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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं राजयोग-रहस्य भूमिका

शंकराचार्य कृत
योगतारावली
[ हिन्दी अनुवाद और विशद व्याख्या के साथ ]
रामशंकर भट्टाचार्य
प्रकाशक
भारतीय विद्या प्रकाशन
वाराणसी दिल्ली

सिद्धसिद्धान्तपद्धतिः
(हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित)
गोरक्षनाथ विरचिता
प्रकाशकः
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
दिल्ली वाराणसी

शंकराचार्यकृत
योगतारावली
[ हिन्दी अनुवाद और विशद व्याख्या के साथ ]
अनुवादक तथा व्याख्याकार
रामशंकर भट्टाचार्य
( एम. ए ; पीएच-डी.; व्याकरणाचार्य )
Co editor : Encyclopedia of Indian Philosophies
( Vols. on Samkhya & Yoga );
Editor : Purana, All-India Kasiraj Trust.
Varanasi
प्रकाशक
भारतीय विद्या प्रकाशन
वाराणसी दिल्ली

[सील:]
भारतीय विद्या प्रकाशन
संशोधित मूल्य
२०/-
वाराणसी
I.S.B.N., 81-217-0035-3
First Ed. 1987
Price Rs. 10.00
भारतीय विद्या प्रकाशन
१. पो० ब० ११०८, कचौड़ी गली, वाराणसी-२२१००१
२. १. यू० बी० जवाहर नगर, बंग्लो रोड, दिल्ली-११०००७
मुद्रक :
वाराणसी मुद्रण संस्थान
डी० ५१/६२ सूरजकुण्ड, वाराणसी

YOGATĀRĀVALĪ
with Hindi Translations & Notes and a Preface
Ram Shankar Bhattacharya
M.A.; Ph.D.; Vyakaranacharya
Co-editor : Encyclopedia of Indian Philosophies
( Vols. on Samkhya & Yoga );
Editor : Purana, All-India Kasiraj Trust,
VARANASI
BHARATIYA VIDYA PRAKASAN
VARANASI DELHI

I.S.B.N., 81-217-0035-3
First Edition, 1987
Price : Rs. 15.00
Publisher :
BHARATIYA VIDYA PRAKASHAN
Post Box 1108, Kachauri Gali, Varanasi

  1. U. B. Jawahar Nagar, Bungalow Road. Delhi-110007
    Printer :
    VARANASI MUDRAN SANSTHAN
    D. 51/92 Suraj Kund
    Varanasi-( India )

प्राक्कथन
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥
राजयोग का प्रतिपादक श्लोकबद्ध योगतारावली¹-नामक ग्रन्थ
योगाभ्यासियों में अत्यन्त प्रसिद्ध रहा है। इस ग्रन्थ को शंकराचार्य द्वारा
विरचित माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न प्रकाशकों द्वारा
प्रकाशित शाङ्करग्रन्थावलियों में यह ग्रन्थ अवश्य संयोजित रहता है।
पृथक् रूप से इस ग्रन्थ का प्रकाशन कदाचित् ही देखा जाता है।
यह खेद का विषय है कि प्रस्तुत ग्रन्थ में वर्णित विषय यद्यपि अत्यन्त
उच्चकोटि का है तथा इसकी भाषा भी कहीं-कहीं व्याख्या की अपेक्षा
रखती है, तथापि इसकी कोई प्राचीन संस्कृत टीका प्रचलित नहीं है,
जबकि शंकराचार्यकृत दार्शनिक-विचार-बहुल दक्षिणामूर्ति-स्तोत्र की टीका
१. 'तारावली' शब्द का तात्पर्य विज्ञेय है। ताराओं की संख्या २७ हैं। यदि
ग्रन्थ के मुख्य श्लोक २७ हों तो 'तारा' शब्द का प्रयोग ग्रन्थ-नाम में किया
जा सकता है ( १-२ गौण श्लोक भी ऐसे नामवाले ग्रन्थों में कभी-कभी
रहते हैं)। तारा की तरह नक्षत्र शब्द भी प्रयुक्त होता है। 'शिवपञ्चाक्षर-
नक्षत्रमाला' (शंकराचार्यकृत) में २७ श्लोक हैं ( २७ मुक्ताओं से जो
माला बनती है, वह नक्षत्रमाला कहलाती है, यह ज्ञातव्य है)।

