सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 52 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

( २ )
हो सकता है । ये दो पद 'चरणारविन्दे' के विशेषण हैं । निःश्रेयस = निश्चित
श्रेयोरूप । माङ्गलिकायमान = माङ्गलिक की तरह आचरण करने वाले ।
हालाहल = विष । पुराणों में कहा गया है कि हिमालय पर्वतस्य हलाहला-
नदी के तीर में यह विष उत्पन्न होता है ।
सदाशिवोक्तानि सपादलक्ष-
लयावधानानि च सन्ति¹लोके ।
नादानुसन्धानसमाधिमेकं
मन्यामहे मान्यतमं² लयानाम्³ ॥२॥
[ १. वसन्ति लोके (पाठा० ) २. अन्यतमम् (पाठा० ); यह भ्रष्ट पाठ
है । ३ इस श्लोक का अनुरूप श्लोक ह० यो० प्र० में है—श्री आदिनाथेन
सपादकोटि-लयप्रकाराः कथिता जयन्ति । नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे
मुख्यतमं लयानाम् ( ४।६६ ); 'नादानुसन्धानसमाधि' शब्द ४।१८ में प्रयुक्त
हुआ है । ]
अनुवाद - सदाशिव के द्वारा प्रोक्त एक लाख पच्चीस हजार लययोग
इस लोक में हैं। इन सब लयों में एकमात्र नादानुसन्धान-समाधि (नादानु-
सन्धान-पूर्वक या नादानुसन्धान से युक्त समाधि) को (हम) सर्वोच्च लय
के रूप में समझते हैं (नादानुसन्धान के विषय में श्लोक ४ द्र०) ।
व्याख्या—शिव को सभी योगों के मूल वक्ता के रूप में मानने की भी एक
प्रसिद्ध परम्परा है । लययोग के श्लोकोक्त भेदों की उपपत्ति गुरु-परम्परा से
जाननी चाहिये—बहिरङ्ग आलोचना से यह ज्ञातव्य नहीं है । ज्योत्स्नाटीका में
कहा गया है—श्री आदिनाथोक्तसपादकोटिसमाधिप्रकारेपु ( ४।२ ) । इस योग
के अनन्तकोटि भेद हैं—यह भी कहीं कही कहा गया है । साधन-क्रिया के
कौशल-भेद से ये भेद होते हैं—यह ज्ञातव्य है ।