कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय
स्वयं ठगे जाना अच्छा है, पर किसी और को मत ठगो। स्वयं ठगे जाने पर मन में शांति रहती है, दूसरों को ठगने से दुख मिलता है।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय
स्वयं ठगे जाना अच्छा है, पर किसी और को मत ठगो। स्वयं ठगे जाने पर मन में शांति रहती है, दूसरों को ठगने से दुख मिलता है।
मोर तोर की जेवड़ी, बटि बाँधा संसार दास कबीरा क्यों बँधे, जाके राम अधार
'मेरा-तेरा' की रस्सी बटकर सारा संसार बँधा है। कबीर क्यों बँधे, जिनका सहारा राम हैं।
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जाण दसवाँ द्वारा देहुरा, तामे जोति पिछाण
मन ही मथुरा है, दिल ही द्वारका और शरीर ही काशी है। भीतर के दसवें द्वार को मंदिर समझो और उसमें प्रभु की ज्योति को पहचानो।
तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू
प्रभु को 'तू-तू' पुकारते-पुकारते मैं स्वयं तू हो गया, मुझमें 'मैं' नहीं बचा। अब जहाँ देखता हूँ, वहाँ तू ही तू है।
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचै तित जाउँ
कबीर कहते हैं कि मैं राम का कुत्ता हूँ, मेरा नाम मोती है। मेरे गले में राम की रस्सी है, वह जिधर खींचे मैं उधर जाता हूँ। यह पूर्ण समर्पण का भाव है।
सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै
सारा संसार खा-पीकर सोने में ही सुखी है। कबीर दुखी हैं, क्योंकि वे सत्य को जानकर जागते हैं और प्रभु के विरह में रोते हैं।
अँखड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि निहारि जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि
प्रभु की राह देखते-देखते आँखों के आगे अँधेरा छा गया और राम-राम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ
विरह रूपी साँप शरीर में बस गया है, उस पर कोई मंत्र काम नहीं करता। राम से बिछुड़ा व्यक्ति जीता नहीं, और जीता है तो बावला हो जाता है।
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल
मेरे प्रियतम प्रभु की लाली हर ओर फैली है, जहाँ देखूँ वहीं वह है। उसे देखने गई तो मैं स्वयं उसी रंग में रँग गई।
जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान
जिस हृदय में प्रेम नहीं, उसे श्मशान समझो। वह लुहार की धौंकनी जैसा है, जो साँस तो लेती है पर उसमें प्राण नहीं होते।
कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय ए पुर पट्टन ए गली, बहुरि न देखहु आय
अपनी शान का नगाड़ा दस दिन और बजा लो। यह नगर, यह बस्ती और ये गलियाँ फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगी।
ऊजल पहिरै कापड़ा, पान सुपारी खाय एक हरि के नाम बिन, बाँधा जमपुर जाय
सफ़ेद उजले कपड़े पहनकर और पान-सुपारी खाकर ठाठ से रहने वाला भी हरि के नाम के बिना अंत में यम के द्वार बँधा हुआ जाता है।
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार
सोना और सज्जन सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं, पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, जो एक धक्के में ही दरक जाता है।
ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होय सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदै सोय
ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या, यदि कर्म ऊँचे नहीं हैं। सोने के कलश में शराब भरी हो तो सज्जन उसकी निंदा ही करते हैं।
आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गई खेत
अच्छे दिन बीत गए और प्रभु से प्रेम नहीं किया। अब पछताने से क्या होगा, जब चिड़िया खेत चुग गई।
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय भगता के पीछे फिरे, सनमुख भाजे सोय
माया और छाया एक जैसी हैं, यह कोई विरला ही जानता है। जो उससे मुँह फेर लेता है, उसके पीछे चलती है और जो उसके पीछे भागता है, उससे दूर भागती है।
कबीर माया पापणी, फंध ले बैठी हाटि सब जग तौ फंधै पड्या, गया कबीरा काटि
माया पापिनी है, जो बाज़ार में फंदा लेकर बैठी है। सारा संसार उसके फंदे में फँस गया, पर कबीर उसे काटकर निकल गए।
मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसो भाजि कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि
'मैं-मैं' का अहंकार बड़ी विपत्ति है, हो सके तो इससे भाग निकलो। रूई में लिपटी आग को कब तक छिपाकर रखोगे?
मूँड़ मुड़ाए हरि मिलें, सब कोई लेय मुड़ाय बार बार के मूँड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय
सिर मुँड़ाने से हरि मिलते तो सब मुँड़ा लेते। भेड़ का ऊन तो बार-बार कटता है, फिर भी वह बैकुंठ नहीं जाती। बाहरी वेश से भक्ति नहीं होती।
नहाये धोये क्या भया, जो मन मैल न जाय मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय
नहाने-धोने से क्या होगा, अगर मन का मैल नहीं गया? मछली सदा पानी में रहती है, फिर भी उसकी गंध नहीं जाती।
हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहिं जाय मुख तो तबहीं देखिहै, जब दिल की दुविधा जाय
हृदय के भीतर ही दर्पण है, पर उसमें चेहरा नहीं दिखता। वह तभी दिखेगा जब मन की दुविधा मिट जाएगी।
प्रेम पियाला जो पिये, सीस दच्छिना देय लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय
प्रेम का प्याला वही पीता है जो दक्षिणा में अपना सिर, यानी अहंकार, दे दे। लोभी सिर नहीं दे सकता, वह केवल प्रेम का नाम लेता है।
अकथ कहानी प्रेम की, कछू कही न जाय गूँगे केरी सरकरा, खाय और मुसकाय
प्रेम की कहानी कही नहीं जा सकती, जैसे गूँगा शक्कर खाकर उसका स्वाद बता नहीं पाता, बस मुस्कुरा देता है।
कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माहिं
प्रेम का घर मौसी का घर नहीं कि कोई भी चला आए। जो अपना अहंकार रूपी सिर उतारकर हाथ में रख दे, वही इसमें प्रवेश कर सकता है।