( २ )
उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने, वेदान्तकेशरी की टीका आनन्दगिरि ने तथा
निर्वाणदशक की टीका मधुसूदन सरस्वती ने लिखी है। टीका न रहने के
कारण इस ग्रन्थ के कुछ वाक्यों का तात्पर्य समझने में कठिनता होती है।
ग्रन्थगत श्लोकों का मुद्रित पाठ भी सर्वत्र शुद्ध प्रतीत नहीं होता। विभिन्न
संस्करणों में श्लोकों के अनेक पाठान्तर दृष्ट होते हैं। अतः प्राचीन हस्त-
लेखों के आधार पर इस ग्रन्थ का एक शुद्धपाठयुत संस्करण प्रस्तुत करना
आवश्यक प्रतीत होता है। शुद्ध पाठों के बिना अर्थनिर्धारण करना सुकर
नहीं है।
इस ग्रन्थ के जो एक-दो व्याख्या-ग्रन्थ (हिन्दी-बंगला में) प्रचलित हैं,
वे बहुत ही साधारण कोटि के हैं। इनमें न पाठों पर उचित विचार किया
गया है और न शब्दों के विवक्षित तात्पर्य के निर्धारण के लिए उचित
प्रयास किया गया है ! प्रस्तुत व्याख्या में योगतारावली में प्रयुक्त शब्दों के
विवक्षित अर्थों का निर्धारण योगग्रन्थों के आधार पर करने की चेष्टा की
गई है तथा कौन पाठ संगत है, इस पर भी विचार किया गया है। हम
समझते हैं कि हठयोगप्रदीपिका की ज्योत्स्नाटीका की तरह एक टीका इस
ग्रन्थ के लिए भी आवश्यक है। कोई अभ्यासशील विद्वान् योगी यदि इस
कार्य को करें तो हम सब उपकृत होंगे।
शङ्कराचार्य इस ग्रन्थ के लेखक हैं—इस प्रसिद्धि में हमें पर्याप्त संशय
है। इस ग्रन्थ का उद्धरण प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थों में नहीं मिलता;
अट्ठारवीं शती के शाक्त भास्कर आचार्य (द्र० १७ श्लोक की व्याख्या) तथा
१६-१७ वीं शती के योगी शिवानन्द (द्र० ६ श्लोक की व्याख्या) के
द्वारा इस ग्रन्थ के वाक्य उद्धृत हुये हैं। किंच शंकर-संप्रदाय के किसी
आचार्य के द्वारा अथवा हठयोगादि योगप्रस्थानों के किसी आचार्य के द्वारा
इस ग्रन्थ की टीका न लिखा जाना इसकी शंकरकर्तृकता में दृढ़ संशय
उत्पन्न करता है। यह भी देखा जाता है कि इस ग्रन्थ का वाक्य
'नन्दिकेश्वरकृत तारावली' के नाम से उद्धृत किया गया है (द्र० ६ श्लोक

