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सर्वकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने, वेदान्तकेशरी की टीका आनन्दगिरि ने तथा
निर्वाणदशक की टीका मधुसूदन सरस्वती ने लिखी है। टीका न रहने के
कारण इस ग्रन्थ के कुछ वाक्यों का तात्पर्य समझने में कठिनता होती है।
ग्रन्थगत श्लोकों का मुद्रित पाठ भी सर्वत्र शुद्ध प्रतीत नहीं होता। विभिन्न
संस्करणों में श्लोकों के अनेक पाठान्तर दृष्ट होते हैं। अतः प्राचीन हस्त-
लेखों के आधार पर इस ग्रन्थ का एक शुद्धपाठयुत संस्करण प्रस्तुत करना
आवश्यक प्रतीत होता है। शुद्ध पाठों के बिना अर्थनिर्धारण करना सुकर
नहीं है।
इस ग्रन्थ के जो एक-दो व्याख्या-ग्रन्थ (हिन्दी-बंगला में) प्रचलित हैं,
वे बहुत ही साधारण कोटि के हैं। इनमें न पाठों पर उचित विचार किया
गया है और न शब्दों के विवक्षित तात्पर्य के निर्धारण के लिए उचित
प्रयास किया गया है ! प्रस्तुत व्याख्या में योगतारावली में प्रयुक्त शब्दों के
विवक्षित अर्थों का निर्धारण योगग्रन्थों के आधार पर करने की चेष्टा की
गई है तथा कौन पाठ संगत है, इस पर भी विचार किया गया है। हम
समझते हैं कि हठयोगप्रदीपिका की ज्योत्स्नाटीका की तरह एक टीका इस
ग्रन्थ के लिए भी आवश्यक है। कोई अभ्यासशील विद्वान् योगी यदि इस
कार्य को करें तो हम सब उपकृत होंगे।
शङ्कराचार्य इस ग्रन्थ के लेखक हैं—इस प्रसिद्धि में हमें पर्याप्त संशय
है। इस ग्रन्थ का उद्धरण प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थों में नहीं मिलता;
अट्ठारवीं शती के शाक्त भास्कर आचार्य (द्र० १७ श्लोक की व्याख्या) तथा
१६-१७ वीं शती के योगी शिवानन्द (द्र० ६ श्लोक की व्याख्या) के
द्वारा इस ग्रन्थ के वाक्य उद्धृत हुये हैं। किंच शंकर-संप्रदाय के किसी
आचार्य के द्वारा अथवा हठयोगादि योगप्रस्थानों के किसी आचार्य के द्वारा
इस ग्रन्थ की टीका न लिखा जाना इसकी शंकरकर्तृकता में दृढ़ संशय
उत्पन्न करता है। यह भी देखा जाता है कि इस ग्रन्थ का वाक्य
'नन्दिकेश्वरकृत तारावली' के नाम से उद्धृत किया गया है (द्र० ६ श्लोक