिर, यानी अहंकार, दे दे। लोभी सिर नहीं दे सकता, वह केवल प्रेम का नाम लेता है।

— Sant Kabir
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कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माहिं

प्रेम का घर मौसी का घर नहीं कि कोई भी चला आए। जो अपना अहंकार रूपी सिर उतारकर हाथ में रख दे, वही इसमें प्रवेश कर सकता है।

— Sant Kabir
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