( ३ )
की व्याख्या) । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि इस ग्रन्थ को शंकर-
विरचित मानना संशयास्पद है ।
यदि नन्दिकेश्वर नामक किसी आचार्य के द्वारा यह ग्रन्थ विरचित हो
तब भी इस प्रश्न का समाधान ढूंढना होगा कि क्यों यह ग्रन्थ शंकराचार्य
की कृति के रूप में प्रसिद्ध हुआ ? नन्दिकेश्वर का परिचय भी निर्धारणीय
है । पुराणों में जिस शिलाद ऋषि के पुत्र नन्दिकेश्वर का चरित है २
( जिनका मानव शरीर जीवित अवस्था में ही दैव शरीर में परिणत हो
गया था; द्र० व्यासभाष्य २।१२-१३ ) वे इस ग्रन्थ के रचयिता हैं, ऐसा
मानने का कोई आधार नहीं है ।
ग्रन्थकार ने श्रीशैल ( श्रीपर्वत ) में निवास करने की उत्कट इच्छा
व्यक्त की है ( श्लोक २८ ) । लेखक का दक्षिणभारत का निवासी होना
इससे ज्ञापित होता है ।
प्रस्तुत संस्करण का मुख्य वैशिष्ट्य यह है कि हमने श्लोकों के
अर्थनिर्धारण में कहीं भी निराधार कल्पना का आश्रय नहीं लिया तथा
व्याख्या में अनावश्यक विस्तार भी नहीं किया । श्लोक-प्रयुक्त शब्दों का
अर्थ अन्यान्य योगग्रन्थों के आधार पर ही किया गया है—यह सहृदय
पाठक देख सकते हैं । व्याख्या में जो सामग्री संकलित की गई है उसके
आधार पर पाठक स्वयं भी श्लोकों के अर्थों का निर्धारण करने में समर्थ
होंगे—ऐसा हम समझते हैं; साथ ही हम यह भी चाहते हैं कि पाठक स्वयं
हमारी व्याख्या की युक्तायुक्तत्व की परीक्षा करें । हमें यह कहने में कोई
भी संकोच नहीं है कि ग्रन्थोक्त कुछ विषय सर्वथा स्पष्ट नहीं हैं । इस
२. द्र० शिवपु० ३।६ अ०; स्कन्दपु० केदारखण्ड ५।१११-११३; स्कन्दपु०
काशीखण्ड ११।१०६; वराहपु० १४४।१६७; वराहपु० २१३।६९-७१;
कूर्मपु० १।४३।१२८; २।४१।१७-४२ । विशद विवरण के लिए मेरा
'Nandin-a yogin' शीर्षक निबन्ध (Journal of the Yoga
Institute, Bombay, Vol. XXVII. 8 में प्रकाशित ) पठनीय है ।

( ४ )
अस्पष्टता का एक हेतु है—श्लोकों के अशुद्ध पाठ--यह कहना अनुचित
नहीं होगा। यह भी निवेदनीय है कि हम चूँकि स्थूलरूप से योग का मनन-
मात्र करते हैं, अतः अयोग्यता के कारण भी हमारी व्याख्या में कहीं-कहीं
भ्रान्ति हो सकती है।
पाठकों की सुविधा के लिए एक 'शब्दसूची' भो ग्रन्थान्त में दी गई है।
पाठक देखेंगे कि ग्रन्थगत कई शब्द विरल-प्रयुक्त हैं। हठसंकेतचन्द्रिका,
हठतत्त्वकौमुदी ( सुन्दरदेवकृत ) आदि विस्तृत ग्रन्थों के प्रकाशन होने पर
इन शब्दों के अर्थों को समझने में सुविधा होगी। इति
गुरुपूर्णिमा रामशंकर भट्टाचार्य
११-७-१९८७
डी० ३८/८ हौजकटोरा, वाराणसी

१. श्लोक १-१०: बन्धत्रय, कुम्भक एवं नादानुसन्धान प्रारम्भ

PREFACE
The Yogatārāvalī deals with some practices of both Haṭha-
yoga and Rājayoga. Though the work is in 29 verses, yet almost
all important practices are mentioned in it. In a few places
necessary details have also been given in brief.
A synopsis of these verses is given below :
( Verse 1 ) Obeisance to Haṭhayoga.
(2) The nādānusandhāna concentration is said to be the
highest of all layas ( obsorption ).
(3) Divine experience to be realized by the practitioner
whose nerves have been purified.
(4) The dissolution of the mind into the feet of Viṣṇu by
means of the nādānusandhāna ( listening to the inner sound ).
(5) Efficacy of the three bandhas, namely Jālandhara,
Uddiyāna and Mūla.
(6) The rise of Kuṇḍalī ( Coiled Energy ) and its entering
the Suṣumnā nerve.
(7) Drinking of nector issuing from the moon heated by the
fire coming out from the Suṣumnā nerve.
(8) Practice of Kevala-kumbhaka ( the stoppage of breath
called Kevala ) which checks the flow of external knowledge.

