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सर्वकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

योगतारावली
वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे
सन्दशितस्वात्मसुखावबोधे ।
जनस्य ये जाङ्गलिकायमाने'
संसारहालाहलमोहशान्त्यै ॥१॥
[ १. निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने ( पाठा० ) ]
अनुवाद—संसाररूपी विष ( के पान ) से उत्पन्न मोह की शान्ति के
लिए गुरुदेव के जो दो चरणकमल ( लोगों में ) विषवैद्य की तरह आचरण
करते हैं अर्थात् गुरु के चरण संसारमोह का नाश करते हैं), आत्मसुखबोध
के दर्शक उन दो चरणों की वन्दना करता हूँ ।
व्याख्या—गुरु शब्द में जो बहुवचन है वह या तो स्वीय गुरु के प्रति
गौरव-प्रदर्शन के लिए है अथवा वह परम्परागत सभी गुरुओं के लिए है ।
योगाभ्यास के लिए गुरु-उपदेश की अत्यन्त आवश्यकता होती है । यही कारण
है कि योग के ग्रन्थों में 'गुरु-उपदिष्ट मार्ग' आदि शब्द प्रायः प्रयुक्त होते हैं ।
गुरु-महिमा के लिए ह० यो० प्र० १।१४ की ज्योत्स्ना टीका द्रष्टव्य है ।
सन्द...बोधे—'चरणारविन्दे' का विशेषण । सन्दर्शित हुआ है स्वात्म-
सुख-अवबोध जिनके द्वारा वे ( दो चरण ) ।
जाङ्गलिक = विषवैद्य; अमरकोश १।८।१४ में जाङ्गुलिक शब्द है, पर
जाङ्गलिक शब्द का भी अन्य कोशों में उल्लेख मिलता है । काशीखण्ड आदि में
जाङ्गुलिक शब्द प्रयुक्त हुआ है ।
तृतीय चरण का पाठान्तर है—'निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने' । यह पाठ संगत