[ 2 ]
(9-10) The developed stage of Kevala kumbhaka; absence
of inhalation and exhalation in this kumbhaka.
(11-12) The state in which the vital air gets dissolved in
Viṣṇu's feet.
(13) The rise of the state that transcends all functions of
sense organs.
(14-16) Characteristics of the perfected stage of Rājayoga.
(17) Description of the stage called Manonmanī (fixedness
of mind).
(18) Characteristics of yogins attaining to the state of
Manonmanī.
(19) Chief means of acquiring the Unmanī state (steadiness
of mind).
(20) Characteristics of the mind that can attain to peace.
(21-22) External as well as internal signs or characteristics
of persons established in the Amanaska mudrā.
(23) Intense longing of a practitioner to acquire the
Amanaska state.
(24) The rise of Yoganidrā (yogic sleep) and its results.
(25-26) Qualifications of a person capable of attaining to
yogic sleep and the divine pleasure to be derived from it.
(27) Persons who are bereft of all knowledge of objects.
(28) Longing of a practitioner of higher stage to acquire
siddhi and to reside in the cave of the Śrīparvata.
(29) The state in which a practitioner listens to divine
sounds.

[ 3 ]
The authorship of the work is usually ascribed to the great
Advaita teacher Śaṅkarācārya. There are however strong grounds
to hold that this ascription is not beyond doubt. The work had
not been commented on by any of the direct or indirect disciples of
Śaṅkarācārya, nor has it been commented on by any teacher of minor
yoga schools. Moreover the work does not seem to have been
quoted by any teacher who lived before the fifteenth century. All
these tend to show that the work belongs to a much later date. It
is quite reasonable to hold that the work was composed by one
of these later Śaṅkarācāryas who were proficient in Haṭha and
Rāja yogas.
There is a difficulty in accepting this view also, for the
work was ascribed to Nandikeśvara by Śivānanda ( in his
Yogacintāmaṇi, p. 15 ), one of the authorities on yoga. It is
difficult to explain this change in authorship. Even if we accept
the authorship of Nandikeśvara, it is difficult to identify him.
Historically it is impossible to take this Nandikeśvara as the
same as the Puranic Nandin or Nandikeśvara ( the son of the
sage Śilāda ), who assumed a daiva śarīra ( divine body )
through the grace of Śiva. A Nandikeśvara is said to have
composed a commentary ( in verse ) on the fourteen Pratyāhāra
sūtras of Paninian grammar. The identification of these two
Nandikeśvaras is still to be proved.
It is a pity that the present work has no ancient Sanskrit
commentary. There are, however, a few translations and commen-
taries in Hindi and Bengali. These commentaries neither try to
determine the intended importe of the important expressions of
the text, nor take into consideration the variant readings found in
the different printed editions of the text. Though we have tried to

[ 4 ]
explain the expressions of the text with the help of the available
works on Haṭhayoga and Rājayoga, yet we do not hesitate to
declare that the significance of some of the expressions remains
still to be determined.
The work, we believe, will delight all lovers of yoga and
inspire them to run on the path of yoga with undivided
attention.
R. S. Bhattacharya

योगतारावली
वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे
सन्दशितस्वात्मसुखावबोधे ।
जनस्य ये जाङ्गलिकायमाने'
संसारहालाहलमोहशान्त्यै ॥१॥
[ १. निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने ( पाठा० ) ]
अनुवाद—संसाररूपी विष ( के पान ) से उत्पन्न मोह की शान्ति के
लिए गुरुदेव के जो दो चरणकमल ( लोगों में ) विषवैद्य की तरह आचरण
करते हैं अर्थात् गुरु के चरण संसारमोह का नाश करते हैं), आत्मसुखबोध
के दर्शक उन दो चरणों की वन्दना करता हूँ ।
व्याख्या—गुरु शब्द में जो बहुवचन है वह या तो स्वीय गुरु के प्रति
गौरव-प्रदर्शन के लिए है अथवा वह परम्परागत सभी गुरुओं के लिए है ।
योगाभ्यास के लिए गुरु-उपदेश की अत्यन्त आवश्यकता होती है । यही कारण
है कि योग के ग्रन्थों में 'गुरु-उपदिष्ट मार्ग' आदि शब्द प्रायः प्रयुक्त होते हैं ।
गुरु-महिमा के लिए ह० यो० प्र० १।१४ की ज्योत्स्ना टीका द्रष्टव्य है ।
सन्द...बोधे—'चरणारविन्दे' का विशेषण । सन्दर्शित हुआ है स्वात्म-
सुख-अवबोध जिनके द्वारा वे ( दो चरण ) ।
जाङ्गलिक = विषवैद्य; अमरकोश १।८।१४ में जाङ्गुलिक शब्द है, पर
जाङ्गलिक शब्द का भी अन्य कोशों में उल्लेख मिलता है । काशीखण्ड आदि में
जाङ्गुलिक शब्द प्रयुक्त हुआ है ।
तृतीय चरण का पाठान्तर है—'निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने' । यह पाठ संगत

( २ )
हो सकता है । ये दो पद 'चरणारविन्दे' के विशेषण हैं । निःश्रेयस = निश्चित
श्रेयोरूप । माङ्गलिकायमान = माङ्गलिक की तरह आचरण करने वाले ।
हालाहल = विष । पुराणों में कहा गया है कि हिमालय पर्वतस्य हलाहला-
नदी के तीर में यह विष उत्पन्न होता है ।
सदाशिवोक्तानि सपादलक्ष-
लयावधानानि च सन्ति¹लोके ।
नादानुसन्धानसमाधिमेकं
मन्यामहे मान्यतमं² लयानाम्³ ॥२॥
[ १. वसन्ति लोके (पाठा० ) २. अन्यतमम् (पाठा० ); यह भ्रष्ट पाठ
है । ३ इस श्लोक का अनुरूप श्लोक ह० यो० प्र० में है—श्री आदिनाथेन
सपादकोटि-लयप्रकाराः कथिता जयन्ति । नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे
मुख्यतमं लयानाम् ( ४।६६ ); 'नादानुसन्धानसमाधि' शब्द ४।१८ में प्रयुक्त
हुआ है । ]
अनुवाद - सदाशिव के द्वारा प्रोक्त एक लाख पच्चीस हजार लययोग
इस लोक में हैं। इन सब लयों में एकमात्र नादानुसन्धान-समाधि (नादानु-
सन्धान-पूर्वक या नादानुसन्धान से युक्त समाधि) को (हम) सर्वोच्च लय
के रूप में समझते हैं (नादानुसन्धान के विषय में श्लोक ४ द्र०) ।
व्याख्या—शिव को सभी योगों के मूल वक्ता के रूप में मानने की भी एक
प्रसिद्ध परम्परा है । लययोग के श्लोकोक्त भेदों की उपपत्ति गुरु-परम्परा से
जाननी चाहिये—बहिरङ्ग आलोचना से यह ज्ञातव्य नहीं है । ज्योत्स्नाटीका में
कहा गया है—श्री आदिनाथोक्तसपादकोटिसमाधिप्रकारेपु ( ४।२ ) । इस योग
के अनन्तकोटि भेद हैं—यह भी कहीं कही कहा गया है । साधन-क्रिया के
कौशल-भेद से ये भेद होते हैं—यह ज्ञातव्य है ।

( ३ )
लययोग योग का अवान्तर भेद है। प्राचीन परम्परा में योग के चार भेद
माने गये हैं—मन्त्र, लय, हठ तथा राजा ( द्र० शिवपु० ७।२।३७।९, लिङ्गपु०
२।५५।७ आदि ) । योगतत्त्वोपनिषद् २२-२३, दत्तात्रेय-संहिता ( प्राणतोषिणी
तन्त्र, पृ० ४३९-४४० में उद्धृत ) आदि में इस योग का विशिष्ट विवरण
द्रष्टव्य है¹। योगकर्णिका, पृ० १४३-१४४ भी द्रष्टव्य है ।
नादानुसन्धान का अर्थ है—अनाहतध्वनि का अनुचिन्तन । इस 'अनुसन्धान'
शब्द का प्रयोग अमनस्कयोग २।१४ में भी मिलता है। नादानुसन्धान को श्रेष्ठ
लय मानना हठयोग का एक प्रतिष्ठित मत है—न नादसदृशो लयः ( ह० यो०
प्र० ४।४३ ) । 'लय' का तात्पर्य 'लयहेतु' से है—नाद चित्तलय का सर्वश्रेष्ठ
हेतु है। ह० यो० प्र० ४।६६-१०२ में नादानुसंधान का सविशेष विवरण
द्रष्टव्य है ।
लयावधान = लय के प्रति अवधान। इस लय के विषय में ह० यो० प्र० ४।३१-
३४ द्रष्टव्य है। लय का सर्वोच्च रूप मनोलय है, पर पहले प्राणलय करणीय
है। मनोलय के कारण विषय-विस्मृति ( विषय ज्ञान का संस्कार न रहने के
कारण ) होती है (४।३४)। यह लय उसको होता है, जिसके श्वास-प्रश्वास रुद्ध
हो गये हैं ( योग-शास्त्रोक्त उपायविशेष के द्वारा—अन्य किसी अशास्त्रीय उपाय
से नहीं ), शब्दादि का ग्रहण रुद्ध हो गया है और शारीरिक क्रियाये स्तम्भित
हो गई हैं—'निर्जीवः काष्ठवत् तिष्ठेत्, लयस्थश्चाभिधीयते' । योगचिन्तामणि
पृ० २५५-२५६ में लयस्थ योगी के लक्षण द्रष्टव्य हैं। लयस्थ योगी के विशद
वर्णन के लिए तथा लयाभ्यास के फल आदि के लिए गोरक्षकृत अमनस्क-योग
( १।३७ से अध्यायान्त पर्यन्त ) द्रष्टव्य है ।
१. द्र० क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । तदैक्ये साधिते देवि चित्तं
याति विलीनताम् ॥ पवनः स्थैर्यमायाति लययोगोदये सति । ( योगबीज ) ।
लययोगेऽपि, नवस्वेव चक्रेषु मरुन्मनसोर्लयो लययोग इत्युच्यते ( योग-
चिन्तामणि, पृ० १३ ) ।

( ४ )
सरेच-पूरैरनिलस्य कुम्भैः¹
सर्वासु नाडीसु विशोधितासु ।
अनाहतादम्बुरुहादुदेति
स्वात्मावगम्यः स्वयमेव बोधः² ॥३॥
[ १. कुम्भे ( पाठ० )--यह अपपाठ है। २. अनाहताख्यो बहुभिः
प्रकारैरन्तः प्रवर्तेत सदा निनादः ( पाठ० )—अनाहत नामक नाद अनेक प्रकारों
से अन्तःकरण में सदा उदित रहता है । ]
अनुवाद —वायु के पूरक, रेचक और कुम्भक के द्वारा जब नाडियाँ
विशोधित मलहीन हो जाती हैं, तब अनाहत नामक पद्म (चक्र) से वह
बोध स्वयं ही उदित होता है जो अपने द्वारा ही ज्ञेय है (अर्थात् दूसरे
किसी के द्वारा ज्ञात नही हो सकता) ।
व्याख्या --यहाँ रेचक, पूरक और कुम्भक के द्वारा जिस नाडीशुद्धि की
बात कही गई है उसका स्वरूप है —योगविरोधी मल का दूरीकरण जिसके कुछ
बाह्य फल शरीर में भी दृष्ट होते हैं। नाडीशुद्धि होने पर सप्राण शरीर
आत्मज्ञान के अभ्यास के लिए समर्थ होता है तथा सूक्ष्म मानस अनुभूतियों का
उदय होने पर उसके वेग का धारण कर सकता है।¹ हठयोग के ग्रन्थों में
प्राणायाम का विशेष विवरण द्रष्टव्य है। सामान्यतः कहा जा सकता है
कि बाह्य वायु का प्रयत्नविशेष से ग्रहण करना पूरक है। पूरित वायु का बन्ध-
पूर्वक निरोध करना कुम्भक ( कुम्भ शब्द भी प्रयुक्त होता है ) है । कुम्भक के
१. द्र० यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिरारोग्यं भवेन्
नाडीविशोधनात् ।। ( काशीखण्ड ); यदा नाडीविशुद्धिः स्यात् तदा
चिह्नानि योगिनः । जायन्ते यानि देहे वै तानि मे गदतः शृणु । शरीर-
लघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् । कृशत्वं च शरीरस्य तदा जायेत
निश्चितम् ॥ ( दत्तात्रेय ) ।

( ५ )
बाद प्रयत्न-विशेष से वायु का रेचन (=बहिर्निःसारण ) रेचक है। पूरणादि
नाना प्रकार से किये जाते हैं।
योग में नाडियों की संख्या ७२००० मानी गई है ( ह० यो० प्र० १-३९;
३।२३ ) तथा ज्ञानसंकलिनी-तन्त्र ७७। इस मत का मूल श्रुति में है
( प्रश्न० ३।६ ) । ये नाडियाँ हृदय से सर्वतोगामी होकर पूरे शरीर में व्याप्त
रहती हैं।
आहत (=अभिघात से उत्पन्न ) न होने के कारण यह ध्वनि 'अनाहतनाद'
कहलाता है। यह प्रधानतः अनाहत चक्र में उदित होता है। पहले पहल यह
दक्षिणकर्ण में सुना जाता है ( ऐसा ही प्रतीत होता है ); बाद में पूरे शरीर में
ऊर्ध्वगतिमान् धारा की तरह ज्ञात होता है ! इस अनाहत के द्वारा ही कुण्डलिनी
को ब्रह्मरन्ध्र में लाया जाता है। नाद यहाँ बिन्दुरूप से परिणत होता है—ऐसा
योगियों का कहना है। ( द्र० घेरण्डसंहिता उप० ५ )।
नादानुसन्धान नमोऽस्तु तुभ्यं
त्वां मन्महे तत्त्वपदं लयानाम्¹।
भवत्प्रसादात् पवनेन साकं
विलीयते विष्णुपदे मनो मे ॥४॥
[ १. त्वां साधनं तत्त्वपदस्य जाने ( पाठा० )—अर्थात् तुम तत्त्वपद का
साधन हो—ऐसा मैं जानता हूँ ]
अनुवाद—हे नादानुसन्धान, तुम्हे नमस्कार है। लयों में तुम ही तत्त्व-
पद हो—ऐसा हम समझते हैं। तुम्हारी प्रसन्नता ( =स्वच्छता, निर्मलता)
होने पर वायु (=प्राणवायु) के साथ मेरा मन विष्णुपद में विलीन होता है।
व्याख्या—नादानुसन्धान के लिए ह० यो० प्र० ४।६६-६८ तथा घेरण्ड-
संहिता उप० ५ द्रष्टव्य है। इसका निकट सम्बन्ध राजयोग से है। चित्तलय में

( ६ )
नाद की हेतुता योगशास्त्र में स्पष्टतया कथित हुई है । ( द्र० ह० यो० प्र०
४।८१, ४।९८ ) ।
तत्त्वपदं लयानाम्—तत्त्वरूप जो पद वह तत्त्वपद । तत्त्व=वस्तु का अना-
रोपित रूप¹ । पद = योगियों द्वारा गम्य ( पद्यते गम्यते योगिभिः ) ।
'प्राणवायु के साथ मन का विष्णुपद में लीन होना' हठयोग का प्रसिद्ध मत
है—यन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् (घेरण्ड० ५।८२); ह० यो० प्र०
४।२९ में प्राण और मन के लय के विषय से सम्बन्धित कार्यकारणपरम्परा
कही गई है ।
'जालन्धरौड्ड्यानकमूलबन्धान्
जल्पन्ति कण्ठोदरपायुमूले² ।
बन्धत्रयेऽस्मिन् परिचीयमाने
बन्धः कुतो दारुणकालपाशैः ॥५॥
[ १. जालन्धरोड्डयन ( पाठा० ) इस पाठ में छन्दोभङ्ग होता है ।
[L1